Thursday, June 28, 2012

अब्दुर्रहमान (पूर्व ब्रह्मण) से एक मुलाकात

बंदर के द्वारा अनेकश्‍वरवाद की दुनिया से निकले  पूर्व ब्रह्मण अब नव मुस्लिम अब्दुर्रहमान  का उर्दू मासिक पत्रीका 'अरमुगान' जूलाई  2012 ईं में मौलाना मुहम्‍मद कलीम सिद्दीकी साहब के सुपुत्र अहमद अव्‍वाह को दिया गया interview साक्षात्कार

अहमद अव्वाहः अस्सलामु अलैकुम
पूर्व ब्रह्मण अब नव मुस्लिम अब्दुर्रहमान: वालैकुम सलाम

अहमद: अब्दुर्रहमान भाई आप दिल्ली में कहां से तशरीफ लाए हैं?
अब्दुर्रहमान: जी में दिल्ली में रोहिणीमें रहता हूं, वहीं से आया हूं ।

अहमद: आप पिछले हफ्ते भी तशरीफ लाए थे?
अब्दुर्रहमान: जी हां अपनी पत्नि के साथ पिछले इतवार को आया था आज में अपने दोनों बेटों और बेटी को हजरत कलीम साहब से मिलाने लाया हू, असल में कल मेरी बेटी ससुराल से आयी थी, हमने बताया कि हजरत से हमारी मुलाकात हो गयी है तो बेटी ने बहुत जिद की कि मुझे भी मिलाइए, असल में उसने ‘‘नसीमे हिदायत के झोंके‘‘ किताब पढी है इस लिए वो बहुत ज्यादा हजरत से मिलना चाहती थी।

अहमद: आप पहले से कहां के रहने वाले हैं, रोहिणि तो अब रहते होंगे?
अब्दुर्रहमान: जी हम लोग पहले से रोहतक जिले के एक गांव के रहने वाले हैं, 26 साल हुए दिल्ली शिफ्ट हो गए हैं, हमारा खानादान धार्मिक हिन्दू घराना है, जात से हम लोग खानदानी ब्रह्मण हैं, मुझे ऐसा लगता है कि यह ब्रहमण आर्यन कोमें हैं, शायद यह लोग इब्राहिमी लोग होंगे, इस लिए कि मक्का के मुशरिक जो अपने को इब्राहिमी दीन पर कहते थे, उनका कलचर हमसे बहुत मिलता जुलता है, हो सकता है कि हम लोग हजरत इबराहीम के खानदान में भी रहे हों।

अहमद: आपने खूब सोचा, हो सकता है ऐसा ही हो, आपको इस्लाम कुबूल किए कितना जमाना हो गया?
अब्दुर्रहमान: यूं तो इस्लाम कुबूल किए मुझ आठ साल हो गए, मगर ऐसा लगता है कि मैं असली मुसलमान तो पिछले इतवार को हूआ हूं, असल में हिन्दू पंडितों के चक्कर से तो आठ साल पहले निकल गया था, मगर मिशाल मशहूर है आसमान से गिरा खजूर में अटका, मुसलमान बनके, पीरनुमा एक पेशावर बहरूपिए मुसलमान पंडित के चंगुल में फंस गया था और इस जालिम ने हिंदू पन्डितों को अच्छा कहलवा दिया।

अहमद: अबू कलीम साहब बता रहे थे कि एक जाहिल पीर आपको एक जमाने तक ठगता रहा, क्या उन्होंने ही आपको इस्लाम की दावत दी थी?
अब्दुर्रहमान: नहीं वह इस्लाम की दावत किया देते, मुझे तो एक बंदर ने दावत दे कर मुसलमान बनाया, हजरत कह रह थे कि आपका इस्लाम हमारे लिए एक बडी वार्निंग है कि अगर मुसलमान अपनी जिम्मेदारी अदा नहीं करेंगे और दावत इस्लाम के अपने फरीजे अर्थात कर्तव्य को अदा नहीं करेंगे तो अल्लाह ताला बंदरों से दावत का काम लेकर ब्रहमणों को मुसलमान बनाएंगे।

अहमद: जरा तफसील से सुनाइए , अल्लाह ताला ने आपको किस तरह हिदायत दी?
पूर्व ब्रह्मण अब नव मुस्लिमअब्दुर्रहमान: असल में खानदानी तौर पर ब्रहमण होने की वजह से मैं बहुत धार्मिक किसम का हिंदू था, और सब से अधिक मेरी अकीदत वैष्णो देवी से थी, उसके अलावा काली और अबा जी का भी उपाषक था, इस लिए साल में दो बार वैष्णो देवी की यात्रा करता था, शायद आप जानते होंगे, वैष्णो देवी का खास मन्दिर कशमीर में है, वहां जाना ऐसा है जैसे हज वगेरा करना, यूं समझो कि मैं भी साल में दो बार उमरे को जाता था, उमरा तो आदमी सौ फीसद अपने एक अल्लाह के साथ अपने इमान और एक अल्लाह की मुहब्बत को बढाने के लिए जाता है, वैष्णो देवी पर तो आदमी, हक को छोड कर शिर्क में भटकने के लिए जाता है, मेरे कहने का मकसद यह है कि जितना वक्त और पैसा उमरा में लगता है, उतना ही तकरीबन वैष्णो देवी की यात्रा में लगता है, हां महनत वैष्णो देवी की यात्रा में और ज्यादा है, यह कि वहां पैदल पहाड की बडी चढाई में आदमी का हाल खराब हो जाता है, इस के एलावा भी अलग अलग मंदिरों में जाता था, मेरी कमाई और वकत का एक खास हिस्सा इन पूजाओं में लगता था, बहुत बर्त यानि हिंदू रोजे रखता था, मेरे घर में एक खास कमरा जिसके तीन हिस्से करके अलग अलग देवियों के मन्दिर बनाए हुए थे, आठ साल पहले नोरते यानि खास हिंदू रोजे चल रहे थे, एक शाम को मैं बरत में पूजा में मगन था, बडी अकीदत से नम्बरवार एक के बाद एक देवी की पूजा की प्रशाद चढाता और अकीदत से दीप जलाता, अचानक पीछे के रास्ते से एक बंदर घर में घुस गया उसने कमरे में घुस कर प्रसाद पर झपटे लगाए तो दीप गिर गए और पूरे कमरे में आग लग गयी, और आग इस कदर लगी की तीनों देवियां और पूरा कमरा आग में झुलस गया, मेरे दिल में आया कि जो देवियां खुद अपनी हिफाजत नहींकर सकीं और जल कर झुलस गयीं, वो पूजा के लायक कैसे हो सकती हैं ? मैं इस आस्‍था और अकीदत से बहुत बद दिल होकर घर से निकला, घर से कुछ दूर एक किसी पीर की कबर पर एक मेवाती बाबा हजार दाने वाली तस्बीह (माला) लिए बैठे थे, मैं ने उनसे कहा मैं मुसलमान होना चाहता हूं, वो पीर बाबा बोले, मुसलमान होकर तुम्हें मेरा मुरीद (धर्म शिष्य) भी होना पडेगा, मैं ने कहा कि मुसलमान होने के लिए मुरीद होना भी जरूरी है, वो बोले पक्का मुसलमान तो तब ही होगा जब मुरीद हो जाएगा, मैं ने कहा कि मैं मुरीद भी हो जाउंगा, वो बोले मैं दो तरह के मुरीद करता हूं, एक मुरीद तो ऐसा होता है कि मुरीद होकर नमाज और रोजे और सारी इबादतें तुम्हें ही करना होंगी, एक मुरीद ऐसे होते हैं कि मुरीद तो मुरीद ही होता है, वो इबादात ठीक तरीके पर कहां कर सकता है, मैं ही तुम्हारी तरफ से नमाज और रोजे अदा करूंगा, उसके लिए तुम्हें माहाना खर्च देना पडेगा, मैंने मालूम किया कि माहाना खर्च किया पडेगा, वो बोले तुम्हारी आमदनी कितनी है, तुम बताओ उस मालिक के नाम पर तुम कितने खर्च कर सकते हो, मैं ने कहा मैं हाथ से बनी देवियों के नाम पर इतना खर्च करता था, तो उस मालिक के नाम पर मैं जान भी दे सकता हूं, वो बोले तो फिर अच्छा मुरीद और अच्छी नमाज रोजा पीर साहब से करवाने के लिए दस हजार रूपए माहाना खर्च करने पडेंगे, मैंने कहा मालिक का दिया बहुत है उसके नाम पर हजार रूपए कोई बडी बात नहीं। पीर बाबा ने मुझे कलिमा पढाया और एक चादर मेरे सर पर डाल कर मुझे मुरीद कर लिया, मुरीद(धर्म शिष्‍य) करने के लिए देर तक नाटक करते रहे।

अहमदः आपको लग रहा था कि यह नाटक है?
अब्दुर्रहमान: खुली आंखों दिखाइ दे रहा था कि यह नाटक है।

अहमद: जब आपको लग रहा था यह नाटक है, फिर भी आप सब करते रहे?
अब्दुर्रहमान: असल बात यह थी कि मुझे इस्लाम के बारे में जरा भी मालूम नहीं था, अब यह जानने वाले थे तो फिर मुझे उनकी बात माननी थी, इस डर से कि कहीं मेरे इस्लाम में कोई कमी न रह जाए, मजहब के मामले में इन्सान अपनी अकल नहीं लडाता बल्कि वो अपनी अकल को मजहब के सुपूर्द करता है। मैं आपको एक लतीफा बताउं, पिछली इतवार को जब हम हजरत से मिलने आए थे, तो मुरादाबाद के एक अंग्रेजी के प्रोफेसर साहब कलिमा पढने आए हुए थे, बहुत मुहब्बत और अकीदत से उन्होंने हजरत से कलिमा पढाने को कहा, हजरत ने उन्हें कलिमा पढवाया, हजरत ने कलिमा पढवाने से पहले कहा अपने मालिक को राजी करने के लिए और इस इरादे से कि मैं अपनी जिन्दगी अल्लाह के आखिरी कानून ‘‘कुरआन मजीद‘‘ को मान कर, और अल्लाह के आखिरी रसूल सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने जो जिन्दगी गुजारने का तरीका बताया है उसके मुताबिक गुजरने के अहद अर्थात वादे की नियत से कलिमा पढ रहा हूं, पहले हम कलिमा अरबी में पढेंगे और फिर हिन्दी अनुवाद कहलवादूंगा, हजरत ने कहा जिस तरह मं कहूं कहिए, हजरत ने कलिमा कहलवाना शुरू किया ‘‘अशहदु अन्ला इलाहा इलल्लाह‘‘ यह कहते हुए हजरत के कान में खुजली आ रही थी, हजरत ने दायें हाथे से कान खुजलाया, तो प्रोफेसर साहब ने भी दायें हाथ से कान खुजलाया, हजरत ने कहलवाया ‘‘व अशहदू अन्ना मुहमदन अब्दुहू व रसूलू‘‘ सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम , हजरत की नाक के उपर एक दाना सा हो रहा था, हजरत ने बाएं हाथ से नाक पर हाथ फेरा, प्रोफेसर साहब ने भी नाक को पकडा, हम सभी को हंसी आगयी, हजरत को भी हंसी आ गयी, प्रोफेसर साहब अजीब से हो गए, हजरत ने बताया कि असल में मेरे कान औरनाक पर खुजली आ रही थी, कलिमा पढते हुए किसी ऐक्शन की जरूरत नहीं, बल्कि अन्दर से यकीन और विश्वास की जरूरत है, प्रोफेसर साहब बोले कि मजहब का मामला है, धर्म में आदमी अपनी अकल को मालिक के हुकुम के सुपुर्द करने आता है, मैं यह समझा कि कान नाक पकड कर अहद (प्रतिज्ञा) करना है, इस लिए मैं ने ऐसा किया, हजरत साहब ने समझाया कि इस्लाम इलम और अकल को मुतमईन करने वाला मजहब है, अहमद साहब इस लिए में ने बावजूद यह कि मेरी अकल कह रही थी कि यह पीर बाबा का नाटक है, मगर वो जैसा कहते गए मैं ने किया, मुरीद होकर पहले हफते की नमाज, रोजा, इबादात की फीस दस हजार रूपए, और मिठाई के लिए दो सौ रूपए में ने एडवांस में पीर साहब को जमा करा दिए।

अहमदः माशा अल्लाह ऐसे मुरीद खरी फीस अदा करने वाले कहां किसी को मिलते होंगे इसके बाद आप माहाना जमा करत रहे?
अब्दुर्रहमान: मौलाना अहम! दस हजार तो जमा करता ही थी, इसके अलावा पीर साहब आंखें लाल पीली करके मुटठी भी खोलते थे कि आज तुम्हारे लिए शुशखबरी है, तुम्हारे दरजे आसमान की तरफ चढ रहे हैं, इसकी खुशी में फरिश्तों को मनाने के लिए अब इस चीज की जरूरत है। आठ साल हो गए इस्लाम कुबूल किए, ओसतन बीस हजार रूपए माहाना मैं ने पीर बाबा को जरूर दिए होंगे।

अहमदः इतने पैसे पीर बाबा को देते थे। आपका कारोबार क्या है?
अब्दुर्रहमान: मेरा एक महूर ब्यूटी पार्लर है, मैं और मेरी बीवी दोनों उस में काम करते हैं।

अहमदः इसमें इतनी आमदनी हो जाती है, आपकी फीस क्या है?
अब्दुर्रहमान: मालिक का करम है, काम बहुत अच्छा है, मेरी बीवी दुल्हन बनाने की फीस पचास हजार रूपए भी ले लेती हैं।

अहमदः तो पीर बाबा की क्या खता है। आप भी भरते के लिए लेते हैं, पीर बाबा भी रूप भरने के लिएण् ही लेते हैं।
अब्दुर्रहमान: बात तो आपकी ठीक है, जब मैं हजरत से पिछले दिनों बैत (भक्ति प्रतिष्ठा)  हुआ था तो हजरत ने मालूम किया था कि आप का कारोबार क्या है? मैं ने कहा कि ब्यूटी पार्लर है, तो हजरत ने फरमाया कि रोजगार पाक और हलाल होना चाहिए, मैं ने हजरत से कहा कि मैं आज से ब्यूटी पार्लर बंद कर दूं, हजरत ने फरमाया कि कोई अच्छा हलाल तैयब रोजगार तलाश करें, बिल्कुल हराम तो नहीं हां अच्छा नहीं, जब दूसरा रोजगार मिल जाए तो इसको छोड देना, हां अलबत्ता तब तक मुफती साहब का नाम बताया कि उनसे मालूम करें कि ब्यूटी पार्लर में क्या कर सकते हैं और क्या नहीं, इसका खयाल करें, मैं ने कहा कि हजरत मैं ने देवियों को राजी करने के लिए इतनी कुरबानियां दी हैं, मैं अपने अल्लाह को राजी करने के लिए आप से  (भक्ति प्रतिष्ठा) बेअत हुआ हू, अगर मेरे अल्लाह की रजा जान देने में है तो मैं जान देने के लिए तैयार हो कर आया हूं, आप मुझे बस हुकुम करें।

अहमदः हजरत से आप मुरीद हो गए, आप तो पहले पीर बाबा से मुरीद थे, अब दोबारा मुरीद कैसे हो गए?
अब्दुर्रहमान: असल में मैं तीन साल से हजरत से मिलना चाह रहा था हजरत को फोन करता था, पहले मिलता ही न था तो हजरत सफर पर होते, दस रोज पहले मैं ने फोन किया तो फोरन कहा कि मैं आठ साल पहले मुसलमान हुआ हूं, मुझे जिन मौलाना साहब ने हजरत का पता दिया था उन्हों ने कहा था कि अपना नाम बताने से पहले यह बता देना, फिर हजरत कहीं न कहीं मिलने की शकल बता देंगे। मैं ने जब कहा कि मैं तीन साल से आप से राबता करने की कोशिश कर रहा हूं, हजरत ने बहुत माजरत की और फरमाया कि इतवार के रोज ‘शाहीन बाग‘ आप आ जाएं, बहुत लोगों को मैं ने बुला लिया है, मगर फिर भी आप की जियारत हो जाएगी।
अहमदः हजरत का पता आपको किसने दिया था?

अब्दुर्रहमान: मुझे एक मौलाना साहब ने हजरत की किताब ‘‘आपकी अमानत आपकी सेवा में‘‘, ‘‘हमें हिदायत कैसे मिली‘‘ और ‘‘नसीमे हिदायत के झोंके‘‘ खरीद कर लाकर दी थी, मैं ने वो पढी, असल में मैं अपने पीर बाबा की मुसलसल ठगी और जुल्म से परेशान था, और मैं आठ साल तक इस मुरीदी से यह बात समझा कि मजहब के नाम पर शिर्क(अनेकश्वरवाद), धर्म के नाम पर सब से बडा अधर्म धार्मिक पंडितों ने कैसे चलाया, शिर्क के नाम पर लोगो को गुलाम बनाकर उनको ठगने का नाम शिर्क(बहीश्वरवाद) है, मजहब इन्सान की अन्दरूनी प्यास है, उसकी आत्मा यह मांगती है कि वो अपने खुदा को राजी करे उसके लिए उस से जो कुरबानी मांगी जाए इन्सान देता है, तकरीबन बीस हजार रूपए मेरी माहाना फीस के अलावा पीर बाबा ने मुझ पर न जाने क्या क्या जुल्म किए। मेरी लउकी बहुत खूबसूरत थी, इन्टर में पढ रही थी अचानक एक जुमेरात में मैं पीर बाबा के पास गया, हर जुमेरात को कुछ हदिया ले कर जाना पडता था, मैं पहुंचा तो पीर बाबा बहुत खुश थे, बोले अब्दुर्रहमान तेरे लिए मैं जो इबादत कर रहा हूं वो मालिक के यहां बहुत कुबूल हो रही है, पीर और मुरीद का रिश्ता तो आक़ा और गुलाम का होता है, मगर शायद तुझे अपने पीर के बराबर दरजा मिलने वाला है, आज उपर से मुझे इशारा हुआ है, अब्दुर्रहमान पहले ही तुम्हारा गुलाम है, मगर उसकी अकीदत हमें बहुत कुबूल है, अपने बेटे से उसकी बेटी और फिर अपनी बेटी से उसके बेटे की शादी करदो, यह एजाज़ बेटा तुम्हें मुबारक हो, तुम्हारी औलाद ने कैसा नसीब पाया है, पीर के बेटे और बेटी से आसमान से रिश्ता जुडवा लिया है, मैं ने कहा अगर मेरे मालिक का यह हुकुम है तो मैं हाजिर हूं, मैं घर आया अपनी बीवी से बताया, बच्चों से मशवरा किया, घर वाले तैयार नहीं थे, घर में मैं ने उनको मालिक के गुस्से से डराया, वहां से हुकुम हुआ है तो मानना चाहिए, मालिक ने औलाद दी है तो उसके हुकुम को मानना चाहिए।

अहमदः आपको यह बात ढोंग नहीं लग रही थी?
अब्दुर्रहमान: दिल में बात आई थी कि शायद यह भी नाटक और ढोंग है, मगर यह भी डर लगता था कि सचमुच मालिक का हुकुम होगा और न माना तो बर्बाद हो जाएंगे, कभी कभी दिल करता, फिर दिल को समझाता, अगर मेरे मालिक के नाम पर धोका है तो उसकी मुहब्बत में धोका खाना भी अच्छा है, बस इस लिए सब कुछ करते रहे।

अहमदः आगे क्या हुआ आप ने शादियां कर दीं?
अब्दुर्रहमान: मेरी लडकी छोटी थी और पीर बाबा की लडकी छ साल बडी थी, मगर उन्होंने कहा कि उपर से इशारा है कि पहले तुम्हारी लडकी की शादी हो, बीवी को खिदमत करनी पडती है, पहले पीर की लडकी से खिदमत कराना बे अदबी है, पहले अपनी बेटी को खिदमत के लिए पेश करो, शदी से पहले हमसे पीर बाबा ने कहा तुम मुरीद हो और में पीर हूं, अल्लाह की मुहब्बत में यह रिश्ता है, इसमें जो भी आप पीर बाबा को अपनी लडकी के जहेज में दोगे वो जन्नत में मिलेगा, मैं ने कहा अल्लाह की मुहब्बत में हर चीज मेरी जानिब से है, आप हुकुम करो, पीर बाबा ने कहा तुम्हारी बेटी मेवात आया जाया करेगी, उसके अलावा हमारे पास भी सवारी का साधन नहीं है, एक ए सी गाडी दो, मेरा मकान तुम्हारी लउकी के लायक नहीं है, मेवात में मकान दोबार बनवाना पडेगा, इसके अलावा और घर में जरूरत का सामान तुम्हारी बच्ची चाहे, हम तो फकीर आदमी हैं, हमारे पास तो बोरिए के अलावा कुछ भी नहीं, बहरहाल तकरीबन 28-29 लाख रूपए शादी में खर्च किए, एक साल बाद फिर मेरी लडकी की शादी का हुकुम उपर से आने की खबर दी, वो बोले तुम मुरीद हो मैं पीर हूं हम तुम्हें जन्नत और विलायत के दरजात जैसी कीमनी चीज दिलाते हैं, अगर मुरीद अपने पीर से जहेज वगेरा का मुतालबा करे तो मुरीदी टूट जाएगी, उनकी लडकी जो कपडे पहन कर आई सारे मैं ने ही बनाए, एक सूई भी वो जहेज में न लाई
अहमदः आप यह सब कुछ करते रहे आज कल अकल का जमाना है, और आप शहर के रहने वाले पढे लिखे ग्रेजवेट हैं, बच्चे पढे लिखे हैं, आपकी बीवी पढी लिखी हैं?
असल में दिल तो टूटता रहा, मगर बस वही बात कि मालिक के नाम पर धोका खाना भी एक मजा देता है, हम सब यह करते रहे।

अहमदः उन पीर साहब से अब भी ताल्लुक है?
अब्दुर्रहमान: असल में नव मुस्लिमों के इन्टरव्यू की किताब ‘‘नसीम-ए-हिदायत के झोंके‘‘ ने दिल तो हटा दिया था, मगर अब रिश्तों की वजा से जाहिरी तौर पर निभाते रहे। मगर अब जालिम ने मेरी बच्ची को सताना शुरू कर दिया है, पीर बाबा की बीवी ऐसी जालिम औरत है कि बस अल्लाह पनाह में रखे, अब उसके जुल्म से खुद उसका बेटा भी आजिज आ गया है, और उसने खुद से कहा कि इन धोकबाजों के चक्कर में न आएं। असल में अल्लाह ताला को हम पर तरस आया, उसके नाम पर धोका हमने चूंकि उसकी मुहब्बत में खाया था, इस लिए खुद पीर बाबा का बेटा हमारे लिए पीर बाबा के बन्धन से छुडाने का जरिया अना। पीर बाबा का बेटा जो हमारा दामाद है जावेद वो एक साथी के साथ हजरत से मिला, दूकान न चलने की शिकायत की, हजरत ने उसको किसी एक नमाज के बाद एक तस्बीह इस्तगफार और हर महीने में तीन दिन तीन महीने तब्लीगी जमात में लगाने का मशवरा दिया और फरमाया कि उम्मीद है कि इन्शा अल्लाह कारोबर चल जाएगा, वो नमाजें पढता था, उसने इस्तगफार नमाज के बाद पढने के लिए रात की नमाज ईशा पढना शुरू की और जमात में तीन रोज तीन महीन तक लगाए, तीसरे माह अमीर साहब ने चार माह का इरादा कर वा लिया, अल्लाह का शुक्र है वो जमात से जुड गया और वो आज हजरत से बेअत भी हुआ, उसने ज्यादा जोर दिया कि हम सब घर वाले हजरत से बेअत हो जाएं, यह अलग बात है कि अल्लाह ताला ने मुझे और मेरी बीवी को एक हफते पहले ही तौफीद दे दी, मेरी बीवी और बच्चे सब यह कह रहे थे कि डेडी असल में आज ऐसा लगा जैसे हम आजाद हो गए, हमारे घर में नव मुस्लिमों के इन्टरव्यू की किताब ‘‘नसीम-ए-हिदायत के झोंके‘‘ बहुत दिनो से बच्चे पढते हैं, मेरे दोनों बेटे उसके बाद से जुमेरात को मरकज भी जाने लगे हैं, अब मेरा भी जमात में वकत लगाने का इरादा है, हजरत ने भी मशवरा दिया है कि चार महीने लगा दूं।

अहमदः माशा अल्लाह वाकई आपकी बात भी खूब है कि आप को बंदर ने मुसलमान बना दिया है, अच्छा आपके इलम में है कि आपका यह इन्टरव्यू हमारे यहां मेगजीन ‘अरमुगान‘ में छपने के लिए है आप उसके पढने वालों को कोई सन्देश देगें?
पूर्व ब्रह्मण अब नव मुस्लिम अब्दुर्रहमान: मैं सन्देश या पैगाम क्या दे सकता हूं, सच्ची बात यह है कि मैं सिर्फ एक हफ्ते का मुसलमान हूं, मैं अपनी जिन्दगी के तजरबे से दो बातें कहता हूं कि बहेसियत मुसलमान हमारी जिम्मेदारी है कि हम शिर्क(अनेकश्वरवाद) के वास्ते से मजहबी गुलामी में जकडी इन्सानियत को एक अल्लाह के सामने खडा करके और उस सच्चे मालिक से जोड कर आजाद कराने की कोशिश करें। अगर हम ऐसा नहीं करेंगे तो अल्लाह ताला मजलूम और सिसकती इन्सानियत के गले से शिर्क (अनेकश्वरवाद) के फंदे और बेडियां काटने के लिए बंदरों को भेज कर यह काम करा लेंगे,
दूसरी बात यह भी दिल में आई है कि अल्लाह की मुहब्बत में उसको राजी करने की नियत से इतना धोका खाने और कुरबानी देने के बदले में अल्लाह ताला ने हम पर तरस खाया और खुद पीर बाबा के बेटे को उस चंगुल से निकाला और हमें निकलवाया। तो अगर उसके नाम पर इस्लामी और शरई क़ायदों को जान कर कुरबानी दी जाएगी तो वो अल्लाह कितना नवाजेंगे, इसका अन्दाजा मुश्किल है।

अहमदः आपने अपने खानदान पर काम का कुछ इरादा किया, आपने हजरत से इस सिलसिले में कुछ नहीं कहा?
अब्दुर्रहमान: ऐसा नहीं होसकता, पहली मुलाकात में सबसे पहले हजरत ने यह कहा कि यह ईमान आपका जब ईमान है, जब यह यकीन हो कि ईमान के बगैर निजात मुक्ति नहीं, और जब यह यकीन है तो आप कैसे इन्सान हैं कि आपके सामने आपके भाई बहन रिश्ते दार बेकार नष्ट हो जाएं। और यह ईमान और बढेगा, जब आप सारी इन्सानियत की फिकर करेंगे और खास तौर पर रिश्तेदारों और खानदान वालों का और भी ज्यादा हक है। अलहम्दु लिल्लाह मैं ने इरादा ही नहीं क्या बल्कि बात करना शुरू कर दी है, आपसे दुआ की दरखास्त है कि अल्लाह ताला की हिदायत से हमारे सब रिश्ते दार इस्लाम में आ जाएं।

अहमदः आमीन, बहुत बहुत शुक्रिया, अस्सलामु अलैकुम
अब्दुर्रहमान: वालैकुम सलाम
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साभार उर्दू मासिक पत्रीका ‘अरमुगान‘ जुलाई 2012

Urdu men idhar padhen
جناب عبد الرحمن سے ایک گفتگو
newmuslimsindia.blogspot.in/2012/06/new-muslim.html

नोटः लगभग 20 साल के ऐसे मासिक इन्टरव्यु ‘‘नसीमे हिदायत के झोंके‘‘ नाम से उर्दू के साथ साथ हिन्दी और इंग्लिश में भी छप चुके हैं।

Sunday, June 3, 2012

पूर्व शिव सैनिक मुहम्मद शकील (सुनिल जोशी) से एक मुलाकात interview

बजरंग दल के जिला संचालक के शिव सैनिक मित्र सुनिल जोशी जो अब नाम मुहम्‍मद शकील का उर्दू मासिक पत्रीका 'अरमुगान' जून 2012 ईं में मौलाना मुहम्‍मद कलीम साहब के सुपुत्र अहमद अव्‍वाह को दिया गया इन्‍टरव्‍यू interview साक्षात्कार

अहमद अव्वाह: अस्सलामु अलैकुम
मुहम्मद शकील: वालैकुम सलाम

अहमद: शकील साहब अबी ने कुछ दिन पहले हम लोगों को बताया था कि आपने हमारे एक जिम्मेदार साथी के साथ बहुत गुस्से का मामला किया था और गालियां वगेरा दी थी, और अब आपको अल्लाह ताला ने हिदायत से नवाज दिया, आपके इस गुस्से और नाराजगी के पीछे क्या बात है, हालांकि आपके खान्दान के मुसलमानों से ताल्लुकात भी रहे हैं।
शकील: मौलाना अहमद साहब असल में तो मेरे मालिक मुझ पर रहम आ रहा था, बस उसने जरिया बना दिया, वर्ना पिछले दिनों मुझ पर मुसलमानों और इस्लाम के खिलाफ जो भूत सवार था उसका आप तसव्वुर भी नहीं कर सकते।

अहमद : फिर भी जाहिरी तौर पर इस गुस्से की वजह क्‍या थी?
शकील : असल में हमारे यहां शाहआबाद आंध्रा के चार बच्चे मुसलमान हुए, चारों भाई बहन थे, जिस लडके के साथ वो आए थे उसने उनकी बडी बहन से शादी कर ली थी, हमारे जिले की शिव-सेना के जिम्मेदारों को मालूम हो गया तो उन्हों ने इलाके में बवाल खडा कर दिया, उस लडके के खिलाफ बच्चों को बहका कर मुसलमान बनाने का मुकदमा दायर कर दिया, और उसको जेल भेज दिया, अदालत में उन बच्चों ने साफ-साफ खुल कर बयान दिया कि हम अपनी मर्जी से मुसलमान हुए हैं, लडकी अभी 18 साल की नहीं हुई थी, असल में उसके पिता झांसी के पास किसी जगह रहते हैं , शिवपूरी कोई जिला है वहां पर उन बच्चों की सगी मां तो मर गयी थीं, वालिद ने एम. पी. में ही दूसरी शादी की, मां के रवैये से परेशान होकर यह बच्चे घर से भाग कर आ गए, स्टेशन पर उस लडके को यह चारों मिले, इसको तरस आ गया, ये उनको शाहआबाद ले आया, घर वालों ने मुखालफत की, मगर इस लडके ने इस लडकी से वादा कर लिया था इस लिए उससे शादी कर ली, बाद में अदालत और पुलिस ने इन बच्चों के पिता से राबता किया तो उनके बाप ने यह बयान दिया कि यह बच्चे मेरी मर्जी से मुसलमान हुए हैं, और मेरी मर्जी से मेरी बेटी ने शादी की है, इस पर हमारे यहां के शिवसेना वालों ने शिवपूरी के जिम्मेदारों से राबता किया और बच्चों के वालिद के खिलाफ बयान दिने पर जोर दिया और उनको तरह-तरह की धमकियां भी दीं, मगर वो किसी तरह खिलाफ बयान देने पर राजी न हुए, और कहते रहे कि इस देवता जैसे इन्सान ने उन बच्चों पर तरस खाकर हमदर्दी की और उसको निभाया, हम उसके खिलाफ बयान दें यह कैसा घोर अन्याय होगा, क्या में बिल्कु हैवान बन जाउं, जब वहां के शिव सैनिकों ने बहुत ज्यादा दबाव दिया तो उन बच्चों के बाप ने और उन बच्चों के साथ उनकी सौतेली मां अपने दो बच्चों के साथ मुसलमान हो गयी, इस पर पूरे इलाके की हिन्दू कमेटियों ने अपनी हार समझ कर एकजुट हो कर छानबीन शुरू की तो मालूम हुआ की इलाके में बहुत से लोग मुसलमान होते जा रहे हैं, इस पर खोद-कुरेद हुई तो पता चला कि संभल और उसके पास के कुछ कसबों में कुछ लोग यह काम कर रहे हैं, मेरे एक साथी बजरंग दल के जिला संचालक हैं अनिल कौशिक, वो मेरे पास संभल आए और उन्होंने संभल में शिवसेना और बजरंग दल के लोगों की मीटिंग की, और उस में धर्म बदलने को रोकने के सिलसिले में लोगों को गरमाया, में बचपन से बहुत जज्बाती आदमी हूं मुझे बहुत गुस्सा आया, और मैं ने इसके खिलाफ तहरीक चलाने का इरादा कर लिया, मेरे एक और साथी ने जो इस काम में बढ चढ कर हिस्सा लेने का वादा कर चुके थे, उन्होंने मुझे बताया कि असल में एक किताब हिन्दी में ''आपकी अमानत, आपकी सेवा में'' मौलाना कलीम सिददीकी साहब ने लिखी है, वो ऐसी जादू भरी भाषा में लिखी गयी है कि जो उसे पढता है मुसलमान हो जाता है, और वो दिल्ली से छपी है उस पर छपवाने वाले का फोन नम्बर है, मैं ने कहा वो किताब जरा मुझे ला कर दो, मैं देखूंगा उस में क्या बात लिखी है, उसने कहा नहीं उसका पढना ठीक नहीं है, उस किताब का लेखक कोई तान्त्रिक है, उसने उसकी भाषा में जादू कर दिया है, अगर तुम पढोगे तो मुसलमान हो जाओगे, मुझे भी डर लगा, जब मुझे किताब दिखाई तो मैं ने बिना खोले किताब के बेक टाइटिल पर छपे दो मोबाइल नम्बरों को नोट कर लिया फिर एक नम्बर पर बात की, पहले नम्बर पर एक साहब का फोन मिला वो बडे नर्म स्वभाव के थे, मैं उन्हें मां बहन की बडी गालियां देता रहा, और धमकियां देता रहा, मगर वो हंसते रहे और बोले आपकी गालियां कितनी मिठी हैं उनसे मुहब्बत की खुशबू आ रही है, रात को दूसरे नम्बर पर मैं ने बात की और बहुत सख्त सुस्त आखरी दरजे की मां बहन की सडी सडी गालियां देता रहा, तो वो साहब पहले तो गुस्सा हुए फिर बोले, मैं ने पूरा फोन टेप कर लिया है, अब आप के खिलाफ थाने में रिपोर्ट कराने जा रहा हूं, एक दफा तो मैं डर सा गया, फिर हिम्मत की और कहा कि कतल के बाद इकटठे ही केस कर देना, मैं ने उनसे कहा कि जरा अपनी पत्नि (बीवी) से बात करादे, मैं तुझे कतल करूंगा , तो वो विधवा हो जाएगी, मैं उससे पहले ही क्षमा (माफी) तो कर लूं, फिर तो मौका मिलेगा नहीं।

अहमद: अच्छा तो वो आप थे, अबी(कलीम साहब) तो बहुत मजे लेकर यह बात सुनाते थे, और उन साथी को समझाया था जब वो बहुत टूटे दिल के साथ उन गालियों की शिकायत कर रहे थे, अबी ने उनको समझाया कि तुम्हें तो फखर करना चाहिए, कि सैयदुल अव्वलीन व आखिरीन नबी रहमतुल आलमीन सल्ल. की सुनन्त अदा करने का शरफ तुम्हें मिला, दावत की राह में किसी खुशकिस्मत को ही गालियां नसीब होती हैं, अबी उनसे कहने लगे तुम बताओ कोई ऐसा खुशकिस्मत आदमी जिस को दावत(दीन की बुलाने) की राह में गालियां मिली हों, यह प्यारे आका की सुन्नत है कि जिनको दोजख की आग से निकालने के लिए आप रातों को रोते और दिनों को खुशामद करते थे, वो लोग गालियां देते, पत्थर बरसाते, और हर तरह से सताते थे, फिर उसने उनसे कहा कि तुम ने उसकी गालियों पर तो गौर किया, उसकी इन्सानियत और रहम दिली और उसकी मुहब्बत भरी फितरत का अहसास नहीं किया कि अभी उसने तुम्हें कतल किया भी नहीं और तुम्हरी बीवी से माफी मांगने को कह रहा है...... जी तो आगे सुनाइए।

शकील: उन साहब ने मुझसे मालूम किया कि आप यह बताइए कि उस किताब में कौनसी बात ऐसी गलत है जिस पर आपको एतराज और ऐसा गुस्सा है, मैं ने कहा, मैं ने तो वो किताब पढी नहीं, उन्होंने कहा फिर आपको गुस्सा क्यूं? मैं ने कहा मेरे कई साथियों ने किताब पढने से मना किया और कहा जो भी यह किताब पढता है इस किताब की की भाषा में जादू कर रखा है, वो मुसलमान हो जाता है, इस डर की वजह से मैं ने किताब नहीं पढी, उन्होंने कहा आपको किसी ने गलत कहा है? मुझसे पूछा आप कुछ पढे लिखे हैं? मैं ने कहा में एम. एस. सी. हूं, वो बोले साइंस के स्कालर होकर आप कैसी अंधविश्वास की बात कर रहे हैं, इन्सान को मालिक ने देखने के लिए अकल दी है, और आप इतने पढे लिखे आदमी हैं, इन्सान चांद तारों पर जा रहा है, और आप जादू की बात कर रहे हैं, आप ऐसा किजिए कि आप इस किताब को जरूर पढिए और इसके पढने के बाद जो बात आपको गलत लगे अपने कलम से काट दिजिए, आइन्दा आप जिस तरह करक्शन करेंगे किताब उसी तरह छपेगी, उन्हों ने कहा 'क्या में आपके पास किताब भेज दू?'' मैं ने कहा अगर मुझे न मिली तो मंगा लूंगा, और मुझे इस किताब में कोई बात हिन्दू धर्म के खिलाफ मिलेगी तो में तेरे पूरे खान्दान को कतल कर दूंगा, वो बोले कोई बात नहीं।

अहमद: उसके बाद आपने वो किताब पढी?
शकीलः नहीं मैं ने उन दिनों वो किताब नहीं पढी, साथियों से बात हुई तो मेरी तबियत में बहुत नर्मी देख कर वो बहुत गुस्से हुए, और बोले कि ऐसे ही तो लठ मार मार कर वो धर्मान्त्रण कर रहे हैं, देखा नहीं यह इसाई मिशन वाले भी ऐसा ही करते हैं में जगह जगह जाकर चौराहों पर इस किताब और उसके बांटने वालों को गालियां देता, संभल के नवाब खान्दान के एक साहब को हज के दिनों ही वहीं मालूम हुआ कि संभल के पास एक कस्बा में एक आदमी सुनिल जोशी नाम का ''आपकी अमानत'' के खिलाफ बहुत गुस्सा है, वो उसके लेखक को बहुत गालियां बकता है, मौलाना कलीम साहब से वो मुरीद(धर्म शिष्‍य) है, हज के सफर से आने के बाद वो तलाश करते करते मेरे पास पहुंचे, मुझे देखा तो चिमट कर बहुत रोने लगे, सुनिल भैया तुम तो मेरे साथ छटी क्लास से लेकर दस्वी क्लात तक पढे हो, तुम्हारे साथ मैं ने कबडडी भी खेली है, मैं ने भी पहचान लिया, मैं ने कहा कि मेरे पिताजी ने तो आपके अब्बा जान की जमीन भी काश्त की है, बोले हां हां वो जमीन तो पिताजी ने बहुत सस्ते दामों में आपके पिताजी को ताल्लुकात की वजह से बेच दी थी, मैं ने कहा हां तुम्हारे पिता जी तो हमारी शादी में बहुत बढ-चढकर शरीक हुए थे, और कई दिन तक काम कराया था बलिक एक तरह से शादी की जिम्मेदारी निभाई थी, यह कह कर वो मुझ से चिमट गए, बुरी बुरी तरह फूट फूट कर रोने लगे और उनका रो रोकर बुरा हाल हो गया, रोते रहे और कहते रहे मेरे लाडले दोस्त, ईमान के बगैर तुम मर गए तो दोजख में जलोगे, मैं ऐसे अच्छे दोस्त को कैसे दोजख में जाता देखूंगा, मेरे भाई सुनिल मैं ने इस बार हज में बार-बार तुम्हारी हिदायत के लिए दुआ की है, मेरे भाई ईमान के बगेर बडा खतरा है और बहुत खतरनाक आग है, मेरे भाई सुनिल नर्क की आग से बच जाओ, जल्दी से कलिमा पढ लो, देखो में दिल का मरीज हूं तडप तडप कर मेरा हार्ट फेल हो जाए गा, मैं ऐसे अच्छे दोस्त को हर्गिज कुफर पर मरने नहीं दूंगा, मेरे भाई कलिमा पढ लो, फूट फूट कर आवाज से रोते रोते उनका बुरा हाल हो गया, मैं ने कहा ''में कलिमा पढ लूंगा, तुम चुप हो जाओ, मेरे यार चाए तो पी लो'' वो बोले ''मैं किस दिल से चाए पी लूं, जब मेरा दिली प्यारा दोस्त, जिसका इतना प्यारा बाप हो, जो मरे हकीकी भाई की तरह होने के बावजूद ईमान के बगैर मर गया, सुनिल भैया चचा बलराम जी पर नर्क में क्या क्या गुजर रही होगी, मेरे अब्बा ने उन्हें मरने दिया गमर में तुम्हें हरगिज अब नर्क में नहीं जाने दूंगा'' बार बार मैं उनको पानी पिलाने की कोशिश करता, मगर वो कहते ''तुम्हें पानी की पडी है, मेरा भाई मेरा दोस्‍त सुनिल बगैर इमान के मर जाएगा, मेरे होश खराब हो गए, मैं ने कहा: ''चुप हो जाओ पानी पी लो, जो तुम कहोगे, मैं करने को तैयार हूं'' वो बोले ''कलिमा पढ लो'', मैं ने कहा कि तुम पानी पीलो, मैं कलिमा नही पूरा कुरआन पढ लूंगा'' वो बोले ''अगर मेरे पानी पीते पीते तुम मर गए तो नर्क में जाओंगे'' मैं ने कहा ''मेरे भाई , अच्छा तुम पढाओ क्या पढाते हो'' मैं ने उनकी हालत बुरी देखी तो उसके अलावा और कोई रास्ता दिखाइ नहीं दिया, उन्होंने रोते रोते मुझे कलिमा पढाया, फिर हिन्दी में उसका अनुवाद बताया, मैं ने उनको पानी पिलाया, मैं ने कहा ''अच्छा अब तुम खुश हो अब चाए पी लो'' उन्हों ने चाए पी, और जेब में से ''आपकी अमानत आपकी सेवा में'' किताब निकाल कर दी, कि सुनिल भैया इस किताब को अब तुम दो बार बहुत गौर से पढना, 'आपकी अमानत' मैं ने देखी तो मेरा मूड खराब हो गया, अच्छा यह किताब तो मैं किसी तरह भी नहीं पढूंगा, इस किताब के लेखक को मैं ने कतल करने का पर्ण (अहद) किया है, वो चाए छोड कर फिर मुझ से चिमट गए और रोने लगे, मैं ने कहा ''तुम कुछ ही करो, मैं किताब नहीं पढ सकता'', वो बोले क्यूं इस किताब से तुम्हें ऐसी चिड है, मैं ने कहा, क्या तुम ही लोग यह किताब बांट रहे हो, उन्होंने कहा कि तुम्हरा यह गया गुजरा भाई ही यह मुहब्बत की खुशबू बांट रहा है'' मैं ने कहा ''मुहब्बत की नहीं नफरत की, इस किताब के नाम से मुझे गुस्सा आता है, वो बोले कि भाई सुनिल, इस किताब में क्या बात गलत है? तुम ने यह किताब पढी है? मैं ने कहा मैं नहीं पढ सकता, इस किताब का लेखक तान्त्रिक है उसने इसके शब्दों में जादू कर रखा है, वो दिलों को बांध देते हैं'' वो फिर पहले की तरह रोने लगे, सुनिल भैया ''इस किताब का लेखक एक तान्त्रिक नहीं, एक सच्चा इन्सान और मुहब्बत का फरिश्ता है, उसने इस किताब में मुहब्बत की मिठास घोल रखी है, और इस किताब में सच है, सच्ची हमदर्दी है, वो यह कहते हैं कि हर इन्सान की आत्मा सच्ची होती है, वो अपने मालिक की तरफ से सच्ची बात पर कुरबान होती है, मेरे दोस्त तुम्हें यह किताब जरूर पढनी पडेगी'' मैंने कहा कि सब कहते हैं जो इस किताब को पढता है वो मुसलमान हो जाता है, मुझे यह डर है कि इस किताब को पढ कर मुझ सचमुच मुसलमान होना पडेगा'' यह कहना था कि वो मुझसे चिमट गए, और बच्चों की तरह बिलक बिलक कर रोने लगे, मेरे भाई सुनिल, तुमने सच्चे दिल से कलमा नही पढा, झूठे दिल से पढा कलमा किसी काम की नहीं, मरे भाई तुम्हें यह किताब पढनी पडेगी, में हरगिज हरगिज तुम्हें नरक में नहीं जाने दूंगा, मेरे भैया में मर जाउंगा, मुझ डर लगा कि यह वाकई  रो रो के मर जाएगा, मैं ने उसको पानी पिलाना चाहा, वो पानी पीने को तैयार न हुए, मैं ने कहा ''मेरे बाप में इस किताब को दस दफा पढूंगा तुम चुप हो जाओ, अच्छा यह पानी पी लो, मैं तुम्हारे सामने अभी पढता हूं'' उसने इस शर्त पर पानी पिया, कि मैं अभी इस किताब को पूरी उसके सामने पढूंगा, मैं ने उनके सामने किताब पढना शुरू की, और खयाल था कि थोडी देर में यह चुप हो जाएगा तो यह किताब बंद कर दूंगा, मगर जैसे ही पेश लफज (दो शब्द) का पृष्ठ पढा, किताब के लेखक से मेरी दूरी कम हो गई, और फिर मैं किताब पढता गया, 32 पृष्ठ की किताब आधे घंटे में खतम हो गई, इस किताब का सच और मुहब्बत मेरे उपर जादू कर चुका था, मैं ने अपने दोस्त से एक बार सच्चे दिल से कलिमा शहादत पढाने की खुद रिक्वेस्ट की, उन्होंने मुझे कलिमा पढाया, मैं ने गले मिलकर उनका शुक्रिया अदा किया, और अपना नाम उनके मशवरे से शकील अहमद रखा

अहमद: इसके बाद आपने अपने इस्लाम का एलान किया?
शकील: रात को मैं ने अपनी बीवी से बताने का इरादा किया, बाजार से उसके लिए जोडा लिया, और एक चांदी की अंगूठी खरीदा, एक मिठाई  का डब्बा लिया, 30 मार्च का दिन था, यह मेरी शादी का दिन था, और यह दिन मेरी बीवी का बर्थडे भी था, रात को मैं ने उसको मुबारकबाद दी और हद दरजे मुहब्बत का इजहार किया जो मेरी आदत के बिल्कुल खिलाफ था, वो हैरत से मालूम करने लगी की यह किया बात है, मैं ने कहा कि एक आदमी सुनिल जो तुम्हारे साथ भारतीय समाज के मुताबिक पांव की जूती समझ कर व्यवहार सलूक करता था, आज उसने नया जन्म लिया है, उस पर उसके मालिक ने महरबानी कर दी हे, उसे धार्मिक बना दिया है, एक प्रेम का देवता मेरे पास आकर मेरी जीवन के अंधकार को प्रकाशित कर गया गया, मैं तुम से आज तक के सारे अत्याचार जुल्म के लिए पांव पकड कर माफी मांगता हूं, और आइन्दा के लिए तुम से वादा करता हूं कि तुम मेरी जीवन साथी, मेरे सर का ताज हो, वो बोली में समझ नहीं सकी, मैं ने कहा इसको समझने के लिए अगर तुम्हारे पास समय है तो आधा घंटा चाहिए, मगर जब तुम खुशी से तैयार हो, मैं तुम पर जबरदस्ती बहुत कर चुका, अब मुझे न्याय दिवस अर्थात उपर वाले को हिसाब देने का दिन का डर हो गया है, तुम्हारे पास जब खुशी से समय हो मैं एक पाठ तुम्हें सुनाना चाहता हूं, वो बोली, ऐसी अदभूत हैरतनाक तब्दीली के लिए मैं सुनने को तैयार हूं, वो कौन सा पाठ है जिसने आपके ऐसा बदल कर रख दिया, मैं ने जेब से 'आपकी अमानत' पुस्तक निकाली, वो बोली '' यह किताब में खुद भी पढ सकती हूं क्या?'' मैं ने कहा मेरा दिल चाहता है मैं खुद ही सुनाउं, असल में मेरे दिल में यह बात आ गई कि 17 साल में ने तुम्हारे साथ इतनी सख्ती और जुल्म किया, एक ऐसा अहसान कर दूं, जो 17 साल का अन्याय ना इन्साफी धुल जाए, कि हमेशा अजाब से तुम बच जाओ'' एक बार सुनने के बाद वो बोली अच्छा अब एक बार उसको जरा समझ कर पढना चाहती हूं, मैं ने कहा जरूर पढो, वो किताब उसने ली, पूरी किताब एक अलग जाकर उसने पढी, फिर मेरे पास आई और बोली इसका मतलब तो यह है कि सनातन धर्म और सच्च मजहब सिर्फ इस्लाम है, मैं ने कहा मालिक ने तुम्हें बिल्कुल सच समझाया, मेरी अचानक तब्दीली से वो बहुत मुतासिर थी, 17 साल से पहली बार मैं ने उसको प्यार से गले लगाया था, उसको प्यार किया था मुहब्बत से कुछ खरीद कर उसको पेश किया था उसके जन्म दिन और शादी के दिन पर मुबारकाद दी थी, अब उसके लिए मेरी बात मानना बिल्कुल स्भाविक (फितरी) था, मैं ने 'आपकी अमानत' पुस्‍तक में देख कर उसको कलिमा पढवाया(‘‘अशहदु अल्ला इलाहा इल्लल्लाहु व अशहदु अन्ना मुहम्मदन अब्दुहू व रसूलूहसल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम‘‘), उसका नाम आमिना खातून रखा, अपने दोनों बच्चों को भी कलिमा पढवाया, उनका नाम फातिमा और हसन रखा।

अहमद : इसके बाद आपने आम एलान किया?
शकील: अभी तक आम एलान नहीं किया, अलबत्ता चार पांच रोज के बाद तुम्हारे यहां एक मौलाना साहब जिनके बारे में मुझे मालूम हुआ था, ''आपकी अमानत'' बांटते हैं, उनको मैं ने एक दिन खरी खरी गालियां सुनाई थीं, उनके पास गया और उनसे अपने मुसलमान होने के बारे में बताया, और उनसे अपनी खतना के सिलसिले में मशवरा किया, मगर उनको यकीन रहीं आया, और जरा टालते रहे, मैं उनके डर को समझ गया,और में मुरादाबाद एक मुसलमान डाक्टर के पास गया, और जाकर खतना कराई, उसके बाद मैं ने तीन बार सिर्फ तीन तीन दिन गजरोला तब्लीगी जमात में लगाए।

अहमद: गजरोला के साथियों को मालूम था कि आपने इस्लाम कुबूल किया है?
शकील: मैंने बताया कि असल में मैं पैदाइशी मुसलमान था बाद में शिव सेना और बजरंग दल के चक्कर में हिंदू बन गया था और यह बात सच्ची थी, हर पैदा होने वाला इस्लाम पर पैदा होता है, अब मेरा इरादा पहले चार महीने तब्लीगी जमात के सफर में लगाने का है, उसके बाद खुल कर एलान करूंगा, और इन्शा अल्लाह दीन सीख लूंगा तो दूसरों को दावत देना आसान होगा।

अहमद: माशा अल्लाह, अल्लाह ताला मुबारक फरमाए, वाकई आपका रईमान अलाह की खास हिदायत की कारफरमाई है, अच्छा आप मासिक 'अरमुगान'  www.armughan.in  के पाठकों को कुछ पैगाम देंगे?
शकील: दो रोज पहले बदायूं में हजरत तकरीर कर रहे थे कि तमाम मुसलमानों को अल्लान दे दाइ अर्थात अल्लाह की और बुलाने वाला बनाया है, दाइ(दीन की दावत देने वाला) की हैसियत डाक्टर जैसी और जिसको दावते दीन दी जाए उसकी हैसियत मरीज (बीमार) की है अगर डाक्टर अपने मरीज के इलाज में कोताही करें और मरीज मरने लगें तो मरीज का गुस्सा होना बिल्कुल नेचुरल है, मगर डाक्टरों को अपने मरीज से निगाह नहीं फेरनी चाहिए, दावते दीन असल में मुहब्बत भरा काम हैं, यह डिबेट मुनाजरा नहीं, कि हारजीत की बात बनालें, यह तो नबवी दर्द के साथ अपने मदउ अर्थात जिसे दावत दी जानी है उसके लिए अजाब के खतरे को समझ कर कुढने और तडपने का अमल है, अगर सच्चे दर्द और तडप के साथ कोई रोने वाला हो, मुझ जैसे जलाली और गुस्सावर, कतल और गालियों पर आमादा दरिन्दे को जिसको कभी अपनी बीवी बच्चों पर प्यार न आया हो, उसको पिघला कर अल्लाह का बंदा और गुलाम बनाया जा सकता है, इमान कुबूल करने के बाद जैसे सुनिल जोशी गुसियारा दरिन्दा मर गया और मुहम्मद शकील एक कोमल दिल वाले इन्सान ने जन्म ले लिया, मेरे साथ  ऐसा हुआ है, असल में दर्द और खेरखाही की जरूरत है।

अहमद: वाकई बहुत गहरी बात आपने कही, बहुत बहुत शुक्रिया  जज़ाकल्लाह, आप खूब समझे, अस्सलामु अलैकुम
शकील: मैं नहीं समझा, एक रोने वाले ने समझा दिया, आपका बहुत बहुत शुक्रिया , वालैकुम सलाम
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"aapki amanat aapki sewa men" in English
 By
Muhammad Kaleem Siddiqui
 
Translation: Safia Iqbal


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Maulana Kaleem Siddiqui यादगार विडियो
Part-1
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