Thursday, February 24, 2011

मराठा अब्दुल्लाह पाटिल से एक दिलचस्प मुलाकात

अहमद अव्‍वाहः  अस्सलामु अलैकुम व रहमतुल्लाहि वबरकातुह
अब्दुल्लाह पाटिलः वलैकुमुस्सलाम व रहमतुल्लाहि वबरकातुह


अहमदः अब्दुल्लाह साहब आप आज ही जमात से वापस आये हैं, आपका वक्त कैसा लगा? 
अब्दुल्लाहः अल्लाह का शुक्र है वक्त तो बहुत अच्छा लगा, हमारे अमीर साहब बहुत अच्छे और नेक आदमी थे, कुछ साथी भी बहुत अच्छे थे, कुछ साथी मेरी तरह बिगडे हुए थे, उन्होंने अमीर साहब को बहुत परेशान किया, बार-बार भागते थे, साथियों से लडते थे, अमीर साहब बार-बार पांव पकड़-पकड़ कर जमात को टूटने से बचाते रहे, जब ज्यादा परेशान होते तो दो रकात नमाज पढकर अपने अल्लाह के सामने रोने लगते, फोरन मामला ठीक हो जाता, जमात में जाकर जो सबसे बडी चीज़ सीखने को मिली वह अमीर साहब से दाओ सीखने को मिला कि जो मसअला हो अपने अल्लाह से कहो।


अहमदः नमाज़ पूरी याद कर ली आपने और क्या-क्या सीखा?
अब्दुल्लाहः अल्हम्दु लिल्लाह नमाज तो याद हो गयी, जनाज़ा की नमाज और दुआए क़नूत कच्ची है, इसके अलावा छ-बातें, खाने-सोने के आदाब भी याद हो गये हैं, अल्लाह का शुक्र है हिन्दी की फज़ाइले आमाल से मैंने ताली भी की, अमीर साहब ने बहुत-सी दफा मुझ से ही किताब पढवायी।
अहमदः माशा अल्लाह अब आप तो जमात के अमीर बनकर जमात ले जा सकते हैं?


अब्दुल्लाहः जमात का अमीर बनकर जमात मैं तो किया ले जा सकता हूं अलबत्ता मैं जमात में जा सकता हूं।


अहमदः अभी आपको मुसलमान होकर दो माह हुए हैं फोरन जमात में जाकर अजनबी माहोल में आप को कैसा लगा?
अब्दुल्लाहः जमात में साथियों की लडाई से तो ज़रा मेरी तबियत घबरायी, बाकी नमाज़, रोज़ा और मामूलात में बिल्कुल अजनबी कोई बात नहीं लगी, हालांकि यह जिन्दगी का पहला रमज़ान है, मैंने कभी हिन्दू मज़हब में व्रत भी नहीं रखा।


अहमदः जमात में आपका वक्त कहां लगा?
अब्दुल्लाहः हमारा वक्त देहरादून में लगा, मैं ने हज़रत से फोन पर बात की, जाते वक्त में मिलने आया था मगर मुलाकात न हो सकी, फोन पर हज़रत ने एक नसीहत की कि अमीर का हुक्म मानना, इस से मुझे बहुत-बहुत फायदा हुआ बस एक बात जो मेरे लिये मुश्किल हुयी वह यह थी कि बहुत बार ऐसा होता कि हम गश्त में जाते, रास्तें में किसी गैर-ईमान वाले भाई का घर होता था तो जमात वाले उस घर को छोड देते थे, कई दफा तो ऐसा हुआ वह लोग तो खुद चाहते कि हमसे बात करें मगर जमात वालों ने ऐसी नही किया, मैं ने कई बार अमीर साहब से ज़ोर देकर कहा भी कि यह ईमान वाले तो बस नमाज रोज़ा आमाल से दूर हैं यह गैर-ईमान वाले तो बगैर ईमान के सख्त खतरे में हैं, जिन की जान का खतरा हो पहले उनको बचाना चाहिए वह कह देते कि हमारे बडों की इजाज़त नहीं है, मुझे यह बात अच्छी न लगती थी, मैं अमीर साहब से कहता था कि फजाईले आमाल में हम पढते हैं कि सब बडों के बडे हमारे नबी सल्लल्लाहू अलैहि वसल्लम सारे गैर ईमान वालो की पहले फिक्र करते थे, फिर भी मैं ने कोशिश की कि अमीर का हुक्म मानूं।


अहमदः आप महाराष्ट्र में किस शहर के रहने वाले हैं? और वहां पर किया करते थे घर वाले कौन-कौन घर पर हैं? ज़रा तफसील से बता देंं।
अब्दुल्लाहः हमारा खानदान परभुनी शहर में रहता है, मै। चालीस गांव के क़रीब एक कसबे में हार्डवेयर की दूकान कता हूं, हम लोग मराठा बिरादरी से ताल्लुक रखते हैं, पाटिल हम लोगों की गौत्रा है, मेरी तालीम बी.काम तक है, कालिज के ज़माने में शिव-सेना में शामिल हुआ, 2000 से चन्द सालों तक जिला की शिव-सेना का जिम्मेदार रहा, इस्लाम कबूल करने तक शिव-सेना का एक्टिव मेम्बर रहा हूं, मेरे वालिद भी तिजारत करते हैं, एक बडे भाई सरकारी अस्पताल में डॉक्टर है।, एक बहन है जिनकी शादी एक पढे-लिखे खानदान में हुई है, उनके शौहर लेक्चरार थे अब प्रमोशन होकर रीडर हो गये हैं।


अहमदः आप शिव-सेना के एक्टिव मेम्बर रहे हैं, आप तो इस्लाम और मुसलमानों से बहुत दूर रहे होंगे फिर आप कैसे मुसलमान हो गए?
अब्दुल्लाहः हमारे अमीर साहब ने बताया था कि अल्लाह के रसूल सल्लल्लाहू अलैहि वसल्लम ने फरमाया कि हर बच्चा मुसलमान पैदा होता है यानि बाई-नेचर वह मुसलमान होता है, उसके मां-बाप उसको हिन्दू, सिख-इसाई बताते हैं, सच्चे नबी ने जो बताया उसमें किया शक हो सकता है, इस लिए कोई इन्सान बाई-नेचर इस्लाम से दूर नहीं हो सकता, जाहिरी हालात की वजह से जो दूरी होती है वह आरजी आर्टीफीशियल(मसनूयी) होती है, यह बात भी ठीक है कि आदमी जो सुनता है और देखता है उससे मुतासिर होता है, मैं इस्लाम और मुसलमानों के बारे में जो सुनता था और शिव-सेना के माहोल में जो जे़हन बनाया जाता था उसकी वजह से मेरे दिल और दिमाग में यह बात थी कि यह मुसलमान हमारे और हमारे देश के लिए खतरा हैं, इसकी वजह से इस्लाम और मुसलमानों के लिए मेरे दिल में नफरत और दूरी थी, मगर जब इस्लाम की किरण मेरे दिल पर पडी तो ज़ाहिरी और मसनूई अन्धेरी दूर हो गये और मेरे अल्लाह ने मेरे दि की दुनिया को जगमगा दिया।


अहमदः वह किस तरह हुआ, ज़रा तफसील बताना?
अब्दुल्लाहः मैं एक ऐसे इलाके में रहता था जहां हमारे मकान के पीछे एक मुस्लिम आबादी शुरू होती थी, मेरे मकान के पीछे की दीवार एक मुसलमान जनाब खालिद महमूद साहब से मिलती थी, जो तबलीगी जमात के सरगर्म कारकुन थे, उनका बेकरी प्रोडक्टस सप्लाई का काम था, और चूंकि मेरा शिव-सेना का जिम्मेदार होना सब को मालूम था, कभी मेरा उनका मिलना नहीं के बराबर होता था, एक दो बार हमारे घर में पीछे की दीवार से पानी आया तो मैंने छत पर चढ कर उनको गालियां भी बकीं, बस इसके अलावा हमारा उनका कोई राबता नहीं था, उनको बडे बेटे की शादी करनी थी तो उन्होंने मकान के ऊपर एक मकान बनाने का प्रोग्राम बनाया, नगरपालिका से नक्श मन्जूर कराके तामीर का मटेरियल भी मंगवा लिया, इत्तफाक से उनके बहनोई (जोकि करीम नगर आन्धरा में रहते थे) की तबियत खराब हो गयी और उनका आप्रेशन हुआ वह उनको देखने के लिए करीम नगर गये, वहंा पर आपके वालिद मौलाना कलीम साहब का प्रोग्राम था, मौलाना को खालिद महमूद साहब पहले से जानते थे और उनसे मिलना चाहते थे, मोका गनीमत समझ कर प्रोग्राम में शिरकत की, मौलाना साहब ने दावत पर बयान किया और लोगों को झिन्झोडा कि हम लोग रस्मी मुसलमान हैं रिवाज में जो चीजें हैं उन्हें हम मानते हैं, जो चीजें रिवाज में नहीं उनको नहीं मानते, इस पर कुछ मिसालें दी जिन में एक यह थी कि मौलाना ने कहाः ‘‘पडोसी के हकूक में एक हक़ यह है कि तू अपनी दीवार उसकी दीवार से बगैर उसकी इजाज़त के ऊंची न कर, यह फरमान रसूल सल्लल्लाहू अलैहि वसल्लम, क्या अमल के लिए नहीं? अगर है तो इतने दीनदारों में कोई बताये कि मैं ने इस पर अमल किया है, नगरपालिकाओं और सरकारी इदारों से रिश्वतें देकर नक्शा पास कराते हैं, इस्लाम का हुक्म यह है कि पहले पडोसी से नक्श पास कराया जाए, उसकी इजाज़त और मन्जूरी के बगैर घर की दीवार में ईन्ट न लगायी जाए, पडोसी की हवा रूकेगी, रोशनी रूकेगी, उसके घर की बे-पर्दगी होगी’’ ..... तकरीर बडी अजीब थी, खालिद साहब घर आए तो बराबर वाले पडोसियों से मिले उनको नक्शा दिखलाया और बताया कि मौलाना साहब ने बताया है कि आपकी मन्जूरी के बगैर मुझे घर बनवाने की इजाज़त नहीं, उन लोगों ने कहा आपका घर है हमं किया एतराज हो सकता है? उनमें से एक साहब ने जो मोटर साईकिल एजेन्सी चलाते हैं, ने यह भी कहा हमने तो आपसे कहा था कि आप हमारा मकान भी खरीद लें, जब आप अपना मकान नहीं फरोखत कर सकते तो आप हमारा खरीद लें ताकि जरा बडा मकान बना सकें, अगले रोज वह नक्श लेकर हमारे घर आए, मुझे अचानक जिन्दगी में पहली बार उनको घर पर देख कर हैरत हुयी, उन्होंने माजरत की, असल में हम अपने को मुसलमान कहते हैं मगर इस्लाम क्या है उसको हमने न जाना न माना, मैं एक जलसा में गया था मौलाना साहब ने पडोसी के हकूक बताये और खास-तौर पर यह बात भी कही कि पडोसी की इजाज़त और मन्जूरी के बगैर मकान बनाना जायज़ नहीं, चाहे पडोसी शिव-सेना का मेम्बर हो या वह हो जिस से आप की दुश्मनी चल रही है, मेरे बेटे की शादी का प्रोग्राम है ऊपर एक मन्जिल बनाना चाहता हूं अगर आप इजाज़त दे तो बनवाऊँ वर्ना नहीं।
मुझे खयाल आया कि ऐसे में यह फारमल्टि पूरी करने आए हैं मगर जेहन में भूंचाल आगया, इस्लाम में पडोसियों के लिए ययह कानून है, मैं यह देखने के लिए कि सिर्फ कहने आए हैं या मानेंगे भी, कहा कि भाई साहब देखिए, आप दूसरी मन्जिल बनायेंगे तो मुझे तो तकलीफ होगी, मै। आपको मकान बनाने की इजाज़त नहीं दे सकता, वह बोले सोच लिजिए दो-तीन रोज मशवरा कर लिजिए, अगर वाकई आपको तकलीफ है तो फिर मैं कोई दूसरा मकान देख लूंगा, तीर रोज के बाद उन्होंने अपने लडके को भेजा मैंने वही जवाब उनको भी दे दियाः ‘‘मुझे तकलीफ होगी इजाज़त नहीं है’’ और मकसद सिर्फ यह था कि क्या वाकई ऐसा करेंगे या फिर बगैर इजाज़त बना लेंगे, मगर उन्होंने जो मटेरियल ईन्टें वगैरा आयी थी वापस करवा दीं।
अल्लाह की मानने वाला हमेशा कैसी खेर में रहता है, वहां पर कुछ अच्छे पढे लिखे मुसलमानों ने एक साफ सुथरी कालोनी बनायी है उसमें एक बडे एक्सपोर्टर रहते थे, उन्होंने तीन सौ गज़ में बडी अच्छी दो मन्ज़िला कोठी बनायी थी मगर किसी हादसे की वजह से उनको अपने बच्चों के पास कनाडा में जाना पड रहा था और हिन्दुस्तान से अपना कारोबार बंद करके चला जाना था, उन्होंने अपने एक दोस्त से जो तबलीग़ी जमात से ताल्लुक रखते थे कहा कि ‘‘मैं ने बडे शौक़ से मकान बनाया है मकान कोई दीनदार मुसलमान खरीद ले तो मुझे इसे छोड कर जाने में दुख नहीं होगा, वह साहब खालिद साहब के दोस्त थे और उनको खालिद साहब का मसअला मालूम था कि वह मकान बनाना चाह रहे हैं और उनके पडोसी उनका मकान खरीदना चाहते हैं, उन्होंने खालिद महमूद साहब से बात की, खालिद महमूद साहब ने अपने पडोसी हाजी अबदुर्रहमान से बात की कि आप हमारा मकार खरीदना चाहे तो हमें एक हफते में रकम चाहिए, वह बहुत खुश हुए, ग्यारह लाख रूपये तीसरे रोज देने का वादा किया, ग्यारह लाख का मकान बेच कर बारा लाख में उन्होंने वह कोठी जिसकी तामीर पर पांच साल पहले पच्चिस लाख रूपये खर्च हुए थे खालिद साहब ने खरीद ली, मैं ने सामान निकालते देखा तो सक्ते में आगया, मैं ने खालिद साहब से कहा मैं तो इम्तहान के लिए मना किया था कि वाकई आप करेंगे भी या सिर्फ कह रहे हैं? मैं ने कहा हर्गिज़ हर्गिज़ मैं आपको जाने नहीं दूंगा, उन्होंने कहा अब मामला तै हो गया है, बै-नामे वगैरा सब हो गये हैं, मुझे बहुत सदमा हुआ, ऐसा अन्दाज़ा नहीं था कि इतनी जल्दी फैसला हो जायेगा, घर बहुत रोना आया, मेरी बीवी ने मुझे रोता देख कर वजह मालूम की तो मैं ने फोरन वजह बतायी, वह बोली कि क्या बता है, सूरज पच्छम में निकल रहा है, मुला जी के जुदा होने पर आप रो रहे हैं।
खालिद साहब ने मुझ से कहा, मकान की दीवार के दूर हाने से क्या होता है? क्या अजब है कि अल्लाह ताला दिल की दीवारों को मिला दें, मैं ने कहा कि मेरे दिल की दीवार तो आपके दिल की दीवार से चिपक कर रह गयी,  मुझे वह मौलाना साहब की तकरीर ज़रूर सुनाईये अगर आडियो हो, इतनी दूर आप तकरीर सुनने गये तो तकरीर तो टेप हुई होगी, मैं दूसरे-तीसरे रोज़ उनकी दुकान पर जाता था उनसे मिलने की चाहत भी होती और तकरीर की आडियो लेने के लिए भी, उन्होंने किसी तरह सी.डी. मुझे दी, उस सी.डी. में मौलाना साहब की पांच तकरीरें थीं, करीम नगर की तकरीर तो नहीं थी मगर महाराष्ट्र की एक तकरीर में पडोसी के हकूक की वह बात मौलाना साहब ने कही थी, तकरीरों में ‘‘आपकी अमानत आपकी सेवा में’’ गैर-मुस्लिम भाईयों को देने की बात कही थी और सब मुसलमानों को गैर ईमान वाले भाईयों को अपना समझने की बात कही गयी थी, मैंने खालिद साहब से किसी तरह ‘‘आपकी अमानत आपकी सेवा में’’ मंगवाने या उसका पता मालूम करने के लिए कहा, जहां वह किताब मिल सकती हो, वाकई बात सच्ची हुयी कि मकान की दीवारें एक किलोमीटर दूर होने से दिल की दीवारें मिल गयीं, मकान के पीछे मकान में वह मेरे घर एक बार पहली बार इजाज़त लेने के लिए आये, और मैं दो बार उनकी छत पर गालियां देने के लिए गया, मगर अब पहले, दूसरे और तीसरे रोज़ बाद मैं रोज़ाना एक दूसरे के यहां आने-जाने लगे, कई बार उनके घर में खाना खाया और उन्होंने भी मेरे घर चाए पी, अकोला से किसी जमात के साथी के वास्ते से उन्होंने ‘आपकी अमानत आपकी सेवा में’ किताब मंगा कर मुझे दी, इस किताब को पढ कर मुझे मौलाना साहब से मिलने की चाहत हुइ, कई फोन राब्ता करने के लिए किए, मगर बात न हो सकी, खालिद साहब ने ‘‘मरने के बाद क्या होगा?’’, ‘‘इस्लाम क्या है?’’ किताबें मंगा कर दीं और कुरआन का हिन्दी अनुवाद भी मुझे लाकर दिया, मैं ने इन सब चीज़ों को पढा, अल्लाह का करम हुआ एक रोज़ दिन में मौलाना साहब से फोन पर बात होगयी, मौलाना ने फोन पर कलमा पढने को कहा, मैंने मिलकर कलमा पढने पर ज़ोर दिया तो मौलाना ने दो-तीन लोगों के बारे में बताया कि फोन पर कलमा पढा और उसी रोज इन्तक़ाल होगया इस लिए मौत का क्या यकीं कि कब आजाए इस लिए आप भी फोन पर मुझसे या खालिद साहब से कलमा पढ़ लें मैं ने फोन पर कमा पढा, मौलाना साहब ने मेरा अब्दुल्लाह रख दिया। 


अहमदः घर वालों से आपने बता दिया? 
अब्दुल्लाहः असल में खालिद साहब के इस मामले से मेरे दोनों बेटे और मेरी बीवी हद दर्जे मुतासिर हुए, हमारे घर में हर वक्त खालिद साहब का ज़िक्र होता और मुलाकात में जो भी बात होती मैं घर आकर घर वालों से बताता था, इस लिए अल्लाह का शुक्र  है घर वाले मेरे साथ रहे और मेरे कलमा पढने से पहले मेरी बीवी खुद कह रही थीं कि हम लोगों को मुसलमान हो जाना चाहिए, मै। ने जाकर बताया तो दोनों बेटे और बीवी तैयार थी ही, खालिद साहब को बुला कर मैं ने कलमा पढवाया, बेटों के नाम अब्दुर्रहमान और अब्दुर्रहीम रखे और अहलिया का नाम आमना, खालिद साहब ही ने रखा।


अहमदः क्या आप के मौहल्ले वालों को भी इल्म हो गया?
अब्दुल्लाहः मेरी पार्टी के साथियों को मालूम हुआ तो बडी मुश्किल हुई, उन्होंने मुझ पर बहुत दबाओ डाला, मेरी बीवी ने उस घर को छोड किसी मुस्लिम इलाके में घर बदलने का मशवरा दिया, मेरे अल्लाह का करम है मुझे बडी आसानी हुई, खालिद साहब के पडोस में एक घर छोड कर एक मकान था, जिसे एक साहब ने जो सऊदी अरब में रहते थे, बनाया था, बाद में उन्होंने मुम्बई में मकान ले लिया, इस लिए वह इस मकान को बेचन चाहते थे, खालिद साहब ने इस मकान मालिक से राबता किया और मामला तै हो गया, मेरा मकान एक प्रापर्टी डीलर ने खरीद लिया, मैं ने खालिद साहब से कहा आपने तो मेरे पडोस से जान बचाने ही की कोशिश की अल्लाह ने आपका पडोस मेरे मुकश्द्दर में लिखा है, अल्लाह का शुक्र है अब हम फिर पडोसी हैं मगर अब दिलों की दीवारों के भी पडोसी हैं।


अहमदः वाकई खूब बात आपने कही, अबी(मौलाना कीलम सिद्दीकी) से आपकी पहली मुलाकात कब हुई?
अब्दुल्लाहः फोन पर तो बार-बार जमात से भी बात होती रही, मगर मुलाक़ात आज ही हुई, मैं जमात से 10 अगस्त को वापस आया मालूम हुआ, मौलाना 27 अगस्त को आयेंगे, तो हमने फिर एक हफता जमात में लगाने की सोची, देहली की एक जमात के साथ जुड गया, अल्हम्दु लिल्लाह आज हज़रत से मुलाकात हो गयी।


अहमदः आईन्दा के लिए कुछ बात हुयी?
अब्दुल्लाहः अल्हमदु लिल्लाह हज़रत ने अपनी पार्टी के वर्करों के लिए दुआ करने और उन पर काम करने को कहा और खान्दान वालों पर भी, मुझे खुद भी बार-बार उनका खयाल आता था, जब जमात में मुझे गैर-मुस्लिम भाई मिलते थे तो खयाल हाता था कि मैं भी एक जमात बनाऊँ। काश मुझे भी अल्लाह ताला मौलाना इलयास साहब वाला दर्द देदे, तो मैं भी एक जमात बनाऊँ जो गैर-ईमान वाले भाईयों में काम करे, मैं ने जमात में बहुत दुआ भी की, मेरे अल्लाह मुझे कम अज़ कम हज़रत मौलाना इलयास साहब बना दे, कुफ्र और शिर्क में फंसे हमारे नबी के इन उम्मतियों की कौन फिक्र करेगा?


अहमदः अल्लाह का शुक्र है अब लोग फिक्र करने लगे हैं और अल्लाह ताला आप जैसे कितने लोगों को खडा कर रहे हैं, आपको इल्म है कि यह बातें जो मैं ने आपसे की हैं उर्दू मेग्ज़ीन ‘अरमुगान’ के लिए की हैं, आप अरमुगान पढने वाले लोगों के लिए कोई पैगाम दीजिए?
अब्दुल्लाहः मेरे दिल में यह बात आयी है और कयी रातों तक मैं जमात में भी सारी रात सोचता रहा और मेरी नींद उडी रही कि पूरी दुनिया के इन्सान हमारे रब के बन्दे और हमारे नबी के उम्मती हैं और हमारे खूरी रिश्ते के भाई हैं, यह बात मैं ने मौलाना कलीम साहब की तकरीर में सुनी और अमीर साहब भी यही कह रहे थे, इस दुनिया के सारे लोगों में ढेड अरब मुसलमान हैं जो अल्हम्दु लिल्लाह मुसलमान हैं, यह सब तो हमेशा की दोज़ख से बचे हुए हैं, साढे चार अरब गैर अरब गैर ईमान वाले उम्मती हैं, डेढ अरब लोगों में काम करने वाले तो करोडों हैं, साढे चार अरब जो इन से लाखों गुना खतरे में हैं उनको बचाने वाले सैकडों भी नहीं हैं, हालांकि उनकी तादाद तीन गुनी है और यह लोग लाखों गुना खतरे में हैं, इसके लिए फिक्र करने वाले करोडों में होने चाहिएं, इसके लिए एक जमात ज़रूर बनायी जाए।


अहमदः अबी(मौलाना कीलम सिद्दीकी) तो कहते हैं यह करोडों जमात वाले, इन लोगों को दोज़ख से बचाने के लिए ही तैयार हो रहे हैं, इन्शा अल्लाह बहुत जल्द यह सारी इन्सानियत की फिक्र को ओढ़ लेंगे।
अब्दुल्लाहः खुदा करे ऐसा हो, खुदा करे ऐसा हो।


अहमदः बहुत-बहुत शुक्रिया अब्दुल्लाह मियां, इजाज़त दें, हमें फुलत जाना है, मैं भी अबी(मौलाना कीलम सिद्दीकी) के साथ सफर पर था। अस्सलामु अलैकुम
अब्दुल्लाहः जी मुझे मालूम हुआ है कि हज़रत पूरी फेमली के साथ तशरीफ ले गये थे, वालैकुम सलाम।
साभारः
अक्‍तूबर 2010, उर्दू मासिक 'अरमुगान' फुलत
www.armughan.net


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کتاب ’’نسیم ہدایت کے جھونکے‘‘ ان نو مسلم بھائیوں بہنوں کے انٹرویوز کا مجموعہ ہے  جو خداوند عالم کی توفیق و عنایت اور داعیِ اسلام حضرت مولانا محمد کلیم صاحب صدیقی اور ان کے  رفقاء کی کوششوں سے نعمت اسلام اور ہدایت کے نور سے سرفراز ہوئے ان نو مسلم بھائیوں کے قبول اسلام کےانٹرویوزماہ نامہ ’’ارمغان‘‘ میں مسلسل شائع ہوتے رہے ہیں اور الحمد للہ یہ سلسلہ اب بھی جاری ہے۔


Nasim e hidayat ke Jhonke Vol. 1 to 6 [ urdu ] نسیم ہدایت کے جھونکے  

This book Set is collection of interviews with newly converts to Islam who got guidance and Allah's blessing due to efforts of made preaches of Islam Hazrat Maulana Muhammad Kaleem Siddiqui and his associates. These interviews were published in Urdu Monthly "ARMUGHAN" and the series still continuing. This magazine is edited by Maulana Wasi Sulaiman Nadvi under the patronage of Hazrat Maulana Muhammad Kaleem Siddiqui
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"नसीमे हिदायत के झोंके" उन नो मुस्लिमों के इंटरव्यू का संग्रह है जो अल्लाह के आशीर्वाद से मौलाना कलीम सिद्दीकी और उनके साथियों की कोशिशों  से इस्लाम धर्म  में आये, ये साक्षात्कार फुलत, उत्तर प्रदेश की  उर्दू मासिक पत्रिका अरमुगान में छप चुके हैं।



Nasim e hidayat ke Jhonke Vol. 1 to 6 [ hindi ] नसीमे हिदायत के झोंके





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