Wednesday, March 30, 2011

मसऊद अहमद से मुलाकात interview april 2011

अहमदः अस्सलामु अलैकुम रहमतुल्लाहि वबरकातुह
मसऊदः वालैकुम सलाम वरहमतुल्लाहि वबरकातुह


अहमदः आपके साथ दो साथी भी आये हैं, इनका तार्रुफ कराईये?
मसऊदः यह दोनों मेरे दफ्तर के साथी हैं, हमारे साथ गुडगांव में अमरिकी कम्पनी में मुलाजमत करते हैं, इनमें से यह पहले साहब, इनका नाम संजय कौशिक था, इनका नया नाम सईद अहमद है, और यह दूसरे अनुपम गुलाठी थे, अब मुहम्मद नईम इनका नाम है, दोनों साफ्टवेयर इन्जीनियर हैं, दोनों ने आई.आई.टी रूडकी से बी.टेक किया है, हम लोग रूडकी में साथ पढ़ते थे, तीनों दोस्त हें, अब इन्शाअल्लाह जन्नत में साथ जाने की तमन्ना है, जो बजाहिर अल्लाह ने चाहा तो पूरी होती दिखायी दे रही है।
यह दोनों जमात में वक्त लगा कर आ रहे हैं, इनका चिल्ला आदिलाबाद में लगा, वहाँ पर इन्होंने हजरत का और भी तार्रुफ सुना तो बहुत बे-चैन थे कि हजरत से मुलाकात हो जाये, मेरी भी खाहिश थी कि मुलाकात हो जाये, वह लोग बेअत होने के लिए आये थे, अब चूंकि हजरत बिल्कुल दावत पर बैअत लेने लगे हैं, इस लिए नये इरादे से जा रहे हैं।


अहमदः इन को दावत देने में आपको कोई मुश्किल तो नहीं आयी?
मसऊदः मुश्किल तो नहीं कह सकते, अलबत्ता दो साल लगातार दुआयें करनी पडीं। असल में इनको जब भी इस्लाम के बारे में बताता, या कोई किताब पढ़ने को कहता तो यह मेरा मजाक उड़ाते, यह कहते कि हमारे लिए कौन-सी कश्मीरी लड़की तुमने तलाश कर रखी है जिसके लिए हम  मुसलमान हों, मेरी बदकिस्‍मती या खुश किस्‍मती है जैसा कि शायद आपको हजरत ने बताया होगा कि मेरे इस्लाम कुबूल करने का जरिया जम्मू की एक लड़की से ताल्लुकात और शादी हुई, यह जरिया जाहिर है किसी दूसरे के लिए इस्लाम में दिलचस्पी का जरिया नहीं हो सकता, तो मैं जब भी इन दोस्तों को लेकर बैठता यह मेरा मजाक  बनाते, इनको नॉनवेज(गोश्त) खाने का बहुत शौक है, दावत के बहाने, में इनको करीम होटल जुमेरात को ले जाता, और मर्कज ले जाकर तकरीर  सुनवाता, यह मेरा मजाक बनाते, मर्कज का भी मजाक उडाते, एक बार इन्होंने हजरत मौलाना साद साहब का बहुत मजाक बनायी और तीन-चार रोज उनकी नकल उतारते रहे, एक-एक जुमले को दो-दो तीन-तीन बार कहते, मुझे देखते ही कहले लगते आओ मौलाना साहब की तकरीर सुनो, मुझे बहुत तकलीफ होती, मैंने इनसे बोलना छोड दिया, उन दिनों मैंने बहुत दुआयें कीं, अपने अल्लाह के सामने बहुत फरियाद की, मेरे अल्लाह को मुझ पर तरस आगया, एक हफ्ते से ज़्यादा बोल-चाल बंद रही, फिर यह दोनों मेरी खुशामद करने लगे, जब एक रोज बहुत खुशामद की और मुझ से बहुत माफी मांगी तो मैंने कहा मैं तुम से इस शर्त पर बोलूंगा जब तुम दोनों तीन बार ‘‘आपकी अमानत-आपकी सेवा में’’ और ‘‘मरने के बाद किया होगा?’’ पढ़ने का वादा करो, वह तैयार हो गये, असल यह है अहमद साहब, अल्लाह के यहाँ से फेसला हो गया था, मेरे अल्लाह को मुझ गंदे पर तरस आ गया और फेसला हो गया, बस इन्होंने तीन-तीन बार ‘‘आपकी अमानत-आपकी सेवा में’’ और ‘‘मरने के बाद किया होगा?’’ पढ़ी और खुद ही इस्लाम कुबूल करने को कहने लगे, मैं ‘दारे अरकम’ आया, इत्तफाक से ‘दारे अरकम’ में कोई नहीं मिला, मस्जिद में हम लोगों ने दोपहर से शाम तक इन्तजार भी किया, फिर मैं इनको लेकर अगले रोज इतवार था, जामा मस्जिद दिल्ली चला गया, वहाँ मौलाना जमालुद्दिन साहब तफसीर ब्यान करते हैं, उन्होंने इनको कलमा पढवाया, कुडकरडूबा कोर्ट में मेरे एक दोस्त वकील हैं, उन्होंने इनके कागजात बनवाये, दूसरे हफ्ते इन्होंने छुट्टि ली और जमात में वक्त लगाया, मुझे ऐसा लगता है और मैं इनसे कहता हूं कि मुझे इस का अन्दाजा अब हुआ कि मुझे अपने इस्लाम कुबूल करने की इतनी खुशी नहीं हुई जितनी इन दोनों दोस्तों के इस्लाम लाने की खुशी हुई, कई बार दफ्तर से रूखसत होते तो इतनी बेचैनी हो जाती थी कि अगर मेरा रास्ते में एक्सीडेंट हो गया या इनमें से कोई आज ही मर गया तो क्या होगा, और मैं रात भर नहीं सो पाता, देर हो जाती तो उठता, वुजू करता, नमाज पढ़ कर घंटों-घंटों रोता रहता, अखबार पढता जगह-जगह हादसे, एक्सीडेंट, मौत की खबरें और भी बेचैन कर देतीं, मेरे अल्लाह का करम है कि उसने यह खुशी दिखायी और इन्हें जमात बहुत अच्छी मिली, माशाअल्लाह दोनों पाबंदी से तहज्जुद पढ़ रहे हैं और अब दावत का बहुत जज़्बा उनमें पैदा हो गया है।


अहमदः आप तीनों गुडगांव में मुलाजमत पर साथ लगे थे?
मसऊदः नहीं! पहले संजय कौशिक की नोकरी लगी, फिर इनकी कोशिश से हम दोनों भी इस कम्पनी में मुलाज़िम हो गये, रहना-सहना भी साथ ही साथ रहा है।


अहमदः आपकी तो शादी हो गयी है, आप अब भी साथ ही रह रहे हैं?
मसऊदः हम तीनों जिस फ्लैट में रह रहे थे, मेरी शादी के बाद इन दोनों ने मेरे बराबर में एक दूसरा फ्लैट ले लिया है, पुराना फ्लैट जरा अच्छा था, वह उन्होंने मेरे लिए छोड दिया है।


अहमदः अबी (मौलाना कलीम सिद्दीकी) बता रहे थे कि आपके ससुराल वाले सब बिदअती थे, अल्लाह ने आपके जरिये उनकी इस्लाह की है, जष्रा इसकी तफसील बताईये?
मसऊदः असल में, मैं जिस कम्पनी में काम करता हूं, वहां एक कश्मीरी जम्मू की रहने वाली लडकी आसिफा बट भी काम करती थी, इस से मेरे ताल्लुकात हो गये, बात जब बढ़ी तो शादी के लिए आसिफा ने मना कर दिया कि तुम हिन्दू हो मैं तुम से शादी नहीं कर सकती, मेरे लिए इस लडकी को छोडना मुश्किल था, मैं बहुत ग़ौर करता रहा, मेरे खानदान का हाल भी ऐसा नहीं थी कि मैं लडकी के लिए मुसलमान होता, मैं छुट्टि लेकर बनारस अपने घर गया कि देखूं घर वालों की राय क्या है? मगर वह बनारस के ब्रहम्‍न, उनके लिए तो नाम लेना भी जुर्म था, दो महीने में बनारस रहा, मेरे दिल  में वह लडकी जगह कर चुकी थी कि इस के बगै़र दो महीने मेरे लिए दो सौ साल लगे, मैं गुडगांव आया और मैं ने फेसला किया कि घर वालों की मर्ज़ी के बगै़र मुझे इससे शादी करनी है, और एक रोज़ मैं ने आसिफा से मुसलमान होकर शादी करने के लिए कह दिया, उसने अपने वालिद से मिलने के लिए कहा, उसके वालिद लाजपत नगर में शालों का कारोबार करते हैं, मैं उनसे मिला, उन्होंने कहा, तुम मुसलमान हो जाओ, एक-दो महीने हम देखेंगे, इतमीनान हो जायेगा तो शादी कर देंगे, हमारे जानने वालों में एक लड़की के साथ एक लड़के ने मुसलमान होकर शादी की थी, मगर दो साल बाद वह फिर हिन्दू हो गया, मैं ने कहा मैं आपकी हर शर्त मानने को तैयार हूं।
वह बोले अजमेर शरीफ चलेंगे, तुम वहां चल कर मुसलमान हो जाना, मैं उनसे तकाजा करता रहता था मगर उनको मसरूफियात की वजह से वक्त नहीं मिलता थी, दो महीने के बाद एक इतवार को हम शताब्दी से अजमेर गये, वहां जाकर एक सज्जादा साहब से मिले, मोटी-मोटी मूंछें, काली मखमल की टोपी, क्लीन शेव, पाजामा जमीन में झाडू देता हुआ, एक साहब अपनी दूकान के काउन्टर पर बिराजमान थे, न जाने क्या नाम था चिश्ती कादरी साहब, हमारे ससुर जिनका नाम मन्‍जूर बट है, उनके पास गये, उनकी खिदमत में मिठाई पेश की, कुछ नकद नजराना भी दिया और आने की गर्ज भी बतायी, उन्होंने पांच हजार रूपये खर्च बताया, फूल और चादर अलग से खरीदने के लिए कहा। मुझे मेरे सर पर फूलों की टोकरी और चादर रख कर अन्दर ले कर गये, मजार की दीवार से लगा कर कुछ मुंह-मुह में कहा, और यह भी कहाः या खाजा आप का यह गुलाम हिन्दू मजहब छोड कर इस्लाम कुबूल कर रहा है, इसको कुबूल फरमा लिजिए और इसके अन्दर का कुफ्र निकाल दिजिए, चादर और फूल चढ़ाये ओर मुझे पांव की तरफ सजदे में पडने के लिए कहा, मैं सजदे में पड गया और मेरे साथ मेरे ससुर मन्‍जूर साहब भी, कादरी साहब ने बाहर निकल कर मुबारक बाद दी की खाजा साहब ने आपका इस्लाम कुबूल कर लिया, मैं ने उनसे कहा कि खाजा साहब ने इस्लाम कुबूल कर लिया, तो अब मुझे इस्लाम के लिया क्या करना है? बोले बेटा तुम्हारा इस्लाम खाजा ने कुबूल कर लिया, तुम वाकई सच्चे दिल से इस्लाम में आये थे, वहां तो दिल देख कर कुबूलियत होती है, मैंने अपने दिल में सोचा कि मैंने सच्चे दिल से कहां इस्लाम का इरादा किया है?


अहमदः क्या आप ने उस वक्त इस्लाम कुबूल करने का दिल से इरादा नहीं किया था?
मसऊदः नहीं मौलाना अहमद साहब! सच्ची बात यह है कि मैं ने सिर्फ उन लोगों के इतमीनान और शादी के लिए इस्लाम कुबूल करने का ड्रामा किया था, और मेरे दिल में यह बात थी कि बाप दादाओं का धर्म कोई छोडने की चीज होती है किया?


अहमदः आप अजमेर कुछ रोज रहे या वापस चले आये?
मसऊदः उसी रात को बस से दिल्ली आ गये, मैं ने आसिफा से शादी का मुतालबा किया तो उसने बताया कि हमारे वालिद साहब अभी मुतमईन नहीं हैं, अभी देख रहे हैं।


अहमदः आपने कुछ नमाज वगैरा पढनी शुरू कर दी थी?
मसऊदः तीन-चार बार जुमे की नमाज उनको दिखाने और इतमीनान कराने के लिए पढी, असल में नमाज तो आसिफा के घर वाले भी नहीं पढ़ते थे, उसके तीन भाई और एक बहन, मां-बाप मैं से कोई भी नमाज नहीं पढ़ता था, बस अजमेर शरीफ साल में दो बार जाते और निजामुद्दीन अन्दर दरगाह में एक महीने में दो बार जाते थे, और जम्मू में कुछ दरगाहें थीं वहां भी जाते, इसी को इस्लाम समझते थे, उनके एक पीर थे खानदानी, जो साल में एक दो बार उनसे नजराना लेते थे और कहते थे कि मैं तुम सब की तरफ से नमाज भी पढ़ लेता हूं और रोज भी रख लेता हूं।


अहमदः फिर शादी किस तरह हुई?
मसऊदः शादी अभी कहां हुई, असल में उनके दोस्त की लडकी के साथ हादसा हुआ था कि उस लडकी से जिस लडके ने मुसलमान होकर शादी की थी, वह शादी के बाद उस लडकी को होली, दीवाली मनाने को कहता था, और न मानने पर मारता था, बात बन न सकी, वह हिन्दू तो था ही, फिर उसे छोड कर अपने खानदान में चला गया, इस लिए आसिफा के वालिद डरते थे, वह लोगों से मशवरा करते, लोग उनको शादी न करने की राये देते, मगर वह मेरे ताल्लुकात के हद से ज़्यादा बढने के बारे में जानते थे, उनके किसी साथी ने उन्हें कश्मीर में मुफ्ती नजीर  अहमद से मशवरा करने के लिए कहा, मुफ्ती नजीर अहमद साहब कश्मीर के बडे मुफ्ती हैं, बांडीपूरा कोई बडा मदरसा है वहां मुफ्ती आजम हैं, उन्होंने किसी से उनका फोन नम्बर लिया और उनसे मशवरा किया, और बताया कि अजमेर शरीफ जाकर हम इस लडके को मुसलमान करवा लाये हैं, और खाजा ने इस्लाम कुबूल कर लिया है, मुफ्ती साहब ने कहा खाजा ने तो कब का इस्लाम कुबूल किया हुआ है, वह लडका अगर इस्लाम कुबूल न करे तो लडकी का निकाह ही नहीं होगा, मुफ्ती साहब ने उन्हें ‘दारे अरकम’ का पता दिया, और हजरत मौलाना कलीम साहब से मिलने का मशवरा दिया, मन्‍जूर साहब कई बार ‘दारे अरकम’ और खलीलुल्लाह मस्जिद आये मगर मुलाकात न हो सकी, इत्तफाक से दारे अरकम में कोई न मिला, बटला हाऊस मस्जिद में कोई अब्दुर्रशीद दोस्तम नव-मुस्लिम हैं, उनसे मन्‍जूर  साहब की मुलाकात हो गयी,  उनसे बात हुयी, अब्दुर्रशीद साहब ने बताया कि हजरत तो एक हफ्ते के बाद सफर से आयेंगे, मौलाना ओवेस और मौलाना उसामा नानोतवी भी नानोता गये हैं, आप ऐसा करें उनसे मुझे मिला दें, अगले रोज इतवार था, लाजपत नगर अब्दुर्रशीद दोस्तम ने आने का वादा किया, मेरी उनसे मुलाकात हुयी, उन्होंने इस्लाम के बारे में समझाया और कलमा पढवाया और मुझे और मेरे ससुर मन्‍जूर बट साहब दोनों को जोर  देकर कहा कि जमात में वक्त लगवा दें, मेरे कागजात सरफराज साहब एडवोकेट से बनवाये, और मुझे मर्कज जाकर डॉक्टर नादिर अली खां से मिल कर जमात में जाने को कहा, मेरे ससुर को बहुत समझाया अगर आप अपनी बची की जिन्‍दगी को तबाह होने से बचाना चाहते हैं कि यह शादी के बाद दोबारा हिन्दू न हों तो कम से कम चालीस रोज वरना अच्छा तो यह है कि चार महीने जमात में लगवा दें, वह बोले कि यह वहाबी हो जायेगा तो न हिन्दू रहेगा न मुसलमान, अब्दुर्रशीद दोस्तम साहब ने समझाया कि जमात वाले किसी का मसलक नहीं बदलवाते, जो हन्फी हैं वह हन्फी रहते हैं, जो शाफई हैं वह शाफई रहते हैं, और अहले हदीस, अहले हदीस रहते हैं। वहां सिर्फ फजाईल ब्यान किये जाते हैं, मसाईल अपने मसलक के मुताबिक लोग अपने आलिमों से पूछते हैं, बात उनकी समझ में आगयी और उन्होंने मुझे जमात में जाने के लिए कहा, चालीस रोज मेरे लिए बडी मुश्किल बात थी मगर वह अड़ गये, बोले जब तक तुम जमात में चिल्ला नहीं लगाओगे शादी नहीं होगी, मैं ने छुट्टि ली और मर्कज अपने ससुर के साथ गया, डॉक्टर नादिर अली खां साहब के कमरे में ऊपर जाकर उनसे मिले, उन्होंने मशवरा दिया पहले आप मौलाना कलीम साहब से मिलें, हमने बताया बहुत कोशिश के बावजूद नहीं मिल सके, अब्दुर्रशीद दोस्तम साहब से मुलाकात हुयी उन्होंने जमात में जाने का मशवरा दिया है, अलीगढ़ के एक पुराने उस्ताद जमात लेकर हेदराबाद जा रहे थे, उनके साथ जमात में जुडवा दिया, और मुझे मशवरा दिया कि तीन चिल्ले पूरे करके आना, जमात पढे लिखे लोगों की थी, बहुत अच्छा वक्त गुजरा और अल्हम्दु लिल्लाह इस्लाम मेरी समझ में आगया, अमीर साहब ने मशवरा दिया और मुझे खुद भी तकाजा हुआ कि जमात चार महीने की है, तो मैं भी चार महीने लगाऊँ। जमात में एक मौलाना साहब भी थे जो साल लगारहे थे, कई बार नये साथियों के साथ जमात बट जाती और फिर एक साथ आ जाती। 15 अगस्त को मेरे चार महीने पूरे हुए। 16 अगस्त को हम दिल्ली मर्कज पहुंचे, डॉक्टर नादिर अली खां साहब  से मुलाकात हुयी, उन्होंने मुझे हजरत  मौलाना कलीम साहब से जुडे रहने की ताकीद की, बात शादी की हुयी तो मुझे हिचकिचाहट थी, कि अगर ऐसे बिदअती खानदान में मेरी  शादी हो गयी तो बच्चे अपनी मां के साथ बिदअती होंगे, और नस्लें सही अकल से महरूम रहेंगी, मैं शादी को टालता रहा, एक रोज आसिफा और उसके वालिद ने मुझसे मालूम किया कि शादी करना है कि नहीं? मैं ने साफ-साफ कह दिया कि जमात में जाने से पहले तो आप लोगों को इत्मीनान नहीं था कि मुसलमान हूँ कि नहीं, मगर अब मामला उलटा है, अजमेर में ले जाकर जिस तरह आपने मुझ से शिर्क कराया, कुरआन और हदीस के लिहाज से तो मन्दिर में बुत को पूजना और अजमेर जाकर खाजा-खाजगान की दरगाह पर सर झुकाना बराबर दरजे का शिर्क है। अल्लाह के रसूल सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने फरमाया है ‘‘जिसने जानबूझ कर नमाज छोडदी उसने कुफ्र किया, अल्लाह के नबी सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने अपनी लाडली बेटी हजरत फातिमा से फरमाया था कि कब्र में तेरे आमाल काम आयेंगे, यहाँ आपके पीर साहब आपकी नमाज  और रोज अदा करते हैं, और बेवकूफ बनाते हैं। अब अल्लाह का शुक्र है मैं एक मुसलमान हूँ और इस्लाम अकल वालों का मजहब है, यह रस्म का नाम नहीं, अगर आपको मुझ से अपनी लडकी की शादी करना है तो आपको पूरे खानदान वालों के साथ मुसलमान होना पडेगा, जब तक आप लोग मुसलमान नहीं होंगे मैं शादी नहीं करूंगा। मैं ने कहा ‘आपको और आपके तीनों बेटों को चालीस रोज लगाने पडेंगे, यह भी कहा कि जमात वाले मसलक नहीं बदलते, मैंने खुशामद भी की, कई साथियों को उन लोगों से मिलवाया, अल्हम्दु लिल्लाह बडी कोशिश के बाद वह तैयार हुए, पहले मेरे ससुर ने वक्त निकाला, छोटे बेटे शबीर बट को साथ लेकर गये, उसके बाद बडे भाईयों ने वक्त लगाया, उस दौरान अल्लाह का शुक्र है कि मैंने आसिफा को काफी किताबों का मुताला कराया, मैं ने चार महीने में कुरआन मजीद नाजरा पढ़ लिया था, उर्दू अच्छी पढने लगा था, अल्लाह का शुक्र है आसिफा का जेहन साफ हो गया, गुडगांव जामा मस्जिद के इमाम साहब के साथ, मैं आसिफा को लेकर खलीलुल्लाह मस्जिद आया और हम दोनों इमाम साहब के मशवरे से हजरत से बैअत हो गये, जब हजरत हज को गये हुये थे तो हमारी शादी की तारीख तै हो गयी, हजरत ने फोन पर जोर दिया कि यह भी सुन्नत के खिलाफ है कि किसी खास शख्सियत से निकाह पढ़वाने का अहतमाम किया जाये और निकाह में ताखीर की जाये, हजरत ने मुलाकात पर भी निकाह में जल्दी करने का मशवरा दिया था, बल्कि यह भी फरमाया था कि अच्छा है आज ही निकाह हो जाये, दोनों के एक साथ रहने, बात करने का कानूनी हक हो जायेगा, वरना इस तरह बात करना भी गुनाह है, अगर्चे जमात से आकर मैं अल्लाह का शुक्र  है काफी अहतियात करने लगा था। अल्हम्दुलिल्लाह 17 नवम्बर को हमारा निकाह हुआ, फिर जब हजरत वापस आगये तो आसिफा के सारे खान्दान वाले हजरत से बैअत हो गये।


अहमदः आपके घर वालों का क्या हुआ?
मसऊदः अभी मैं ने सिर्फ अपने घर वालों के लिए दुआओं का अहतमाम किया है, अभी जल्दी ही हजरत ने बनारस के एक साहब को हमारे वालिद साहब का फोन नम्बर दिया है, हमारे वालिद साहब रेलवे में एक अच्छी पोस्ट पर हैं, मुगलसराये में उनकी पोस्टिंग है।


अहमदः और भी कुछ लोगों पर आपने काम किया है, इसकी कुछ तफसील बताईये?
मसऊदः हमारी कम्पनी में काम करने वाले एक साथी जो जयपुर के रहने वाले हैं, उनके वालिद दस साल पहले बी.जे.पी. के एम.एल.ए. रहे हैं, अल्हम्दु लिल्लाह मुसलमान होगये हैं, वह जमात में गये हुए हैं।


अहमदः आपकी अहलिया आसिफा का क्या हाल है?
मसऊदः अल्हम्दु लिल्लाह मैं ने मशवरे से तै किया है कि वह सिर्फ दावत का काम करेंगी, उन्होंने मुलाजष्मत छोड दी है, बुरका पहनने लगी हैं, इस्लाम का मुताला कर रही हैं, और कुरआन और सीरत, हजरत के मशवरे से पढना शुरू किया है, हम लोग नेट पर दावत के लिए आनलाइन साइट खोलकर काम का खाका बना रहे हैं, उनकी दोस्त दो लड़कियां उनकी कोशिश से मुसलमान हो चुकी हैं।


अहमदः बहुत-बहुत शुक्रिया मसऊद भाई, अरमुगान के कारिईन के लिए कोई पैगषम आप देंगे?
मसऊदः खानदानी मुसलमानों को रस्मी इस्लाम से निकल कर कुरआनी इस्लाम में लाने का वाहिद तरीका यह है कि मुसलमानों में दावती शऊर बेदार हो, नया खून पुराने बीमार खून को ताजा और साफ करता है, मैं ने अपना इस्लाम कुबूल किया था तो मुझे अपनी ससुराल वालों के इस्लाम की कैसी फिक्र थी बस मैं ही जानता हूँ।


अहमदः बेशक! बहुत पते की बात आपने कही है। अस्सलामु अलैकुम
मसऊदः वालैकुम सलाम 

Wednesday, March 2, 2011

भाई मुज़म्मिल (सोहन वीर) से मुलाकात interview March 2011

अहमद अव्वाहः अस्सलामु अलैकुम व रहमतुल्लाहि वबरकातुह
मुज़म्मिलः वालैकुमुस्सलाम व रहमतुल्लाहि वबरकातुह

अहमदः मुज़म्मिल भाई आपका नम्बर भी आ ही गया?
मुज़म्मिलः जी अहमद भाई, मैंने आपसे कितनी बार कहा कि मेरा इन्टरव्यू भी ले लो।

अहमदः तुम्हारा हाल तुम्हें खुद मालूम है कैसा था, क्या वह इस लायक़ था कि उसे छपवाया जाये, वह तो ऐसा हाल था कि उसे छुपाया जाये बस, फिर यह बात भी थी कि अबी (मौलाना मुहम्मद कलीम सिद्दीकी) जिसके बारे में फरमाते हैं मैं उनसे ही बात करता हूं, मैंने अबी से तुम्हारी बात कही थी, तो अबी कहते थे ज़रा इन्तज़ार कर लो इसका हाल ज़रा इस लायक होने दो।
मुज़म्मिलः मशहूर है कि बारा बरस में कोडी के दिन भी बहाल हो जाते हैं, अहमद भाई मुझे बारा बरस इस्लाम कुबूल किये हुए हो गये, बल्कि अगर मैं कहूं कि इस्लाम कुबूल करने का ढोंग भरे हुए, तो यह भी सही है।
 
अहमदः वाकई हम पर तुम्हारा अहसान है कि तुम्हारी वजह से हमने अबी को पहचाना और हमें मालूम हुआ कि किसी को बरदाश्त करना और सबर करना किसको कहते हैं, वरना अच्छे-अच्छे हिम्मत हार जाते हैं।
मुज़म्मिलः अहमद भाई आप हज़रत के घर में सबसे नर्म, बरदाश्त करने वाले और रहमदिल हैं, आपने भी मुझे दो बार फुलत से भगाया, लेकिन हज़रत दोनों बार मुझे अपनी गाड़ी में बैठाकर साथ ले आये।
 
अहमदः अच्छा अब डेढ साल से तुमने कोई ड्रामा नहीं किया, कहते हैं चोर चोरी से जाये, हेरा-फेरी से नहीं जाता, तो क्या अब तुम्हारे दिल में पुरानी हरकतें करने की बात नहीं आती?
मुज़म्मिलः अल्हमदू लिल्लाह मेरे अल्लाह का करम है(रोते हुए) अब कुछ भी नहीं आती।
 
अहमदः तुम्हें कलमा पढे हुए कितने दिन हुए?
मुज़म्मिलः कौन-सा वाला कलमा पढे हुए, मैंने तो बिसियों बार कलमा पढा है।
 
अहमदः तुमने इस्लाम कुबूल करने के लिए कलमा कब पढा?
मुज़म्मिलः मौलवी अहमद! मैं ने हर बार इस्लाम कुबूल करने के लिए कह कर कलमा पढा, सबसे पहला ड्रामा मैंने 9 जून 1998 में कलमा पढने का किया, जब थाना भवन के एक बडे आदमी चौधरी साहब मुझे हजरत की खिदमत में लेकर आये थे, इसके बाद मैं ज़रूरत के लिहाज़ से बार-बार कलमा पढकर मुसलमान होने का ड्रामा करता रहा, लेकिन 3 मार्च 2009 को मुझे हज़रत ने जामा मस्जिद फुलत में दस बजकर बाईस मिन्ट पर कलमा पढवाया था उसके बाद से काशिश करता हूं कि इस पर जमा रहूं, हमारे हज़रत कहते हैं कि मुझे हर वक्त डर रहता है कि ईमान रहा कि नहीं, इस खौफ से मग़रिब के बाद और फ़जर के बाद एक बार रोज़ाना ईमान कुबूल करने के लिए कलमा पढता हूं, आपने तो सुना होगा, नव-मुस्लिम आकर कहता है कि मैं नव-मुस्लिम हूं, हज़रत मालूम करते हैं कब मुसलमान हुए? तो वह बताता है कि दो महीने हो गये, दो साल हो गये। हजरत कहते हैं कि आप तो मुझसे पुराने मुसलमान हो, मैं ने अभी फजर के बाद इस्लाम कुबूल किया है या मग़रिब के बाद, हज़रत तो यह भी फरमाते हैं कि हर बच्चा सच्चे नबी सल्लल्लाहू अलैहि वसल्लम की सच्ची खबर के मुताबिक मुसलमान पैदा होता है, तो अब आप नव-मुस्लिम कहां हुए, आपतो पैदाईशी मुसलमान हैं, अल्हम्दू लिल्लाह 9 जून से रोज़ाना सुबह-शाम ईमान की तजदीद करता हूं, दिन रात मैं कभी-कभी बीच में भी कलमा पढ लेता हूं कि शायद अभी मौत का वक्त करीब हो।
 
अहमदः आजकल तुम कहां रह रहे हो?
मुज़म्मिलः मैं आजकल हजरत के हुक्म से सहारनपुर के एक मदरसे में पढ रहा हूं, यह तो आपके इल्म में है कि मैं अगस्त 2009 में चार महीने जमा‘त में लगाकर आया, और कुरआन शरीफ नाज़रा और हिफज़ (कुरआन कंण्ठस्थ) सात महीने में मुकम्मल किया, 5 अप्रैल 2010 को मेरे हज़रत हमारे मदरसे में तशरीफ लाये, मेरे खत्म कुरआन की दुआ हुई, हज़रत पर इस कद्र रक्कत(रूदन, करूणा) तारी थी कि तकरीर करना मुश्किल हो गया और चालीस मिन्ट की दुआ करायी, सारा मजमा रोता रहा, हजरत ने प्रोग्राम के बाद खाना खाते हुए यह बात कही कि आज मुझे मुज़म्मिल के हिफज(कंण्ठस्थ) की जितनी खुशी हुयी, अगर अल्लाह ने बख्श दिया और जन्नत में जाना हुआ तो शायद इतनी खुशी बस उस रोज़ होगी, उसके बाद मैं ने दौर किया और अल्हम्दू लिल्लाह मैंने जमात में आदिलाबाद में वक्त लगाया, और साथियों को कुरआन शरीफ सुनाया, इस साल अल्हमदुलिल्लाह अरबी पढनी शुरू कर दी है, मैंने हज़रत से वादा किया है इन्शा अल्लाह जल्द हज़रत को आलमियत की सनद दिखानी है, सुमा इन्शाअल्लाह।

अहमदः कुरआन मजीद तो आपका अल्हम्दू लिल्लाह अब बिल्कुल पक्का हो गया है, मगर आपने बडी उम्र में हिफज किया है इस लिये याद करते रहना चाहिए।
मुज़म्मिलः हज़रत से मैंने मालूम किया था कि हमारे नबी सल्लल्लाहू अलैहि वसल्लम का कितना कुरआन पढने का मामूल था तो हज़रत ने बताया कि एक मन्ज़िल रोज़ाना, और बहुत से सहाबा इकराम का भी आप सल्लल्लाहू अलैहि वसल्लम कि इत्तबा(अनुसरण) में इस मामूल का जिक्र आता है, मैंने ईद के बाद से तहज्जुद में एक मन्ज़िल पढना शुरू किया है, चन्द दिनों के अलावा जब मुझे डेंगू हो गया था अल्हम्दू लिल्लाह अभी तक नागा नहीं हुआ, हमारे मदरसे में सिफर घण्टे में तर्जुमा(अनुवाद) कुरआन पढाया जाता है, अल्हम्दू लिल्लाह मुझे खासा कुरआन समझ में आने लगा है, कभी-कभी बहुत ही मज़ा आता है।

अहमदः शुरू में जब 1998 में तुम ने कलमा पढा था तो उस वक्त तुम्हारा इरादा मुसलमान होने का था कि नहीं?
मुज़म्मिलः असल में आपको मालूम है, मैं थाना भवन के करीब एक भंगी खानदान में पैदा हुआ, हमारे खान्दान वाले गांव के चैधरियों के यहां सफायी वगैरा करते थे, मेरे पिता जी दस्वी क्लास तक पढे हुये थे, और सोसाईटी में मुलाजिम हो गये थे, मेरी मां भी पढी लिखी हैं, वह एक प्रायमरी स्कूल में टीचर हैं, उन्होंने ही मुझे पढाया, मैं बहुत जहीन था, हाई स्कूल में फ्रस्ट डवीजन पास हुआ, ग्यारहवीं में पहले मुझे शराब की लत लगी फिर और दूसरे खतरनाक नशों का आदी हो गया, और इस तरह के लडकों के साथ बुरी संगती हो गयी, उनमें एक दो मुसलमान भी थे, इण्टर पास करके मेरी मां मुझे डाक्टर बनाना चाहती थीं, मगर मैं आवारा लडकों के साथ लग गया, कुछ रफ्तार मेरी ऐसी तेज़ थी कि जिधर जाता आगे निकल जाता था। थाना भवन में एक गूजर ज़मीनदार के बेटे के साथ मेरे ताल्लुकात बढे जो नशे की वजह से बने थे, उनके यहां हज़रत एक बार नाश्ते के लिए आये थे, मैं वहां मौजूद था, हज़रत से चैधरी साहब के बडे बेटे ने मेरी मुलाक़ात करायी, तो हज़रत ने उनके बेटे जो मेरे साथी थे अल्ताफ से कहा कि अपने दोस्त की खबर लो वरना यह तुम्हें दोज़ख़ में पकड कर ले जायेगा, अल्ताफ के बडे भाई ने मझ से कहा ‘सोहन वीर कब तक तू अछूत रहेगा, मुसलमान होजा’ मैं ने कहा ‘अगर मैं मुसलमान हो जाऊँगा तो मुसलमानों में मेरी शादी होजायेगी?’ उसने कहा ‘ हो जायेगी’। मैं ने सोचा चलो देखते हैं, एक बार मुसलमान होकर देखते हैं अगर जमेगा तो अच्छा है वरना फिर अपने घर आजाऊँगा। मेरे पिताजी का तो शराब की लत में 45 साल की उम्र में इन्तकाल हो गया था, मेरी मां मेरी वजह से बहुत परैशान रहती थी, अल्ताफ के बडे भाई मसरूर मुझे लेकर फुलत पहुंचे, हज़रत ने मुझे कलमा पढवाया, मेरठ भेज कर मेरे कागज बनवाये और मुझे जमात के लिए दिल्ली मर्कज भेज दिया गया, हमारी जमात भोपाल गयी, हज़रत ने यह कह कर पैसे अब्बा इलयास से दिलवाये कि यह कर्ज़ है, जमात से वापस आकर तुम काम पर लगोगे तो वापस करने हैं, जब यह जैब खर्च खत्म हो गया तो मैंने अमीर साहब से कहा कि मैंने घर फोन किया था, मेरी मां बहुत बीमार है मुझे बुलाया है, अमीर साहब से सत्राह सौ रूपये लेकर मैं जमात से वापस आगया, सत्राह-सौ रूपये शराब और गोलियों वगैरा में खर्च किए और थाना भवन पहुंचा, वहां लोगों से कहा कि जमात से मुझे अमीर साहब ने भगा दिया कि तुम नव-मुस्लिम हो हमें मरवाओगे क्या? तुम्हारे घर वाले हमारे सर हो जायेंगे, यह कहा और मुझे भगा दिया, मुझे किराये के पैसे भी नहीं दिये, अल्ताफ ने हज़रत को फोन किया। हज़रत ने कहा कि हम मालूम करेंगे, ऐसा नहीं हो सकता, फिर भी अगर कोई जमात इलाके में काम कर रही हो, उसमें जोड दें, उन्होंने थाना भवन मर्कज जाकर मालूम किया तो मालूम हुआ कि कैराना के इलाके में एक अच्छी जमात काम कर रही है, मुझे जमात के एक साथी लेकर कर कैराना जाकर दूसरी जमात में जोडकर चले आये। जमात में अमीर साहब ने खर्च की रक़म अमानत के तौर पर एक मास्टर साहब के पास रख दी थी, तीन रोज़ तो मैं हिम्मत करके जमात में रहा, मगर मेरे लिए मुश्किल था कि मैं इतनी महनत करूं मैं ने रात मास्टर साहब के जवाहरकट से पैसे निकाले और फरार होगया, जब तक पैसे रहे तफरीह करता रहा और फिर फुलत पहुंचा, हजरत से बडी मुश्किल से वक्त लेकर तन्हाई में मुलाकात की, हज़रत से माफी मांगी और कहा कि पहले मेरी शादी करादें, हज़रत ने मुझे समझाया कि जब तक तुम अपने पैरों पर खडे नहीं होगे कौन अपनी लडकी देगा, तुम खुद सोचो। अगर तुम्हारी कोई बेटी हो तो तुम बेरोज़गार लडके से शादी कैसे करोगे? कुछ सबर करो, अपने हाल को बनाओ, देखो तुम्हारी जिन्दगी का यह अहम मोड है, हमें तुम से सिर्फ तुम्हारे मुस्तकबिल के लिए ताल्लुक है, तुम अच्छी जिन्दगी गुजारोगे तो खुशी होगी, मुझे बहुत समझाया मगर मेरी समझ में बात न आयी, वापस आया और दैनिक जागरण के दफतर में खतोली जाकर एक खबर बनवायीः ‘शादी का वादा पूरा न होने पर हिन्दू जवान ने इस्लाम लौटाया’ और इस्लाम कुबूल करने का सर्टिफिकेट एक लडके के हाथ हजरत के पास भिजवा दिया और हजरत से कहलवा दिया कि इस्लाम मुझे नहीं चाहिए। घर वापस चला गया, मां मुझे देख कर बहुत नाराज हुयी, लेकिन जब मैं ने दैनिक जागरण दिखाया कि इस्लाम छोड कर आया हूं तो बहुत खुश हुयी। घर रह कर फिर वही काम मां को लूटना, शुरू में मां झेलती रही मगर एक रोज़ जब मैं ने ज्यादा नशा करके गांव के एक लडके से लडाई की तो वह बहुत परैशान होगयी और बोली बस सोहन मुझे ऐसे बेटे से अच्छा है कि मैं बगैर बेटे के रहूं, और मेरे घर से मुंह काला करके मुझे निकाल दिया, एक दो रोज़ में घर से इधर-उधर रहा, मुझे कहीं ठिकाना नहीं मिला तो मैंने हिम्मत करके हजरत को फोन किया, इत्तफाक से फोन मिल गया, हज़रत से मैं ने कहा कि में मुज़म्मिल आपका भगौडा बोल रहा हूं, हज़रत ने कहा ‘भगौडा कौन होता, मेरा बेटा मुज़म्मिल बोल रहा है, हज़रत ने पूछाः कहां हो? मैं ने कहा मुज़फ्फरनगर, हजरत ने कहा फुलत आजाओ, मुलाकात पर बात होगी, मैं ने कहा फुलत में मुझे कौन आने देगा, हज़रत ने कहा आजाओ मैं आज फुलत में हूं, फुलत पहुंचा, हज़रत ने गले लगाया, रात को देर तक समझाते रहे, और बोले बेटा जो कुछ तुम अच्छा-बुरा कर रहे हो अपने साथ कर रहे हो, तुम हमें सत्तर बार धोका दोगे हम फखर के साथ धोका खायेंगे, और हज़रत उमर रजि. का वाकिआ सुनाया, हज़रत उमर फरमाते थे दीन के नाम पर कोई हमें धोका देगा तो हम सत्तर बार फखर से धोका खायेंगे, मुझे ज़ोर देते रहे कि तुम जमात में एक पूरा चिल्ला(चालीस दिन) लगा लो, मैं ने आमादगी ज़ाहिर की, मेरे कागजात तलाश कराये तो नहीं मिल सके, दोबारा मेरठ भेज कर कागजात बनवाये और मुझे मर्कज निज़ामुद्दीन भेज दिया गया, इस बार एक जानने वाले साथी को समझा कर मेरे साथ किया, जमात में मेरा वक्त मथुरा में लगा, नशे की आदत मेरे लिए बहुत बडा मसला था, मैं बहुत हिम्मत करता था मगर रूका नहीं जाता था, दो बार मैं ने बाहर जाकर शराब पी ली, अमीर साहब ने हजरत को फोन किया, हज़रत ने एक साहब को मुज़फ्फरनगर से नशा छुडाने की दवा ले कर भेजा, उसको खाने से नशा का मसला हल हो गया, मगर अपनी आज़ाद तबियत की वजह से मैं पूरे चिल्ले मैंने साथियों की नाक में दम रखा, मगर अमीर साहब हज़रत के एक मुरीद थे, उनसे हज़रत ने कह दिया था, अगर आपने मुज़म्मिल का चिल्ला पूरा लगवा दिया तो आपको दाई(अल्लाह की ओर निमन्त्राण देने वाला) समझेंगे वरना आप फेल होजायेंगे, उन्होंने लोहे के चने चबाये मगर जमात से वापस नहीं किया, चूंकि मेरा जे़हन बहुत अच्छा था, बिल्कुल न करने के बाद भी मैंने नमाज मुकम्मल और नमाज़े जनाजा याद कर ली, और खाने के, सोने के आदाब, मुखतलिफ दुआऐं याद कर लीं। चिल्ला लगाकर आया तो हजरत बहुत खुश हुए, अमीर साहब को बहुत मुबारकबाद दी और मुझे दिल्ली में एक जानने वाले के यहां नोकरी पर लगवा दिया, चार हजार रूपये माहाना और खाना रहना तै हुआ, रिशेप्शन पर डियूटी थी, वहां पर एक लडकी से मेरे ताल्लुकात हो गये, और मैं उसे लेकर फरार होगया, लडकी के घर वालों ने कम्पनी के मालिक और मेरे खिलाफ एफ.आई.आर. कर दी, सबको परैशान होना था, हज़रत ने किसी तरह अफसरों से सिफारिश करके केस को डील किया, लडकी एक ब्रहम्ण की थी, मैंने उसे कलमा पढवाया और इलाहाबाद लेजाकर कानूनी कार्यवाही करवाई, कम्पनी में तीन और नव-मुस्लिम काम करते थे, कम्पनी वालों ने हजरत से कहा कि इन सभी को कहीं और काम पर लगा दो, हज़रत ने कहा इनको रिज़क देने वाले अल्लाह हैं, आप जैसे कितने लोगों को अल्लाह ने इनकी खिदमत के लिए मालदार बनाया है, हज़रत उन तीनों को लेकर आगये और उसी दिन कोशिश करके उन तीनों को काम पर लगवा दिया, मेरी यह शादी ज्यादा दिन नहीं चल सकी और मैं ने उस लडकी को छ महीने बाद तलाक दे दी।

अहमदः उन दिनों आप कहां रहे?
मुज़म्मिलः मैं ने हज़रत का नाम लेकर कानपुर में एक साहब को अपना बाप बना लिया था और उनके यहां हम दोनों रहे।
 
अहमदः उन्होंने ऐसे में तुम्हें रख लिया?
मुज़म्मिलः मैं हजरत के ताल्लुक के लोगों को निगाह में रखता था, हज़रत से कोई मिलने आया फोरन फोन नम्बर ले लिया, एक दो फोन खेरियत और दुआ के लिए करता था। हज़रत भी बेटा-बेटा उनके सामने करते थे, लोग समझते कि यह हज़रत का बहुत खास है, बस मेरा काम निकलता रहता था।
 
अहमदः इस तरह अन्दाज़न तुमने कितने लोगों से पैसे ऐंठे होंगे?
मुज़म्मिलः लाखों रूपये मैं ने हज़रत के ताल्लुक से लोगों से वसूल किए और सैंकडों ऐसे लोग होंगे जिन से मैं ने फायदा बल्कि हकीकत में नुक्सान उठाया, दसियों मामले तो आपके सामने भी आये, दो बार आपने, एक बार शुऐब भाई ने मुझे फुलत से भगा दिया, आपने तो वार्निंग दी थी कि आज के बाद तुम्हें फुलत में देखा तो अपनी मोजूदगी में मुंह काला करके निकाल दूंगा।
 
अहमदः उस लडकी का क्या हुआ?
मुज़म्मिलः उसका इस्लामी नाम मैंने आमना रखा था, घर वाले उसे मारना चाहते थे, तलाक के बाद उसके लिए फुलत के अलावा कोई जगह नहीं थी, हजरत के पास वह पहुंची, हज़रत ने उसको मेरठ के किसी मदरसे में भेजा, कुछ रोज पढाया, इद्दत का वक्त गुज़रने के बाद गाजियाबाद के एक जानने वाले के बेटे से उसकी शादी कर दी।
 
अहमदः उसके बाद क्या हुआ?
मुज़म्मिलः मुझ पर एक बहुत शातिर शैतान सवार था, रोज-रोज नये खेल सुझाता था, मैं ने हज़रत से कुछ बडी रकम ऐंठने की सोची। मैंने मुज़फ्फरनगर इन्टेलीजेंस के दफतर में सम्पर्क किया और वहां एक राजपूत इन्सपेक्टर से दोस्ती कर ली, और कहा फुलत में धर्म बदलवाने का काम होता है, और बडी रकम उनके पास बाहर से आती है
 
अहमदः क्या तुम समझते हो कि ऐसा है?
मुज़म्मिलः मुझे खूब मालूम है कि हज़रत का मिजाज़ तो यहां के लोगों से भी चन्दा करने का नहीं है, बस वैसे ही शैतानी में मैंने ऐसा कहा, मैं ने कहा कि मैं वहां से आपको बडी रक़म दिलवा सकता हूं, मगर उसमें से 25 पतिशत मुझे देना होगा, वह तैयार हो गये। उन्होंने एक आई.बी. कारकुन को जिस का पांव एक हादसे में कट गया था, मेरे साथ भेजा, और एक और साथी को साथ लिया, मैं तो रास्ते में रूक गया और उनको वहां भेज दिया, अब्बा इलयास साहब और मास्टर अकरम का पता बता दिया, वह दोनों फुलत पहुंचे कि हम मुसलमान होना चाहते हैं, हज़रत तो नहीं मिले, मास्टर अकरम के पास गये, उनसे बातें हुयीं, उन्होंने मौलाना उमर साहब से उनको मिलवाया, महमूद भाई भी आ गये, उन्होंने उनको इस्लाम का तार्रुफ(परिचय) करवाया और बताया कि हम लोग तो पैसे लेकर मुसलमान करते हैं, हम तो कलमा पढवाकर इस्लाम देते हैं, इसके लिए कोई रक़म देने या शादी वगैरा का किया तुक है, हमारे यहां तो अगर आप सर्टीफिकेट लेंगे तो पांच सौ रूपये फीस है, वह देनी पडेगी, हम आपको मदरसे की रसीद देंगे, यह लोग और बहसें करते रहे, वहां पर कुछ मिला नहीं तो मायूस होकर वापस आये, मुझ पर बहुत बरसे, वहां से किताब ‘आपकी अमानत-आपकी सेवा में’ लेकर आये, उसको पढकर बहुत मुतास्सिर थे, मैंने कहा इतनी आसानी से बात बनने वाली नहीं, वह मेरे इसरार पर दो-तीन बार गये, कुछ हाथ नहीं आया, उन्होंने मुझे धमकाया कि तुम्हारे खिलाफ मुकदमा बना देंगे, मैं मायूस वापस आया, फिर मैंने बजरंग दल और शिव सेना वालों को भडकाने की कोशिश की, शिव सेना वालों ने फुलत कहलवाया भी कि फुलत वाले यह धर्म बदलवाने का काम या तो बंद कर दें वरना हम इन्तज़ाम करेंगे, हज़रत ने उनके पास साथियों को भेजा, और उनसे काम का तार्रुफ कराया और दफतर वालों से फुलत आने को कहा, बारी-बारी वह लोग आते रहे और फिर मामला ठण्डा हो गया।

अहमदः इसके बाद एक बार पुरकाज़ी में भी तो आपने शादी की थी?
मुज़म्मिलः हज़रत के ताल्लुक के एक काज़ी जी से मैं ने बहुत रो-रो कर अपना हाल सुनाया और उनसे कहा कि मैंने हज़रत को बार-बार न चाहते हुए भी धोका दिया, अब मैं उस वक्त तक हज़रत को मुंह नहीं दिखाना चाहता जब तक एक अच्छा मुसलमान न बन जाऊँ, काज़ी जी ने मुझ पर तरस खाकर मुझे अपने घर रख लिया, उनके यहां कोई औलाद नहीं थी, मैं उनकी दुकान पर बैठने लगा, उन्होंने बिजनौर जिला के एक गांव में अपने रिश्तेदारों में मेरी शादी करा दी बेचारों ने खुद ही शादी वगैरा के इन्तज़ामात किए।
 
अहमदः उन्होंने आपके बारे में तहकीक नहीं की?
मुज़म्मिलः उन्होंने हज़रत से मालूम किया था, हज़रत ने कहा हम दाई(अल्लाह की ओर निमन्त्राण देने वाला) हैं, और दाई तबीब(हकीम) होता है, आखरी सांस तक मायूस होना उसूले तिब(चिकित्सा) के खिलाफ है, कोशिश किजिए, क्या खबर अल्लाह ने उसकी हिदायत आपके हिस्से में लिखी हो।
 
अहमदः उसके बाद क्या हुआ? उस लडकी को भी आपने तलाक़ दे दी है?
मुज़म्मिलः बस आठ महीने में उसके घर वालों का और काज़ी जी के सारे खान्दान का नाक में दम करके, मार-पीट कर तीन तलाक़ देकर भाग आया।

अहमदः उसके बाद क्या हुआ?
मुज़म्मिलः में दर-बदर भटकता रहा, उस दौरान एक बार हिम्मत करके फुलत पहुंचा, मास्टर इस्लाम मुझे मिल गये, हज़रत तो नहीं थे, उन्होंने मुझे डराया, बहुत बुरा-भला कहा कि तूने सब लोगों का एतिमाद खत्म कर दिया, हर नव-मुस्लिम मुहाजिर से यहां के लोग बद ज़न(कुधारणा, बुरे खयाल वाले) हो गये हैं। मैं उनसे बहुत लडा और चला आया। कई बार गलत लोगों के साथ लगा, दो बार दो-दो महीने के जेल में भी रहा। हजरत के किसी जानने वाले ने ज़मानत करायी, अल्लाह का शुक्र है कि जिन लोगों ने मुकदमा कराया था हजरत की सिफारिश से उन्होंने वापस ले लिया। जेल में अल्बत्ता मैंने दो लोगों को कलमा पढवाया, हजरत सब लोगों से कहते थे कि देखो उसकी वजह से पांच लोग जेल में और एक ब्राहम्ण की लडकी आमना मुसलमान हुयी, अब उनकी नस्लों में क्यामत तक कितने लोग मुसलमान होंगे, अब अगर यह हमारी जिन्दगी को जेलखाना भी बना दे तो हमने महनत वसूल कर ली।

अहमदः  सब घर वाले और ताल्लुक वाले तुम्हारी वजह से अबी (मौलाना मुहम्मद कलीम सिद्दीकी) से बहस भी करते थे, अबी अक्सर, बिगडे हुए लोगों और नव-मुस्लिमों के लिए कहते हैं कि जैसे रूह वैसे फरिश्ते, नेक लोगों के पास नेक लोग आते हैं, बदों के पास बद आते हैं, हम फासिक़ और फाजिर धोकेबाज़ ढोंगियों के पास पाकबाज़ और नेक लोग कहां रहने लगे, देखो शराबियों के पास शराबी, जुआरियों के पास जुआरी जमा होते हैं, हम जैसे बदकारों के पास कहां नेक लोग जमा होने वाले हैं, अम्मी जान का इन्तकाल हुआ तो फरमाने लगे कि अम्मीजान नहीं रहीं तो हमें कैसी कमी महसूस हो रही है, हालांकि अपने घर के सारे अज़ीज़ भाई-बहन बीवी-बच्चे मौजूद हैं, यह बेचारे नव-मुस्लिम इनका कोई भी नहीं, अपना सगा बेटा कितना ऐबों में फंस जाता है, कभी किसी से जिक्र भी नहीं करता, न घर से निकालता है, यह बेचारे दर-बदर फिरते हैं, ज़रा-सी बात इनसे हो जाये तो लोग इन्हें निकाल देते हैं, पुराना मुसलमान सारे ऐब करे तो कोई खयाल नहीं, यह कल का मुसलमान सोचते हैं कि फरिश्ता बन जाये और सब धुतकारते हैं, यह कह कर अबी बार-बार रोने लगते हैं।
मुज़म्मिलः एक रोज़ जब में पिछली बार आया था, तो हज़रत से मिला तो मैं ने यह भी कहा कि आपने मुझे इतनी बार बुरी हरकत करने के बावजूद बार-बार मौका दिया, हज़रत ने फरमाया कि मुझ से बुरी हरकत कौन करने वाला होगा, मेरे बेटे तुम मुझ से तो हज़ार दर्जे बेहतर हो, बस अल्लाह ने मेरे ऐब छुपा रखे हैं।
 
अहमदः इस दौरान तुम कितनी बार जमात में गये?
मुज़म्मिलः इन बारा सालों में मुझे सत्राह बार जमात में भेजा गया, एक बार चिल्ला(चालीस दिन) और आखिर में तीन चिल्ले तो पूरे किए, वरना धोका देकर भागता रहा, उसी जमाने में मुझे 21 बार काम से लगाया, या कारोबार कराया, मगर मैं कोई काम करने के बजाये धोका देता रहा।
 
अहमदः अब तुम्हारे दिल में वह बातें नहीं आतीं?
मुज़म्मिलः अल्हम्दू लिल्लाह नहीं आतीं, मुझे ऐसा लगता है वह शैतान जो मुझ पर सवार था वह मेरे हजरत की बरकत से मुझे छोडकर चला गया है, 2 मार्च 2009 को फुलत के एक साहब ने मेरी एक हरकत पर मुझे बहुत मारा, हजरत सफर से रात को देर से तशरीफ लाये, सुबह दस बजे मुझे देखा, मेरा पूरा जिस्म जख्मी था, हज़रत मुझे पकड कर जामा मस्जिद ले गये, मस्जिद जाकर दो रकात नमाज़ पढी, और मुझे देखते रहे और बार-बार चूमते रहे, मेरे बेटे कब तक तुम ऐसी जिल्लत बर्दाशत करते रहोगे, और अगर इसी तरह रहे तो फिर दोज़ख की मार किस तरह सहोगे, चलो आओ अल्लाह से दुआ करें, बहुत देर तक दुआ की, मैं आमीन कहता रहा, फिर बोले मुज़म्मिल आओ दोनों सच्चे दिल से तौबा करें बस, ऐसी तौबा जिसके बाद लौटना न हो, मुझे तौबा करायी, ईमान की तजदीद करायी, और मुझसे वादा लिया कि बस अब मुसलमान दाई बनकर मेरी इज़्ज़त की लाज रखोगे, और सबको दिखा दोगे कि इन्सान कभी भी अच्छा बन सकता है, मैंने वादा किया अगले रोज चार महीने की जमात में चला गया, और अल्हम्दू लिल्लाह जमात में दाढी रखी और खूब दुआ का अहतमाम किया, हज़रत ने जमात से वापस आकर काम पर लगने को कहा, मैं ने हाफिज आलिम बनने की खाहिश का इजहार किया, दाखिला होगया, अल्हम्दू लिल्लाह हिफज मुकम्‍मल होगया, इन्शा अल्लाह बहुत जल्द आलमियत का निसाब मुकम्‍मल कर लूंगा, मेरा इरादा है कि आलमीनी दाई बनूं, इसके लिए एक घण्टे मैं ने अंग्रेजी अच्छी करने के लिए पढनी शुरू कर दी है, अल्हम्दु लिल्लह इस वक्फे में मेरे मदरसे में सब लोग खसूसन असातजा और जिम्मेदार मुझे बहुत चाहते हैं बल्कि मुझ से दुआ कराते हैं।
 
अहमदः माशा अल्लाह, अरमुगान के पाठकों के लिए कोई सन्देश दें?
मुज़म्मिलः बस हजरत की बात ही कहूंगा कि हर मुसलमान एक दाई है और हर दाई एक तबीब है, किसी मरीज से आखरी सांस तक मायूस होना या मर्ज के बुरा होने की वजस से मरीज को अपने दर से धुतकारना उसूले तिब के खिलाफ है, हर इन्सान अल्लाह की बनायी हुयी शाहकार मखलूक है इसको अहसन तक्वीम पर अल्लाह ने अपने हाथों से बनाया है, उस से मायूस नहीं होना चाहिए, बस उसके लिए दिल में दर्द रख कर उसके इस्लाह और उसे दावत देने की फिकर रखनी चाहिए, शायद मुझसे ज्यादा बुरा इन्सान तो अल्लाह की ज़मीन में कोई और हो? जब मैं अपने लिए इन्सान बनने का इरादा करके यहां तक आ सकता हूं तो किसी से भी मायूस होने की क्या वजह है, दूसरी दरखास्त पाठकों से दुआ की है, कि अल्लाह ताला मौत तक मुझे इस्तकामत अता फरमाये और मेरे हज़रत ने जो मुझ से अरमान बनाये हैं और हज़रत फरमाते भी हैं कि मेरी हसरत है कि मुज़म्मिल अल्लाह ताला तुम्हें प्यारे नबी के आंखों की ठण्डक बनाये, मेरी तमन्ना है कि अल्लाह ताला मुझे प्यारे नबी सल्लल्लाहू अलैहि वसल्लम की आंखों की ठण्डक बनायें।
 
अहमदः शुक्रिया भाई मुज़म्मिल! वाकई एक ज़माना था कि तुम्हारा नाम सुनकर हम सभी को गुस्सा आ जाता था, मगर अल्हमदू लिल्लाह अब तुम से मिलने की बेचैनी रहती है।
मुज़म्मिलः जी अहमद भाई! मैं इसी लायक़ था और हूं, बस मेरे अल्लाह का करम है कि उसने दिल का रूख मोड दिया है।
 
अहमदः शादी के बारे में तुम्हारा क्या इरादा है?
मुज़म्मिलः अब शादी मेरे लिए कोई बात नहीं रही, अल्हम्दू लिल्लाह मेरे अल्लाह ने मेरे दिल अपनी तरफ फेर दिया है, अब मुझे खिलवत में अपने रब के हुजूर राज़ और नियाज़ का मज़ा मेरे रब ने मुझ गन्दे को लगा दिया है, कुरआन यह कहता है ‘‘इन कुरआन अल्फजर कान मशहूदा’’ सुबह का कुरआन मजीद तो आमने सामने का है, बस ऐसे जमील महबूब से सामना होने लगे तो सारी हसीनायें अन्धेरा लगती हैं, अल्हम्दू लिल्लह मेरे अल्लाह के करम से नाला नीम शबी की बादशाहत मेरे अल्लाह ने मुझे अता फरमादी है, इसकी वजह से हर एक के सामने हाथ फैलाने से मेरे अल्लाह ने मुझे बचा लिया है।
 
अहमदः आजकल अखराजात वगैरा किस तरह चल रहे हैं?
मुज़म्मिलः अल्लाह के करम से नाला नीम शबी की बादशाहत ने दिल को मालदार कर दिया है, इसकी बरकत से हाथ फैलाने से अल्लाह ने बचा लिया है, अल्हम्दू लिल्लाह अब मुझे खर्च की ज़रूरत नहीं, मैं छुटटी में मज़दूरी कर लेता हूं, मैंने इम्तिहान की छुटटी में मज़दूरी की, और एक हज़ार रूपये हज़रत की खिदमत में हदिया किए, कब से हज़रत आपको लूटता रहा यह हकीर हदिया कबुल कर लिजिए, हजरत ने बहुत गले लगाया और बडी कद्र से कुबूल कर लिया, अब हाथ ऊपर कर लिया है और अल्लाह से सवाल किया है कि अल्लाह अब किसी के आगे हाथ न फैलवायें, मुझे उम्मीद है कि अल्लाह ताला अब किसी का मोहताज न करेंगे।
अहमदः अच्छा बहुत शुक्रिया। अस्सलामु अलैकुम
मुज़म्मिलः वालैकुमुस्सलाम व रहमतुल्लाही वबरकातुह
with thanks

मार्च 2011, उर्दू मासिक 'अरमुगान'

www.armughan.in

Thursday, February 24, 2011

मराठा अब्दुल्लाह पाटिल से एक दिलचस्प मुलाकात

अहमद अव्‍वाहः  अस्सलामु अलैकुम व रहमतुल्लाहि वबरकातुह
अब्दुल्लाह पाटिलः वलैकुमुस्सलाम व रहमतुल्लाहि वबरकातुह


अहमदः अब्दुल्लाह साहब आप आज ही जमात से वापस आये हैं, आपका वक्त कैसा लगा? 
अब्दुल्लाहः अल्लाह का शुक्र है वक्त तो बहुत अच्छा लगा, हमारे अमीर साहब बहुत अच्छे और नेक आदमी थे, कुछ साथी भी बहुत अच्छे थे, कुछ साथी मेरी तरह बिगडे हुए थे, उन्होंने अमीर साहब को बहुत परेशान किया, बार-बार भागते थे, साथियों से लडते थे, अमीर साहब बार-बार पांव पकड़-पकड़ कर जमात को टूटने से बचाते रहे, जब ज्यादा परेशान होते तो दो रकात नमाज पढकर अपने अल्लाह के सामने रोने लगते, फोरन मामला ठीक हो जाता, जमात में जाकर जो सबसे बडी चीज़ सीखने को मिली वह अमीर साहब से दाओ सीखने को मिला कि जो मसअला हो अपने अल्लाह से कहो।


अहमदः नमाज़ पूरी याद कर ली आपने और क्या-क्या सीखा?
अब्दुल्लाहः अल्हम्दु लिल्लाह नमाज तो याद हो गयी, जनाज़ा की नमाज और दुआए क़नूत कच्ची है, इसके अलावा छ-बातें, खाने-सोने के आदाब भी याद हो गये हैं, अल्लाह का शुक्र है हिन्दी की फज़ाइले आमाल से मैंने ताली भी की, अमीर साहब ने बहुत-सी दफा मुझ से ही किताब पढवायी।
अहमदः माशा अल्लाह अब आप तो जमात के अमीर बनकर जमात ले जा सकते हैं?


अब्दुल्लाहः जमात का अमीर बनकर जमात मैं तो किया ले जा सकता हूं अलबत्ता मैं जमात में जा सकता हूं।


अहमदः अभी आपको मुसलमान होकर दो माह हुए हैं फोरन जमात में जाकर अजनबी माहोल में आप को कैसा लगा?
अब्दुल्लाहः जमात में साथियों की लडाई से तो ज़रा मेरी तबियत घबरायी, बाकी नमाज़, रोज़ा और मामूलात में बिल्कुल अजनबी कोई बात नहीं लगी, हालांकि यह जिन्दगी का पहला रमज़ान है, मैंने कभी हिन्दू मज़हब में व्रत भी नहीं रखा।


अहमदः जमात में आपका वक्त कहां लगा?
अब्दुल्लाहः हमारा वक्त देहरादून में लगा, मैं ने हज़रत से फोन पर बात की, जाते वक्त में मिलने आया था मगर मुलाकात न हो सकी, फोन पर हज़रत ने एक नसीहत की कि अमीर का हुक्म मानना, इस से मुझे बहुत-बहुत फायदा हुआ बस एक बात जो मेरे लिये मुश्किल हुयी वह यह थी कि बहुत बार ऐसा होता कि हम गश्त में जाते, रास्तें में किसी गैर-ईमान वाले भाई का घर होता था तो जमात वाले उस घर को छोड देते थे, कई दफा तो ऐसा हुआ वह लोग तो खुद चाहते कि हमसे बात करें मगर जमात वालों ने ऐसी नही किया, मैं ने कई बार अमीर साहब से ज़ोर देकर कहा भी कि यह ईमान वाले तो बस नमाज रोज़ा आमाल से दूर हैं यह गैर-ईमान वाले तो बगैर ईमान के सख्त खतरे में हैं, जिन की जान का खतरा हो पहले उनको बचाना चाहिए वह कह देते कि हमारे बडों की इजाज़त नहीं है, मुझे यह बात अच्छी न लगती थी, मैं अमीर साहब से कहता था कि फजाईले आमाल में हम पढते हैं कि सब बडों के बडे हमारे नबी सल्लल्लाहू अलैहि वसल्लम सारे गैर ईमान वालो की पहले फिक्र करते थे, फिर भी मैं ने कोशिश की कि अमीर का हुक्म मानूं।


अहमदः आप महाराष्ट्र में किस शहर के रहने वाले हैं? और वहां पर किया करते थे घर वाले कौन-कौन घर पर हैं? ज़रा तफसील से बता देंं।
अब्दुल्लाहः हमारा खानदान परभुनी शहर में रहता है, मै। चालीस गांव के क़रीब एक कसबे में हार्डवेयर की दूकान कता हूं, हम लोग मराठा बिरादरी से ताल्लुक रखते हैं, पाटिल हम लोगों की गौत्रा है, मेरी तालीम बी.काम तक है, कालिज के ज़माने में शिव-सेना में शामिल हुआ, 2000 से चन्द सालों तक जिला की शिव-सेना का जिम्मेदार रहा, इस्लाम कबूल करने तक शिव-सेना का एक्टिव मेम्बर रहा हूं, मेरे वालिद भी तिजारत करते हैं, एक बडे भाई सरकारी अस्पताल में डॉक्टर है।, एक बहन है जिनकी शादी एक पढे-लिखे खानदान में हुई है, उनके शौहर लेक्चरार थे अब प्रमोशन होकर रीडर हो गये हैं।


अहमदः आप शिव-सेना के एक्टिव मेम्बर रहे हैं, आप तो इस्लाम और मुसलमानों से बहुत दूर रहे होंगे फिर आप कैसे मुसलमान हो गए?
अब्दुल्लाहः हमारे अमीर साहब ने बताया था कि अल्लाह के रसूल सल्लल्लाहू अलैहि वसल्लम ने फरमाया कि हर बच्चा मुसलमान पैदा होता है यानि बाई-नेचर वह मुसलमान होता है, उसके मां-बाप उसको हिन्दू, सिख-इसाई बताते हैं, सच्चे नबी ने जो बताया उसमें किया शक हो सकता है, इस लिए कोई इन्सान बाई-नेचर इस्लाम से दूर नहीं हो सकता, जाहिरी हालात की वजह से जो दूरी होती है वह आरजी आर्टीफीशियल(मसनूयी) होती है, यह बात भी ठीक है कि आदमी जो सुनता है और देखता है उससे मुतासिर होता है, मैं इस्लाम और मुसलमानों के बारे में जो सुनता था और शिव-सेना के माहोल में जो जे़हन बनाया जाता था उसकी वजह से मेरे दिल और दिमाग में यह बात थी कि यह मुसलमान हमारे और हमारे देश के लिए खतरा हैं, इसकी वजह से इस्लाम और मुसलमानों के लिए मेरे दिल में नफरत और दूरी थी, मगर जब इस्लाम की किरण मेरे दिल पर पडी तो ज़ाहिरी और मसनूई अन्धेरी दूर हो गये और मेरे अल्लाह ने मेरे दि की दुनिया को जगमगा दिया।


अहमदः वह किस तरह हुआ, ज़रा तफसील बताना?
अब्दुल्लाहः मैं एक ऐसे इलाके में रहता था जहां हमारे मकान के पीछे एक मुस्लिम आबादी शुरू होती थी, मेरे मकान के पीछे की दीवार एक मुसलमान जनाब खालिद महमूद साहब से मिलती थी, जो तबलीगी जमात के सरगर्म कारकुन थे, उनका बेकरी प्रोडक्टस सप्लाई का काम था, और चूंकि मेरा शिव-सेना का जिम्मेदार होना सब को मालूम था, कभी मेरा उनका मिलना नहीं के बराबर होता था, एक दो बार हमारे घर में पीछे की दीवार से पानी आया तो मैंने छत पर चढ कर उनको गालियां भी बकीं, बस इसके अलावा हमारा उनका कोई राबता नहीं था, उनको बडे बेटे की शादी करनी थी तो उन्होंने मकान के ऊपर एक मकान बनाने का प्रोग्राम बनाया, नगरपालिका से नक्श मन्जूर कराके तामीर का मटेरियल भी मंगवा लिया, इत्तफाक से उनके बहनोई (जोकि करीम नगर आन्धरा में रहते थे) की तबियत खराब हो गयी और उनका आप्रेशन हुआ वह उनको देखने के लिए करीम नगर गये, वहंा पर आपके वालिद मौलाना कलीम साहब का प्रोग्राम था, मौलाना को खालिद महमूद साहब पहले से जानते थे और उनसे मिलना चाहते थे, मोका गनीमत समझ कर प्रोग्राम में शिरकत की, मौलाना साहब ने दावत पर बयान किया और लोगों को झिन्झोडा कि हम लोग रस्मी मुसलमान हैं रिवाज में जो चीजें हैं उन्हें हम मानते हैं, जो चीजें रिवाज में नहीं उनको नहीं मानते, इस पर कुछ मिसालें दी जिन में एक यह थी कि मौलाना ने कहाः ‘‘पडोसी के हकूक में एक हक़ यह है कि तू अपनी दीवार उसकी दीवार से बगैर उसकी इजाज़त के ऊंची न कर, यह फरमान रसूल सल्लल्लाहू अलैहि वसल्लम, क्या अमल के लिए नहीं? अगर है तो इतने दीनदारों में कोई बताये कि मैं ने इस पर अमल किया है, नगरपालिकाओं और सरकारी इदारों से रिश्वतें देकर नक्शा पास कराते हैं, इस्लाम का हुक्म यह है कि पहले पडोसी से नक्श पास कराया जाए, उसकी इजाज़त और मन्जूरी के बगैर घर की दीवार में ईन्ट न लगायी जाए, पडोसी की हवा रूकेगी, रोशनी रूकेगी, उसके घर की बे-पर्दगी होगी’’ ..... तकरीर बडी अजीब थी, खालिद साहब घर आए तो बराबर वाले पडोसियों से मिले उनको नक्शा दिखलाया और बताया कि मौलाना साहब ने बताया है कि आपकी मन्जूरी के बगैर मुझे घर बनवाने की इजाज़त नहीं, उन लोगों ने कहा आपका घर है हमं किया एतराज हो सकता है? उनमें से एक साहब ने जो मोटर साईकिल एजेन्सी चलाते हैं, ने यह भी कहा हमने तो आपसे कहा था कि आप हमारा मकान भी खरीद लें, जब आप अपना मकान नहीं फरोखत कर सकते तो आप हमारा खरीद लें ताकि जरा बडा मकान बना सकें, अगले रोज वह नक्श लेकर हमारे घर आए, मुझे अचानक जिन्दगी में पहली बार उनको घर पर देख कर हैरत हुयी, उन्होंने माजरत की, असल में हम अपने को मुसलमान कहते हैं मगर इस्लाम क्या है उसको हमने न जाना न माना, मैं एक जलसा में गया था मौलाना साहब ने पडोसी के हकूक बताये और खास-तौर पर यह बात भी कही कि पडोसी की इजाज़त और मन्जूरी के बगैर मकान बनाना जायज़ नहीं, चाहे पडोसी शिव-सेना का मेम्बर हो या वह हो जिस से आप की दुश्मनी चल रही है, मेरे बेटे की शादी का प्रोग्राम है ऊपर एक मन्जिल बनाना चाहता हूं अगर आप इजाज़त दे तो बनवाऊँ वर्ना नहीं।
मुझे खयाल आया कि ऐसे में यह फारमल्टि पूरी करने आए हैं मगर जेहन में भूंचाल आगया, इस्लाम में पडोसियों के लिए ययह कानून है, मैं यह देखने के लिए कि सिर्फ कहने आए हैं या मानेंगे भी, कहा कि भाई साहब देखिए, आप दूसरी मन्जिल बनायेंगे तो मुझे तो तकलीफ होगी, मै। आपको मकान बनाने की इजाज़त नहीं दे सकता, वह बोले सोच लिजिए दो-तीन रोज मशवरा कर लिजिए, अगर वाकई आपको तकलीफ है तो फिर मैं कोई दूसरा मकान देख लूंगा, तीर रोज के बाद उन्होंने अपने लडके को भेजा मैंने वही जवाब उनको भी दे दियाः ‘‘मुझे तकलीफ होगी इजाज़त नहीं है’’ और मकसद सिर्फ यह था कि क्या वाकई ऐसा करेंगे या फिर बगैर इजाज़त बना लेंगे, मगर उन्होंने जो मटेरियल ईन्टें वगैरा आयी थी वापस करवा दीं।
अल्लाह की मानने वाला हमेशा कैसी खेर में रहता है, वहां पर कुछ अच्छे पढे लिखे मुसलमानों ने एक साफ सुथरी कालोनी बनायी है उसमें एक बडे एक्सपोर्टर रहते थे, उन्होंने तीन सौ गज़ में बडी अच्छी दो मन्ज़िला कोठी बनायी थी मगर किसी हादसे की वजह से उनको अपने बच्चों के पास कनाडा में जाना पड रहा था और हिन्दुस्तान से अपना कारोबार बंद करके चला जाना था, उन्होंने अपने एक दोस्त से जो तबलीग़ी जमात से ताल्लुक रखते थे कहा कि ‘‘मैं ने बडे शौक़ से मकान बनाया है मकान कोई दीनदार मुसलमान खरीद ले तो मुझे इसे छोड कर जाने में दुख नहीं होगा, वह साहब खालिद साहब के दोस्त थे और उनको खालिद साहब का मसअला मालूम था कि वह मकान बनाना चाह रहे हैं और उनके पडोसी उनका मकान खरीदना चाहते हैं, उन्होंने खालिद महमूद साहब से बात की, खालिद महमूद साहब ने अपने पडोसी हाजी अबदुर्रहमान से बात की कि आप हमारा मकार खरीदना चाहे तो हमें एक हफते में रकम चाहिए, वह बहुत खुश हुए, ग्यारह लाख रूपये तीसरे रोज देने का वादा किया, ग्यारह लाख का मकान बेच कर बारा लाख में उन्होंने वह कोठी जिसकी तामीर पर पांच साल पहले पच्चिस लाख रूपये खर्च हुए थे खालिद साहब ने खरीद ली, मैं ने सामान निकालते देखा तो सक्ते में आगया, मैं ने खालिद साहब से कहा मैं तो इम्तहान के लिए मना किया था कि वाकई आप करेंगे भी या सिर्फ कह रहे हैं? मैं ने कहा हर्गिज़ हर्गिज़ मैं आपको जाने नहीं दूंगा, उन्होंने कहा अब मामला तै हो गया है, बै-नामे वगैरा सब हो गये हैं, मुझे बहुत सदमा हुआ, ऐसा अन्दाज़ा नहीं था कि इतनी जल्दी फैसला हो जायेगा, घर बहुत रोना आया, मेरी बीवी ने मुझे रोता देख कर वजह मालूम की तो मैं ने फोरन वजह बतायी, वह बोली कि क्या बता है, सूरज पच्छम में निकल रहा है, मुला जी के जुदा होने पर आप रो रहे हैं।
खालिद साहब ने मुझ से कहा, मकान की दीवार के दूर हाने से क्या होता है? क्या अजब है कि अल्लाह ताला दिल की दीवारों को मिला दें, मैं ने कहा कि मेरे दिल की दीवार तो आपके दिल की दीवार से चिपक कर रह गयी,  मुझे वह मौलाना साहब की तकरीर ज़रूर सुनाईये अगर आडियो हो, इतनी दूर आप तकरीर सुनने गये तो तकरीर तो टेप हुई होगी, मैं दूसरे-तीसरे रोज़ उनकी दुकान पर जाता था उनसे मिलने की चाहत भी होती और तकरीर की आडियो लेने के लिए भी, उन्होंने किसी तरह सी.डी. मुझे दी, उस सी.डी. में मौलाना साहब की पांच तकरीरें थीं, करीम नगर की तकरीर तो नहीं थी मगर महाराष्ट्र की एक तकरीर में पडोसी के हकूक की वह बात मौलाना साहब ने कही थी, तकरीरों में ‘‘आपकी अमानत आपकी सेवा में’’ गैर-मुस्लिम भाईयों को देने की बात कही थी और सब मुसलमानों को गैर ईमान वाले भाईयों को अपना समझने की बात कही गयी थी, मैंने खालिद साहब से किसी तरह ‘‘आपकी अमानत आपकी सेवा में’’ मंगवाने या उसका पता मालूम करने के लिए कहा, जहां वह किताब मिल सकती हो, वाकई बात सच्ची हुयी कि मकान की दीवारें एक किलोमीटर दूर होने से दिल की दीवारें मिल गयीं, मकान के पीछे मकान में वह मेरे घर एक बार पहली बार इजाज़त लेने के लिए आये, और मैं दो बार उनकी छत पर गालियां देने के लिए गया, मगर अब पहले, दूसरे और तीसरे रोज़ बाद मैं रोज़ाना एक दूसरे के यहां आने-जाने लगे, कई बार उनके घर में खाना खाया और उन्होंने भी मेरे घर चाए पी, अकोला से किसी जमात के साथी के वास्ते से उन्होंने ‘आपकी अमानत आपकी सेवा में’ किताब मंगा कर मुझे दी, इस किताब को पढ कर मुझे मौलाना साहब से मिलने की चाहत हुइ, कई फोन राब्ता करने के लिए किए, मगर बात न हो सकी, खालिद साहब ने ‘‘मरने के बाद क्या होगा?’’, ‘‘इस्लाम क्या है?’’ किताबें मंगा कर दीं और कुरआन का हिन्दी अनुवाद भी मुझे लाकर दिया, मैं ने इन सब चीज़ों को पढा, अल्लाह का करम हुआ एक रोज़ दिन में मौलाना साहब से फोन पर बात होगयी, मौलाना ने फोन पर कलमा पढने को कहा, मैंने मिलकर कलमा पढने पर ज़ोर दिया तो मौलाना ने दो-तीन लोगों के बारे में बताया कि फोन पर कलमा पढा और उसी रोज इन्तक़ाल होगया इस लिए मौत का क्या यकीं कि कब आजाए इस लिए आप भी फोन पर मुझसे या खालिद साहब से कलमा पढ़ लें मैं ने फोन पर कमा पढा, मौलाना साहब ने मेरा अब्दुल्लाह रख दिया। 


अहमदः घर वालों से आपने बता दिया? 
अब्दुल्लाहः असल में खालिद साहब के इस मामले से मेरे दोनों बेटे और मेरी बीवी हद दर्जे मुतासिर हुए, हमारे घर में हर वक्त खालिद साहब का ज़िक्र होता और मुलाकात में जो भी बात होती मैं घर आकर घर वालों से बताता था, इस लिए अल्लाह का शुक्र  है घर वाले मेरे साथ रहे और मेरे कलमा पढने से पहले मेरी बीवी खुद कह रही थीं कि हम लोगों को मुसलमान हो जाना चाहिए, मै। ने जाकर बताया तो दोनों बेटे और बीवी तैयार थी ही, खालिद साहब को बुला कर मैं ने कलमा पढवाया, बेटों के नाम अब्दुर्रहमान और अब्दुर्रहीम रखे और अहलिया का नाम आमना, खालिद साहब ही ने रखा।


अहमदः क्या आप के मौहल्ले वालों को भी इल्म हो गया?
अब्दुल्लाहः मेरी पार्टी के साथियों को मालूम हुआ तो बडी मुश्किल हुई, उन्होंने मुझ पर बहुत दबाओ डाला, मेरी बीवी ने उस घर को छोड किसी मुस्लिम इलाके में घर बदलने का मशवरा दिया, मेरे अल्लाह का करम है मुझे बडी आसानी हुई, खालिद साहब के पडोस में एक घर छोड कर एक मकान था, जिसे एक साहब ने जो सऊदी अरब में रहते थे, बनाया था, बाद में उन्होंने मुम्बई में मकान ले लिया, इस लिए वह इस मकान को बेचन चाहते थे, खालिद साहब ने इस मकान मालिक से राबता किया और मामला तै हो गया, मेरा मकान एक प्रापर्टी डीलर ने खरीद लिया, मैं ने खालिद साहब से कहा आपने तो मेरे पडोस से जान बचाने ही की कोशिश की अल्लाह ने आपका पडोस मेरे मुकश्द्दर में लिखा है, अल्लाह का शुक्र है अब हम फिर पडोसी हैं मगर अब दिलों की दीवारों के भी पडोसी हैं।


अहमदः वाकई खूब बात आपने कही, अबी(मौलाना कीलम सिद्दीकी) से आपकी पहली मुलाकात कब हुई?
अब्दुल्लाहः फोन पर तो बार-बार जमात से भी बात होती रही, मगर मुलाक़ात आज ही हुई, मैं जमात से 10 अगस्त को वापस आया मालूम हुआ, मौलाना 27 अगस्त को आयेंगे, तो हमने फिर एक हफता जमात में लगाने की सोची, देहली की एक जमात के साथ जुड गया, अल्हम्दु लिल्लाह आज हज़रत से मुलाकात हो गयी।


अहमदः आईन्दा के लिए कुछ बात हुयी?
अब्दुल्लाहः अल्हमदु लिल्लाह हज़रत ने अपनी पार्टी के वर्करों के लिए दुआ करने और उन पर काम करने को कहा और खान्दान वालों पर भी, मुझे खुद भी बार-बार उनका खयाल आता था, जब जमात में मुझे गैर-मुस्लिम भाई मिलते थे तो खयाल हाता था कि मैं भी एक जमात बनाऊँ। काश मुझे भी अल्लाह ताला मौलाना इलयास साहब वाला दर्द देदे, तो मैं भी एक जमात बनाऊँ जो गैर-ईमान वाले भाईयों में काम करे, मैं ने जमात में बहुत दुआ भी की, मेरे अल्लाह मुझे कम अज़ कम हज़रत मौलाना इलयास साहब बना दे, कुफ्र और शिर्क में फंसे हमारे नबी के इन उम्मतियों की कौन फिक्र करेगा?


अहमदः अल्लाह का शुक्र है अब लोग फिक्र करने लगे हैं और अल्लाह ताला आप जैसे कितने लोगों को खडा कर रहे हैं, आपको इल्म है कि यह बातें जो मैं ने आपसे की हैं उर्दू मेग्ज़ीन ‘अरमुगान’ के लिए की हैं, आप अरमुगान पढने वाले लोगों के लिए कोई पैगाम दीजिए?
अब्दुल्लाहः मेरे दिल में यह बात आयी है और कयी रातों तक मैं जमात में भी सारी रात सोचता रहा और मेरी नींद उडी रही कि पूरी दुनिया के इन्सान हमारे रब के बन्दे और हमारे नबी के उम्मती हैं और हमारे खूरी रिश्ते के भाई हैं, यह बात मैं ने मौलाना कलीम साहब की तकरीर में सुनी और अमीर साहब भी यही कह रहे थे, इस दुनिया के सारे लोगों में ढेड अरब मुसलमान हैं जो अल्हम्दु लिल्लाह मुसलमान हैं, यह सब तो हमेशा की दोज़ख से बचे हुए हैं, साढे चार अरब गैर अरब गैर ईमान वाले उम्मती हैं, डेढ अरब लोगों में काम करने वाले तो करोडों हैं, साढे चार अरब जो इन से लाखों गुना खतरे में हैं उनको बचाने वाले सैकडों भी नहीं हैं, हालांकि उनकी तादाद तीन गुनी है और यह लोग लाखों गुना खतरे में हैं, इसके लिए फिक्र करने वाले करोडों में होने चाहिएं, इसके लिए एक जमात ज़रूर बनायी जाए।


अहमदः अबी(मौलाना कीलम सिद्दीकी) तो कहते हैं यह करोडों जमात वाले, इन लोगों को दोज़ख से बचाने के लिए ही तैयार हो रहे हैं, इन्शा अल्लाह बहुत जल्द यह सारी इन्सानियत की फिक्र को ओढ़ लेंगे।
अब्दुल्लाहः खुदा करे ऐसा हो, खुदा करे ऐसा हो।


अहमदः बहुत-बहुत शुक्रिया अब्दुल्लाह मियां, इजाज़त दें, हमें फुलत जाना है, मैं भी अबी(मौलाना कीलम सिद्दीकी) के साथ सफर पर था। अस्सलामु अलैकुम
अब्दुल्लाहः जी मुझे मालूम हुआ है कि हज़रत पूरी फेमली के साथ तशरीफ ले गये थे, वालैकुम सलाम।
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साभारः
अक्‍तूबर 2010, उर्दू मासिक 'अरमुगान' फुलत
www.armughan.in 

Saturday, February 5, 2011

जावेद अहमद (जोगेन्‍द्र आशीष पाटिल) से एक दिलचस्प मुलाकात interview

अहमद अव्वाह: अस्सलामु अलैकुम व रहमतुल्लाहि वबरकातुहू
जावेद अहमदः वालैकुमुस्सलाम व रहमतुल्लाहि वबरकातुहू


अहमदः जावेद साहब आप बंगलौर से कब तशरीफ़ लाये थे?
जावेदः मैं पिछले हफ्ते आया था, असल में, मैं वसीम भाई से बहुत ज़माने से कह रहा था कि हजरत से मुलाकात करा दो, मगर उनको छुट्टी नहीं मिल रही थी, इत्तिफाक़ से कम्पनी की तरफ से दिल्ली एक काम के लिए सफर का प्रोग्राम बनाया, मैं ने खदीजा से कहा कि चलो दोनों चलते हैं। हज़रत से मुलाकात हो जायेगी, वह बहुत खुश हुयी, अल्लाह का शुक्र है हज़रत से मुलाकात हो गयी।


अहमदः आपका वतन बंगलोर है?
जावेदः नहीं, हम लोग महाराष्ट्र में पूना के क़रीब के रहने वाले हैं, मेरी पत्नि खदीजा नागपुर के करीब एक शहर से ताल्लुक रखती हैं, अब उनके वालिद बंगलौर में रहने लगे हैं, वह बी.जे.पी. के असिस्टेंट सेक्रेट्री हैं और वह बडे एक्टिव लीडर हैं, उन्होंने नागपुर को, सिर्फ कर्नाटक में पार्टी का काम करने के लिए छोडा है, और उनके कर्नाटक आने से पार्टी को बडा फायदा हुआ, और अगर मैं कहूं कि कर्नाटक में मौजूदा फ़िरक़ेवाराना माहौल बनाने में ख़दीजा के वालिद का असल रोल है तो गलत न होगा।


अहमदः आपके वालिद किया करते हैं?
जावेदः मेरे वालिद साहब एक स्कूल के प्रिन्सपल हैं, पूना में, मैंने अपनी तालीम मुकम्मल की, वहीं से ग्रेजवेशन, फिर बी.टेक और एम.टेक किया, बंगलौर मैं विप्रो एक साफ्टवेयर की मशहूर कम्पनी है, इसी में मुझे मुलाज़मत मिल गयी है, उसी में काम करता हूं, अल्लाह का शुक्र है बहुत फरावानी का रोज़गार अल्लाह ने मुझे दे रखा है।
अहमदः आपकी पत्नि भी मुलाज़मत करती हैं ?
जावेदः करती थीं, अलहम्दु लिल्लाह मुसलमान होने के बाद मैंने उनसे मुलाज़मत छुडवा दी है।


अहमदः उनकी तालीम कहां तक है?
जावेदः वह भी एम.टेक हैं, बल्कि वह बी.टेक और एम.टेक में गोल्ड मेडलिस्ट हैं, वह एक बहुत मशहूर अमरीकी कम्पनी में काम कर रही थीं, उनको दो साल पहले, जब मुलाज़मत छोडी है एक लाख अठारह हज़ार रूपए तन्खाह मिलती थी।


अहमदः इतनी बडी तन्खाह छोडने पर राज़ी हो गयीं?
जावेदः जिस बडी चीज़ के लिए मुलाज़मत छोडी है, यह तन्खाह उसके पासंग में भी नहीं आयेगी, उन्होंने यह मुलाज़मत अपने रब अहकमुल हाकिमीन का हुक्म मानने के लिए छोडी है, अब आप बताईये कि अल्लाह के हुक्म के आगे यह एक लाख रूपए महीना की तन्खाह क्या हैसियत रखती है? और सच्ची बात यह है (रोते हुए) हम गंदे तो एक पैसा छोडने वाले नहीं थे, मेरे करीम रब को हम पर तरस आया कि उन्होंने हमें ईमान अता फरमाया और इस ईमान के लिए इस तन्खाह को छोडने की तौफीक भी दी।


अहमदः माशा अल्लाह बहुत मुबारक हो जावेद साहब, अल्लाह ताला हमें भी इस ईमान का कुछ हिस्सा अता फरमाए?
जावेदः आप कैसी बात कर रहे हैं, हम आपके सामने किस लायक हैं, मौलाना अहमद आपके पास तो ईमान का खजाना है, आप तो ईमान के सिलसिले में पुश्तैनी रईस हैं, और हम तो अभी सडकछाप रिटेल्रर(दुकानदार) हैं।


अहमदः असल में आपका ईमान खुद का कमाया हुआ है, और हम लोगों को वर्से में मिल गया है?
जावेदः हमारा भी खुद का कमाया हुआ कहां है, सिर्फ और सिर्फ हमारे अल्लाह की करमफरमायी कि हम निकम्मों को भीक में दे दिया है, अल्बत्ता हमें अभी-अभी मिला है। नयी-नयी नेमत मिलती है तो ज़रा कद्र तो होती है, शौक़ सा रहता है, नयी-नयी गाडी मिल जाए, नया घर मिल जाए तो ज़रा शौक सा तो रहता है, बस हमारा हाल यही है।


अहमदः आपको इस्लाम से कैसे दिलचस्पी हुई?
जावेदः यह एक दिलचस्प कहानी है।


अहमदः ज़रा तफसील इसकी मालूम करना चाहता हूं?
जावेदः 2006 में, मैं बंगलोर आया तो शान्ति नगर के पास एक होस्टिल में रहने लगा, हमारे करीब में मेरी अहलिया खदीजा का घर था, इत्तिफाक से दोनों का आफिस एक ही इलाके में था, हम लोग तकरीबन रोज एक बस से जाते थे। चन्द दिनों में हम लोगों में ताल्लुकात हुए, मैंने अपने घर जाकर खदीजा से (जिस का नाम उस वक्त अंजली था) शादी करने की खाहिश का इजहार किया, हमारे घर वाले, बंगलोर आए और उन्होंने इस लडकी को बहुत पसंद किया और मंगनी का सवाल डाल दिया, मैं भी चूंकि सूरत, शक्ल, खानदान और रोज़गार के लिहाज़ से ठीक-ठाक थ तो अंजली के घर वाले खुशी से तैयार हो गए, मंगनी हुई और फिर 12 जनवरी 2007 को हमारी शादी हो गयी, शादी में अंजली के वालिद ने एक अच्छा सा फलैट अपने घर के करीब दहेज में दिया, शादी उन्होंने आर.एस.एस. का संचालक होने की वजह से बहुत सादगी से की।


अहमदः अच्छा आर.एस.एस. के संचालक सादगी से शादी करते हैं?
जावेदः जी आपको मालूम नहीं, उनके यहां दहेज वगेरा देने की भी पाबन्दी है, यह फलैट भी उन्होंने बहुत छुप कर दिया है, लोगों को मालूम नहीं।


अहमदः हां तो आगे बताईए?
जावेदः मैं होस्टिल छोड कर अपनी अहलिया के साथ उनके फलैट में रहने लगा, मेरे साथ मेरी कम्पनी में जम्मू-कश्मीर के एक साहब वसीम नाम के मुलाज़मत करते हैं, सूरत से खूबसूरत मुसलमान, पूरी दाढी के साथ मुलाज़मत करते हैं, आफिस में पाबन्दी से जोहर, असर की नमाज़ अदा करते हैं, हम लोग उनको देख कर शुरू-शुरू में कशमीरी आतंकवादी समझते थे, मगर जैसे-जैसे दिन गुजरते गए पूरे दफ्तर में उनकी पहचान एक बहुत शरीफ और मोहतरम इन्सान की तरह हो गयी, शायद हमारे पूरे दफ्तर में लोग उनसे ज्यादा किसी का अहतराम करते हों, उनके अफसर भी उनको हुजूर व जनाब से बात करते हैं और यह सिर्फ उनकी दीनदारी की वजह से है, उनकी एक बहन जो उनके साथ बंगलोर में रहती हैं, फिज़ियोथरापिस्ट हैं, एक नर्सिंग होम में काम करती हैं, वह भी बुर्के और नक़ाब के साथ वहां जाती हैं और एक मुस्लिम नर्सिंग होम में सिर्फ औरतों को वर्जिश कराती हैं, यह दोनों भाई बहन आपके वालिद साहब से दिल्ली में बेअत हुए थे और मासिक ‘अरमुगान‘ पाबन्दी से पढते रहे हैं, दोनों दावत की धुन में लगे रहते हैं, वसीम साहब मौका पाते ही शुरू हो जाते हैं, दफ्तर के बहुत से लोगों को उन्होंने किताबें और कुरआन मजीद सलाम सेन्टर से लाकर दिए हैं, मेरे दफ्तर में मुझ से पहले दो लोग उनकी कोशिश से मुसलमान हो चुके थे, एक इतवार को उन्होंने मुझे अपने घर लंच पर आने की दावत दी और घर बुलाकर बहुत दर्द के साथ इस्लाम कबूल करने को कहा, मैंने कहा कि मैं इस्लाम को पसंद करता हूं और इस्लाम की तरफ से मेरा जहन बिल्कुल साफ हो गया है और मैं समझता हूं कि इस्लाम ही सच्चा मज़हब है, हिन्दू मज़हब खुद उलझी हुयी भूल-भुलैया है जिस में अक्ल के लिए कुछ भी नहीं, मगर मेरा खानदान खसूसन मेरी ससुराल जिसके साथ में रह रहा हूं, वह आर. एस. एस. और बी. जे. पी. का सरकर्दा खानदान है, मेरे लिए मुसलमान होना किस तरह मुमकिन है? वह रोने लगे और बोले आशीष भाई! मौत के बाद अगर खुदा न करे, ईमान के बगेर मौत आ गयी तो सिर्फ आपके सास-ससुर नहीं, सारी दुनिया के नेता मिल कर आपको दोज़ख से बचाना चाहेंगे तो बचा नहीं सकते, इस लिए आप अल्लाह के लिए सच्चे दिल से कलमा पढो और मुसलमान हो जाओ, आप किसी को मत बताना, मैं ने कहा ‘मुझे नमाज पढनी पडेगी, इस्लाम को फालो करना पडेगा, वर्ना मुसलमान होने का क्या फायदा होगा? वसीम साहब ने कहा कि छुप कर जैसा मौका मिले, आप नमाज वगैरा पढ लिया करना, अगर आप जिन्दगी भर एक नमाज भी न पढ सके, लेकिन सच्चे दिल से कलिमा पढ कर अन्दर से ईमान ले आये तो हमेशा की दोज़ख से तो बच जाऐंगे। वह बहुत दर्द से मुझे समझाते रहे, उनकी दर्दमन्दी ने मुझे मजबूर किया और मैं ने कलिमा पढ लिया, वसीम साहब ने कहा ‘दुनिया के लिए नहीं तो आखिरत के लिए आप अपना इस्लामी नाम रख लो’ मैंने कहा आप ही रख दो, वसीम ने जोगेन्द्र आशीष पाटिल के लिहाज से जावेद अहमद पाटिल रख दिया, फुरसत और लंच में वह मुझे नमाज वगैरा सिखाने लगे, अल्हम्दु लिल्लाह रफ्ता-रफ्ता इस्लाम मेरी पहली पसंद बन गया और अल्लाह का शुक्र है में बहुत जल्द पंज-वक्ता नमाजी बन गया।


अहमदः घर में आपने इत्तिला कर दी?
जावेदः नहीं-नहीं बिल्कुल नहीं! छुप-छुप कर नमाज पढता, कपडे बदलने के लिए बेडरूम का दरवाजा बंद करता और चुपके से नमाज पढ लेता, घर से बाहर दोस्तों के साथ जाने का बहाना बना कर दूर मस्जिद चला जाता, और रमजान आया तो मुझे रोज़ा रखना था, पैशाब के बहाने उठता, किचन जाता और कुछ दूध वगैरा सहरी में पी लेता, आफिस से लेट लौटता रास्ते में इफ्तार कर लेता, वसीम मुझे अंजली पर काम करने को कहते मगर मैं हिम्मत नहीं कर पाता कि उसने अपने घर बता दिया तो लोग मुझे जिन्दा न छोडेंगे। ‘‘आपकी अमानत- आपकी सेवा में’’ हज़रत की किताब घर ले कर गया और बेड पर डाल दी, मैं नहा कर आया तो देखा अंजली पढ रही है, मुझे देख कर बोली यह तो किसी मुसलमान मोलवी की लिखी हुयी किताब है, इसे आप क्यूं पढ रहे हैं? मैं ने टलाया कि एक दोस्त ने ज़बरदस्ती देदी थी, तुम ने देखी कैसी जादू-भरी किताब है? अंजली ने कहा नहीं-नहीं, मुझे भी यह किताब हमारे आफिस में एक लडकी ने दी है, वह पहले क्रिस्चिन(इसाई) थी, अब मुसलमान हो गयी है, मैं ने तो वापस कर दी, मौलाना अहमद साहब किस कद्र मुजाहिदे के साथ मैं ने रोजे रखे, बयान करना मुश्किल है, अब ईद आयी किसी तरह ईद की नमाज तो फरीज़र टाउन जाकर अदा कर आया, मगर घर आकर कमरा बंद करके बहुत रोया, मेरे अल्लाह मेरी ईद कब आयेगी, सब मुसलमान तो ईद मना रहे हैं और मैं तो कह भी नहीं सकता कि आज ईद है, दोपहर के बाद मैंने कमरा खोला और अंजली को तलाश किया तो वह दूसरे कमरे में दरवाजा बंद किए हुए थी। मैंने नोक किया, कुछ देर के बाद उसने दरवाजा खोला, देखा तो आंखें सूज रही हैं, मैंने कहा तुम क्यूं रो रही थी? बोली कोई बात नहीं, आज न जाने दिल पर कुछ बोझ सा है बस अन्दर से रोना आ रहा है, दिल को हल्का करने के लिए दिल में आया कि कमरा बन्द करके रो लूं, आप परेशान न हों कोई बात नहीं है, मैं ने कहा चलो डाक्टर को दिखा दूं, वह बोली मैं अन्दर कमरे में अपने डाक्टर को दिखाने गयी थी, मैं ने कहा तुम्हारा दिमाग तो ठीक है? अन्दर कमरे में डाक्टर कहां से आया? उसने कहा हां-हां, मेरा डाक्टर इस कमरे में था, मेरा दिल मेरा डाक्टर है, मैं अपने डाक्टर के सामने अपनी बीमारी रोने गयी थी, मैं परेशान हो गया, बहुत सोचता रहा और फिर हम दोनों ने बोझ हल्का करने के लिए पार्क में जाने का प्रोग्राम बनाया।
एक साल और इसी तरह गुजर गया, रमजान आया, मैं इतवार को किसी बहाने घर से बाहर चला जाता, अंजली मुझ से मालूम करती कि दोपहर को खाना घर पर ही खायेंगे न? मैं कहता कि तुम मेरे लिए मत बनाना, मैं तो दोस्त के साथ खाउंगा, रोजा इफतार करके घर आता, मालूम करता दोपहर किया खाना बनाया था, तो वह कहती बस अकेले के लिए मैं किया बनाती, बस चाए वगैरा पी ली थी, मैं सोचता यह बेचारी मेरी वजह से खाने से रह गयी, ईद आयी तो हम दोनों का एक ही हाल कि मैं अलग कमरे में कमरा बंद करके अपने रब से अपनी ईद न होने की फरियाद करता, वह भी पहले साल की तरह दूसरे कमरे में से रोती हुयी आंखों से निकली, अब मुझे उसकी तरफ से फिक्र होने लगी, इसको कोई दिमागी बीमारी तो नहीं हो गयी है, वह कभी भी कमरा बंद कर लेती, ईद के दो महीने बाद एक रोज वह इतवार को दोपहर के तीन बजे कमरे में गयी और अन्दर से कमरा बन्द कर लिया, अब मुझे बेचैनी हो गयी। इत्तिफाक से खिडकी हल्की-सी खुली रह गयी थी, मैं ने दरीचे से देखा तो वह कमरे में नमाज पढ रही थी, नमाज के बाद वह बडी मिन्न्त के साथ देर तक दुआ मांगती रही, उसके बाद उसने कुरआन मजीद अपने पर्स से निकाल कर उसको चूमा, आंखों से लगाया और तिलावत की, मेरी खुशी बस देखने लायक थी, हिम्मत करके मैं ने अपने हाल को छुपाया। तकरीबन एक घंटे के बाद वह कमरे से निकली तो मैंने अपने हाल पर काबू पाकर उससे पूछा कि अंजली तुम अपना हाल मुझसे छुपा रही हो, सच बताओ किया परेशानी है? मुझे तो ऐसा लगता है कि तुम ने किसी से दिल लगा लिया है, उसने कहा कि दिल तो आपको दे दिया था, अब मेरे पास है कहां कि दिल लगाउं? और वह बेहाल होकर फिर फूट-फूट कर रोने लगी, मैं ने बहुत ज़ोर दिया कि तुम मुझसे छुपाओगी तो किस से दिल का हाल बताओगी? मैं ने कहा कि अगर आज तुम ने मुझे अपनी परेशानी न बतायी तो जाकर कहीं खुदकशी कर लूंगा, अंजली ने कहा मुझे जो परेशानी है अगर मैंने तुम्हें बता दी तो तुम मुझे अपने घर से निकाल दोगे, मैंने कहा ‘यह घर तुम्हारा है मैं कहां तुम को अपने घर से निकालूंगा?’ वह बोली मुझे एक ऐसी बीमारी लग गयी है, जो लाइलाज है और अगर वह बीमारी मैं आपको बता दूंगी तो आप एक मिनट में मुझे छोड दोगे, मुझे ऐसी बीमारी लगी है जिसे आज के जमाने में बहुत गंदा समझा जाता है, मैंने कहा कि मुझे बताओ तो, मैंने तुम्हारे साथ जीने मरने के लिए तुम से शादी की है, उसने कहा कितने लोग हैं जो जीने मरने को कहते हैं, अगर मैं ने वह बीमारी जो मुझे लग गयी है आपको बता दी तो आप इस बीमारी को इस कद्र गुनाह समझते हैं कि मुझे छोड देगे, मैं ने कहा अंजली कैसी बात करती हो? मैं तुम्हें छोड दूंगा? क्या इतने दिन में कभी तुम्हें मुझसे बेवफाई का शक भी हुआ है, तुम्हें अन्दाजा नहीं कि मैं तुम्हें किस कद्र चाहता हूं, अंजली ने कहा अभी तक वाकई तुम मुझे चाहते हो मगर इस बीमारी का पता लगते ही आपका सारा प्यार खत्म हो जाएगा, मैं ने कहा नहीं, अंजली ऐसा न कहो, तुम मुझे अपनी परेशानी बताओ, मैं जिस तरह चाहो तुम्हें यकीन दिलाता हूं कि हर बीमारी और हर शर्त पर जीने मरने का साथी हूं, अंजली ने कहा यह बिल्कुल सच है तो लिख दो, मैं ने कहा खून से लिख दूं, उस ने कहा नहीं पेन से लिख दो, वह मुझ से लिपट गयी और बोली, मेरे लाडले, मेरे प्यारे, मैं ने सारी दुनिया को हुस्न व जमाल और प्यार देने वाले अकेले मालिक से दोस्ती कर ली है, और दिल को भाडखाना बनाने के बजाय उसी एक अकेले से लगा लिया है, और मैं ने बाप-दादा से चला आया धर्म बल्कि अधर्म छोड कर गन्दगी और आतंकवाद से बदनाम मज़हब इस्लाम कबूल कर लिया है, और अब मैं अंजली नहीं बल्कि खदीजा बन गयी हूं, आपने लिख तो दिया है, मगर आपको इखतियार है, इस्लाम के साथ कबूल करते हैं तो अच्छा है, वर्ना आप जैसे एक हजार रिश्तेदार मुझे छोड दें, तो मुझे इस्लाम ईमान के लिए खुशी से मन्जूर है, और अब यह भी सुन लिजिए कि फैसला आज ही कर लिजिए, अब मैं मुसलमान हूं, किसी काफिर और गैर-मुस्लिम शौहर के साथ मेरा रहना हराम है, अब अगर आपको मेरे साथ जीना मरना है, तो सिर्फ एक तरीका है कि आप मुसलमान हो जाऐं, वर्ना आज के बाद, आप छोडें या न छोडें मैं आपको छोड दूंगी।
मैं उससे बे इखतियार चिमट गया, मेरी खदीजा अगर तुम खदीजा बन गयी हो तो तुम्हारा आशीष तो कब से जावेद अहमद बन चुका है, वह खुशी से चीख पडी, कब से? तो मैं ने कहा 3 जनवरी 2009 से, वह बोली कैसे? मैंने पूरी तफसील बतायी, तो उसने बताया कि 1 जनवरी 2009 को खदीजा मुसलमान हुयी थी, उसके दफ्तर की एक इसाई लडकी जो मुसलमान हो कर आयशा बन गयी थी, उसने उसे कलिमा पढवाया था, असल में वसीम की बहन फरहीन ने अपनी एक दोस्त प्रियंका को जो गुलबर्गा की रहने वाली थी (डाक्टर रीहाना उनका नया नाम था) दावत देकर उनको कलिमा पढवाया था, रीहाना बडी दर्दमंद दाईया(इस्‍लाम की तरफ बुलाने वाली) हैं, डाक्टर रीहाना की दावत पर बाईस लोग गुलबर्गा और बंगलोर में मुसलमान हुए हैं, जिन में आयशा भी थी।


अहमदः माशा अल्लाह वाकई बडा अफसानवी वाकिआ है। आप लोगों को कितना मज़ा आया होगा?
जावेदः खदीजा भी दो साल तक रमजान के रोजे रखती रही और छुप-छुप कर नमाज पढती रही, ईद के दिन दोनों छुप-छुप कर रोते रहे, वह दिन में रोजे में मुझे खाने को नहीं पूछती थी कि मुझे साथ खाना न पडे, मैं भी उसी तरह टलाता रहा, मैं डरता था कि उसको पता चल गया तो अपने घर वालों से कह देगी तो मेरा जीना मुश्किल हो जाएगा, और वह इस लिए नहीं बताती थी कि मैं उसे छोड दूंगा, दो साल तक हम दोनों मुसलमान रहे, एक घर में रहते रहे, एक दूसरे से छुपाते रहे, उसके बाद जब ईद आयी तो बस ईद थी, दो साल ईद पर रोने को याद करके हम नादानों तरह हंसते रहे, अल्हम्दु लिल्लाह सुम्मा अल्हम्दु लिल्लाह मेरे अल्लाह भी हम पर हंसते होंगे, हम पर कैसा प्यार और रहम आता होगा हमारे अल्लाह को।


अहमदः अब आप के घर वालों को इल्म हो गया कि नहीं?
जावेदः मेरे घर वालों को मालूम हो गया है, मेरा छोटा भाई और मेरी वालिदा अल्हम्दु लिल्लाह मुसलमान हो गयी हैं, वालिद साहब पढ रहे हैं, इन्शा अल्लाह वह इस्लाम में आ जायेंगे, अभी खदीजा ने अपनी छोटी बहन को बताया है, वह हमारे घर आकर इस्लाम पढ रही है। उनके घर वालों के लिए दुआ किजिए।


अहमदः माशा अल्लाह खूब है आपकी कहानी, बडे मजे की है, अब आपकी गाडी का समय हो गया है। मासिक ‘अरमुगान’ पढने वालों के लिए कोई पैग़ाम दिजिए?
जावेदः बस हमारे खानदान वालों के लिए दुआ की दरखास्त है और आप दुआ करें कि हम ने अपने हजरत से जिन्दगी को दावत के लिए वक्फ़ करने का जो अहद किया है, अल्लाह ताला हमसे कुछ काम ले ले।


अहमदः शुक्रिया। अस्सलामु अलैकुम
जावेदः वालैकुमुस्सलाम व रहमतुल्लाहि वबरकातुहू


साभार- उर्दू मासिक 'अरमुगान' , फरवरी 2011
www.armughan.in

Tuesday, January 18, 2011

पूर्व हॉकी खिलाडी नव-मुस्‍लिम अफिफा बहन से मुलाकात new-muslim-women-hockey player-interview

असमाः अस्सलामु अलैकुम व रहमतुल्लाह वबरकातुह
पूर्व हाकी खिलाडी अफिफाः  वालैकुम सलाम


असमाः अबी (मौलाना कलीम सिद्दीकी साहब) ने हमें बताया था कि हिन्दुस्तान की एक हॉकी खिलाडी आ रही हैं तो हम सोच रहे थे कि आप हॉकी की ड्रेस में  आयेंगी, मगर आप माशा अल्लाह बुरके में मल्बूस (पहने) Dressed और दस्ताने पहन कर मुकम्मल परदे में हैं, आप अपने घर से बुरका ओढकर कैसे आयी हैं?
अफिफाः मैं अल्हमदु लिल्लाह पिछले दो महीने से सो फीसद शरई परदे में रहती हूं।


असमाः अभी आपके घर में तो कोई मुसलमान नहीं हुआ?
अफिफाः जी मेरे घर में अभी मेरे अलावा कोई मुसलमान नहीं है मगर इसके बावजूद में अल्हम्दु लिल्लाह कोशिश करती हूं कि मैं अगर्चे घर में अकेली मुसलमान हूं मगर मैं आधी मुसलमान तो न बनूं, आधी इधर, आधी उधर, यह तो न होना चाहिए।


असमाः आपको हॉकी खेलने का शोक़ कैसे हुआ, यह तो बिल्कुल मर्दों का खेल है?
अफिफाः असल में, मैं हरियाणा के सोनीपत जिले के एक गांव की रहने वाली हूं, हमारे घर में सभी मर्द पढे लिखे हैं और अकसर कबडडी खेलते रहते हैं, मैं ने स्कूल में दाखिला लिया शुरू से क्लास में टाप करती रही, सी बी एस इ बोर्ड में मेरी हाईस्कूल में ग्यारहवीं पोज़िशन रही, मुझे शुरू से मर्दों से आगे निकलने का शौक़ था, इसके लिए मैंने स्कूल में हॉकी खेलना शुरू की, पहले जिले में नवीं क्लास में सलेक्शन हुआ, फिर हाईस्कूल में हरियाण स्टेट के लिए लडकियों की टीम में मेरा सलेक्शन हो गया, बारहवीं क्लास में भी मैंने स्कूल टाप किया और सी. बी. एस. इ. बोर्ड में मेरा नम्बर अठारहवां रहा, इसी साल में इण्डिया टीम में सलेक्ट हो गयी, औरतों के ऐशिया कप में भी खेली और बहुत से टूरनामेंट मेरी कारकर्दगी (प्रदर्शन) की वजह से जीते गये, असल में हॉकी में भी सब से ज्यादा एक्टीव रोल असमा बाजी! सेन्टर फारवर्ड खिलाडी का होता है, हमेशा सेन्टर फारवर्ड में खेलती रही, असल में बस मर्दों से आगे बढने का जनून था, मगर रोज़ाना रात को मेरा जिस्म मुझ से शिकायत करता था, कि यह खेल औरतों को नहीं है, मालिक ने अपनी दुनिया में हर एक के लिए अलग काम दिया है, हाथ पांव बिल्कुल शिल (अकड) हो जाते थे, मगर मेरा जनून मुझे दौडाता था और इस पर कामयाबी और वाह-वाह अपने नेचर के खिलाफ दौडने पर मजबूर करती थी।


असमाः इस्लाम कबूल करने से पहले तो आपका नाम प्रीती(बदला हुआ नाम) था न?
अफिफाः हज़रत ने मेरा नाम अभी अफ़िफ़ा यानि कुछ माह पहले रखा है।


असमाः आपके पिताजी क्या करते हैं?
अफिफाः वह एक स्कूल चलाते हैं उसके प्रिन्सीपल हैं, वह सी बी एस इ बोर्ड का एक स्कूल चलाते हैं, मेरे एक बडे भाई उसमें पढाते हैं, मेरी भाभी भी पढाती हैं, वह खेल से दिलचस्पी रखती हैं, मेरी भाभी बेडमिन्टन की खिलाडी है।


असमाः ऐसे आज़ाद माहौल में जिन्दगी गुज़ारने के बाद ऐसे परदे में रहना आपको कैसा लगता है?
अफिफाः इन्सान अपने नेचर से कितना ही दूर हो जाए और कितने ज़माने तक दूर हे, जब उसको उसके नेचर की तरफ आना मिलता है, वह कभी अजनबियत महसूस नहीं करेगा, वह हमेशा फील करेगा कि अपने घर लोट आया, अल्लाह ने इन्सान को बनाया, और औरतों की नेचर बिल्कुल अलग बनायी, बनाने वाले ने औरत को नेचर छुपने और परदे में रहने का बनाया, उसे सकून व चेन लोगों की हवस भरी निगाह से बचे रहने में ही मिल सकता  है, इस्लाम दीन फितरत है, जिसके सारे हुक्म इन्सानी नेचर से मेल खाते हैं, मर्दों के लिए मर्दों के नेचर की बात, और औरतों के लिए औरतों के नेचर की बात।


असमाः आपकी उम्र कितनी है?
अफिफाः मेरी तारीखे पैदाइश 6 जनवरी 1988 है, गोया मैं बाईस साल की होने वाली हूं।


असमाः मुसलमान हुए कितने दिन हुए?
अफिफाः साढे छ महीने के करीब हुए हैं।


असमाः आपके घर में आपके इतने बडे फेसले पर मुखालफत नहीं हुयी?
अफिफाः हुयी और खूब हुयी, मगर सब जानते हैं कि अजीब दीवानी लडकी है, जो फेसला कर लेती है फिरती नहीं, इसलिए शुरू में ज़रा सख्ती की, मगर जब अन्दाजा हो गया कि मैं दूर तक जा सकती हूं तो सब मोम हो गए।


असमाः आप हॉकी अब भी खेलती हैं?
अफिफाः नहीं! अब हाकी मैं ने छोड दी है।


असमाः इस पर तो घर वालों को बहुत ही अहसास हुआ होगा?
अफिफाः हां हुआ, मगर मेरा फेसला मुझे लेने का हक था मैंने लिया, और मैं ने अपने अल्लाह का हुक्म समझ कर लिया, अब अल्लाह के हुक्म के आगे बन्दों की चाहत कैसे ठहर सकती है।


असमाः आके तैवर तो घर वालों को बहुत सख्त लगते होंगे?
अफिफाः आदमी को ढुलमुल नहीं होना चाहिए, असल में आदमी पहले यह फेसला करे कि मेरा फेसला हक़ है कि नहीं, और अगर उसका हक़ पर होना साबित हो जाए तो पहाड भी सामने से हट जाते हैं।


असमाः आपके इस्लाम में आने का क्या चीज़ ज़रिया बनी?
अफिफाः मैं हरियाण के उस इलाके की रहने वाली हूं जहां किसी हिन्दू का मुसलमान होना तो दूर की बात है, हमारे चारों तरफ कितने मुसलमान हैं जो हिन्दू बने हुए हैं, खुद हमारे गांव में बादी और तेलियों के बिसयों घर हैं जो हिन्दू हो गए हैं, मन्दिर जाते हैं, होली-दीपावली मनाते हैं, लेकिन मुझे इस्लाम की तरफ वहां जाकर रगबत (लगाव,प्यार) हुई जहां जाकर खुद मुसलमान इस्लाम से आज़ाद हो जाते हैं।


असमाः कहां और किस तरह ज़रा बतायें?
अफिफाः मैं हॉकी खेलती थी तो बिल्कुल आज़ाद माहोल में रहती थी, आधे से कम कपडों में हिन्दुस्तानी रिवायात का खयाल भी खत्म हो गया था, हमारे अक्सर कोच मर्द रहे, टीम के साथ कुछ मर्द साथ रहते हैं, एक दूसरे से मिलते हैं, टीम में ऐसी भी लडकियां थी जो रात गुजारने बल्कि खाहिशात पूरी करने में जर्रा बराबर झिजक महसूस नहीं करती थीं, मेरे अल्लाह का करम था कि मुझे उसने इस हद तक न जाने दिया, गोल के बाद मौर मेच जीत कर मर्दों औरतों का गले लग जाना चिमट जाना तो कोई बात ही नहीं थी, मेरी टीम के कोच ने कई बार बेतकल्लुफी में मेरे किसी शाट पर टांगों में कमर में चुटकियां भरीं, मैं ने इस पर नोटिस लिया, और उनको वार्निंग दी, मगर टीम की साथी लडकियों ने मुझे बुरा भला कहा, इतनी बात को तुम दूसरी तरह ले रही हो, मगर मेरे ज़मीर पर बहुत चोट लगी, हमारी टीम एक टूरनामेन्ट खेलने डेन्मार्क गयी, वहां मुझे मालूम हुआ कि वहां की टीम की सेन्टर फारवर्ड खिलाडी ने एक पाकिस्तानी लडके से शादी करके इस्लाम कबूल कर लिया है, और हॉकी खेलना छोड दिया है, लोगों में यह बात मशहूर थी कि उसने शादी के लिए इस लडके की मुहब्बत में इस्लाम कबूल किया है, मुझे यह बात अजीब सी लगी, हम जिस होटल में रहते थे, उसके करीब एक पार्क था, उस पार्क से मिला हुआ उनका मकान था, मैं सुबह को पार्क में तफरीह कर रही थी कि डेन्मार्क की एक खिलाडी ने मुझे बताया कि वह सामने बिर्टनी का घर है, जो डेन्मार्क की हॉकी की मशहूर खिलाडी रही है, उसने अपना नाम अब सादिया रख लिया है और घर में रहने लगी है, मुझे उससे मिलने का शौक़ हुआ, मैं एक साथी खिलाडी के साथ उसके घर गयी, वह अपने शौहर के साथ कहीं जाने वाली थी, बिल्कुल मोजे, दस्ताने और पूरे बुरके में मल्बूस। मैं देखकर हैरत में रह गयी, और हम दोनों हंसने लगे, मैं ने अपना तार्रुफ कराया तो वह मुझे पहचानती थी, वह बोली मैं ने तुम्हें खेलते देखा है, सादिया ने कहा हमारे एक ससुराली अज़ीज़ का इन्तकाल हो गया है, मुझे उसमें जाना है वर्ना मैं आपके साथ कुछ बातें करती। मैं तुम्हारे खेलने के अन्दाज से बहुत मुतासिर रही हूं, हॉकी खेल औरतों के नेचर से मेल नहीं खाता, मेरा दिल चाहता है कि तुम्हारी सलाहियतें नेचर से मेल खाने वाले कामों में लगें, मैं तुमसे हॉकी छुडवाना चाहती हूं, मैं ने कहा आप मेरे खेल के अन्दाज़ से मुतासिर हैं और मुझ से खेल छुडवाना चाहती हैं, और मैं आपका हाकी छोडना सुन कर आप से मिलने आयी हूं, कि ऐसी मशहूर खिलाडी होकर आप ने क्यूं हॉकी छोड दी? मैं आपको फिल्ड में लाना चाहती हूं, सादिया ने कहा कि अच्छा आज रात को डिनर मेरे साथ कर लो, मैं ने कहा आज तो नहीं, कल हो सकता है, ते हो गया, मैं डिनर पर पहुंची, तो सादिया ने अपने इस्लाम कबूल करने की रोदाद मुझे सुनायी और बताया कि मैंने शादी के लिए इस्लाम कबूल नहीं किया बल्कि अपनी शर्म अपनी असमत की इज्जत व हिफाज़त के लिए इस्लाम कबूल किया है और इस्लाम के लिए शादी की है। सादिया न सिर्फ एक मुस्लिम खातून थी बल्कि इस्लाम की बडी दाइया था, उसने फोन करके दो अंग्रेज़ लडकियों को और एक मुअमर खातून को बुलाया, जो उनके मौहल्ले में रहती थीं, और सादिया की दावत पर मुसलमान हो गयी थीं, वह मुझे सब से ज्‍यादा इस्लाम के परदे के हुक्म की खेर बताती रहीं और बहुत इसरार करके मुझे बरका पहन कर बाहर जाकर आने को कहा। मैं ने बुरका पहना, डेन्मार्क के बिल्कुल मुखालिफ माहौल में मैं ने बुरका पहन कर गली का चक्कर लगाया, मगर वह बुरका मेरे दिल में उतर गया, मैं बयान नहीं कर सकती कि मैं ने मज़ाक़ उडाने या ज्यादा से ज्यादा उसकी खाहिश के लिए बुरका पहना था, मगर मुझे अपना इन्सानी कद बहुत बढा हुआ महसूस हुआ, अब मुझे अपने कोच की बेशर्माना शहवानी चुटकियों से घिन भी आ रही थी, मैं ने बुरका उतारा और सादिया को बताया कि मुझे वाकई बुरका पहन कर बहुत अच्छा लगा, मगर आजके माहौल में जब बुरके पर वेस्टर्न हकूम्तों में पाबन्दी लगायी जा रही है, बुरका पहनना कैसे मुमकिन है? और ग़ैर मुस्लिम का बुरका पहनना तो किसी तरह मुमकिन नहीं, वह मुझे इस्लाम कबूल करने को कहती रहीं और बहुत इसरार करती रहीं, मैं ने माज़रत की कि मैं इस हाल में नहीं हूं, अभी मुझे दुनिया की नम्बर वन हॉकी खिलाडी बनना है, मेरे सारे अरमानों पर पानी फिर जायेगा, सादिया ने कहा मुझे आपको हॉकी की फिल्ड से बुरके में लाना है, मैं ने अपने अल्लाह से दुआ भी की है और बहुत ज़िद करके दुआ की है, उसके बाद हम दस रोज़ तक डेन्मार्क में रहे, वह मुझे फोन करती रही, दो बार होटल में मिलने आयी और मुझे इस्लाम पर किताबें दे कर गयी।


असमाः आपने वह किताबें पढीं?
अफिफाः कहीं कहीं से देखी हैं।


असमाः उसके बाद इस्लाम में आने का क्या ज़रिया बना?
अफिफाः मैं इन्डिया वापस आयी, हमारे यहां नरेला के पास एक गांव की एक लडकी (जिसके पिताजी सन 47 ई. में हिन्दू हो गए थे, और बाद में आपके पिताजी मौलाना कलीम सिददीकी साहब के हाथों मुसलमान हो गये थे, उनके मुरीद भी थे और हज भी कर आए थे) हॉकी खेलती थीं, दिल्ली स्टेट की हॉकी टीम में थी और इन्डिया की तरफ से स्लेक्शन के बाद रूस में खेलने जाने वाली थी, मुझसे मशवरा और खेल के अन्दाज़ में रहनुमायी के लिए मेरे पास आयी, मैंने उससे डेन्मार्क की मशहूर खिलाडी बिर्टनी का जिक्र किया, उसने अपने वालिद साहब से सारी बात बतायी, वह अपनी लडकी के साथ मुझसे मिलने आए, और मुझे हज़रत की किताब ‘आपकी अमानत आपकी सेवा में‘ और ‘इस्लाम एक परिचय‘ दी, आपकी अमानत छोटी सी किताब थी, बुरके ने मेरे दिल में जगह बना ली थी, इस किताब ने बुरके के क़ानून को मेरे लिद में बिठा दिया, मैं ने हज़रत साहब से मिलने की खाहिश ज़ाहिर की, दूसरे रोज हज़रत का पन्जाब का सफर था, अल्लाह का करना कि बहालगढ़ एक साहब के यहां हाईवे पर मुलाकात ते होगयी और हजरत ने दस पन्द्रह मिन्ट मुझ से बात करके कलमा पढने को कहा, और उन्होंने बताया कि मेरा दिल यह कहता है कि बिर्टनी ने अपने अल्लाह से आपको बुरके में लाने की बात मनवाली है, बहरहाल मैंने कलमा पढा और हज़रत ने मेरा नाम अफ़िफ़ा रखा, और कहा अफ़िफ़ा पाक दामन को कहते हैं, चूंकि बाईनेचर आप अन्दर से पाकदामनी को पसन्द करती हैं, मेरी भान्जी का नाम भी अफिफा है, मैं आपका नाम अफिफा ही रखता हूं।


असमाः उसके बाद क्या हुआ?
अफिफाः मैं ने बिर्टनी को फोन किया, और उसको बताया, वह खुशी में झूम गयी, जब मैं ने हज़रत का नाम लिया तो उन्होंने अपने शौहर से बात करायी, डाक्टर अशरफ उनका नाम है, उन्होंने बताया कि हज़रत की बहन के यहां रहने वाली एक ‘हिरा‘ की शहादत और उसके चचा के कबूले इस्लाम की कहानी सुनकर हमें अल्लाह ने इस्लाम की कद्र सिखायी है, और इसी की वजह से मैंने बिर्टनी से शादी की है, यह कह कर कि अगर तुम इस्लाम ले आती हो तो मैं आपसे शादी के लिए तैयार हूं। मैं ने अखबार में ऐड दिया, गज़ट में नाम बदलवाया, अपनी हाईस्कूल और इन्टर की डिग्रियों में नाम बदलवाया और हॉकी से रिटायरमेंट ले कर घर पर स्टडी शुरू की।


असमाः अब आप का क्या इरादा है, आपकी शादी का क्या हुआ?
अफिफाः मैं ने आई सी एस की तैयार शुरू की है, मैं ने इरादा किया है कि मै। एक आई सी एस अफसर बनूंगी, और बुरकापोश आई एस अफसर बन कर इस्लामी परदे की अज़मत लोगों को बताउंगी।


असमाः आप इसके लिए कोचिंग कर रही हैं?
अफिफाः मैं नेट पर स्टडी कर रही हूं, मेरे अल्लाह ने हमेशा मेरे साथ यह मामला किया है, कि मैं जो इरादा कर लेती हूं उसे पूरा कर देते हैं, जब काफिर थी तो पूरा करते थे, अब तो इस्लाम की अज़मत के लिए मैंने इरादा किया है, अल्लाह जरूर पूरा करेंगे, मुझे एक हज़ार फीसद उम्मीद है कि मैं पहली बार में ही आई सी एस इम्तहानात पास कर लूंगी।


असमाः इन्टरव्यू का क्या होगा?
अफिफाः सारे बुरके और इस्लाम के मुखालिफ भी अगर इन्टरव्यू लेंगे तो वह मेरे सलेक्शन के लिए इन्शाअल्लाह मजबूर हो जायेंगे।


असमाः घर वालों को आपने दावत नहीं दी?
अफिफाः अभी दुआ कर रही हूं, और क़रीब कर रही हूं, ‘हमें हिदायत कैसे मिली?‘ हिन्दी में मैंने घर वालों को पढवायी, सब लोग हैरत में रह गये और अल्लाह का शुकर है जहन बदल रहा है।


असमाः यह बातें, मैंने आपके इल्म में है कि फुलत से निकलने वाले रिसाले ‘अरमुगान‘ के लिए की हैं, इस रिसाले के बहुत से पढने वाले हैं, उनके लिए कोई पैग़ाम आप देंगी?
अफिफाः औरत का बेपरदा होना उसकी हद दरजे तौहीन है, इस लिए मर्द खुदा के लिए अपने झूटे मतलब और अपना बोझ उनपर डालने के लिए उनको बाजारों में फिराकर बाज़ारी बनाने से बाज रहें, और औरतें अपने मक़ाम और अपनी असमत और इफफत की हिफाजत के लिए इस्लाम के परदे के हुक्म की कद्र करें।


असमाः बहुत बहुत शुक्रिया, अस्सलामु अलैकुम
अफिफाः वालैकुम सलाम


साभार उर्दू मासिक ‘अरमुग़ान‘ नवम्बर 2010
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