Thursday, August 2, 2012

पूर्व सुखराम ब्रह्मण अब नव-मुस्लिम फारूक़ आजम से एक मुलाकात interview

तिहाड और दूसरी जेलों  में हजारों खतरनाक कैदियों को और नागपुर जेल में जेलर को ही अनेकश्‍वरवाद की दुनिया से निकालने वाले  पूर्व ब्रह्मण अब नव मुस्लिम फारूक़ आजम का उर्दू मासिक पत्रीका 'अरमुगान' अगस्‍त 2012 ईं  के लिए मौलाना मुहम्‍मद कलीम सिद्दीकी साहब के सुपुत्र अहमद अव्‍वाह को दिया गया interview साक्षात्कार 

अहमद अव्वाहः अस्सलामु अलैकुम
पूर्व ब्रह्मण अब नव मुस्लिम अब्दुर्रहमान: वालैकुम सलाम

अहमद अव्वाहः अस्सलामु अलैकुम
(ब्रह्मण) पूर्व सुखराम अब नव-मुस्लिम फारूक़ आजम: वालैकुम सलाम

अहमद: आप इस वक्त कहां से आ रहे हैं?
फारूक आजम: में चार महीने की तब्लीगी जमात में हूं, हमारी जमात दो चिल्ले लगाकर पहुंची है, तीसरी चिल्ले के लिए महाराष्‍ट्र का रूख बना है अर्थात तय हुआ है, परसों का रिजर्वेशन हुआ है, आज सोचा हजरत से मुलाकात हो जाए, अल्लाह का शुक्र है मुलाकात हो गयी।

अहमद: जमात में आपने वक्त कहां लगाया?
फारूक आजम: पहला चिल्ला गुजरात में लगा और दूसरा राजस्थान में।
  (जमात या तब्‍लीगी जमात यानि कुछ मुसलमान मिलकर धर्म के लिए इधर उधर अपने खर्चे से यात्रा करते हैं, चिल्‍ला यानि 40 दिन, नव-मुस्लिमों के लिए यह चलता फिरता मदरसा साबित होता है)

अहमद: आपके यह तीनों साथी भी आपके साथ जमात में हैं?
फारूक आजम: जी यह मेरे जेल के साथी हैं और इन्होंने भी मुझ से ही कुछ महीने पहले इस्लाम कुबूल किया है। यह  अब्दुर्रहमान भाई जो बहराईच यु पी के रहने वाले हैं, यह भी एक झूटे मुकदमें में दिल्ली में फंस गए थे, तिहाड जेल में थे, मुझ से ही दो महीने बाद मुसलमान हो गए, और छ महीने बाद जेल से छुट गए, इनको मैं ने जमात(धर्म के लिए यात्रा) के लिए घर से बुलाया है, और यह दूसरे शकील अहमद भाई हैं यह पन्जाब में पटियाला के रहने वाले हैं, यह भी जेल में मेरे साथ थे, और मुझ से चार महीने बाद मुसलमान हुए, यह भी तीन साल पहले बरी हो गए थे, इनको भी साथ में जमात के लिए मैं ने बुलाया था, और यह तीसरे मुहम्मद सलमान भाई यह लोनी गाजीयाबाद के हैं, इन्हों ने मुझ से छ महीने बाद इस्लाम कुबूल क्या था, और इस्लाम कुबूल करने के छ रोज बाद यह रिहा हो गए थे, इन्हों ने जेल से जाकर चालिस दिन जमात में लगाए थे, मगर मेरे साथ वकत लगाने का वादा था इस लिए फिर मेरे साथ चार महीने लगा रहे हैं।

अहमद: आपका वतन कहां है?
फारूक आजम: मैं गोरखपुर यू.पी. के एक गांव का रहने वाला हूं, आठवीं क्लास के बाद चाचा के साथ दिल्ली 1989 में रोजगार के लिए आ गया था, जिन्दगी का अकसर हिस्सा दिल्ली में गुजरा, आखिर के यह छ साल तो जेल में गुजरे।

अहमद: जेल में आप कैसे चले गये?
फारूक आजम: असल में हमारे नबी सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने बुरी सोहबत से बचने का हुकुम दिया है, लुहार के पास अगर आग न लगे तो धुवां तो लगेगा ही, हम कुछ लोग जमनापार में साथ रहते थे, लक्ष्मीनगर के एक आदमी का कतल हो गया उसकी हमारे एक साथी से चंद रोज पहले लडाई हुई थी, जिस से लडाई हुई थी, उसकी सोहबत अच्छी नहीं थी, जो असल कातिल थे उन्होंने पैसे दे कर होशियारी से हम लोगों के नाम वो कतल लगा दिया और हम लोगों को जेल जाना पडा, मेरे अल्लाह का करम था, हमारे मुकदमे की कोई पेरवी करने वाला नहीं था।

अहमद: ये क्या बात आप कह रहे हैं?
फारूक आजम: मैं सच कह रहा हूं, मौलाना अहमद साहब, हमारे प्यारे नबी सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने क्या सच फरमाया कि कुछ लोग ऐसे होंगे कि उनकी गरदन में तोक(रस्‍सी) डाल कर अल्लाह ताला खींचकर जन्नम में दाखिल करेंगे, मुझे बिल्कुल ऐसा लगता है कि मेरे अल्लाह का वो करम हमारे और हमारे जेल के साथियों के लिए है, मेरे अल्लाह ने जिस तरह हमें जेल में भेज कर हिदायत से नवाजा।

अहमद: आप जरा तफसील बताइए?
फारूक आजम: मैं ने बताया न कि मैं बचपन में अपने चाचा के साथ रोजगार के लिए दिल्ली आ गया था, शुरू में एक हार्डवेयर की दुकान पर मेरे चाचा ने मुझे लगाया फिर मेरे चाचा यहां आकर एक औरत के चक्कर में पड गए और फिर घरबार को छोड दिया, मेरे पिताजी का देहांत हो गया बाद में मैं ने कुछ बेकरी(बिस्‍कुट,पापे, डबल रोटी आदि) आईटम सप्लाई के लिए एक रेहडा रिक्शा खरीदा और एक के बाद एक कुछ न कुछ सप्लाई का काम करता रहा। मार्च 2001 में मेरी शादी मां ने करादी, 2006 में मुझ पर मुकदमा कायम हुआ और मैं अपने साथियों के साथ जेल में चला गया, जेल में तन्हाई में मैं बहुत गौर करता, कि मुझे भगवान ने किस जुर्म में जेल भेजा, असल में, जब मैं हिंदू था, जब भी मेरे दिल में इसका पक्का यकीन था कि जो कुछ होता है मालिक की मरजी से होता है, यह दुनिया के सारे लोग कठपुतली हैं, जैसे वहां से उंगली हिलती है यह नाचते हैं, तो मैं सोच में बहुत डूब जाता कि मुझे जेल में मालिक ने क्यूं भेजा है, जब मैं बेकसूर हूं और मेरी कोई पेरवी करने वाला भी नहीं तो मेरे दिल में कोई कहता कि तुझे कुछ देने के लिए और बनाने के लिए। तीन साल पहले दिल्ली के एक वकील साहब बचपन के किसी मुकदमे में सजायाब होकर तिहाड जेल पहुंचे, जेल में बहुत चर्चे थे, कि दिल्ली हाईकोर्ट के इतने बडे वकील साहब जेल में आ गए हैं, वकील साहब के बाकायदा दाढी थी, बडे मौलाना लगते थे, सब कैदी उनसे दबे रहते, मुकदमों के सिलसिले में मशवरा करते, वो मुफीद मशवरा देते, लोग उनसे मालूम करते कि आप इतने बडे वकील हैं फिर भी जेल में आगए, उन्होंने कहा जज रिश्‍वत मांग रही थी, मैं ने रिश्वत देने के मुकाबले में जेल को मुनासिब समझा, लोग कहते कि रिश्वत दे देनी चाहिए थी, तो वो कहते, रिश्वत देने से, मरने के बाद खतरनाक जेल जहन्नुम में जाने के बजाए यह आरजी अर्थात कुछ समय की तिहाड जेल अच्छी है। (रिश्‍वल लेना-देना हराम है)

 वो मुकदमों के सिलसिले में मशवरे के दौरान कैदियों से मालूम करते कि इस कैद में इतने परैशन हो रहे हो, जहां खाना, पानी, इलाज, पंखे, बिस्तर सब हैं, मरने के बाद की जहन्नुम की जेल की परवा क्यूं नहीं? जहां न खना, न पानी और सजा ही सजा है, कैदियों को उनके मौलवियाना हुलिए और हर एक की हमदर्दी के जज्बे की वजह से बहुत ताल्लुक हो गया था, वो उनकी बात को बहुत गहराई से लेते थे, जेल में वो मुसलमानों में भी नमाज वगेरा की दावत का काम करते थे, और गैर मुस्लिम कैदियों को हजरत की किताब ‘‘आपकी अमानत - आपकी सेवा में‘‘ देते, ‘‘मरने के बाद क्या होगा?‘‘ और ‘‘नसीमे हिदायत के झोंके‘‘ यानि हिन्दी में नव-मुस्लिमों के इन्टरव्यूज भी पढवाते।

मौलाना अहमद साहब मेरे जितने साथियों ने इस्लाम कुबूल किया है, सारे साथियों का खयाल यह है कि हिन्‍दी में ‘‘आपकी अमानत - आपकी सेवा में‘‘ (इंग्लिश में RETURNING YOUR TRUST) ऐसी लगती है जैसे किसी उमरकैद की सजा काट रहे कैदी को अचानक रिहाई का परवाना मिल जाए, और मैं तो बिल्कुल इसको मालिक के यहां से कैद से रिहाई का परवाना ही समझता हूं, 17 जनवरी 2010 को मैं ने तिहाड में इस्लाम कुबूल किया, दिसम्बर 2010 में हम कुछ लोगों को नागपुर जेल भेजा गया, वकील साहब के साथ मिलकर मैंने काम किया, अल्हम्दु लिल्लाह कुल मिलाकर तिहाड में 37 लोगों ने इस्लाम कुबूल किया, उनमें एक बजरंग दल के वो साहब भी थे, जिन्हों ने 1992 के फसादात में दो मस्जिद के इमामों को कतल किया था, और बाद में वो खुद इतने पछताए कि कतल में जेल चले गए।

अहमद: नागपुर में भी आप ने काम किया?
फारूक आजम: नागपुर में इस साल मार्च में रिहाई तक रहा, और अल्हम्दु लिल्लाह में यह सोच कर जेल में रहा कि मुझे अल्लाह ताला ने हजरत यूसुफ अलैहिस्सलाम की सुन्नत जिन्दा करने के लिए जेल के अन्दर कैदियों को जहन्नुम की जेल से आजाद कराने के लिए भेजा है, अल्हम्दु लिल्लाह 67 लोग नागपुर जेल में मुसलमान हुए। नागपुर जेलर के पास लोगों ने शिकायत की, मुझे मालूम हुआ कि वो मुझे बुलाकर बात करने वाले हैं, मैं ने इस खयाल से, इससे पहले कि अन्धेरे वाले चिराग को बुझाने को कहें, हमें अन्धेरों को रोशन करना चाहिए, जेलर आर के पाटिल से वकत लिया, सब से पहले मैं ने उनको कानून की आरटीकल 25 के हवाले से मुलक के हर शहरी को अपने मजहब की दावत देने के मूल अधिकार की बात जरा जोर देकर कही, कि आप मुलक के किसी शहरी को इस से रोकेंगे तो कानून तोडेंगे, उसके बाद मैं ने उनको अपना परिचय कराया और बताया कि मालिक जानता है कि मैं बिल्कुल बे-कुसूर सजा पा रहा हूं, और उस मालिक ने मुझ कैदी को नागपुर जेल में आप जेलर पाटिल साहब को नर्क की खतरनाक जेल से छुडाने के लिए भेजा है, मैं ने कुछ आखिरत की बात कह कर उनको  ‘‘आपकी अमानत - आपकी सेवा में‘‘  पुस्तक दी और उनसे पढने का वादा लिया, और इस पर कि वो जरूर इस किताब को पढें, उनकी मां के दूध की कसम ली, वो किताब उन्होंने पढी, उनकी सोच की दुनिया बदल गयी, उन्होंने दूसरी कोई पुस्तक मांगी तो मैं ने  ‘‘मरने के बाद क्या होगा?‘'  फिर ‘‘नसीमे हिदायत के झोंके‘‘ यानि हिन्दी में नव-मुस्लिमों के इन्टरव्यूज की पुस्तक उन तक पहुंचाई। मालिक का करम है, उन्होंने इस्लाम कुबूल किया, पिछले साल रमजान से पहले वो मुसलमान हो गए हैं, अभी आम एलान तो नहीं कर सके, उन्होंने पिछले साल रमजान के ऐसे सख्त रोजे रखे और नागपुर के कुछ कारोबारी मुसलमानों के साथ मिल कर जेल में इफतार  और सहरी (रोजा रखने के  खाना-पीना)का बहुत अच्छा इन्तजाम कराया और फिर दिल्ली सफर करके मेरे केस की पेरवी की, वकील अपने खर्च से किया, अल्हम्दु लिल्लाह मेरी रिहाई हो गयी।

अहमद: आपके घर वालों को मालूम हो गया?
फारूक आजम: मैं जेल से ही अपनी मां और भाईयों को खत के जरिए दावत देता रहा, जेल से रिहा होकर घर गया, मेरी मां और दो भाई अल्हम्दु लिल्लाह पहले से तैयार थे, उन्होंने इस्लाम कुबूल कर लिया है, मेरे चचा के बेटे जो डाक्टर हैं वो भी मुसलमान हो गए हैं, मैं हजरत की तकरीर की सी डी नागपुर से लाया था, उसमें उन्होंने कहा है कि इस्लाम एक नूर है, अगर कोई शख्स इस्लाम लाएगा तो चिराग की तरह इस्लाम के नूर से मुनव्वर होगा, जहां रहेगा वो रौशनी फेलाएगा, मोमिन जहां हो, इस्लाम का नूर उससे जरूर फेलेगा, किसी चिराग के बस में नहीं कि वो रौशन हो और रौशनी न फैलाए, इसी तरह मोमिन के बस में ही नहीं कि वो दाई न हो(दाई यानि इस्‍लाम की दावत देने वाला), अल्हम्दु लिल्लाह हमारे जो साथी तिहाड जेल से मुसलमान हुए और जो नागपुर से हुए हर एक को दावत की धुन है, एक मुहम्मद उमर नागपुर से औरंगाबाद जेल में गए वहां पर बहुत लोगों ने इस्लाम कुबूल किया, एक महुम्मद इकबाल बरेली जेल गए, वहां पर एक डाक्टर साहब के साथ मिलकर बहुत काम किया, एक मुहम्मद इस्माइल रोहतक जेल में गए, वहां पर इक्कीस लोग मुसलमान हुए और ‘‘या हादी या रहीम‘‘ पढ कर लोग रिहा होते गए, उनमें से अक्सर ने जाकर काम किया, और अपने घरों में अपनी जिन्दगी की मकसद दावत बना कर काम कर रहे हैं।
(हजरत कलीम साहब के मुताबिक इन शब्‍दों को सौ-सौ बार रोजाना दोहराने से दुआ कुबूल हो जाती हैं,,अधिक समझने के लिए इस विडियो से दावत देने के सवाब और विडियो के आखिर हिस्‍से में इस दुआ बारे में समझें  http://www.youtube.com/watch?v=tgZP4fN5RMg)

अहमद: अबी से (यानि मौलाना मुहम्‍मद कलीम सिद्दीकी) तो आप पहली मर्तबा मिले होंगे?
फारूक आजम: बजाहिर तो पहली मर्तबा मिले, मगर आपकी अमानत और नसीमे हिदायत के झोंके पुस्तक और वकील साहब से चूंकी वो हजरत साहब से मुरीद हैं उनकी बातें सुन-सुन कर ऐसा ताल्लुक हो गया है, ऐसा लगता है जैसे हम हजरत की तर्बीयत से पले हैं, और अब बयानात की सी डी ने हजरत के बोल याद करा दिए हैं, देखने और मिलने से भी ऐसा लगा जैसे हजरत को बहुत देखा है।

अहमद: अब आप का क्या इरादा है?
फारूक आजम: जमात में वक्ल लगा कर हजरत के पास कुछ वक्त गुजारना है, और फिर गोरखपुर के आस-पास दावत का काम करना है।

अहमद: आपके बीवी बच्चों का क्या हुआ?
फारूक आजम: अल्हम्दु लिल्लाह मेरी बीवी और दोनों बच्चे इस्लाम में आ गए हैं।

अहमद: उनके खर्चे वगेरा का इस दौर में क्या हो रहा है?
फारूक आजम: मेरी बीवी ने अपने जेवर बेच कर अपने भाई के साथ मिल कर एक कारोबार क्या था, अल्हम्दु लिल्लाह उस में बडी बरकत हुइ, मेरी बीवी ने मुझे जमात का खर्च दिया, और उसने तै किया है कि वो हजरत खदीजा रजि. की तरह अपने माल को दावत पर खर्च करेगी, इत्तफाक से हमारे रिवाज के खिलाफ वो उमर में मुझ से आठ साल बडी हैं, इस तरह अल्लाह का करम यह है कि एक तरह यह सुन्नत भी अल्लाह ने बे-मांगे दे दी।

अहमद: तब्लीगी जमात में आप रहे तो आपका दिल गैर मुस्लिमों में दावत को नहीं चाहा?
फारूक आजम: असल में अभी तब्लीगी जमात में इसकी खुल कर इजाजत नहीं, मगर कोई मौका मिल जाता है तो फिर आदमी क्या करे, राजस्थान में हम कोटा में काम कर रहे थे, गश्त के लिए जा रहे थे, एक आश्रम के सामने कुछ लोग बैठे थे, आश्रम के जिम्मेदार भी थी, हमें रोक कर बोले, आप लोग धर्म के नाम पर जमात में निकले हो, तो क्या हम तुम्हारे भाई नहीं? हम से ऐसी नफरत के साथ क्यूं निगाह चुरा कर जा रहे हो, हमें भी बताओ, मैं ने अमीर साहब से इजाजत ली और सब से गले मिला और बात की, अल्हम्दु लिल्लाह चारों लोगों ने नकद कलिमा पढा, और हमारे साथ गश्त कराया, नमाज पढी और फिर बात के बाद तशकील हुई, चिल्ले के लिए  यानि 40 दिन की धर्म यात्रा के लिए नाम भी लिखाए, इस तरह से एक दो कहीं-कहीं काम होता रहा।

अहमद: इस मर्तबा आप के अमीर जमात(टोली अध्‍यक्ष) कौन हैं?
फारूक आजम: असल में मुझ से मालूम क्या तो मैं ने बताया कि मैं दो चिल्ले लगा चुका हूं, तो फिर जमात का मुझे ही अमीर बना दिया गया, जमात में अलग-अलग जगह के लोग हैं, मैं ने बहुत मना भी किया। मगर मेरे साथ बस मेरे यह तीनों साथी भी हैं जिनका यह तीसरा चिल्ला है, दो साहब हैं जिनके छ साल पहले चिल्ले लगे थे, इन साथियों में से कोई तैयार नहीं हुआ, मजबूरन मुझे ही अमीरे जमात बना दिया गया।

अहमद: आप का पहले नाम क्या था? क्या आप ने नाम जेल में ही बदल लिया था?
फारूक आजम: मेरा नाम सुखराम था, हमारा खान्दान ब्रह्मण खान्दान है, वकील साहब ने मेरा नाम मुहम्मद फारूक आजम रखा, और मुझ से कहा तुम फारूक आजम रह. की तरह इस्लाम की मजबूती और कुव्वत के लिए काम करना, मुझे भी अच्छा लगा, अल्लाह के लिए क्या मुश्किल है कि नाम की बरकत से मुझ कमजोर को ताकतवर बनाकर इस्लाम की ताकत का जरिया बना दे।

अहमद: आप रमजान में अल्लाह के रास्ते में होंगे, आप हमारे लिए भी दुआ किजिए?
फारूक आजम: मौलाना अहमद साहब, आपके घर से जिस्मानी और जाहिरी ताल्लुक मेरा पुराना नहीं, मगर रोएं रोएं में आपके घराने से ताल्लुक है, हजरत और हजरत के हर साथी बल्कि कुत्ते का भी में अपने को अहसानमंद पाता हूं

अहमद: वाकई अल्लाह ताला की रहमत और शाने हिदायत देखनी हो तो आपको देखिए, कि अल्लाह ने गले में रस्सी डाल कर आपको इस्लाम और जन्नत की राह पर डाल दिया।
फारूक आजम: अच्छा आपको नहीं लगता। वो हदीस जब पढता हूं कि कुछ लोग ऐसे होंगे कि फरिश्ते उनको अल्लाह के हुकुम से गले में रस्सी डाल कर घसीटते हुए जन्नत में दाखिल करेंगें, मुझे तो एसा लगता है कि वो रस्सी मेरे गले मे पडी है, और फरिश्ते मुझको घसीटते ले जा रहे हैं।

अहमद: आपक का यह इन्टरव्यू हमारे उर्दू मेगजीन ‘‘अरमुगान‘‘ में छपेगा। आप इसके पढने वालों को कुछ सन्देश,पेगाम देंगे?
फारूक आजम: मैं दो दिन का मुसलमान क्या पेगाम दे सकता हूं, बस मैं तो यह कह सकता हूं कि एक मुसलमान की हैसियत रौशन चिराग की है जो रौशन होगा तो रौशनी फेलाएगा, जहां रहेगा रौशनी फेलाएगा, और जिस चिराग की लो से उसकी लो करीब होगी, तो बुझे चिराग का जला देगा,
मुसलमान जहां रहे अगर वो इस्लाम और इमान का नूर वहां नहीं फैला रहा है, और वो दावत का काम नहीं कर रहा है, और कुफर और शिर्क के अन्धेरे दिल, ईमान से मुनव्वर नहीं हो रहे हैं तो वो बुझे चिराग की तरह है, बुझा चिराग, चिराग कहलाने के लायक नहीं, मुसलमान को दाई यानि इस्‍लाम की दावत देने वाला होना चाहिए, जहां कुफर और शिर्क के अन्धेरे दिल हों, वहां ईमान और इस्लाम की दावत से उन्हें मुनव्वर करना चाहिए और जो मुसलमान दावत का काम नहीं कर रहे हैं उन बुझे चिरागों की लो से अपने दिल की कोई लो लगाकर उनको रौशन करना चाहिए, ताकि वो भी दाइ बन जाऐं, एक वकील साहब ने जेल में आकर मुझ बेजान आदमी के दिल के चिराग को अपने चिराग की लो लगा कर जलाया और इमान से मुनव्वर किया, अब अगर में, चिराग से चिराग और चिरागों से चिराग, तिहाड जेल नागपुर, बरेली, रोहतक, औरंगाबाद और जेल से रिहाई पाकर घर जाकर काम करने वालों के जरिए हिदायत पाने वालों का हिसाब लगाउं तो तादाद हजार से भी ज्यादा हो जाएगी, यह बात सही है कि यह तादाद है ही क्या, इस सिलसिले में हजरत की बात ही ठीक है कि जो लोग अभी कुफर और शिर्क पर जहन्नुम की तरफ जा रहे हैं उनकी तादाद साढे चार अरब से ज्यादा है, उनके मुकाबले में जो इस्लाम की तरफ आ रहे हैं हरगिज काबिले जिकर नहीं। मगर यह भी हकीकत है कि एक चिराग से एक चिराग जलकर की सारी दुनिया के साढे चार अरब की अन्धेरियां दूर हो सकती हैं, इस लिए सारी दुनिया के मुसलमानों से, खसुसन मासिक 'अरमुगान' पढने वालों से मेरी दरखास्त है कि अगर आपके जरिए सुबह से शम तक कोई करीब रहने वाले खूनी रिश्ते के भाई बहन की कुफर और शिर्क की अन्धेरी कम नहीं हुई और आप उसको इस्लाम के करीब न कर सके, और साथ रहने वाले मुसलमान भाईयों के दिल की कोई लो अपने दिल की लो लगाकर आपने उसके अंदर कुछ दावती जज्बा और जौत नही जलाई तो फिर आप जिन्दा मोमिन नहीं बल्कि बुझे चिराग हैं, जो हकीकत में चिराग कहलाए जाने के लायक नहीं। दूसरी दरखास्त यह है कि रमजान का मुबारक महीना आ रहा है, अल्लाह की खास अता का महीना है हमें वफादार बंदों की तरह इस माह का इस्तकबाल करना चाहिए और हुदा लिलनास कुरआन मजीद के इस जशन शाही में इस बार अपने अल्लाह से पूरी दुनिया के लोगों की हिदायत मांगनी चाहिए, मैं ने तो पिछले दो सालों में तजुर्बा किया, मैं ने जिन-जिन लोगों का नाम ले कर पिछले दोनों रमजानों में हिदायत की दुआ मांगी, मेरे अल्लाह ने मेरी दरखासत कुबूल कर ली, और फिर दावत देने में बिल्कुल भी मुश्किल पेश नहीं आई।

अहमद: माशा अल्लाह आपको अल्लाह की जात पर यकीन में सहाबा के ईमान का हिस्सा मिल गया है?
फारूक आजम: इतनी बडी बात कहां कह रहे हैं? हम तो सहाबा के पांव की खाक भी नहीं, हां मगर उनको अपना बडा कहने पर फखर है, और हम उनका अकीदत से नाम लेने वाले जरूर हैं।

अहमद: बहुत बहुत शुक्रिया , अस्सलामु अलैकुम
फारूक आजम: वालैकुम सलाम

साभार उर्दू मासिक ‘अरमुगान‘ अगस्त 2012
with thanks: www.armughan.in

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Nateeje nikalne Lage
उपरोक्‍त बातें पढकर हम जान गए कैसे जेलों में भी माशाअल्‍लाह दायी हजरात काम कर रहे हैं,,, अब नतीजे सामने आने लगे - Urdu Daily 'inquilab' 29-11-2012 merut edition