Wednesday, March 30, 2011

मसऊद अहमद से मुलाकात interview april 2011

अहमदः अस्सलामु अलैकुम रहमतुल्लाहि वबरकातुह
मसऊदः वालैकुम सलाम वरहमतुल्लाहि वबरकातुह


अहमदः आपके साथ दो साथी भी आये हैं, इनका तार्रुफ कराईये?
मसऊदः यह दोनों मेरे दफ्तर के साथी हैं, हमारे साथ गुडगांव में अमरिकी कम्पनी में मुलाजमत करते हैं, इनमें से यह पहले साहब, इनका नाम संजय कौशिक था, इनका नया नाम सईद अहमद है, और यह दूसरे अनुपम गुलाठी थे, अब मुहम्मद नईम इनका नाम है, दोनों साफ्टवेयर इन्जीनियर हैं, दोनों ने आई.आई.टी रूडकी से बी.टेक किया है, हम लोग रूडकी में साथ पढ़ते थे, तीनों दोस्त हें, अब इन्शाअल्लाह जन्नत में साथ जाने की तमन्ना है, जो बजाहिर अल्लाह ने चाहा तो पूरी होती दिखायी दे रही है।
यह दोनों जमात में वक्त लगा कर आ रहे हैं, इनका चिल्ला आदिलाबाद में लगा, वहाँ पर इन्होंने हजरत का और भी तार्रुफ सुना तो बहुत बे-चैन थे कि हजरत से मुलाकात हो जाये, मेरी भी खाहिश थी कि मुलाकात हो जाये, वह लोग बेअत होने के लिए आये थे, अब चूंकि हजरत बिल्कुल दावत पर बैअत लेने लगे हैं, इस लिए नये इरादे से जा रहे हैं।


अहमदः इन को दावत देने में आपको कोई मुश्किल तो नहीं आयी?
मसऊदः मुश्किल तो नहीं कह सकते, अलबत्ता दो साल लगातार दुआयें करनी पडीं। असल में इनको जब भी इस्लाम के बारे में बताता, या कोई किताब पढ़ने को कहता तो यह मेरा मजाक उड़ाते, यह कहते कि हमारे लिए कौन-सी कश्मीरी लड़की तुमने तलाश कर रखी है जिसके लिए हम  मुसलमान हों, मेरी बदकिस्‍मती या खुश किस्‍मती है जैसा कि शायद आपको हजरत ने बताया होगा कि मेरे इस्लाम कुबूल करने का जरिया जम्मू की एक लड़की से ताल्लुकात और शादी हुई, यह जरिया जाहिर है किसी दूसरे के लिए इस्लाम में दिलचस्पी का जरिया नहीं हो सकता, तो मैं जब भी इन दोस्तों को लेकर बैठता यह मेरा मजाक  बनाते, इनको नॉनवेज(गोश्त) खाने का बहुत शौक है, दावत के बहाने, में इनको करीम होटल जुमेरात को ले जाता, और मर्कज ले जाकर तकरीर  सुनवाता, यह मेरा मजाक बनाते, मर्कज का भी मजाक उडाते, एक बार इन्होंने हजरत मौलाना साद साहब का बहुत मजाक बनायी और तीन-चार रोज उनकी नकल उतारते रहे, एक-एक जुमले को दो-दो तीन-तीन बार कहते, मुझे देखते ही कहले लगते आओ मौलाना साहब की तकरीर सुनो, मुझे बहुत तकलीफ होती, मैंने इनसे बोलना छोड दिया, उन दिनों मैंने बहुत दुआयें कीं, अपने अल्लाह के सामने बहुत फरियाद की, मेरे अल्लाह को मुझ पर तरस आगया, एक हफ्ते से ज़्यादा बोल-चाल बंद रही, फिर यह दोनों मेरी खुशामद करने लगे, जब एक रोज बहुत खुशामद की और मुझ से बहुत माफी मांगी तो मैंने कहा मैं तुम से इस शर्त पर बोलूंगा जब तुम दोनों तीन बार ‘‘आपकी अमानत-आपकी सेवा में’’ और ‘‘मरने के बाद किया होगा?’’ पढ़ने का वादा करो, वह तैयार हो गये, असल यह है अहमद साहब, अल्लाह के यहाँ से फेसला हो गया था, मेरे अल्लाह को मुझ गंदे पर तरस आ गया और फेसला हो गया, बस इन्होंने तीन-तीन बार ‘‘आपकी अमानत-आपकी सेवा में’’ और ‘‘मरने के बाद किया होगा?’’ पढ़ी और खुद ही इस्लाम कुबूल करने को कहने लगे, मैं ‘दारे अरकम’ आया, इत्तफाक से ‘दारे अरकम’ में कोई नहीं मिला, मस्जिद में हम लोगों ने दोपहर से शाम तक इन्तजार भी किया, फिर मैं इनको लेकर अगले रोज इतवार था, जामा मस्जिद दिल्ली चला गया, वहाँ मौलाना जमालुद्दिन साहब तफसीर ब्यान करते हैं, उन्होंने इनको कलमा पढवाया, कुडकरडूबा कोर्ट में मेरे एक दोस्त वकील हैं, उन्होंने इनके कागजात बनवाये, दूसरे हफ्ते इन्होंने छुट्टि ली और जमात में वक्त लगाया, मुझे ऐसा लगता है और मैं इनसे कहता हूं कि मुझे इस का अन्दाजा अब हुआ कि मुझे अपने इस्लाम कुबूल करने की इतनी खुशी नहीं हुई जितनी इन दोनों दोस्तों के इस्लाम लाने की खुशी हुई, कई बार दफ्तर से रूखसत होते तो इतनी बेचैनी हो जाती थी कि अगर मेरा रास्ते में एक्सीडेंट हो गया या इनमें से कोई आज ही मर गया तो क्या होगा, और मैं रात भर नहीं सो पाता, देर हो जाती तो उठता, वुजू करता, नमाज पढ़ कर घंटों-घंटों रोता रहता, अखबार पढता जगह-जगह हादसे, एक्सीडेंट, मौत की खबरें और भी बेचैन कर देतीं, मेरे अल्लाह का करम है कि उसने यह खुशी दिखायी और इन्हें जमात बहुत अच्छी मिली, माशाअल्लाह दोनों पाबंदी से तहज्जुद पढ़ रहे हैं और अब दावत का बहुत जज़्बा उनमें पैदा हो गया है।


अहमदः आप तीनों गुडगांव में मुलाजमत पर साथ लगे थे?
मसऊदः नहीं! पहले संजय कौशिक की नोकरी लगी, फिर इनकी कोशिश से हम दोनों भी इस कम्पनी में मुलाज़िम हो गये, रहना-सहना भी साथ ही साथ रहा है।


अहमदः आपकी तो शादी हो गयी है, आप अब भी साथ ही रह रहे हैं?
मसऊदः हम तीनों जिस फ्लैट में रह रहे थे, मेरी शादी के बाद इन दोनों ने मेरे बराबर में एक दूसरा फ्लैट ले लिया है, पुराना फ्लैट जरा अच्छा था, वह उन्होंने मेरे लिए छोड दिया है।


अहमदः अबी (मौलाना कलीम सिद्दीकी) बता रहे थे कि आपके ससुराल वाले सब बिदअती थे, अल्लाह ने आपके जरिये उनकी इस्लाह की है, जष्रा इसकी तफसील बताईये?
मसऊदः असल में, मैं जिस कम्पनी में काम करता हूं, वहां एक कश्मीरी जम्मू की रहने वाली लडकी आसिफा बट भी काम करती थी, इस से मेरे ताल्लुकात हो गये, बात जब बढ़ी तो शादी के लिए आसिफा ने मना कर दिया कि तुम हिन्दू हो मैं तुम से शादी नहीं कर सकती, मेरे लिए इस लडकी को छोडना मुश्किल था, मैं बहुत ग़ौर करता रहा, मेरे खानदान का हाल भी ऐसा नहीं थी कि मैं लडकी के लिए मुसलमान होता, मैं छुट्टि लेकर बनारस अपने घर गया कि देखूं घर वालों की राय क्या है? मगर वह बनारस के ब्रहम्‍न, उनके लिए तो नाम लेना भी जुर्म था, दो महीने में बनारस रहा, मेरे दिल  में वह लडकी जगह कर चुकी थी कि इस के बगै़र दो महीने मेरे लिए दो सौ साल लगे, मैं गुडगांव आया और मैं ने फेसला किया कि घर वालों की मर्ज़ी के बगै़र मुझे इससे शादी करनी है, और एक रोज़ मैं ने आसिफा से मुसलमान होकर शादी करने के लिए कह दिया, उसने अपने वालिद से मिलने के लिए कहा, उसके वालिद लाजपत नगर में शालों का कारोबार करते हैं, मैं उनसे मिला, उन्होंने कहा, तुम मुसलमान हो जाओ, एक-दो महीने हम देखेंगे, इतमीनान हो जायेगा तो शादी कर देंगे, हमारे जानने वालों में एक लड़की के साथ एक लड़के ने मुसलमान होकर शादी की थी, मगर दो साल बाद वह फिर हिन्दू हो गया, मैं ने कहा मैं आपकी हर शर्त मानने को तैयार हूं।
वह बोले अजमेर शरीफ चलेंगे, तुम वहां चल कर मुसलमान हो जाना, मैं उनसे तकाजा करता रहता था मगर उनको मसरूफियात की वजह से वक्त नहीं मिलता थी, दो महीने के बाद एक इतवार को हम शताब्दी से अजमेर गये, वहां जाकर एक सज्जादा साहब से मिले, मोटी-मोटी मूंछें, काली मखमल की टोपी, क्लीन शेव, पाजामा जमीन में झाडू देता हुआ, एक साहब अपनी दूकान के काउन्टर पर बिराजमान थे, न जाने क्या नाम था चिश्ती कादरी साहब, हमारे ससुर जिनका नाम मन्‍जूर बट है, उनके पास गये, उनकी खिदमत में मिठाई पेश की, कुछ नकद नजराना भी दिया और आने की गर्ज भी बतायी, उन्होंने पांच हजार रूपये खर्च बताया, फूल और चादर अलग से खरीदने के लिए कहा। मुझे मेरे सर पर फूलों की टोकरी और चादर रख कर अन्दर ले कर गये, मजार की दीवार से लगा कर कुछ मुंह-मुह में कहा, और यह भी कहाः या खाजा आप का यह गुलाम हिन्दू मजहब छोड कर इस्लाम कुबूल कर रहा है, इसको कुबूल फरमा लिजिए और इसके अन्दर का कुफ्र निकाल दिजिए, चादर और फूल चढ़ाये ओर मुझे पांव की तरफ सजदे में पडने के लिए कहा, मैं सजदे में पड गया और मेरे साथ मेरे ससुर मन्‍जूर साहब भी, कादरी साहब ने बाहर निकल कर मुबारक बाद दी की खाजा साहब ने आपका इस्लाम कुबूल कर लिया, मैं ने उनसे कहा कि खाजा साहब ने इस्लाम कुबूल कर लिया, तो अब मुझे इस्लाम के लिया क्या करना है? बोले बेटा तुम्हारा इस्लाम खाजा ने कुबूल कर लिया, तुम वाकई सच्चे दिल से इस्लाम में आये थे, वहां तो दिल देख कर कुबूलियत होती है, मैंने अपने दिल में सोचा कि मैंने सच्चे दिल से कहां इस्लाम का इरादा किया है?


अहमदः क्या आप ने उस वक्त इस्लाम कुबूल करने का दिल से इरादा नहीं किया था?
मसऊदः नहीं मौलाना अहमद साहब! सच्ची बात यह है कि मैं ने सिर्फ उन लोगों के इतमीनान और शादी के लिए इस्लाम कुबूल करने का ड्रामा किया था, और मेरे दिल में यह बात थी कि बाप दादाओं का धर्म कोई छोडने की चीज होती है किया?


अहमदः आप अजमेर कुछ रोज रहे या वापस चले आये?
मसऊदः उसी रात को बस से दिल्ली आ गये, मैं ने आसिफा से शादी का मुतालबा किया तो उसने बताया कि हमारे वालिद साहब अभी मुतमईन नहीं हैं, अभी देख रहे हैं।


अहमदः आपने कुछ नमाज वगैरा पढनी शुरू कर दी थी?
मसऊदः तीन-चार बार जुमे की नमाज उनको दिखाने और इतमीनान कराने के लिए पढी, असल में नमाज तो आसिफा के घर वाले भी नहीं पढ़ते थे, उसके तीन भाई और एक बहन, मां-बाप मैं से कोई भी नमाज नहीं पढ़ता था, बस अजमेर शरीफ साल में दो बार जाते और निजामुद्दीन अन्दर दरगाह में एक महीने में दो बार जाते थे, और जम्मू में कुछ दरगाहें थीं वहां भी जाते, इसी को इस्लाम समझते थे, उनके एक पीर थे खानदानी, जो साल में एक दो बार उनसे नजराना लेते थे और कहते थे कि मैं तुम सब की तरफ से नमाज भी पढ़ लेता हूं और रोज भी रख लेता हूं।


अहमदः फिर शादी किस तरह हुई?
मसऊदः शादी अभी कहां हुई, असल में उनके दोस्त की लडकी के साथ हादसा हुआ था कि उस लडकी से जिस लडके ने मुसलमान होकर शादी की थी, वह शादी के बाद उस लडकी को होली, दीवाली मनाने को कहता था, और न मानने पर मारता था, बात बन न सकी, वह हिन्दू तो था ही, फिर उसे छोड कर अपने खानदान में चला गया, इस लिए आसिफा के वालिद डरते थे, वह लोगों से मशवरा करते, लोग उनको शादी न करने की राये देते, मगर वह मेरे ताल्लुकात के हद से ज़्यादा बढने के बारे में जानते थे, उनके किसी साथी ने उन्हें कश्मीर में मुफ्ती नजीर  अहमद से मशवरा करने के लिए कहा, मुफ्ती नजीर अहमद साहब कश्मीर के बडे मुफ्ती हैं, बांडीपूरा कोई बडा मदरसा है वहां मुफ्ती आजम हैं, उन्होंने किसी से उनका फोन नम्बर लिया और उनसे मशवरा किया, और बताया कि अजमेर शरीफ जाकर हम इस लडके को मुसलमान करवा लाये हैं, और खाजा ने इस्लाम कुबूल कर लिया है, मुफ्ती साहब ने कहा खाजा ने तो कब का इस्लाम कुबूल किया हुआ है, वह लडका अगर इस्लाम कुबूल न करे तो लडकी का निकाह ही नहीं होगा, मुफ्ती साहब ने उन्हें ‘दारे अरकम’ का पता दिया, और हजरत मौलाना कलीम साहब से मिलने का मशवरा दिया, मन्‍जूर साहब कई बार ‘दारे अरकम’ और खलीलुल्लाह मस्जिद आये मगर मुलाकात न हो सकी, इत्तफाक से दारे अरकम में कोई न मिला, बटला हाऊस मस्जिद में कोई अब्दुर्रशीद दोस्तम नव-मुस्लिम हैं, उनसे मन्‍जूर  साहब की मुलाकात हो गयी,  उनसे बात हुयी, अब्दुर्रशीद साहब ने बताया कि हजरत तो एक हफ्ते के बाद सफर से आयेंगे, मौलाना ओवेस और मौलाना उसामा नानोतवी भी नानोता गये हैं, आप ऐसा करें उनसे मुझे मिला दें, अगले रोज इतवार था, लाजपत नगर अब्दुर्रशीद दोस्तम ने आने का वादा किया, मेरी उनसे मुलाकात हुयी, उन्होंने इस्लाम के बारे में समझाया और कलमा पढवाया और मुझे और मेरे ससुर मन्‍जूर बट साहब दोनों को जोर  देकर कहा कि जमात में वक्त लगवा दें, मेरे कागजात सरफराज साहब एडवोकेट से बनवाये, और मुझे मर्कज जाकर डॉक्टर नादिर अली खां से मिल कर जमात में जाने को कहा, मेरे ससुर को बहुत समझाया अगर आप अपनी बची की जिन्‍दगी को तबाह होने से बचाना चाहते हैं कि यह शादी के बाद दोबारा हिन्दू न हों तो कम से कम चालीस रोज वरना अच्छा तो यह है कि चार महीने जमात में लगवा दें, वह बोले कि यह वहाबी हो जायेगा तो न हिन्दू रहेगा न मुसलमान, अब्दुर्रशीद दोस्तम साहब ने समझाया कि जमात वाले किसी का मसलक नहीं बदलवाते, जो हन्फी हैं वह हन्फी रहते हैं, जो शाफई हैं वह शाफई रहते हैं, और अहले हदीस, अहले हदीस रहते हैं। वहां सिर्फ फजाईल ब्यान किये जाते हैं, मसाईल अपने मसलक के मुताबिक लोग अपने आलिमों से पूछते हैं, बात उनकी समझ में आगयी और उन्होंने मुझे जमात में जाने के लिए कहा, चालीस रोज मेरे लिए बडी मुश्किल बात थी मगर वह अड़ गये, बोले जब तक तुम जमात में चिल्ला नहीं लगाओगे शादी नहीं होगी, मैं ने छुट्टि ली और मर्कज अपने ससुर के साथ गया, डॉक्टर नादिर अली खां साहब के कमरे में ऊपर जाकर उनसे मिले, उन्होंने मशवरा दिया पहले आप मौलाना कलीम साहब से मिलें, हमने बताया बहुत कोशिश के बावजूद नहीं मिल सके, अब्दुर्रशीद दोस्तम साहब से मुलाकात हुयी उन्होंने जमात में जाने का मशवरा दिया है, अलीगढ़ के एक पुराने उस्ताद जमात लेकर हेदराबाद जा रहे थे, उनके साथ जमात में जुडवा दिया, और मुझे मशवरा दिया कि तीन चिल्ले पूरे करके आना, जमात पढे लिखे लोगों की थी, बहुत अच्छा वक्त गुजरा और अल्हम्दु लिल्लाह इस्लाम मेरी समझ में आगया, अमीर साहब ने मशवरा दिया और मुझे खुद भी तकाजा हुआ कि जमात चार महीने की है, तो मैं भी चार महीने लगाऊँ। जमात में एक मौलाना साहब भी थे जो साल लगारहे थे, कई बार नये साथियों के साथ जमात बट जाती और फिर एक साथ आ जाती। 15 अगस्त को मेरे चार महीने पूरे हुए। 16 अगस्त को हम दिल्ली मर्कज पहुंचे, डॉक्टर नादिर अली खां साहब  से मुलाकात हुयी, उन्होंने मुझे हजरत  मौलाना कलीम साहब से जुडे रहने की ताकीद की, बात शादी की हुयी तो मुझे हिचकिचाहट थी, कि अगर ऐसे बिदअती खानदान में मेरी  शादी हो गयी तो बच्चे अपनी मां के साथ बिदअती होंगे, और नस्लें सही अकल से महरूम रहेंगी, मैं शादी को टालता रहा, एक रोज आसिफा और उसके वालिद ने मुझसे मालूम किया कि शादी करना है कि नहीं? मैं ने साफ-साफ कह दिया कि जमात में जाने से पहले तो आप लोगों को इत्मीनान नहीं था कि मुसलमान हूँ कि नहीं, मगर अब मामला उलटा है, अजमेर में ले जाकर जिस तरह आपने मुझ से शिर्क कराया, कुरआन और हदीस के लिहाज से तो मन्दिर में बुत को पूजना और अजमेर जाकर खाजा-खाजगान की दरगाह पर सर झुकाना बराबर दरजे का शिर्क है। अल्लाह के रसूल सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने फरमाया है ‘‘जिसने जानबूझ कर नमाज छोडदी उसने कुफ्र किया, अल्लाह के नबी सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने अपनी लाडली बेटी हजरत फातिमा से फरमाया था कि कब्र में तेरे आमाल काम आयेंगे, यहाँ आपके पीर साहब आपकी नमाज  और रोज अदा करते हैं, और बेवकूफ बनाते हैं। अब अल्लाह का शुक्र है मैं एक मुसलमान हूँ और इस्लाम अकल वालों का मजहब है, यह रस्म का नाम नहीं, अगर आपको मुझ से अपनी लडकी की शादी करना है तो आपको पूरे खानदान वालों के साथ मुसलमान होना पडेगा, जब तक आप लोग मुसलमान नहीं होंगे मैं शादी नहीं करूंगा। मैं ने कहा ‘आपको और आपके तीनों बेटों को चालीस रोज लगाने पडेंगे, यह भी कहा कि जमात वाले मसलक नहीं बदलते, मैंने खुशामद भी की, कई साथियों को उन लोगों से मिलवाया, अल्हम्दु लिल्लाह बडी कोशिश के बाद वह तैयार हुए, पहले मेरे ससुर ने वक्त निकाला, छोटे बेटे शबीर बट को साथ लेकर गये, उसके बाद बडे भाईयों ने वक्त लगाया, उस दौरान अल्लाह का शुक्र है कि मैंने आसिफा को काफी किताबों का मुताला कराया, मैं ने चार महीने में कुरआन मजीद नाजरा पढ़ लिया था, उर्दू अच्छी पढने लगा था, अल्लाह का शुक्र है आसिफा का जेहन साफ हो गया, गुडगांव जामा मस्जिद के इमाम साहब के साथ, मैं आसिफा को लेकर खलीलुल्लाह मस्जिद आया और हम दोनों इमाम साहब के मशवरे से हजरत से बैअत हो गये, जब हजरत हज को गये हुये थे तो हमारी शादी की तारीख तै हो गयी, हजरत ने फोन पर जोर दिया कि यह भी सुन्नत के खिलाफ है कि किसी खास शख्सियत से निकाह पढ़वाने का अहतमाम किया जाये और निकाह में ताखीर की जाये, हजरत ने मुलाकात पर भी निकाह में जल्दी करने का मशवरा दिया था, बल्कि यह भी फरमाया था कि अच्छा है आज ही निकाह हो जाये, दोनों के एक साथ रहने, बात करने का कानूनी हक हो जायेगा, वरना इस तरह बात करना भी गुनाह है, अगर्चे जमात से आकर मैं अल्लाह का शुक्र  है काफी अहतियात करने लगा था। अल्हम्दुलिल्लाह 17 नवम्बर को हमारा निकाह हुआ, फिर जब हजरत वापस आगये तो आसिफा के सारे खान्दान वाले हजरत से बैअत हो गये।


अहमदः आपके घर वालों का क्या हुआ?
मसऊदः अभी मैं ने सिर्फ अपने घर वालों के लिए दुआओं का अहतमाम किया है, अभी जल्दी ही हजरत ने बनारस के एक साहब को हमारे वालिद साहब का फोन नम्बर दिया है, हमारे वालिद साहब रेलवे में एक अच्छी पोस्ट पर हैं, मुगलसराये में उनकी पोस्टिंग है।


अहमदः और भी कुछ लोगों पर आपने काम किया है, इसकी कुछ तफसील बताईये?
मसऊदः हमारी कम्पनी में काम करने वाले एक साथी जो जयपुर के रहने वाले हैं, उनके वालिद दस साल पहले बी.जे.पी. के एम.एल.ए. रहे हैं, अल्हम्दु लिल्लाह मुसलमान होगये हैं, वह जमात में गये हुए हैं।


अहमदः आपकी अहलिया आसिफा का क्या हाल है?
मसऊदः अल्हम्दु लिल्लाह मैं ने मशवरे से तै किया है कि वह सिर्फ दावत का काम करेंगी, उन्होंने मुलाजष्मत छोड दी है, बुरका पहनने लगी हैं, इस्लाम का मुताला कर रही हैं, और कुरआन और सीरत, हजरत के मशवरे से पढना शुरू किया है, हम लोग नेट पर दावत के लिए आनलाइन साइट खोलकर काम का खाका बना रहे हैं, उनकी दोस्त दो लड़कियां उनकी कोशिश से मुसलमान हो चुकी हैं।


अहमदः बहुत-बहुत शुक्रिया मसऊद भाई, अरमुगान के कारिईन के लिए कोई पैगषम आप देंगे?
मसऊदः खानदानी मुसलमानों को रस्मी इस्लाम से निकल कर कुरआनी इस्लाम में लाने का वाहिद तरीका यह है कि मुसलमानों में दावती शऊर बेदार हो, नया खून पुराने बीमार खून को ताजा और साफ करता है, मैं ने अपना इस्लाम कुबूल किया था तो मुझे अपनी ससुराल वालों के इस्लाम की कैसी फिक्र थी बस मैं ही जानता हूँ।


अहमदः बेशक! बहुत पते की बात आपने कही है। अस्सलामु अलैकुम
मसऊदः वालैकुम सलाम 

2 comments:

Irfan Jamil said...

You Have Done Good.Please send me your email id.
Masud Bhai.

Taj Mohammad said...

I read all the stories of new Muslims, its amazing, I requested to you please post the stories in clear hindi, because some script is difficult to read it, you are doing very good job, and please remember me in dua, Allah ham sab aisi hi hidayat de, Ameen

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