Tuesday, January 18, 2011

पूर्व हॉकी खिलाडी नव-मुस्‍लिम अफिफा बहन से मुलाकात new-muslim-women-hockey player-interview

असमाः अस्सलामु अलैकुम व रहमतुल्लाह वबरकातुह
पूर्व हाकी खिलाडी अफिफाः  वालैकुम सलाम


असमाः अबी (मौलाना कलीम सिद्दीकी साहब) ने हमें बताया था कि हिन्दुस्तान की एक हॉकी खिलाडी आ रही हैं तो हम सोच रहे थे कि आप हॉकी की ड्रेस में  आयेंगी, मगर आप माशा अल्लाह बुरके में मल्बूस (पहने) Dressed और दस्ताने पहन कर मुकम्मल परदे में हैं, आप अपने घर से बुरका ओढकर कैसे आयी हैं?
अफिफाः मैं अल्हमदु लिल्लाह पिछले दो महीने से सो फीसद शरई परदे में रहती हूं।


असमाः अभी आपके घर में तो कोई मुसलमान नहीं हुआ?
अफिफाः जी मेरे घर में अभी मेरे अलावा कोई मुसलमान नहीं है मगर इसके बावजूद में अल्हम्दु लिल्लाह कोशिश करती हूं कि मैं अगर्चे घर में अकेली मुसलमान हूं मगर मैं आधी मुसलमान तो न बनूं, आधी इधर, आधी उधर, यह तो न होना चाहिए।


असमाः आपको हॉकी खेलने का शोक़ कैसे हुआ, यह तो बिल्कुल मर्दों का खेल है?
अफिफाः असल में, मैं हरियाणा के सोनीपत जिले के एक गांव की रहने वाली हूं, हमारे घर में सभी मर्द पढे लिखे हैं और अकसर कबडडी खेलते रहते हैं, मैं ने स्कूल में दाखिला लिया शुरू से क्लास में टाप करती रही, सी बी एस इ बोर्ड में मेरी हाईस्कूल में ग्यारहवीं पोज़िशन रही, मुझे शुरू से मर्दों से आगे निकलने का शौक़ था, इसके लिए मैंने स्कूल में हॉकी खेलना शुरू की, पहले जिले में नवीं क्लास में सलेक्शन हुआ, फिर हाईस्कूल में हरियाण स्टेट के लिए लडकियों की टीम में मेरा सलेक्शन हो गया, बारहवीं क्लास में भी मैंने स्कूल टाप किया और सी. बी. एस. इ. बोर्ड में मेरा नम्बर अठारहवां रहा, इसी साल में इण्डिया टीम में सलेक्ट हो गयी, औरतों के ऐशिया कप में भी खेली और बहुत से टूरनामेंट मेरी कारकर्दगी (प्रदर्शन) की वजह से जीते गये, असल में हॉकी में भी सब से ज्यादा एक्टीव रोल असमा बाजी! सेन्टर फारवर्ड खिलाडी का होता है, हमेशा सेन्टर फारवर्ड में खेलती रही, असल में बस मर्दों से आगे बढने का जनून था, मगर रोज़ाना रात को मेरा जिस्म मुझ से शिकायत करता था, कि यह खेल औरतों को नहीं है, मालिक ने अपनी दुनिया में हर एक के लिए अलग काम दिया है, हाथ पांव बिल्कुल शिल (अकड) हो जाते थे, मगर मेरा जनून मुझे दौडाता था और इस पर कामयाबी और वाह-वाह अपने नेचर के खिलाफ दौडने पर मजबूर करती थी।


असमाः इस्लाम कबूल करने से पहले तो आपका नाम प्रीती(बदला हुआ नाम) था न?
अफिफाः हज़रत ने मेरा नाम अभी अफ़िफ़ा यानि कुछ माह पहले रखा है।


असमाः आपके पिताजी क्या करते हैं?
अफिफाः वह एक स्कूल चलाते हैं उसके प्रिन्सीपल हैं, वह सी बी एस इ बोर्ड का एक स्कूल चलाते हैं, मेरे एक बडे भाई उसमें पढाते हैं, मेरी भाभी भी पढाती हैं, वह खेल से दिलचस्पी रखती हैं, मेरी भाभी बेडमिन्टन की खिलाडी है।


असमाः ऐसे आज़ाद माहौल में जिन्दगी गुज़ारने के बाद ऐसे परदे में रहना आपको कैसा लगता है?
अफिफाः इन्सान अपने नेचर से कितना ही दूर हो जाए और कितने ज़माने तक दूर हे, जब उसको उसके नेचर की तरफ आना मिलता है, वह कभी अजनबियत महसूस नहीं करेगा, वह हमेशा फील करेगा कि अपने घर लोट आया, अल्लाह ने इन्सान को बनाया, और औरतों की नेचर बिल्कुल अलग बनायी, बनाने वाले ने औरत को नेचर छुपने और परदे में रहने का बनाया, उसे सकून व चेन लोगों की हवस भरी निगाह से बचे रहने में ही मिल सकता  है, इस्लाम दीन फितरत है, जिसके सारे हुक्म इन्सानी नेचर से मेल खाते हैं, मर्दों के लिए मर्दों के नेचर की बात, और औरतों के लिए औरतों के नेचर की बात।


असमाः आपकी उम्र कितनी है?
अफिफाः मेरी तारीखे पैदाइश 6 जनवरी 1988 है, गोया मैं बाईस साल की होने वाली हूं।


असमाः मुसलमान हुए कितने दिन हुए?
अफिफाः साढे छ महीने के करीब हुए हैं।


असमाः आपके घर में आपके इतने बडे फेसले पर मुखालफत नहीं हुयी?
अफिफाः हुयी और खूब हुयी, मगर सब जानते हैं कि अजीब दीवानी लडकी है, जो फेसला कर लेती है फिरती नहीं, इसलिए शुरू में ज़रा सख्ती की, मगर जब अन्दाजा हो गया कि मैं दूर तक जा सकती हूं तो सब मोम हो गए।


असमाः आप हॉकी अब भी खेलती हैं?
अफिफाः नहीं! अब हाकी मैं ने छोड दी है।


असमाः इस पर तो घर वालों को बहुत ही अहसास हुआ होगा?
अफिफाः हां हुआ, मगर मेरा फेसला मुझे लेने का हक था मैंने लिया, और मैं ने अपने अल्लाह का हुक्म समझ कर लिया, अब अल्लाह के हुक्म के आगे बन्दों की चाहत कैसे ठहर सकती है।


असमाः आके तैवर तो घर वालों को बहुत सख्त लगते होंगे?
अफिफाः आदमी को ढुलमुल नहीं होना चाहिए, असल में आदमी पहले यह फेसला करे कि मेरा फेसला हक़ है कि नहीं, और अगर उसका हक़ पर होना साबित हो जाए तो पहाड भी सामने से हट जाते हैं।


असमाः आपके इस्लाम में आने का क्या चीज़ ज़रिया बनी?
अफिफाः मैं हरियाण के उस इलाके की रहने वाली हूं जहां किसी हिन्दू का मुसलमान होना तो दूर की बात है, हमारे चारों तरफ कितने मुसलमान हैं जो हिन्दू बने हुए हैं, खुद हमारे गांव में बादी और तेलियों के बिसयों घर हैं जो हिन्दू हो गए हैं, मन्दिर जाते हैं, होली-दीपावली मनाते हैं, लेकिन मुझे इस्लाम की तरफ वहां जाकर रगबत (लगाव,प्यार) हुई जहां जाकर खुद मुसलमान इस्लाम से आज़ाद हो जाते हैं।


असमाः कहां और किस तरह ज़रा बतायें?
अफिफाः मैं हॉकी खेलती थी तो बिल्कुल आज़ाद माहोल में रहती थी, आधे से कम कपडों में हिन्दुस्तानी रिवायात का खयाल भी खत्म हो गया था, हमारे अक्सर कोच मर्द रहे, टीम के साथ कुछ मर्द साथ रहते हैं, एक दूसरे से मिलते हैं, टीम में ऐसी भी लडकियां थी जो रात गुजारने बल्कि खाहिशात पूरी करने में जर्रा बराबर झिजक महसूस नहीं करती थीं, मेरे अल्लाह का करम था कि मुझे उसने इस हद तक न जाने दिया, गोल के बाद मौर मेच जीत कर मर्दों औरतों का गले लग जाना चिमट जाना तो कोई बात ही नहीं थी, मेरी टीम के कोच ने कई बार बेतकल्लुफी में मेरे किसी शाट पर टांगों में कमर में चुटकियां भरीं, मैं ने इस पर नोटिस लिया, और उनको वार्निंग दी, मगर टीम की साथी लडकियों ने मुझे बुरा भला कहा, इतनी बात को तुम दूसरी तरह ले रही हो, मगर मेरे ज़मीर पर बहुत चोट लगी, हमारी टीम एक टूरनामेन्ट खेलने डेन्मार्क गयी, वहां मुझे मालूम हुआ कि वहां की टीम की सेन्टर फारवर्ड खिलाडी ने एक पाकिस्तानी लडके से शादी करके इस्लाम कबूल कर लिया है, और हॉकी खेलना छोड दिया है, लोगों में यह बात मशहूर थी कि उसने शादी के लिए इस लडके की मुहब्बत में इस्लाम कबूल किया है, मुझे यह बात अजीब सी लगी, हम जिस होटल में रहते थे, उसके करीब एक पार्क था, उस पार्क से मिला हुआ उनका मकान था, मैं सुबह को पार्क में तफरीह कर रही थी कि डेन्मार्क की एक खिलाडी ने मुझे बताया कि वह सामने बिर्टनी का घर है, जो डेन्मार्क की हॉकी की मशहूर खिलाडी रही है, उसने अपना नाम अब सादिया रख लिया है और घर में रहने लगी है, मुझे उससे मिलने का शौक़ हुआ, मैं एक साथी खिलाडी के साथ उसके घर गयी, वह अपने शौहर के साथ कहीं जाने वाली थी, बिल्कुल मोजे, दस्ताने और पूरे बुरके में मल्बूस। मैं देखकर हैरत में रह गयी, और हम दोनों हंसने लगे, मैं ने अपना तार्रुफ कराया तो वह मुझे पहचानती थी, वह बोली मैं ने तुम्हें खेलते देखा है, सादिया ने कहा हमारे एक ससुराली अज़ीज़ का इन्तकाल हो गया है, मुझे उसमें जाना है वर्ना मैं आपके साथ कुछ बातें करती। मैं तुम्हारे खेलने के अन्दाज से बहुत मुतासिर रही हूं, हॉकी खेल औरतों के नेचर से मेल नहीं खाता, मेरा दिल चाहता है कि तुम्हारी सलाहियतें नेचर से मेल खाने वाले कामों में लगें, मैं तुमसे हॉकी छुडवाना चाहती हूं, मैं ने कहा आप मेरे खेल के अन्दाज़ से मुतासिर हैं और मुझ से खेल छुडवाना चाहती हैं, और मैं आपका हाकी छोडना सुन कर आप से मिलने आयी हूं, कि ऐसी मशहूर खिलाडी होकर आप ने क्यूं हॉकी छोड दी? मैं आपको फिल्ड में लाना चाहती हूं, सादिया ने कहा कि अच्छा आज रात को डिनर मेरे साथ कर लो, मैं ने कहा आज तो नहीं, कल हो सकता है, ते हो गया, मैं डिनर पर पहुंची, तो सादिया ने अपने इस्लाम कबूल करने की रोदाद मुझे सुनायी और बताया कि मैंने शादी के लिए इस्लाम कबूल नहीं किया बल्कि अपनी शर्म अपनी असमत की इज्जत व हिफाज़त के लिए इस्लाम कबूल किया है और इस्लाम के लिए शादी की है। सादिया न सिर्फ एक मुस्लिम खातून थी बल्कि इस्लाम की बडी दाइया था, उसने फोन करके दो अंग्रेज़ लडकियों को और एक मुअमर खातून को बुलाया, जो उनके मौहल्ले में रहती थीं, और सादिया की दावत पर मुसलमान हो गयी थीं, वह मुझे सब से ज्‍यादा इस्लाम के परदे के हुक्म की खेर बताती रहीं और बहुत इसरार करके मुझे बरका पहन कर बाहर जाकर आने को कहा। मैं ने बुरका पहना, डेन्मार्क के बिल्कुल मुखालिफ माहौल में मैं ने बुरका पहन कर गली का चक्कर लगाया, मगर वह बुरका मेरे दिल में उतर गया, मैं बयान नहीं कर सकती कि मैं ने मज़ाक़ उडाने या ज्यादा से ज्यादा उसकी खाहिश के लिए बुरका पहना था, मगर मुझे अपना इन्सानी कद बहुत बढा हुआ महसूस हुआ, अब मुझे अपने कोच की बेशर्माना शहवानी चुटकियों से घिन भी आ रही थी, मैं ने बुरका उतारा और सादिया को बताया कि मुझे वाकई बुरका पहन कर बहुत अच्छा लगा, मगर आजके माहौल में जब बुरके पर वेस्टर्न हकूम्तों में पाबन्दी लगायी जा रही है, बुरका पहनना कैसे मुमकिन है? और ग़ैर मुस्लिम का बुरका पहनना तो किसी तरह मुमकिन नहीं, वह मुझे इस्लाम कबूल करने को कहती रहीं और बहुत इसरार करती रहीं, मैं ने माज़रत की कि मैं इस हाल में नहीं हूं, अभी मुझे दुनिया की नम्बर वन हॉकी खिलाडी बनना है, मेरे सारे अरमानों पर पानी फिर जायेगा, सादिया ने कहा मुझे आपको हॉकी की फिल्ड से बुरके में लाना है, मैं ने अपने अल्लाह से दुआ भी की है और बहुत ज़िद करके दुआ की है, उसके बाद हम दस रोज़ तक डेन्मार्क में रहे, वह मुझे फोन करती रही, दो बार होटल में मिलने आयी और मुझे इस्लाम पर किताबें दे कर गयी।


असमाः आपने वह किताबें पढीं?
अफिफाः कहीं कहीं से देखी हैं।


असमाः उसके बाद इस्लाम में आने का क्या ज़रिया बना?
अफिफाः मैं इन्डिया वापस आयी, हमारे यहां नरेला के पास एक गांव की एक लडकी (जिसके पिताजी सन 47 ई. में हिन्दू हो गए थे, और बाद में आपके पिताजी मौलाना कलीम सिददीकी साहब के हाथों मुसलमान हो गये थे, उनके मुरीद भी थे और हज भी कर आए थे) हॉकी खेलती थीं, दिल्ली स्टेट की हॉकी टीम में थी और इन्डिया की तरफ से स्लेक्शन के बाद रूस में खेलने जाने वाली थी, मुझसे मशवरा और खेल के अन्दाज़ में रहनुमायी के लिए मेरे पास आयी, मैंने उससे डेन्मार्क की मशहूर खिलाडी बिर्टनी का जिक्र किया, उसने अपने वालिद साहब से सारी बात बतायी, वह अपनी लडकी के साथ मुझसे मिलने आए, और मुझे हज़रत की किताब ‘आपकी अमानत आपकी सेवा में‘ और ‘इस्लाम एक परिचय‘ दी, आपकी अमानत छोटी सी किताब थी, बुरके ने मेरे दिल में जगह बना ली थी, इस किताब ने बुरके के क़ानून को मेरे लिद में बिठा दिया, मैं ने हज़रत साहब से मिलने की खाहिश ज़ाहिर की, दूसरे रोज हज़रत का पन्जाब का सफर था, अल्लाह का करना कि बहालगढ़ एक साहब के यहां हाईवे पर मुलाकात ते होगयी और हजरत ने दस पन्द्रह मिन्ट मुझ से बात करके कलमा पढने को कहा, और उन्होंने बताया कि मेरा दिल यह कहता है कि बिर्टनी ने अपने अल्लाह से आपको बुरके में लाने की बात मनवाली है, बहरहाल मैंने कलमा पढा और हज़रत ने मेरा नाम अफ़िफ़ा रखा, और कहा अफ़िफ़ा पाक दामन को कहते हैं, चूंकि बाईनेचर आप अन्दर से पाकदामनी को पसन्द करती हैं, मेरी भान्जी का नाम भी अफिफा है, मैं आपका नाम अफिफा ही रखता हूं।


असमाः उसके बाद क्या हुआ?
अफिफाः मैं ने बिर्टनी को फोन किया, और उसको बताया, वह खुशी में झूम गयी, जब मैं ने हज़रत का नाम लिया तो उन्होंने अपने शौहर से बात करायी, डाक्टर अशरफ उनका नाम है, उन्होंने बताया कि हज़रत की बहन के यहां रहने वाली एक ‘हिरा‘ की शहादत और उसके चचा के कबूले इस्लाम की कहानी सुनकर हमें अल्लाह ने इस्लाम की कद्र सिखायी है, और इसी की वजह से मैंने बिर्टनी से शादी की है, यह कह कर कि अगर तुम इस्लाम ले आती हो तो मैं आपसे शादी के लिए तैयार हूं। मैं ने अखबार में ऐड दिया, गज़ट में नाम बदलवाया, अपनी हाईस्कूल और इन्टर की डिग्रियों में नाम बदलवाया और हॉकी से रिटायरमेंट ले कर घर पर स्टडी शुरू की।


असमाः अब आप का क्या इरादा है, आपकी शादी का क्या हुआ?
अफिफाः मैं ने आई सी एस की तैयार शुरू की है, मैं ने इरादा किया है कि मै। एक आई सी एस अफसर बनूंगी, और बुरकापोश आई एस अफसर बन कर इस्लामी परदे की अज़मत लोगों को बताउंगी।


असमाः आप इसके लिए कोचिंग कर रही हैं?
अफिफाः मैं नेट पर स्टडी कर रही हूं, मेरे अल्लाह ने हमेशा मेरे साथ यह मामला किया है, कि मैं जो इरादा कर लेती हूं उसे पूरा कर देते हैं, जब काफिर थी तो पूरा करते थे, अब तो इस्लाम की अज़मत के लिए मैंने इरादा किया है, अल्लाह जरूर पूरा करेंगे, मुझे एक हज़ार फीसद उम्मीद है कि मैं पहली बार में ही आई सी एस इम्तहानात पास कर लूंगी।


असमाः इन्टरव्यू का क्या होगा?
अफिफाः सारे बुरके और इस्लाम के मुखालिफ भी अगर इन्टरव्यू लेंगे तो वह मेरे सलेक्शन के लिए इन्शाअल्लाह मजबूर हो जायेंगे।


असमाः घर वालों को आपने दावत नहीं दी?
अफिफाः अभी दुआ कर रही हूं, और क़रीब कर रही हूं, ‘हमें हिदायत कैसे मिली?‘ हिन्दी में मैंने घर वालों को पढवायी, सब लोग हैरत में रह गये और अल्लाह का शुकर है जहन बदल रहा है।


असमाः यह बातें, मैंने आपके इल्म में है कि फुलत से निकलने वाले रिसाले ‘अरमुगान‘ के लिए की हैं, इस रिसाले के बहुत से पढने वाले हैं, उनके लिए कोई पैग़ाम आप देंगी?
अफिफाः औरत का बेपरदा होना उसकी हद दरजे तौहीन है, इस लिए मर्द खुदा के लिए अपने झूटे मतलब और अपना बोझ उनपर डालने के लिए उनको बाजारों में फिराकर बाज़ारी बनाने से बाज रहें, और औरतें अपने मक़ाम और अपनी असमत और इफफत की हिफाजत के लिए इस्लाम के परदे के हुक्म की कद्र करें।


असमाः बहुत बहुत शुक्रिया, अस्सलामु अलैकुम
अफिफाः वालैकुम सलाम


साभार उर्दू मासिक ‘अरमुग़ान‘ नवम्बर 2010
www.armughan.in

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