Wednesday, March 30, 2011

मसऊद अहमद से मुलाकात interview april 2011

अहमदः अस्सलामु अलैकुम रहमतुल्लाहि वबरकातुह
मसऊदः वालैकुम सलाम वरहमतुल्लाहि वबरकातुह


अहमदः आपके साथ दो साथी भी आये हैं, इनका तार्रुफ कराईये?
मसऊदः यह दोनों मेरे दफ्तर के साथी हैं, हमारे साथ गुडगांव में अमरिकी कम्पनी में मुलाजमत करते हैं, इनमें से यह पहले साहब, इनका नाम संजय कौशिक था, इनका नया नाम सईद अहमद है, और यह दूसरे अनुपम गुलाठी थे, अब मुहम्मद नईम इनका नाम है, दोनों साफ्टवेयर इन्जीनियर हैं, दोनों ने आई.आई.टी रूडकी से बी.टेक किया है, हम लोग रूडकी में साथ पढ़ते थे, तीनों दोस्त हें, अब इन्शाअल्लाह जन्नत में साथ जाने की तमन्ना है, जो बजाहिर अल्लाह ने चाहा तो पूरी होती दिखायी दे रही है।
यह दोनों जमात में वक्त लगा कर आ रहे हैं, इनका चिल्ला आदिलाबाद में लगा, वहाँ पर इन्होंने हजरत का और भी तार्रुफ सुना तो बहुत बे-चैन थे कि हजरत से मुलाकात हो जाये, मेरी भी खाहिश थी कि मुलाकात हो जाये, वह लोग बेअत होने के लिए आये थे, अब चूंकि हजरत बिल्कुल दावत पर बैअत लेने लगे हैं, इस लिए नये इरादे से जा रहे हैं।


अहमदः इन को दावत देने में आपको कोई मुश्किल तो नहीं आयी?
मसऊदः मुश्किल तो नहीं कह सकते, अलबत्ता दो साल लगातार दुआयें करनी पडीं। असल में इनको जब भी इस्लाम के बारे में बताता, या कोई किताब पढ़ने को कहता तो यह मेरा मजाक उड़ाते, यह कहते कि हमारे लिए कौन-सी कश्मीरी लड़की तुमने तलाश कर रखी है जिसके लिए हम  मुसलमान हों, मेरी बदकिस्‍मती या खुश किस्‍मती है जैसा कि शायद आपको हजरत ने बताया होगा कि मेरे इस्लाम कुबूल करने का जरिया जम्मू की एक लड़की से ताल्लुकात और शादी हुई, यह जरिया जाहिर है किसी दूसरे के लिए इस्लाम में दिलचस्पी का जरिया नहीं हो सकता, तो मैं जब भी इन दोस्तों को लेकर बैठता यह मेरा मजाक  बनाते, इनको नॉनवेज(गोश्त) खाने का बहुत शौक है, दावत के बहाने, में इनको करीम होटल जुमेरात को ले जाता, और मर्कज ले जाकर तकरीर  सुनवाता, यह मेरा मजाक बनाते, मर्कज का भी मजाक उडाते, एक बार इन्होंने हजरत मौलाना साद साहब का बहुत मजाक बनायी और तीन-चार रोज उनकी नकल उतारते रहे, एक-एक जुमले को दो-दो तीन-तीन बार कहते, मुझे देखते ही कहले लगते आओ मौलाना साहब की तकरीर सुनो, मुझे बहुत तकलीफ होती, मैंने इनसे बोलना छोड दिया, उन दिनों मैंने बहुत दुआयें कीं, अपने अल्लाह के सामने बहुत फरियाद की, मेरे अल्लाह को मुझ पर तरस आगया, एक हफ्ते से ज़्यादा बोल-चाल बंद रही, फिर यह दोनों मेरी खुशामद करने लगे, जब एक रोज बहुत खुशामद की और मुझ से बहुत माफी मांगी तो मैंने कहा मैं तुम से इस शर्त पर बोलूंगा जब तुम दोनों तीन बार ‘‘आपकी अमानत-आपकी सेवा में’’ और ‘‘मरने के बाद किया होगा?’’ पढ़ने का वादा करो, वह तैयार हो गये, असल यह है अहमद साहब, अल्लाह के यहाँ से फेसला हो गया था, मेरे अल्लाह को मुझ गंदे पर तरस आ गया और फेसला हो गया, बस इन्होंने तीन-तीन बार ‘‘आपकी अमानत-आपकी सेवा में’’ और ‘‘मरने के बाद किया होगा?’’ पढ़ी और खुद ही इस्लाम कुबूल करने को कहने लगे, मैं ‘दारे अरकम’ आया, इत्तफाक से ‘दारे अरकम’ में कोई नहीं मिला, मस्जिद में हम लोगों ने दोपहर से शाम तक इन्तजार भी किया, फिर मैं इनको लेकर अगले रोज इतवार था, जामा मस्जिद दिल्ली चला गया, वहाँ मौलाना जमालुद्दिन साहब तफसीर ब्यान करते हैं, उन्होंने इनको कलमा पढवाया, कुडकरडूबा कोर्ट में मेरे एक दोस्त वकील हैं, उन्होंने इनके कागजात बनवाये, दूसरे हफ्ते इन्होंने छुट्टि ली और जमात में वक्त लगाया, मुझे ऐसा लगता है और मैं इनसे कहता हूं कि मुझे इस का अन्दाजा अब हुआ कि मुझे अपने इस्लाम कुबूल करने की इतनी खुशी नहीं हुई जितनी इन दोनों दोस्तों के इस्लाम लाने की खुशी हुई, कई बार दफ्तर से रूखसत होते तो इतनी बेचैनी हो जाती थी कि अगर मेरा रास्ते में एक्सीडेंट हो गया या इनमें से कोई आज ही मर गया तो क्या होगा, और मैं रात भर नहीं सो पाता, देर हो जाती तो उठता, वुजू करता, नमाज पढ़ कर घंटों-घंटों रोता रहता, अखबार पढता जगह-जगह हादसे, एक्सीडेंट, मौत की खबरें और भी बेचैन कर देतीं, मेरे अल्लाह का करम है कि उसने यह खुशी दिखायी और इन्हें जमात बहुत अच्छी मिली, माशाअल्लाह दोनों पाबंदी से तहज्जुद पढ़ रहे हैं और अब दावत का बहुत जज़्बा उनमें पैदा हो गया है।


अहमदः आप तीनों गुडगांव में मुलाजमत पर साथ लगे थे?
मसऊदः नहीं! पहले संजय कौशिक की नोकरी लगी, फिर इनकी कोशिश से हम दोनों भी इस कम्पनी में मुलाज़िम हो गये, रहना-सहना भी साथ ही साथ रहा है।


अहमदः आपकी तो शादी हो गयी है, आप अब भी साथ ही रह रहे हैं?
मसऊदः हम तीनों जिस फ्लैट में रह रहे थे, मेरी शादी के बाद इन दोनों ने मेरे बराबर में एक दूसरा फ्लैट ले लिया है, पुराना फ्लैट जरा अच्छा था, वह उन्होंने मेरे लिए छोड दिया है।


अहमदः अबी (मौलाना कलीम सिद्दीकी) बता रहे थे कि आपके ससुराल वाले सब बिदअती थे, अल्लाह ने आपके जरिये उनकी इस्लाह की है, जष्रा इसकी तफसील बताईये?
मसऊदः असल में, मैं जिस कम्पनी में काम करता हूं, वहां एक कश्मीरी जम्मू की रहने वाली लडकी आसिफा बट भी काम करती थी, इस से मेरे ताल्लुकात हो गये, बात जब बढ़ी तो शादी के लिए आसिफा ने मना कर दिया कि तुम हिन्दू हो मैं तुम से शादी नहीं कर सकती, मेरे लिए इस लडकी को छोडना मुश्किल था, मैं बहुत ग़ौर करता रहा, मेरे खानदान का हाल भी ऐसा नहीं थी कि मैं लडकी के लिए मुसलमान होता, मैं छुट्टि लेकर बनारस अपने घर गया कि देखूं घर वालों की राय क्या है? मगर वह बनारस के ब्रहम्‍न, उनके लिए तो नाम लेना भी जुर्म था, दो महीने में बनारस रहा, मेरे दिल  में वह लडकी जगह कर चुकी थी कि इस के बगै़र दो महीने मेरे लिए दो सौ साल लगे, मैं गुडगांव आया और मैं ने फेसला किया कि घर वालों की मर्ज़ी के बगै़र मुझे इससे शादी करनी है, और एक रोज़ मैं ने आसिफा से मुसलमान होकर शादी करने के लिए कह दिया, उसने अपने वालिद से मिलने के लिए कहा, उसके वालिद लाजपत नगर में शालों का कारोबार करते हैं, मैं उनसे मिला, उन्होंने कहा, तुम मुसलमान हो जाओ, एक-दो महीने हम देखेंगे, इतमीनान हो जायेगा तो शादी कर देंगे, हमारे जानने वालों में एक लड़की के साथ एक लड़के ने मुसलमान होकर शादी की थी, मगर दो साल बाद वह फिर हिन्दू हो गया, मैं ने कहा मैं आपकी हर शर्त मानने को तैयार हूं।
वह बोले अजमेर शरीफ चलेंगे, तुम वहां चल कर मुसलमान हो जाना, मैं उनसे तकाजा करता रहता था मगर उनको मसरूफियात की वजह से वक्त नहीं मिलता थी, दो महीने के बाद एक इतवार को हम शताब्दी से अजमेर गये, वहां जाकर एक सज्जादा साहब से मिले, मोटी-मोटी मूंछें, काली मखमल की टोपी, क्लीन शेव, पाजामा जमीन में झाडू देता हुआ, एक साहब अपनी दूकान के काउन्टर पर बिराजमान थे, न जाने क्या नाम था चिश्ती कादरी साहब, हमारे ससुर जिनका नाम मन्‍जूर बट है, उनके पास गये, उनकी खिदमत में मिठाई पेश की, कुछ नकद नजराना भी दिया और आने की गर्ज भी बतायी, उन्होंने पांच हजार रूपये खर्च बताया, फूल और चादर अलग से खरीदने के लिए कहा। मुझे मेरे सर पर फूलों की टोकरी और चादर रख कर अन्दर ले कर गये, मजार की दीवार से लगा कर कुछ मुंह-मुह में कहा, और यह भी कहाः या खाजा आप का यह गुलाम हिन्दू मजहब छोड कर इस्लाम कुबूल कर रहा है, इसको कुबूल फरमा लिजिए और इसके अन्दर का कुफ्र निकाल दिजिए, चादर और फूल चढ़ाये ओर मुझे पांव की तरफ सजदे में पडने के लिए कहा, मैं सजदे में पड गया और मेरे साथ मेरे ससुर मन्‍जूर साहब भी, कादरी साहब ने बाहर निकल कर मुबारक बाद दी की खाजा साहब ने आपका इस्लाम कुबूल कर लिया, मैं ने उनसे कहा कि खाजा साहब ने इस्लाम कुबूल कर लिया, तो अब मुझे इस्लाम के लिया क्या करना है? बोले बेटा तुम्हारा इस्लाम खाजा ने कुबूल कर लिया, तुम वाकई सच्चे दिल से इस्लाम में आये थे, वहां तो दिल देख कर कुबूलियत होती है, मैंने अपने दिल में सोचा कि मैंने सच्चे दिल से कहां इस्लाम का इरादा किया है?


अहमदः क्या आप ने उस वक्त इस्लाम कुबूल करने का दिल से इरादा नहीं किया था?
मसऊदः नहीं मौलाना अहमद साहब! सच्ची बात यह है कि मैं ने सिर्फ उन लोगों के इतमीनान और शादी के लिए इस्लाम कुबूल करने का ड्रामा किया था, और मेरे दिल में यह बात थी कि बाप दादाओं का धर्म कोई छोडने की चीज होती है किया?


अहमदः आप अजमेर कुछ रोज रहे या वापस चले आये?
मसऊदः उसी रात को बस से दिल्ली आ गये, मैं ने आसिफा से शादी का मुतालबा किया तो उसने बताया कि हमारे वालिद साहब अभी मुतमईन नहीं हैं, अभी देख रहे हैं।


अहमदः आपने कुछ नमाज वगैरा पढनी शुरू कर दी थी?
मसऊदः तीन-चार बार जुमे की नमाज उनको दिखाने और इतमीनान कराने के लिए पढी, असल में नमाज तो आसिफा के घर वाले भी नहीं पढ़ते थे, उसके तीन भाई और एक बहन, मां-बाप मैं से कोई भी नमाज नहीं पढ़ता था, बस अजमेर शरीफ साल में दो बार जाते और निजामुद्दीन अन्दर दरगाह में एक महीने में दो बार जाते थे, और जम्मू में कुछ दरगाहें थीं वहां भी जाते, इसी को इस्लाम समझते थे, उनके एक पीर थे खानदानी, जो साल में एक दो बार उनसे नजराना लेते थे और कहते थे कि मैं तुम सब की तरफ से नमाज भी पढ़ लेता हूं और रोज भी रख लेता हूं।


अहमदः फिर शादी किस तरह हुई?
मसऊदः शादी अभी कहां हुई, असल में उनके दोस्त की लडकी के साथ हादसा हुआ था कि उस लडकी से जिस लडके ने मुसलमान होकर शादी की थी, वह शादी के बाद उस लडकी को होली, दीवाली मनाने को कहता था, और न मानने पर मारता था, बात बन न सकी, वह हिन्दू तो था ही, फिर उसे छोड कर अपने खानदान में चला गया, इस लिए आसिफा के वालिद डरते थे, वह लोगों से मशवरा करते, लोग उनको शादी न करने की राये देते, मगर वह मेरे ताल्लुकात के हद से ज़्यादा बढने के बारे में जानते थे, उनके किसी साथी ने उन्हें कश्मीर में मुफ्ती नजीर  अहमद से मशवरा करने के लिए कहा, मुफ्ती नजीर अहमद साहब कश्मीर के बडे मुफ्ती हैं, बांडीपूरा कोई बडा मदरसा है वहां मुफ्ती आजम हैं, उन्होंने किसी से उनका फोन नम्बर लिया और उनसे मशवरा किया, और बताया कि अजमेर शरीफ जाकर हम इस लडके को मुसलमान करवा लाये हैं, और खाजा ने इस्लाम कुबूल कर लिया है, मुफ्ती साहब ने कहा खाजा ने तो कब का इस्लाम कुबूल किया हुआ है, वह लडका अगर इस्लाम कुबूल न करे तो लडकी का निकाह ही नहीं होगा, मुफ्ती साहब ने उन्हें ‘दारे अरकम’ का पता दिया, और हजरत मौलाना कलीम साहब से मिलने का मशवरा दिया, मन्‍जूर साहब कई बार ‘दारे अरकम’ और खलीलुल्लाह मस्जिद आये मगर मुलाकात न हो सकी, इत्तफाक से दारे अरकम में कोई न मिला, बटला हाऊस मस्जिद में कोई अब्दुर्रशीद दोस्तम नव-मुस्लिम हैं, उनसे मन्‍जूर  साहब की मुलाकात हो गयी,  उनसे बात हुयी, अब्दुर्रशीद साहब ने बताया कि हजरत तो एक हफ्ते के बाद सफर से आयेंगे, मौलाना ओवेस और मौलाना उसामा नानोतवी भी नानोता गये हैं, आप ऐसा करें उनसे मुझे मिला दें, अगले रोज इतवार था, लाजपत नगर अब्दुर्रशीद दोस्तम ने आने का वादा किया, मेरी उनसे मुलाकात हुयी, उन्होंने इस्लाम के बारे में समझाया और कलमा पढवाया और मुझे और मेरे ससुर मन्‍जूर बट साहब दोनों को जोर  देकर कहा कि जमात में वक्त लगवा दें, मेरे कागजात सरफराज साहब एडवोकेट से बनवाये, और मुझे मर्कज जाकर डॉक्टर नादिर अली खां से मिल कर जमात में जाने को कहा, मेरे ससुर को बहुत समझाया अगर आप अपनी बची की जिन्‍दगी को तबाह होने से बचाना चाहते हैं कि यह शादी के बाद दोबारा हिन्दू न हों तो कम से कम चालीस रोज वरना अच्छा तो यह है कि चार महीने जमात में लगवा दें, वह बोले कि यह वहाबी हो जायेगा तो न हिन्दू रहेगा न मुसलमान, अब्दुर्रशीद दोस्तम साहब ने समझाया कि जमात वाले किसी का मसलक नहीं बदलवाते, जो हन्फी हैं वह हन्फी रहते हैं, जो शाफई हैं वह शाफई रहते हैं, और अहले हदीस, अहले हदीस रहते हैं। वहां सिर्फ फजाईल ब्यान किये जाते हैं, मसाईल अपने मसलक के मुताबिक लोग अपने आलिमों से पूछते हैं, बात उनकी समझ में आगयी और उन्होंने मुझे जमात में जाने के लिए कहा, चालीस रोज मेरे लिए बडी मुश्किल बात थी मगर वह अड़ गये, बोले जब तक तुम जमात में चिल्ला नहीं लगाओगे शादी नहीं होगी, मैं ने छुट्टि ली और मर्कज अपने ससुर के साथ गया, डॉक्टर नादिर अली खां साहब के कमरे में ऊपर जाकर उनसे मिले, उन्होंने मशवरा दिया पहले आप मौलाना कलीम साहब से मिलें, हमने बताया बहुत कोशिश के बावजूद नहीं मिल सके, अब्दुर्रशीद दोस्तम साहब से मुलाकात हुयी उन्होंने जमात में जाने का मशवरा दिया है, अलीगढ़ के एक पुराने उस्ताद जमात लेकर हेदराबाद जा रहे थे, उनके साथ जमात में जुडवा दिया, और मुझे मशवरा दिया कि तीन चिल्ले पूरे करके आना, जमात पढे लिखे लोगों की थी, बहुत अच्छा वक्त गुजरा और अल्हम्दु लिल्लाह इस्लाम मेरी समझ में आगया, अमीर साहब ने मशवरा दिया और मुझे खुद भी तकाजा हुआ कि जमात चार महीने की है, तो मैं भी चार महीने लगाऊँ। जमात में एक मौलाना साहब भी थे जो साल लगारहे थे, कई बार नये साथियों के साथ जमात बट जाती और फिर एक साथ आ जाती। 15 अगस्त को मेरे चार महीने पूरे हुए। 16 अगस्त को हम दिल्ली मर्कज पहुंचे, डॉक्टर नादिर अली खां साहब  से मुलाकात हुयी, उन्होंने मुझे हजरत  मौलाना कलीम साहब से जुडे रहने की ताकीद की, बात शादी की हुयी तो मुझे हिचकिचाहट थी, कि अगर ऐसे बिदअती खानदान में मेरी  शादी हो गयी तो बच्चे अपनी मां के साथ बिदअती होंगे, और नस्लें सही अकल से महरूम रहेंगी, मैं शादी को टालता रहा, एक रोज आसिफा और उसके वालिद ने मुझसे मालूम किया कि शादी करना है कि नहीं? मैं ने साफ-साफ कह दिया कि जमात में जाने से पहले तो आप लोगों को इत्मीनान नहीं था कि मुसलमान हूँ कि नहीं, मगर अब मामला उलटा है, अजमेर में ले जाकर जिस तरह आपने मुझ से शिर्क कराया, कुरआन और हदीस के लिहाज से तो मन्दिर में बुत को पूजना और अजमेर जाकर खाजा-खाजगान की दरगाह पर सर झुकाना बराबर दरजे का शिर्क है। अल्लाह के रसूल सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने फरमाया है ‘‘जिसने जानबूझ कर नमाज छोडदी उसने कुफ्र किया, अल्लाह के नबी सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने अपनी लाडली बेटी हजरत फातिमा से फरमाया था कि कब्र में तेरे आमाल काम आयेंगे, यहाँ आपके पीर साहब आपकी नमाज  और रोज अदा करते हैं, और बेवकूफ बनाते हैं। अब अल्लाह का शुक्र है मैं एक मुसलमान हूँ और इस्लाम अकल वालों का मजहब है, यह रस्म का नाम नहीं, अगर आपको मुझ से अपनी लडकी की शादी करना है तो आपको पूरे खानदान वालों के साथ मुसलमान होना पडेगा, जब तक आप लोग मुसलमान नहीं होंगे मैं शादी नहीं करूंगा। मैं ने कहा ‘आपको और आपके तीनों बेटों को चालीस रोज लगाने पडेंगे, यह भी कहा कि जमात वाले मसलक नहीं बदलते, मैंने खुशामद भी की, कई साथियों को उन लोगों से मिलवाया, अल्हम्दु लिल्लाह बडी कोशिश के बाद वह तैयार हुए, पहले मेरे ससुर ने वक्त निकाला, छोटे बेटे शबीर बट को साथ लेकर गये, उसके बाद बडे भाईयों ने वक्त लगाया, उस दौरान अल्लाह का शुक्र है कि मैंने आसिफा को काफी किताबों का मुताला कराया, मैं ने चार महीने में कुरआन मजीद नाजरा पढ़ लिया था, उर्दू अच्छी पढने लगा था, अल्लाह का शुक्र है आसिफा का जेहन साफ हो गया, गुडगांव जामा मस्जिद के इमाम साहब के साथ, मैं आसिफा को लेकर खलीलुल्लाह मस्जिद आया और हम दोनों इमाम साहब के मशवरे से हजरत से बैअत हो गये, जब हजरत हज को गये हुये थे तो हमारी शादी की तारीख तै हो गयी, हजरत ने फोन पर जोर दिया कि यह भी सुन्नत के खिलाफ है कि किसी खास शख्सियत से निकाह पढ़वाने का अहतमाम किया जाये और निकाह में ताखीर की जाये, हजरत ने मुलाकात पर भी निकाह में जल्दी करने का मशवरा दिया था, बल्कि यह भी फरमाया था कि अच्छा है आज ही निकाह हो जाये, दोनों के एक साथ रहने, बात करने का कानूनी हक हो जायेगा, वरना इस तरह बात करना भी गुनाह है, अगर्चे जमात से आकर मैं अल्लाह का शुक्र  है काफी अहतियात करने लगा था। अल्हम्दुलिल्लाह 17 नवम्बर को हमारा निकाह हुआ, फिर जब हजरत वापस आगये तो आसिफा के सारे खान्दान वाले हजरत से बैअत हो गये।


अहमदः आपके घर वालों का क्या हुआ?
मसऊदः अभी मैं ने सिर्फ अपने घर वालों के लिए दुआओं का अहतमाम किया है, अभी जल्दी ही हजरत ने बनारस के एक साहब को हमारे वालिद साहब का फोन नम्बर दिया है, हमारे वालिद साहब रेलवे में एक अच्छी पोस्ट पर हैं, मुगलसराये में उनकी पोस्टिंग है।


अहमदः और भी कुछ लोगों पर आपने काम किया है, इसकी कुछ तफसील बताईये?
मसऊदः हमारी कम्पनी में काम करने वाले एक साथी जो जयपुर के रहने वाले हैं, उनके वालिद दस साल पहले बी.जे.पी. के एम.एल.ए. रहे हैं, अल्हम्दु लिल्लाह मुसलमान होगये हैं, वह जमात में गये हुए हैं।


अहमदः आपकी अहलिया आसिफा का क्या हाल है?
मसऊदः अल्हम्दु लिल्लाह मैं ने मशवरे से तै किया है कि वह सिर्फ दावत का काम करेंगी, उन्होंने मुलाजष्मत छोड दी है, बुरका पहनने लगी हैं, इस्लाम का मुताला कर रही हैं, और कुरआन और सीरत, हजरत के मशवरे से पढना शुरू किया है, हम लोग नेट पर दावत के लिए आनलाइन साइट खोलकर काम का खाका बना रहे हैं, उनकी दोस्त दो लड़कियां उनकी कोशिश से मुसलमान हो चुकी हैं।


अहमदः बहुत-बहुत शुक्रिया मसऊद भाई, अरमुगान के कारिईन के लिए कोई पैगषम आप देंगे?
मसऊदः खानदानी मुसलमानों को रस्मी इस्लाम से निकल कर कुरआनी इस्लाम में लाने का वाहिद तरीका यह है कि मुसलमानों में दावती शऊर बेदार हो, नया खून पुराने बीमार खून को ताजा और साफ करता है, मैं ने अपना इस्लाम कुबूल किया था तो मुझे अपनी ससुराल वालों के इस्लाम की कैसी फिक्र थी बस मैं ही जानता हूँ।


अहमदः बेशक! बहुत पते की बात आपने कही है। अस्सलामु अलैकुम
मसऊदः वालैकुम सलाम 

Wednesday, March 2, 2011

भाई मुज़म्मिल (सोहन वीर) से मुलाकात interview March 2011

अहमद अव्वाहः अस्सलामु अलैकुम व रहमतुल्लाहि वबरकातुह
मुज़म्मिलः वालैकुमुस्सलाम व रहमतुल्लाहि वबरकातुह

अहमदः मुज़म्मिल भाई आपका नम्बर भी आ ही गया?
मुज़म्मिलः जी अहमद भाई, मैंने आपसे कितनी बार कहा कि मेरा इन्टरव्यू भी ले लो।

अहमदः तुम्हारा हाल तुम्हें खुद मालूम है कैसा था, क्या वह इस लायक़ था कि उसे छपवाया जाये, वह तो ऐसा हाल था कि उसे छुपाया जाये बस, फिर यह बात भी थी कि अबी (मौलाना मुहम्मद कलीम सिद्दीकी) जिसके बारे में फरमाते हैं मैं उनसे ही बात करता हूं, मैंने अबी से तुम्हारी बात कही थी, तो अबी कहते थे ज़रा इन्तज़ार कर लो इसका हाल ज़रा इस लायक होने दो।
मुज़म्मिलः मशहूर है कि बारा बरस में कोडी के दिन भी बहाल हो जाते हैं, अहमद भाई मुझे बारा बरस इस्लाम कुबूल किये हुए हो गये, बल्कि अगर मैं कहूं कि इस्लाम कुबूल करने का ढोंग भरे हुए, तो यह भी सही है।
 
अहमदः वाकई हम पर तुम्हारा अहसान है कि तुम्हारी वजह से हमने अबी को पहचाना और हमें मालूम हुआ कि किसी को बरदाश्त करना और सबर करना किसको कहते हैं, वरना अच्छे-अच्छे हिम्मत हार जाते हैं।
मुज़म्मिलः अहमद भाई आप हज़रत के घर में सबसे नर्म, बरदाश्त करने वाले और रहमदिल हैं, आपने भी मुझे दो बार फुलत से भगाया, लेकिन हज़रत दोनों बार मुझे अपनी गाड़ी में बैठाकर साथ ले आये।
 
अहमदः अच्छा अब डेढ साल से तुमने कोई ड्रामा नहीं किया, कहते हैं चोर चोरी से जाये, हेरा-फेरी से नहीं जाता, तो क्या अब तुम्हारे दिल में पुरानी हरकतें करने की बात नहीं आती?
मुज़म्मिलः अल्हमदू लिल्लाह मेरे अल्लाह का करम है(रोते हुए) अब कुछ भी नहीं आती।
 
अहमदः तुम्हें कलमा पढे हुए कितने दिन हुए?
मुज़म्मिलः कौन-सा वाला कलमा पढे हुए, मैंने तो बिसियों बार कलमा पढा है।
 
अहमदः तुमने इस्लाम कुबूल करने के लिए कलमा कब पढा?
मुज़म्मिलः मौलवी अहमद! मैं ने हर बार इस्लाम कुबूल करने के लिए कह कर कलमा पढा, सबसे पहला ड्रामा मैंने 9 जून 1998 में कलमा पढने का किया, जब थाना भवन के एक बडे आदमी चौधरी साहब मुझे हजरत की खिदमत में लेकर आये थे, इसके बाद मैं ज़रूरत के लिहाज़ से बार-बार कलमा पढकर मुसलमान होने का ड्रामा करता रहा, लेकिन 3 मार्च 2009 को मुझे हज़रत ने जामा मस्जिद फुलत में दस बजकर बाईस मिन्ट पर कलमा पढवाया था उसके बाद से काशिश करता हूं कि इस पर जमा रहूं, हमारे हज़रत कहते हैं कि मुझे हर वक्त डर रहता है कि ईमान रहा कि नहीं, इस खौफ से मग़रिब के बाद और फ़जर के बाद एक बार रोज़ाना ईमान कुबूल करने के लिए कलमा पढता हूं, आपने तो सुना होगा, नव-मुस्लिम आकर कहता है कि मैं नव-मुस्लिम हूं, हज़रत मालूम करते हैं कब मुसलमान हुए? तो वह बताता है कि दो महीने हो गये, दो साल हो गये। हजरत कहते हैं कि आप तो मुझसे पुराने मुसलमान हो, मैं ने अभी फजर के बाद इस्लाम कुबूल किया है या मग़रिब के बाद, हज़रत तो यह भी फरमाते हैं कि हर बच्चा सच्चे नबी सल्लल्लाहू अलैहि वसल्लम की सच्ची खबर के मुताबिक मुसलमान पैदा होता है, तो अब आप नव-मुस्लिम कहां हुए, आपतो पैदाईशी मुसलमान हैं, अल्हम्दू लिल्लाह 9 जून से रोज़ाना सुबह-शाम ईमान की तजदीद करता हूं, दिन रात मैं कभी-कभी बीच में भी कलमा पढ लेता हूं कि शायद अभी मौत का वक्त करीब हो।
 
अहमदः आजकल तुम कहां रह रहे हो?
मुज़म्मिलः मैं आजकल हजरत के हुक्म से सहारनपुर के एक मदरसे में पढ रहा हूं, यह तो आपके इल्म में है कि मैं अगस्त 2009 में चार महीने जमा‘त में लगाकर आया, और कुरआन शरीफ नाज़रा और हिफज़ (कुरआन कंण्ठस्थ) सात महीने में मुकम्मल किया, 5 अप्रैल 2010 को मेरे हज़रत हमारे मदरसे में तशरीफ लाये, मेरे खत्म कुरआन की दुआ हुई, हज़रत पर इस कद्र रक्कत(रूदन, करूणा) तारी थी कि तकरीर करना मुश्किल हो गया और चालीस मिन्ट की दुआ करायी, सारा मजमा रोता रहा, हजरत ने प्रोग्राम के बाद खाना खाते हुए यह बात कही कि आज मुझे मुज़म्मिल के हिफज(कंण्ठस्थ) की जितनी खुशी हुयी, अगर अल्लाह ने बख्श दिया और जन्नत में जाना हुआ तो शायद इतनी खुशी बस उस रोज़ होगी, उसके बाद मैं ने दौर किया और अल्हम्दू लिल्लाह मैंने जमात में आदिलाबाद में वक्त लगाया, और साथियों को कुरआन शरीफ सुनाया, इस साल अल्हमदुलिल्लाह अरबी पढनी शुरू कर दी है, मैंने हज़रत से वादा किया है इन्शा अल्लाह जल्द हज़रत को आलमियत की सनद दिखानी है, सुमा इन्शाअल्लाह।

अहमदः कुरआन मजीद तो आपका अल्हम्दू लिल्लाह अब बिल्कुल पक्का हो गया है, मगर आपने बडी उम्र में हिफज किया है इस लिये याद करते रहना चाहिए।
मुज़म्मिलः हज़रत से मैंने मालूम किया था कि हमारे नबी सल्लल्लाहू अलैहि वसल्लम का कितना कुरआन पढने का मामूल था तो हज़रत ने बताया कि एक मन्ज़िल रोज़ाना, और बहुत से सहाबा इकराम का भी आप सल्लल्लाहू अलैहि वसल्लम कि इत्तबा(अनुसरण) में इस मामूल का जिक्र आता है, मैंने ईद के बाद से तहज्जुद में एक मन्ज़िल पढना शुरू किया है, चन्द दिनों के अलावा जब मुझे डेंगू हो गया था अल्हम्दू लिल्लाह अभी तक नागा नहीं हुआ, हमारे मदरसे में सिफर घण्टे में तर्जुमा(अनुवाद) कुरआन पढाया जाता है, अल्हम्दू लिल्लाह मुझे खासा कुरआन समझ में आने लगा है, कभी-कभी बहुत ही मज़ा आता है।

अहमदः शुरू में जब 1998 में तुम ने कलमा पढा था तो उस वक्त तुम्हारा इरादा मुसलमान होने का था कि नहीं?
मुज़म्मिलः असल में आपको मालूम है, मैं थाना भवन के करीब एक भंगी खानदान में पैदा हुआ, हमारे खान्दान वाले गांव के चैधरियों के यहां सफायी वगैरा करते थे, मेरे पिता जी दस्वी क्लास तक पढे हुये थे, और सोसाईटी में मुलाजिम हो गये थे, मेरी मां भी पढी लिखी हैं, वह एक प्रायमरी स्कूल में टीचर हैं, उन्होंने ही मुझे पढाया, मैं बहुत जहीन था, हाई स्कूल में फ्रस्ट डवीजन पास हुआ, ग्यारहवीं में पहले मुझे शराब की लत लगी फिर और दूसरे खतरनाक नशों का आदी हो गया, और इस तरह के लडकों के साथ बुरी संगती हो गयी, उनमें एक दो मुसलमान भी थे, इण्टर पास करके मेरी मां मुझे डाक्टर बनाना चाहती थीं, मगर मैं आवारा लडकों के साथ लग गया, कुछ रफ्तार मेरी ऐसी तेज़ थी कि जिधर जाता आगे निकल जाता था। थाना भवन में एक गूजर ज़मीनदार के बेटे के साथ मेरे ताल्लुकात बढे जो नशे की वजह से बने थे, उनके यहां हज़रत एक बार नाश्ते के लिए आये थे, मैं वहां मौजूद था, हज़रत से चैधरी साहब के बडे बेटे ने मेरी मुलाक़ात करायी, तो हज़रत ने उनके बेटे जो मेरे साथी थे अल्ताफ से कहा कि अपने दोस्त की खबर लो वरना यह तुम्हें दोज़ख़ में पकड कर ले जायेगा, अल्ताफ के बडे भाई ने मझ से कहा ‘सोहन वीर कब तक तू अछूत रहेगा, मुसलमान होजा’ मैं ने कहा ‘अगर मैं मुसलमान हो जाऊँगा तो मुसलमानों में मेरी शादी होजायेगी?’ उसने कहा ‘ हो जायेगी’। मैं ने सोचा चलो देखते हैं, एक बार मुसलमान होकर देखते हैं अगर जमेगा तो अच्छा है वरना फिर अपने घर आजाऊँगा। मेरे पिताजी का तो शराब की लत में 45 साल की उम्र में इन्तकाल हो गया था, मेरी मां मेरी वजह से बहुत परैशान रहती थी, अल्ताफ के बडे भाई मसरूर मुझे लेकर फुलत पहुंचे, हज़रत ने मुझे कलमा पढवाया, मेरठ भेज कर मेरे कागज बनवाये और मुझे जमात के लिए दिल्ली मर्कज भेज दिया गया, हमारी जमात भोपाल गयी, हज़रत ने यह कह कर पैसे अब्बा इलयास से दिलवाये कि यह कर्ज़ है, जमात से वापस आकर तुम काम पर लगोगे तो वापस करने हैं, जब यह जैब खर्च खत्म हो गया तो मैंने अमीर साहब से कहा कि मैंने घर फोन किया था, मेरी मां बहुत बीमार है मुझे बुलाया है, अमीर साहब से सत्राह सौ रूपये लेकर मैं जमात से वापस आगया, सत्राह-सौ रूपये शराब और गोलियों वगैरा में खर्च किए और थाना भवन पहुंचा, वहां लोगों से कहा कि जमात से मुझे अमीर साहब ने भगा दिया कि तुम नव-मुस्लिम हो हमें मरवाओगे क्या? तुम्हारे घर वाले हमारे सर हो जायेंगे, यह कहा और मुझे भगा दिया, मुझे किराये के पैसे भी नहीं दिये, अल्ताफ ने हज़रत को फोन किया। हज़रत ने कहा कि हम मालूम करेंगे, ऐसा नहीं हो सकता, फिर भी अगर कोई जमात इलाके में काम कर रही हो, उसमें जोड दें, उन्होंने थाना भवन मर्कज जाकर मालूम किया तो मालूम हुआ कि कैराना के इलाके में एक अच्छी जमात काम कर रही है, मुझे जमात के एक साथी लेकर कर कैराना जाकर दूसरी जमात में जोडकर चले आये। जमात में अमीर साहब ने खर्च की रक़म अमानत के तौर पर एक मास्टर साहब के पास रख दी थी, तीन रोज़ तो मैं हिम्मत करके जमात में रहा, मगर मेरे लिए मुश्किल था कि मैं इतनी महनत करूं मैं ने रात मास्टर साहब के जवाहरकट से पैसे निकाले और फरार होगया, जब तक पैसे रहे तफरीह करता रहा और फिर फुलत पहुंचा, हजरत से बडी मुश्किल से वक्त लेकर तन्हाई में मुलाकात की, हज़रत से माफी मांगी और कहा कि पहले मेरी शादी करादें, हज़रत ने मुझे समझाया कि जब तक तुम अपने पैरों पर खडे नहीं होगे कौन अपनी लडकी देगा, तुम खुद सोचो। अगर तुम्हारी कोई बेटी हो तो तुम बेरोज़गार लडके से शादी कैसे करोगे? कुछ सबर करो, अपने हाल को बनाओ, देखो तुम्हारी जिन्दगी का यह अहम मोड है, हमें तुम से सिर्फ तुम्हारे मुस्तकबिल के लिए ताल्लुक है, तुम अच्छी जिन्दगी गुजारोगे तो खुशी होगी, मुझे बहुत समझाया मगर मेरी समझ में बात न आयी, वापस आया और दैनिक जागरण के दफतर में खतोली जाकर एक खबर बनवायीः ‘शादी का वादा पूरा न होने पर हिन्दू जवान ने इस्लाम लौटाया’ और इस्लाम कुबूल करने का सर्टिफिकेट एक लडके के हाथ हजरत के पास भिजवा दिया और हजरत से कहलवा दिया कि इस्लाम मुझे नहीं चाहिए। घर वापस चला गया, मां मुझे देख कर बहुत नाराज हुयी, लेकिन जब मैं ने दैनिक जागरण दिखाया कि इस्लाम छोड कर आया हूं तो बहुत खुश हुयी। घर रह कर फिर वही काम मां को लूटना, शुरू में मां झेलती रही मगर एक रोज़ जब मैं ने ज्यादा नशा करके गांव के एक लडके से लडाई की तो वह बहुत परैशान होगयी और बोली बस सोहन मुझे ऐसे बेटे से अच्छा है कि मैं बगैर बेटे के रहूं, और मेरे घर से मुंह काला करके मुझे निकाल दिया, एक दो रोज़ में घर से इधर-उधर रहा, मुझे कहीं ठिकाना नहीं मिला तो मैंने हिम्मत करके हजरत को फोन किया, इत्तफाक से फोन मिल गया, हज़रत से मैं ने कहा कि में मुज़म्मिल आपका भगौडा बोल रहा हूं, हज़रत ने कहा ‘भगौडा कौन होता, मेरा बेटा मुज़म्मिल बोल रहा है, हज़रत ने पूछाः कहां हो? मैं ने कहा मुज़फ्फरनगर, हजरत ने कहा फुलत आजाओ, मुलाकात पर बात होगी, मैं ने कहा फुलत में मुझे कौन आने देगा, हज़रत ने कहा आजाओ मैं आज फुलत में हूं, फुलत पहुंचा, हज़रत ने गले लगाया, रात को देर तक समझाते रहे, और बोले बेटा जो कुछ तुम अच्छा-बुरा कर रहे हो अपने साथ कर रहे हो, तुम हमें सत्तर बार धोका दोगे हम फखर के साथ धोका खायेंगे, और हज़रत उमर रजि. का वाकिआ सुनाया, हज़रत उमर फरमाते थे दीन के नाम पर कोई हमें धोका देगा तो हम सत्तर बार फखर से धोका खायेंगे, मुझे ज़ोर देते रहे कि तुम जमात में एक पूरा चिल्ला(चालीस दिन) लगा लो, मैं ने आमादगी ज़ाहिर की, मेरे कागजात तलाश कराये तो नहीं मिल सके, दोबारा मेरठ भेज कर कागजात बनवाये और मुझे मर्कज निज़ामुद्दीन भेज दिया गया, इस बार एक जानने वाले साथी को समझा कर मेरे साथ किया, जमात में मेरा वक्त मथुरा में लगा, नशे की आदत मेरे लिए बहुत बडा मसला था, मैं बहुत हिम्मत करता था मगर रूका नहीं जाता था, दो बार मैं ने बाहर जाकर शराब पी ली, अमीर साहब ने हजरत को फोन किया, हज़रत ने एक साहब को मुज़फ्फरनगर से नशा छुडाने की दवा ले कर भेजा, उसको खाने से नशा का मसला हल हो गया, मगर अपनी आज़ाद तबियत की वजह से मैं पूरे चिल्ले मैंने साथियों की नाक में दम रखा, मगर अमीर साहब हज़रत के एक मुरीद थे, उनसे हज़रत ने कह दिया था, अगर आपने मुज़म्मिल का चिल्ला पूरा लगवा दिया तो आपको दाई(अल्लाह की ओर निमन्त्राण देने वाला) समझेंगे वरना आप फेल होजायेंगे, उन्होंने लोहे के चने चबाये मगर जमात से वापस नहीं किया, चूंकि मेरा जे़हन बहुत अच्छा था, बिल्कुल न करने के बाद भी मैंने नमाज मुकम्मल और नमाज़े जनाजा याद कर ली, और खाने के, सोने के आदाब, मुखतलिफ दुआऐं याद कर लीं। चिल्ला लगाकर आया तो हजरत बहुत खुश हुए, अमीर साहब को बहुत मुबारकबाद दी और मुझे दिल्ली में एक जानने वाले के यहां नोकरी पर लगवा दिया, चार हजार रूपये माहाना और खाना रहना तै हुआ, रिशेप्शन पर डियूटी थी, वहां पर एक लडकी से मेरे ताल्लुकात हो गये, और मैं उसे लेकर फरार होगया, लडकी के घर वालों ने कम्पनी के मालिक और मेरे खिलाफ एफ.आई.आर. कर दी, सबको परैशान होना था, हज़रत ने किसी तरह अफसरों से सिफारिश करके केस को डील किया, लडकी एक ब्रहम्ण की थी, मैंने उसे कलमा पढवाया और इलाहाबाद लेजाकर कानूनी कार्यवाही करवाई, कम्पनी में तीन और नव-मुस्लिम काम करते थे, कम्पनी वालों ने हजरत से कहा कि इन सभी को कहीं और काम पर लगा दो, हज़रत ने कहा इनको रिज़क देने वाले अल्लाह हैं, आप जैसे कितने लोगों को अल्लाह ने इनकी खिदमत के लिए मालदार बनाया है, हज़रत उन तीनों को लेकर आगये और उसी दिन कोशिश करके उन तीनों को काम पर लगवा दिया, मेरी यह शादी ज्यादा दिन नहीं चल सकी और मैं ने उस लडकी को छ महीने बाद तलाक दे दी।

अहमदः उन दिनों आप कहां रहे?
मुज़म्मिलः मैं ने हज़रत का नाम लेकर कानपुर में एक साहब को अपना बाप बना लिया था और उनके यहां हम दोनों रहे।
 
अहमदः उन्होंने ऐसे में तुम्हें रख लिया?
मुज़म्मिलः मैं हजरत के ताल्लुक के लोगों को निगाह में रखता था, हज़रत से कोई मिलने आया फोरन फोन नम्बर ले लिया, एक दो फोन खेरियत और दुआ के लिए करता था। हज़रत भी बेटा-बेटा उनके सामने करते थे, लोग समझते कि यह हज़रत का बहुत खास है, बस मेरा काम निकलता रहता था।
 
अहमदः इस तरह अन्दाज़न तुमने कितने लोगों से पैसे ऐंठे होंगे?
मुज़म्मिलः लाखों रूपये मैं ने हज़रत के ताल्लुक से लोगों से वसूल किए और सैंकडों ऐसे लोग होंगे जिन से मैं ने फायदा बल्कि हकीकत में नुक्सान उठाया, दसियों मामले तो आपके सामने भी आये, दो बार आपने, एक बार शुऐब भाई ने मुझे फुलत से भगा दिया, आपने तो वार्निंग दी थी कि आज के बाद तुम्हें फुलत में देखा तो अपनी मोजूदगी में मुंह काला करके निकाल दूंगा।
 
अहमदः उस लडकी का क्या हुआ?
मुज़म्मिलः उसका इस्लामी नाम मैंने आमना रखा था, घर वाले उसे मारना चाहते थे, तलाक के बाद उसके लिए फुलत के अलावा कोई जगह नहीं थी, हजरत के पास वह पहुंची, हज़रत ने उसको मेरठ के किसी मदरसे में भेजा, कुछ रोज पढाया, इद्दत का वक्त गुज़रने के बाद गाजियाबाद के एक जानने वाले के बेटे से उसकी शादी कर दी।
 
अहमदः उसके बाद क्या हुआ?
मुज़म्मिलः मुझ पर एक बहुत शातिर शैतान सवार था, रोज-रोज नये खेल सुझाता था, मैं ने हज़रत से कुछ बडी रकम ऐंठने की सोची। मैंने मुज़फ्फरनगर इन्टेलीजेंस के दफतर में सम्पर्क किया और वहां एक राजपूत इन्सपेक्टर से दोस्ती कर ली, और कहा फुलत में धर्म बदलवाने का काम होता है, और बडी रकम उनके पास बाहर से आती है
 
अहमदः क्या तुम समझते हो कि ऐसा है?
मुज़म्मिलः मुझे खूब मालूम है कि हज़रत का मिजाज़ तो यहां के लोगों से भी चन्दा करने का नहीं है, बस वैसे ही शैतानी में मैंने ऐसा कहा, मैं ने कहा कि मैं वहां से आपको बडी रक़म दिलवा सकता हूं, मगर उसमें से 25 पतिशत मुझे देना होगा, वह तैयार हो गये। उन्होंने एक आई.बी. कारकुन को जिस का पांव एक हादसे में कट गया था, मेरे साथ भेजा, और एक और साथी को साथ लिया, मैं तो रास्ते में रूक गया और उनको वहां भेज दिया, अब्बा इलयास साहब और मास्टर अकरम का पता बता दिया, वह दोनों फुलत पहुंचे कि हम मुसलमान होना चाहते हैं, हज़रत तो नहीं मिले, मास्टर अकरम के पास गये, उनसे बातें हुयीं, उन्होंने मौलाना उमर साहब से उनको मिलवाया, महमूद भाई भी आ गये, उन्होंने उनको इस्लाम का तार्रुफ(परिचय) करवाया और बताया कि हम लोग तो पैसे लेकर मुसलमान करते हैं, हम तो कलमा पढवाकर इस्लाम देते हैं, इसके लिए कोई रक़म देने या शादी वगैरा का किया तुक है, हमारे यहां तो अगर आप सर्टीफिकेट लेंगे तो पांच सौ रूपये फीस है, वह देनी पडेगी, हम आपको मदरसे की रसीद देंगे, यह लोग और बहसें करते रहे, वहां पर कुछ मिला नहीं तो मायूस होकर वापस आये, मुझ पर बहुत बरसे, वहां से किताब ‘आपकी अमानत-आपकी सेवा में’ लेकर आये, उसको पढकर बहुत मुतास्सिर थे, मैंने कहा इतनी आसानी से बात बनने वाली नहीं, वह मेरे इसरार पर दो-तीन बार गये, कुछ हाथ नहीं आया, उन्होंने मुझे धमकाया कि तुम्हारे खिलाफ मुकदमा बना देंगे, मैं मायूस वापस आया, फिर मैंने बजरंग दल और शिव सेना वालों को भडकाने की कोशिश की, शिव सेना वालों ने फुलत कहलवाया भी कि फुलत वाले यह धर्म बदलवाने का काम या तो बंद कर दें वरना हम इन्तज़ाम करेंगे, हज़रत ने उनके पास साथियों को भेजा, और उनसे काम का तार्रुफ कराया और दफतर वालों से फुलत आने को कहा, बारी-बारी वह लोग आते रहे और फिर मामला ठण्डा हो गया।

अहमदः इसके बाद एक बार पुरकाज़ी में भी तो आपने शादी की थी?
मुज़म्मिलः हज़रत के ताल्लुक के एक काज़ी जी से मैं ने बहुत रो-रो कर अपना हाल सुनाया और उनसे कहा कि मैंने हज़रत को बार-बार न चाहते हुए भी धोका दिया, अब मैं उस वक्त तक हज़रत को मुंह नहीं दिखाना चाहता जब तक एक अच्छा मुसलमान न बन जाऊँ, काज़ी जी ने मुझ पर तरस खाकर मुझे अपने घर रख लिया, उनके यहां कोई औलाद नहीं थी, मैं उनकी दुकान पर बैठने लगा, उन्होंने बिजनौर जिला के एक गांव में अपने रिश्तेदारों में मेरी शादी करा दी बेचारों ने खुद ही शादी वगैरा के इन्तज़ामात किए।
 
अहमदः उन्होंने आपके बारे में तहकीक नहीं की?
मुज़म्मिलः उन्होंने हज़रत से मालूम किया था, हज़रत ने कहा हम दाई(अल्लाह की ओर निमन्त्राण देने वाला) हैं, और दाई तबीब(हकीम) होता है, आखरी सांस तक मायूस होना उसूले तिब(चिकित्सा) के खिलाफ है, कोशिश किजिए, क्या खबर अल्लाह ने उसकी हिदायत आपके हिस्से में लिखी हो।
 
अहमदः उसके बाद क्या हुआ? उस लडकी को भी आपने तलाक़ दे दी है?
मुज़म्मिलः बस आठ महीने में उसके घर वालों का और काज़ी जी के सारे खान्दान का नाक में दम करके, मार-पीट कर तीन तलाक़ देकर भाग आया।

अहमदः उसके बाद क्या हुआ?
मुज़म्मिलः में दर-बदर भटकता रहा, उस दौरान एक बार हिम्मत करके फुलत पहुंचा, मास्टर इस्लाम मुझे मिल गये, हज़रत तो नहीं थे, उन्होंने मुझे डराया, बहुत बुरा-भला कहा कि तूने सब लोगों का एतिमाद खत्म कर दिया, हर नव-मुस्लिम मुहाजिर से यहां के लोग बद ज़न(कुधारणा, बुरे खयाल वाले) हो गये हैं। मैं उनसे बहुत लडा और चला आया। कई बार गलत लोगों के साथ लगा, दो बार दो-दो महीने के जेल में भी रहा। हजरत के किसी जानने वाले ने ज़मानत करायी, अल्लाह का शुक्र है कि जिन लोगों ने मुकदमा कराया था हजरत की सिफारिश से उन्होंने वापस ले लिया। जेल में अल्बत्ता मैंने दो लोगों को कलमा पढवाया, हजरत सब लोगों से कहते थे कि देखो उसकी वजह से पांच लोग जेल में और एक ब्राहम्ण की लडकी आमना मुसलमान हुयी, अब उनकी नस्लों में क्यामत तक कितने लोग मुसलमान होंगे, अब अगर यह हमारी जिन्दगी को जेलखाना भी बना दे तो हमने महनत वसूल कर ली।

अहमदः  सब घर वाले और ताल्लुक वाले तुम्हारी वजह से अबी (मौलाना मुहम्मद कलीम सिद्दीकी) से बहस भी करते थे, अबी अक्सर, बिगडे हुए लोगों और नव-मुस्लिमों के लिए कहते हैं कि जैसे रूह वैसे फरिश्ते, नेक लोगों के पास नेक लोग आते हैं, बदों के पास बद आते हैं, हम फासिक़ और फाजिर धोकेबाज़ ढोंगियों के पास पाकबाज़ और नेक लोग कहां रहने लगे, देखो शराबियों के पास शराबी, जुआरियों के पास जुआरी जमा होते हैं, हम जैसे बदकारों के पास कहां नेक लोग जमा होने वाले हैं, अम्मी जान का इन्तकाल हुआ तो फरमाने लगे कि अम्मीजान नहीं रहीं तो हमें कैसी कमी महसूस हो रही है, हालांकि अपने घर के सारे अज़ीज़ भाई-बहन बीवी-बच्चे मौजूद हैं, यह बेचारे नव-मुस्लिम इनका कोई भी नहीं, अपना सगा बेटा कितना ऐबों में फंस जाता है, कभी किसी से जिक्र भी नहीं करता, न घर से निकालता है, यह बेचारे दर-बदर फिरते हैं, ज़रा-सी बात इनसे हो जाये तो लोग इन्हें निकाल देते हैं, पुराना मुसलमान सारे ऐब करे तो कोई खयाल नहीं, यह कल का मुसलमान सोचते हैं कि फरिश्ता बन जाये और सब धुतकारते हैं, यह कह कर अबी बार-बार रोने लगते हैं।
मुज़म्मिलः एक रोज़ जब में पिछली बार आया था, तो हज़रत से मिला तो मैं ने यह भी कहा कि आपने मुझे इतनी बार बुरी हरकत करने के बावजूद बार-बार मौका दिया, हज़रत ने फरमाया कि मुझ से बुरी हरकत कौन करने वाला होगा, मेरे बेटे तुम मुझ से तो हज़ार दर्जे बेहतर हो, बस अल्लाह ने मेरे ऐब छुपा रखे हैं।
 
अहमदः इस दौरान तुम कितनी बार जमात में गये?
मुज़म्मिलः इन बारा सालों में मुझे सत्राह बार जमात में भेजा गया, एक बार चिल्ला(चालीस दिन) और आखिर में तीन चिल्ले तो पूरे किए, वरना धोका देकर भागता रहा, उसी जमाने में मुझे 21 बार काम से लगाया, या कारोबार कराया, मगर मैं कोई काम करने के बजाये धोका देता रहा।
 
अहमदः अब तुम्हारे दिल में वह बातें नहीं आतीं?
मुज़म्मिलः अल्हम्दू लिल्लाह नहीं आतीं, मुझे ऐसा लगता है वह शैतान जो मुझ पर सवार था वह मेरे हजरत की बरकत से मुझे छोडकर चला गया है, 2 मार्च 2009 को फुलत के एक साहब ने मेरी एक हरकत पर मुझे बहुत मारा, हजरत सफर से रात को देर से तशरीफ लाये, सुबह दस बजे मुझे देखा, मेरा पूरा जिस्म जख्मी था, हज़रत मुझे पकड कर जामा मस्जिद ले गये, मस्जिद जाकर दो रकात नमाज़ पढी, और मुझे देखते रहे और बार-बार चूमते रहे, मेरे बेटे कब तक तुम ऐसी जिल्लत बर्दाशत करते रहोगे, और अगर इसी तरह रहे तो फिर दोज़ख की मार किस तरह सहोगे, चलो आओ अल्लाह से दुआ करें, बहुत देर तक दुआ की, मैं आमीन कहता रहा, फिर बोले मुज़म्मिल आओ दोनों सच्चे दिल से तौबा करें बस, ऐसी तौबा जिसके बाद लौटना न हो, मुझे तौबा करायी, ईमान की तजदीद करायी, और मुझसे वादा लिया कि बस अब मुसलमान दाई बनकर मेरी इज़्ज़त की लाज रखोगे, और सबको दिखा दोगे कि इन्सान कभी भी अच्छा बन सकता है, मैंने वादा किया अगले रोज चार महीने की जमात में चला गया, और अल्हम्दू लिल्लाह जमात में दाढी रखी और खूब दुआ का अहतमाम किया, हज़रत ने जमात से वापस आकर काम पर लगने को कहा, मैं ने हाफिज आलिम बनने की खाहिश का इजहार किया, दाखिला होगया, अल्हम्दू लिल्लाह हिफज मुकम्‍मल होगया, इन्शा अल्लाह बहुत जल्द आलमियत का निसाब मुकम्‍मल कर लूंगा, मेरा इरादा है कि आलमीनी दाई बनूं, इसके लिए एक घण्टे मैं ने अंग्रेजी अच्छी करने के लिए पढनी शुरू कर दी है, अल्हम्दु लिल्लह इस वक्फे में मेरे मदरसे में सब लोग खसूसन असातजा और जिम्मेदार मुझे बहुत चाहते हैं बल्कि मुझ से दुआ कराते हैं।
 
अहमदः माशा अल्लाह, अरमुगान के पाठकों के लिए कोई सन्देश दें?
मुज़म्मिलः बस हजरत की बात ही कहूंगा कि हर मुसलमान एक दाई है और हर दाई एक तबीब है, किसी मरीज से आखरी सांस तक मायूस होना या मर्ज के बुरा होने की वजस से मरीज को अपने दर से धुतकारना उसूले तिब के खिलाफ है, हर इन्सान अल्लाह की बनायी हुयी शाहकार मखलूक है इसको अहसन तक्वीम पर अल्लाह ने अपने हाथों से बनाया है, उस से मायूस नहीं होना चाहिए, बस उसके लिए दिल में दर्द रख कर उसके इस्लाह और उसे दावत देने की फिकर रखनी चाहिए, शायद मुझसे ज्यादा बुरा इन्सान तो अल्लाह की ज़मीन में कोई और हो? जब मैं अपने लिए इन्सान बनने का इरादा करके यहां तक आ सकता हूं तो किसी से भी मायूस होने की क्या वजह है, दूसरी दरखास्त पाठकों से दुआ की है, कि अल्लाह ताला मौत तक मुझे इस्तकामत अता फरमाये और मेरे हज़रत ने जो मुझ से अरमान बनाये हैं और हज़रत फरमाते भी हैं कि मेरी हसरत है कि मुज़म्मिल अल्लाह ताला तुम्हें प्यारे नबी के आंखों की ठण्डक बनाये, मेरी तमन्ना है कि अल्लाह ताला मुझे प्यारे नबी सल्लल्लाहू अलैहि वसल्लम की आंखों की ठण्डक बनायें।
 
अहमदः शुक्रिया भाई मुज़म्मिल! वाकई एक ज़माना था कि तुम्हारा नाम सुनकर हम सभी को गुस्सा आ जाता था, मगर अल्हमदू लिल्लाह अब तुम से मिलने की बेचैनी रहती है।
मुज़म्मिलः जी अहमद भाई! मैं इसी लायक़ था और हूं, बस मेरे अल्लाह का करम है कि उसने दिल का रूख मोड दिया है।
 
अहमदः शादी के बारे में तुम्हारा क्या इरादा है?
मुज़म्मिलः अब शादी मेरे लिए कोई बात नहीं रही, अल्हम्दू लिल्लाह मेरे अल्लाह ने मेरे दिल अपनी तरफ फेर दिया है, अब मुझे खिलवत में अपने रब के हुजूर राज़ और नियाज़ का मज़ा मेरे रब ने मुझ गन्दे को लगा दिया है, कुरआन यह कहता है ‘‘इन कुरआन अल्फजर कान मशहूदा’’ सुबह का कुरआन मजीद तो आमने सामने का है, बस ऐसे जमील महबूब से सामना होने लगे तो सारी हसीनायें अन्धेरा लगती हैं, अल्हम्दू लिल्लह मेरे अल्लाह के करम से नाला नीम शबी की बादशाहत मेरे अल्लाह ने मुझे अता फरमादी है, इसकी वजह से हर एक के सामने हाथ फैलाने से मेरे अल्लाह ने मुझे बचा लिया है।
 
अहमदः आजकल अखराजात वगैरा किस तरह चल रहे हैं?
मुज़म्मिलः अल्लाह के करम से नाला नीम शबी की बादशाहत ने दिल को मालदार कर दिया है, इसकी बरकत से हाथ फैलाने से अल्लाह ने बचा लिया है, अल्हम्दू लिल्लाह अब मुझे खर्च की ज़रूरत नहीं, मैं छुटटी में मज़दूरी कर लेता हूं, मैंने इम्तिहान की छुटटी में मज़दूरी की, और एक हज़ार रूपये हज़रत की खिदमत में हदिया किए, कब से हज़रत आपको लूटता रहा यह हकीर हदिया कबुल कर लिजिए, हजरत ने बहुत गले लगाया और बडी कद्र से कुबूल कर लिया, अब हाथ ऊपर कर लिया है और अल्लाह से सवाल किया है कि अल्लाह अब किसी के आगे हाथ न फैलवायें, मुझे उम्मीद है कि अल्लाह ताला अब किसी का मोहताज न करेंगे।
अहमदः अच्छा बहुत शुक्रिया। अस्सलामु अलैकुम
मुज़म्मिलः वालैकुमुस्सलाम व रहमतुल्लाही वबरकातुह
with thanks

मार्च 2011, उर्दू मासिक 'अरमुगान'

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