Monday, December 6, 2010

शमीम भाई (पूर्व गेंग मेम्‍बर श्याम सुंदर) से एक मुलाकात

शमीम भाई (लुटेरा श्याम सुंदर) से मौलाना कलीम साहब के साहब ज़ादे मौलाना अहमद अव्वाह नदवी द्वारा लिया गया इन्‍ट्रव्‍यू

अहमद अव्वाहः अस्सलामु अलैकुम व रहमतुल्लाहि व बरकातुह
शमीमः व अलैकुमुस्सलाम व रहमतुल्लाहि व बरकातुह
अहमदः शमीम भाई आप जमाअत में से कब आए?
शमीमः मैं जमाअत में से 22 अप्रैल को वापस आ गया था।

मौलाना कलीम सिद्दीक़ी साहब के ड्राइवर सलीम अपनी छाती पर लगी गोली का निशान दिखाते हुए 



अहमदः आपका यह चिल्ला कहां लगा था?

शमीमः मेरा यह चिल्ला मेवात में लगा। बिजनोर की जमाअत थी मुफ्ती अब्बास साहब अमीर थे। अल्हम्दु लिल्लाह इस चिल्ले में मेरा पहले चिल्ले से बहुत अच्छा वक्त गुज़रा।
अहमदः अच्छा माशअल्लाह। आप का यह दूसरा चिल्ला था?
शमीमः हां अहमद भाई। पहला चिल्ला तो मेरा जब मौलाना साहब हज से आए थे उस के फोरन बाद लगा था। हज से आने के चार रोज़ बाद मैं ने कलमा पढा था और तीन दिन बाद मेरे काग़ज़ात बनवाकर निजामुददीन से मुझे जमाअत में भेज दिया गया था। वह चिल्ला मेरा सीतापुर में लगा था। मगर वह जमाअत ज़रा मेरे जैसी थी। मैं यह तो नहीं कहूंगा कि अच्छी नहीं थी। अमीर भी नए थे और साथियों में भी रोज लडाई होती रही। चार साथी दरमियान में वापस आ गए। मैं तो यही कहूंगा कि मेरी नहूसत थी कि अल्लाह की राह में मुझे मेरे जैसे हाल वालों से साबेका(संपर्क) पडा।


अहमदः अच्छा शमीम भाई। आप अपना खानदानी तआर्रुफ कराईये?
शमीमः मैं मुज़फ्फरनगर जिला के सखेडा गांव के पास एक गांव के गूजर ज़मीनदार परिवार में पैदा हुआ। 11 अप्रैल 1984 मेरी जन्म तिथि है। मेरे पिताजी ने नाम श्याम सुंदर रखा। मेरा खानदान पढा लिखा खानदान है। मेरे चचा सरकारी अफसर हैं। मेरे वालिद भी मास्टर थे और सत्तर बीघा ज़मीन भी थी। मेरे बडे भाई फौज़ में हैं। एक बहन है उन की शादी सरकारी स्कूल के टीचर से हुई है। मैं ने हाई स्कूल से पढाई छोड दी और फिल्म देखना, सिगरेट पीना, गुटका खाना और आवारा लडकों के साथ रहना मेरा काम था। मेरे पिताजी ने मुझे पढने पर जोर दिया तो मैं घर से भग गया। मेरी संगती अच्छी नही रही और मुझे गोलियां खाने की आदत हो गई। काफी दिनों के बाद मैं किसी तरह घर आया। मगर मेरा तअल्लुक गलत लोगों से था। खर्च घर वाले देते नहीं थे। मैं ने खर्च बढा रखा था। मजबूरत घर से चोरी करता कभी कुछ निकाल कर बेच आता, कभी कुछ। घर वालों ने एहतियात की तो फिर बाहर से चोरी करने लगा। बात गिड गई और मैं लूटमार करने वाले लडकों की गैंग में जा मिला और मेरे अल्लाह की रहमत पर कुर्बान कि यह गेंग ही मेरी नय्या पार लगा गई।




अहमदः असल में गेंग में रहना दुनिया को डुबोता ही है। बस अल्लाह की रहमत ने आपको फूल समझ कर इस गंदी गैंग की कीचड से आगोशे रहमत में उठा लिया।
शमीमः हां। आप सच कहते ह।। असल में मेरा खानदान और पूरा परिवार बडे सज्जन लोगों का परिवार है। मेरे घरवालों के ज्यदातर मुसलमानों से संबन्ध रहे हैं। मेरा बचपन भी इसी माहौल में गुजरा। मैं बदकिस्मती से इस माहौल से दूर होता रहा मगर मुझे इस गलत माहौल से स्वभाव के लिहाज से मेल महसूस न हुआ।
अहमदः अपने इस्लाम कुबूल करने के बारे में ज़रा बताइये?
शमीमः अहमद भाई। पिछले साल दुखेडी जलसा से वापस आते हुए रात को मन्सूरपुर से पहले आपके और हम सब के अबी मौलाना कलीम साहब की गाडी पर बदमाशों ने गोली चला दी थी। हमारे ड्राइवर सलीम मियां के दो गोलियां लगी थीं। एक हाथ में अन्दर घुस गयी थी। दूसरी गोली बिल्कुल दिल के सामने सीने पर लगी थी, कुरता बुरी तरह फटगया। 315 की गोली, मगर कलाई से (अल्लाह की रहमत से) बस छू कर वापस हो गयी। अल्लाह तआला अपने सच्चे बन्दों को साथी भी ऐसे देते हैं कि गोली लगने के बावजूद सलीम ने गाडी को दो तीन किलोमीटर उलटा बैक गेअर में दौडाया और मौका लगाकर मोडा और दस किलोमीटर दूर जाकर बताया कि मुझे गोली लग गयी है और हौसला नहीं खोया। वरना हमारे साथी तो कह रहे थे कि हम ने ऐसा निशाना नाकर गोली सामने से मारी थी कि हम को यकीन था कि ड्राइवर तो मर गया होगा। कोई बराबर वाला गाडी भगा रहो है।
वह गोली चलाने वाले लोग सब मेरे साथी थे मगर मेरे अल्लाह का करम था मैं दो हफ्ते से बीमार हो गया था और मुझे पीलिया हो गया था। मैं मुजफ्फरनगर अस्पताल में भरती था। यह खबर पूरी इलाके में जंगल की आग की तरह फैल गयी। हम आठ लोगों का गेंग था। सिर्फ एक हिन्दू था और सब सात लोग मुसलमान थे। इत्तेफाक से मरे अलावा सातों उस रोज उस वाकिए में मौजूद थे। खतौली कोतवाली ने सी.आई.डी. इन्चार्ज को बुलाया और दोनों ने कसम खाई कि ऐसे सज्जन भले और महान आदमी की गाडी पर हमारे क्षेत्र में यह हमला हुआ है। हमारे लिए डूब मरने की बात है। कसम खाकर अहद किया कि जब तक मुजरिमों को पकड न लेंगे उस वक्त तक खाना नहीं खाऐंगे। भला ऐसे लोगों पर गोली चलाने वाले कब बच सकते थे। तीसरे रोज़ उन में से तीन पकडे गए और पिटाई पर सबने बता दिया। बाकी चार भी एक हफ्ते में गिरफतार हो गए। बहुत से केस लूटमार चोरी डाके के खुले और थाना इन्चार्ज ने ऐसे केस बनाए कि जमानत तो सालों तक मुमकिन ही नहीं थी न हुई।
एक हफ्ते के बाद मेरी बतीअत कुछ ठीक हुयी। दोबारा खून भी चढा तो मेरी छुटटी हुई। दो हफ्ते तक घर पर ही रहा। साथियों के पकडे जाने की खबर मुझे मिल गयी थी। मेरा खून सूखता था कि सख्ती में मेरा नाम न ले लिया हो। मगर दो महीने तक जब हमारे घर पुलिस न आयी तो कुछ इत्मिनान हुआ। कुछ तबीअत भी ठीक हो गयी तो मैं किसी तरह मौका लगाकर जेल में मिलाई करने गया। जेल में साथियों ने सारा मुआमला बताया और मुझे बधाई दी कि तू बीमार हो गया वरना तू भी हमारे साथ जेल में होता। मुजफ्फरनगर जेल में उन की मुलाकात कुछ कैदियों से हुयी जो मौलाना साहब के उन साथियों की कोशिश से जिन को दुश्मनी में लोगों ने झूटे कत्ल के केस में फंसा दिया था। मुसलमान हो गए थे। उन कैदियों से मिलने मौलाना कलीम कई बार जेल आए। जेल वालों से मौलाना साहिब और उन के घर वालोऔर उन की वालिदा के बारे में कहानियां सी सुनाते रहते थे। उनके घर का हाल यह है कि अपने चोरों को खुद छुडाकर लाते हैं। मुआफ करते हैं उनके घर राशन पहुंचाते थे। कोकडा गांव के एक मेरे साथी ने जो हमारा सरदार था मुझ से कहा, तू फुलत जाना और मौलाना साहब को हमारी परेशानी बताना और खूब रोना, मुंह बनाकर खूब परेशानियां बताना, मैं ने कहा तुम्हें शर्म नहीं आती। भला उनके यहां जाने का किस तरह मुंह हो सकता है। मगर वह जोर देता रहा। तू जाकर देखना वह तुझे कुछ नहीं कहेंगे। उन से कहना सब साथी लि से मुआफी मांग रहे हैं और सभी अहद कर रहे हैं कि अब अच्छी जिन्दगी गुजारेंगे और आपके मुरीद भी बन जाऐंगे। मेरी हिम्मत न हुई हफ्ते दो हफ्ते के बाद वह मुझे जोर देते रहे।

 कुरआन से इलाज(Hindi/Arabi)(PB)
बार-बार कहने पर मुझे उनके हाल पर तरस आ गया और मैं पता लेने के बाद फुलत पहुंचा। सर्दी का ज़माना था, रास्ते में बारिश हो गयी और मैं भीग गया। मौलाना साहब ज़ोहर (दोपहर की) की नमाज के लिए जा रहे थे। नमाज़ का वक्त करीब था। मुझे देखा मालूम किया कहां से आए हो? मैं ने अपने गांव का नाम बताया। मौलाना साहब घर में गए और मेरे लिए एक शर्ट पैन्ट लेकर आए और बोले सर्दी सख्त हो रही है आप अन्दर जाकर कपडे बदल लीजिए। मेरा नाम पूछा, मैं ने बताया श्यामसुंदर, तो उन्होंने रजाई में बैठ जाने को कहा और अन्दर से बच्चे को एक कप चाय लाने को कहा। नमाज़ के लिए जाते वक्त हंसते हुए बोले। आप तो इस इलाके के मेहमान हैं जहां हमारी अच्छी मेहमानी हुई थी। हमारे ड्राइवर के गोली लगी थी। मैं यह सुन कर सहम गया। मेरे चेहरे के उतरने से मौलाना बोले आप क्यूं शर्माते हैं। कोई आपने गोली नही चलाई थी। आप तो हमारे मेहमान हैं। मौलाना साहब नमाज़ पढने चले गए।
जमाज पढकर वापस आए तो मैं ने अलग बात करने के लिए कहा। बराबर के छोटे कमरे में मुझे ले गए। मैं ने अपना तआर्रुफ कराया और अपने साथियों का हाल और उनके घर का हाल खूब बनावटी रोना बनाकर सुनाया और मौलाना साहब से कहा आप चाहें तो उनकी जमानत हो सकती है। मौलाना साहब ने कहा न हमने उन को गिरफतार किया है और हम उन को मुजरिम कम और बीमार ज्यादा समझते हैं। ऐसे सच्चे और अच्छे दीन को मानने वाले ऐसे रहम भरे रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम पर ईमान रखने वाले, ऐसी बेधडक लोगों की जानें लेंगे तो फिर दुनिया का क्या होगा? उन का इलाज यह है कि उन कसे कहुं या उम्रकैद में रहो या तीन चिल्ले के लिए जमाअत में चले जाओ। अगर वह सच्चे दिल से अपनी गलती पर शर्मिन्दा हैं तो वह जेस से सीधे तीन चिल्ले के लिए सातों जमाअत में चले जाऐं। हम खुद गवाही देने के बजाए उनकी जमानत को तैयार हैं।
मौलाना साहब ने मुझ से कहा, आप पहले खाना खा लें मैं अभी आता हूं। एक साहब अन्दर से खाना ले आए। थोडी देर में मौलाना आए और मुझ से कहा अपने साथियों की जेल की तो तुम फिªक्र
करते हो। तुम्हें भी एक जेल में मरने के बाद जाना पड सकता है। वह जेल हमेशा की है जिस से जमानत भी नहीं है, वह नर्क की जेल है। जिस की ऐसी सजाएं हैं जिन का तसव्वुर(कल्पना) भी यह दुनिया की पुलिस वाले नहीं कर सकते। उस जेल से बचने के लिए यह किताब पढो। यह कह कर पुस्तक ‘आपकी अमानत आपकी सेवा में‘ मुझे दी फिर वह एक साथी को मेरे पास भेज कर चले गए। इन से बात करो, वह मुझे मुसलमान होने के लिए कहते रहे और बोले तुम बडे खुशकिस्मत हो कि मालिक ने आपको इस बहाने हमारे हज़रत के याहं भेज दिया। मालिक की मेहर होती है तो अल्लाह इस दर का पता देते हैं। मैं ने उन से इस किताब को पढने का वाअदा किया और इस लिहाज से खुश खुश घर लौटा कि चार महीने जमाअत में जाना तो बहुत आसान है। मैं ने अगले रोज जेल जाकर साथियों को खुशखबरी सुनाई। उन्होंने पूरी बात सुनी और बहुत रोए ऐसे आदमी के साथ हमने बडा जुल्म किया और फिर उन नव-मुस्लिम कैदियों के साथ रहने लगे। नमाज़ पढनी शुरू कर दी। रोज़ाना तालीम मैं बैठने लगे और तीन कैदी उनके कहने से भी मुसलमान हो गए।
मैंने दूसरे रोज वह किताब पढी। एक अजनबी आदमी के साथ मौलाना साहब के बरताव ने मेरे अन्दरून को मौलाना का कर दिया और मुझे अन्दर में ऐसा लग रहा था कि मैं मौलाना का गुलाम हो गया हूं। इस किताब ने मुझे भी जज़्बाती (भावुक) बना दिया। मैं तीन दिन के बाद फुलत गया। मौलाना नहीं मिले, बहुत मायूस लौटा, दूसरी बार गया, तो मालूम हुआ कि वह आए थे और आज ही हज के सफर पर चले जाऐंगे और एक महीने के बाद आएंगे।
एक-एक दिन करके दिन गिनता रहा। मै। बयान नहीं कर सकता अहमद भैया। मैं ने एक महीना सालों की कैद की तरह गुज़ारा। अल्लाह का करह हुआ मैं ने फुलत फोन किया मालूम हुआ कि मौलाना साहब आ गए हैं और कल तक रहेंगे। 16 जनवरी को सुबह मैं ने मौलाना साहब के पास जाकर कलमा पढा। मैं ने मौलाना साहब से कहा कि मेरे पिताजी मुझे मारते और डांटते तो कहा करते थे कि नालायक हमारे बडे तो यह कहा करते थे कि इन्सान वह है कि उसके दुश्मन भी उससे फायदा उठाएं। तू ने अपने ही घर को नर्क बना दिया है। मैं यह सुन कर कहता ऐसे लोग कसी दूसरे लोक में होंगे। लेकिन आपके कातिलों के साथ रहना मेरे लिए ईमान लाने का जरिआ बन गया। मौलाना साहब ने कहा मैं क्या बल्कि वह मालिक जिसने पैदा किया उसको आप पर रहम आ गया। आप रहमत की कद्र करें। मेरा मौलाना साहब से शमीम अहमद रखा।



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अहमदः फिर उसके बाद आप जमाअत में चले गए?
शमीमः दूसरे रोज मेरे काग़ज़ात मेरठ भिजवाकर बनवाए और मुझे साथ लेकर मौलाना साहब दिल्ली गए और एक मौलाना के साथ मुझे मर्कज भेज दिया। सीतापुर चिल्ला लगा। कुछ नमाज वगैरा तो मैंने सीख ली, वापस आकर मैंने कारगुजारी सुनाई। मौलाना साहब ने कहा, चालीस दिन में अगर आप कलमा भी अच्छी तरह याद करके आ गए तो काफी है। आपको नमाज भी अच्छी खासी आ गयी है। दोबारा जाकर और अच्छी तरह याद कर लेना। कुछ रोज़ मैं मुज़फ्फरनगर एक मदरसा में रहा। फिर जमाअत में दोबारा गया। अलहम्दुलिल्लाह इस बार मैं ने एक पारा भी पढ लिया और उर्दू भी पढना सीख ली। घर वालों और साथियों के लिए दुआ भी की। वापस जाकर जेल गया और साथियों से जमाअत और मुसलमान होने की कारगुजारी सुनायी। वह बहुत खुश हुए अब इन्शाअल्लाह जल्दी उन की जमानत होने वाली है। दो लोगों की जमानत तो किसी तरह हो गयी मगर मैं ने उनको भी तैयार किया है। वह सातों इन्शा अल्लाह जल्द चार महीने की जमाअत में जाने वाले हैं।
 
अहमदः जमाअत से वापस आकर आप घर गए। तो घर वालों को आपने क्या बताया?
शमीमः मेरे घर वाले यह समझ रहे थे कि फिर गैंग में चला गया हूं, मेरे घर से बाहर जाने के वह आदी थे। उनके लिए यह कोई नयी बात नहीं थी। टोपी ओढ कर कुरता पहन कर मैं घर पहुंचा तो घर वाले हैरत में पड गए। शुरू में मेरे पिताजी बहुत नाराज हुए फिर मैंने फुलत जाने की और वहां की सारी रिपोर्ट सुनाइ्र तो वह खामोश हो गए। मैं ने एक दिन बहुत खुशामद से उन से वक्त लिया। कमरा बंद करके दो घंटे उन से दावत की बात की। फिर ‘आप की अमानत आपकी सेवा में‘ उन को दी। अलहम्दु लिल्लाह। अल्लाह ने उनके दिल को फेर दिया और वह फुलत जाकर मुसलमान हो गए। हमारे गांव में मुसलमान नाम के बराबर हैं। मौलाना साहब ने उर से अभी इज़हार और एलान करने के लिए मना कर दिया है। अलबत्ता वह घर वालों को समझाने में लग रहे हैं। खुदा करे हमारा सारा घर जल्द मुशर्रफ ब इस्लाम हो जाए।
अहमदः माशा अल्लाह बहुत खूब। अल्लाह तआला मुबारक करे। आप कोई पैगाम 'अरमुगान' के वास्ते से मुसलमानों को देना चाहेंगे।
शमीमः मैं अपनी बात क्या कहूं? मेरा मुंह कहां कि मैं कुछ कह सकूं मगर मैं ज़रूर कहूंगा जो मौलाना साहब कहते है। कि मुसलमान अपने को दायी और सारी इन्सानियत को मदू ( मद ऊ ) समझने लगे तो सारी दुनिया रश्के जन्नत बन जाएगी और दायी तबीब (डाक्टर) और मदू मरीज़ होता है वह आदमी नहीं जो अपने मरीज़ से मायूस हो और वह भी तबीब नहीं जो मरीज़ से नफरत करे। इस से कराहत करे, उसे धक्के दे दे, मुसलमानों ने अपने मरीजों को अपना हरीफ, अपना दुश्मन समझ लिया है इस की वजस से अपने मरीजों को अपना हरीफ, अपना दुश्मन समझ लिया है इस की वजह से खुद भी पिस रहे हैं और पूरी इन्सानियत ईमान और इस्लाम से महरूम (वंचित) हो रही है।
अहमदः माशाअल्लाह। बहुत अच्छा पैगाम दिया, शमीम भाई। बहुत दिनों से मैं इन्टरव्यू ले रहा हूं मगर इतनी अहम बात आपने कही। आप को यह समझ मुबारक हो।
शमीमः अहमद भाई बस याद करके मैं ने आपको सुना दिया है सबक़ तो मौलाना साहब ने याद कराया है।
अहमदः बहुत बहुत शुक्रिया। अस्सलामु अलैकुम
शमीमः आपका भी शुक्रिया। वअलैकुमुस्सलाम व रहमतुल्लाह

साभार,
प्रकाशित, उर्दू माहनामा ‘अरमुगान’ जून 2007
नसीमे हिदायत के झोंके (उर्दू, हिन्दी) , इन्टरव्यु नम्बर 32





کتاب ’’نسیم ہدایت کے جھونکے‘‘ ان نو مسلم بھائیوں بہنوں کے انٹرویوز کا مجموعہ ہے  جو خداوند عالم کی توفیق و عنایت اور داعیِ اسلام حضرت مولانا محمد کلیم صاحب صدیقی اور ان کے  رفقاء کی کوششوں سے نعمت اسلام اور ہدایت کے نور سے سرفراز ہوئے ان نو مسلم بھائیوں کے قبول اسلام کےانٹرویوزماہ نامہ ’’ارمغان‘‘ میں مسلسل شائع ہوتے رہے ہیں اور الحمد للہ یہ سلسلہ اب بھی جاری ہے۔


Nasim e hidayat ke Jhonke Vol. 1 to 6 [ urdu ] نسیم ہدایت کے جھونکے  

This book Set is collection of interviews with newly converts to Islam who got guidance and Allah's blessing due to efforts of made preaches of Islam Hazrat Maulana Muhammad Kaleem Siddiqui and his associates. These interviews were published in Urdu Monthly "ARMUGHAN" and the series still continuing. This magazine is edited by Maulana Wasi Sulaiman Nadvi under the patronage of Hazrat Maulana Muhammad Kaleem Siddiqui
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"नसीमे हिदायत के झोंके" उन नो मुस्लिमों के इंटरव्यू का संग्रह है जो अल्लाह के आशीर्वाद से मौलाना कलीम सिद्दीकी और उनके साथियों की कोशिशों  से इस्लाम धर्म  में आये, ये साक्षात्कार फुलत, उत्तर प्रदेश की  उर्दू मासिक पत्रिका अरमुगान में छप चुके हैं।



Nasim e hidayat ke Jhonke Vol. 1 to 6 [ hindi ] नसीमे हिदायत के झोंके