Wednesday, May 19, 2010

जनाब अब्दुर्रहमान (शास्त्री अनिलराव) से मुलाकात interview 5

अहमद अव्वाह : अस्सलामु अलैकुम व रहमतुल्लाहि व बरकातुह
अब्दुर्रहमान(अनिलराव): व अलैकुमुस्सलाम व रहमतुल्लाहि व बरकातुह

अहमदः अब्दुर्रहमान साहब एक जमाना कब्ल(पूर्व) हमारे यहाँ से ‘अरमुगान’ दावत में हजरत मौलाना अली मियाँ नववरल्लाहू मरकदहू के नाम आप का एक खत शाये(प्रकाशित) हुआ था उस वक्त से आप से मुलाकात का इश्तियाक(उत्सुक) था। आप ऐसे वक्त तशरीफ लाये जब मुझे एक दूसरी भी जरूरत दरपेश(मौजूद) थी। फुलत से शाया होने वाले दावती माहनामे अरमुगान में दस्तरखाने इस्लाम पर आने वाले नये खुशनसीब भाई बहनों के इण्टरव्यु शाये करने का एक सिलसिला चल रहा है। सितम्बर के शुमारे के लिये मैं तलाश में था कि आप से मुलाकात करूँ। बहुत अच्छे वक्त पर आपका आना हुआ।
अब्दुर्रहमानः मुझे भी बाज बहुत जरूरी मशवरे मौलाना साहब (मौलाना कलीम सिद्दीकी साहब) से करने थे, सालों मिले भी हो गये थे। अच्छा हुआ आप से भी मुलाकात हो गयी। आपसे मिलने का मेरा भी दिल चाहता था। असल में हैदराबाद के हमारे बहुत से दोस्त आपका बहुत जिक्र करते हैं वहाँ के उर्दू अखबारों में ‘अरमुगान’ के हवाले से इण्टरव्यु शाये हो रहे हैं जिन से बडी दा्वती फिजा बन रही है और लोगों में अलहम्दु लिल्लाह बडा दअवती जज़्बा पैदा हो रहा है। हमारे यहाँ वरंगल से बहुत से लोग फुलत के सफर का खास तौर पर आप से मुलाकात के लिये प्रोग्राम बना रहे हैं। अल्लाह तआला आप की उम्र और इल्म में बरकत अता फरमाये। दिल बहुत खुश होता है कि हमारे हजरत के साहबजादे भी मिशन से जुड गये हैं अल्लाह तआला कुबूल फरमाये।

अहमदः आमीन, अल्लाह अपकी जश्बान मुबारक करे और मुझ ना-अहल(अयोग्य) को भी अपने दीन की खिदमत के लिये खुसूसन दाअवत के लिये कुबूल फरमाए, आमीन। जनाब अब्दुर्रहमान साहब। आप अपना खानदानी तआरूफ(परिचय) करायें।
अब्दुर्रहमानः मैं शहर वरंगल के एक बडे ताजिर के घर में अब से तकरीबन 51 साल पहले 13 अगस्त 1954 को पैदा हुआ नाम अनिलराव रखा गया, पाँच साल की उम्र में स्कूल में दाखिल हुआ, सन 1959 में हाईस्कूल फिर 1961 में बारहवीं क्लास साईंस साइड से और उसके बाद 1964 में बी. एस. सी और 1966 में फिजिक्स से एम. एस. सी. किया और उसके बाद पी. एच. डी में रजिस्ट्रेशन करा लिया।

अहमदः ऐसी मेयारी तालीम के बावजूद आप हरिद्वार, ऋषिकेश किस तरह गये?
अब्दुर्रहमानः हुआ यह कि मेरे वालिद साहब मेरी शादी करना चाहते थे मगर न जाने क्यूँँ मेरा दिल इस तरह के झमेलों से घबराता था। मेरे पिताजी ने शादी के लिये दबाव डाला तो मैं घर से फरार हो गया। मैं ने हरिद्वार का रूख किया। मैंने इरादा कर लिया कि मुझे बह्मचार्य जिन्दगी गुजारनी है। हमारा घराना आर्य समाजी था। हरिद्वार में एक के बाद एक छः आश्रमों में रहा। मगर वहाँ का माहौल मुझे न भाया। हरिद्वार में एक इन्जिनियर साहब बी. एच. इ. एल में मुलाजमत करते थे और विजयवाडा के रहने वाले थे मेरी उन से अच्छी दोस्ती हो गयी। उन्होंने मेरी बेचैनी देखकर मुझ मशवरा दिया कि तुम्हें शान्तिकुंज में जाना चाहिये या वहीं पर किसी और समाजी आश्रम को तलाश करना चाहिये। मैं ने ऋषिकेश जाकर तलाश शुरू की। बहुत तलाश के बाद मैं ने श्री नित्यानंदजी महाराज के सत्यप्रकाश आश्रम को अपने लिये मुनासिब समझा। जहाँ पर अक्सर लोग पढे लिखे और तालीम याफता थे और स्वामी नित्यानंदजी बहुत पढे लिखे और तालीम याफता थे। वह इलाहाबाद युनिवर्सिटी से संस्कृत में डॉक्ट्रेट करके एक जमाने तक वहाँ रीडर और फिर प्रोफेसर रह चुके थे। छः साल तक मैं वहाँ ब्रहम्चारी रहकर ज्ञान सीखता रहा। छः साल के बाद स्वामी जी ने मुझे परीक्षा के लिये यज्ञ कराये और मुझे शास्त्राी की पदवी प्रदान की। शास्त्राी बनने के बाद मैं ने सात साल मैं चैंतीस यज्ञ किए। जिन में बडा इम्तिहान था मगर मैं सब कुछ त्याग कर अपने मालिक को पाने के लिये आया था। इस लिये मैं ने मुश्किल वक्त में हिम्मत न हारी। वरंगल से आने के सात साल के बाद मेरे बडे भाई और पिताजी मुझे ढूंडते-ढूंडते ऋषिकेश पहुँचे और मुझे न जाने किस तरह तलाश कर लिया। आश्रम में आये एक हफ्ता तक मेरी खुशामद करते रहे और मुझे वापस घर ले जाने के लिये जोर देते रहे। लेकिन मेरा दिल घर जाते हुये घबराता था। मैंने अपने वालिद और भाई की बहुत खुशामद की और मुझे ईश्वर को पाने तक वहाँ रहने देने के लिये कहा, वह मुझे छोडकर इस शर्त पर चले गये की वह अपने खर्च पर आश्रम में रहेगा और दान वगैरा(आदि) यानि सदका खैरात नहीं खायेगा और आश्रम में उन्होंने अन्दाजे से अब तक का खर्च भी जमा किया और एक बडी रकम आईन्दा के लिये जमा कराके चले गये।

अहमदः इतने रोज तक एक प्रोफेसर स्वामी के जेरे तर्बियत ऐसे पढे लिखे लोगों के साथ आश्रम में रहने के बावजूद आपको इस्लाम की तरफ आने का ख्याल कैसे हुआ? अपने कुबूले इस्लाम के बारे में जरा तफसील से बताईये।
अब्दुर्रहमानः असल मेें जिस सच्चे मालिक की तलाश में मैं ने वरंगल छोडा था, उसको मुझ पर तरस आया है उसने मेरे लिये रास्ता खुद निकाल लिया। अहमद भाई आपको मालूम है कि आर्य समाज हिन्दू धर्म की बहुत संशोधित शक्ल है। उस में एक निराकार खुदा की इबादत का दावा किया गया है। मूर्तीपूजा और पुरानी देव मालाई बातों का रद्द किया गया है। उस मज़हब की असल किताब या ग्रंथ ‘सत्यार्थ प्रकाश’ है जो स्वामी दयानन्द सरस्वती की तस्नीफ है। इस मज़हब के बानी स्वामी विवेकानन्द इस्लाम मज़हब और उसकी तालीमात से बहुत ज़्यादा मुतअस्सिर(प्रभावित) हुए और उन्होंने हिन्दुओं को मुसलमान बनने से रोकने के लिये। हिन्दू मजहब को अकल के मुताबिक बनाने के लिये आर्य समाज की बुनियाद रखी। उनका दावा है कि आर्य समाज सौ फीसद वैदिक धर्म है। जो आज तर्कों (दलाइल) पर आधारित है। और बिल्कुल साइन्टिफिक और लॉजिक है। मगर जब मैं ने आर्य समाज को पढा तो मेरे दिल में बहुत सी बातें खटकती थीं। 13 साल की सख्त तरीन तपस्या(मुजाहिदे) के बावजूद मैं अपने अन्दर कोई तब्दीली महसूस नहीं करता था। मैं कभी-कभी स्वामी नित्यानन्दजी से करीब होने की कोशिश करता तो मैं उन को बहुत उलझा हुआ इन्सान पाता। मैं जब उनके सामने अपने इश्कालात(कठिन, वह बातें जिन्हें समझ न पाया) रखता तो कभी वह झुन्झला जाते। मुझे महसूस होता कि यह खुद ही अपनी बात से मुतमइन नहीं। सन 92 मेरे लिये सख्त गुजरा। मां बाप को दुख देकर 13 साल के सन्यास के बाद इसके अलावा लोग शास्त्राी कहने लगे थे। मै। ने अपने अन्दर के इन्सान को पहले से कुछ गिरा हुआ ही पाया। तरह-तरह के ख्यालात मेरे दिल में आये। बाज दफा कई रोज तक मेरी नींद उड जाती कभी ख्याल आता कि खुदा को पाने का यह रास्ता ही गलत है। मुझे किसी और रास्ते को तलाश करना चाहिए। कभी यह ख्याल आता कि मेरी आत्मा में गन्दगी है। इस लिये मुझ पर कुछ असर नहीं हो रहा है। जब कभी रात को मुझे नींद न आती तो मैं उठकर बैठ जाता और मन ही मन में अपने मालिक से दुआएं करता ‘‘सच्चे मालिक अगर तू मौजूद है और जरूर मौजूद है तो अपने अनिल राव का अपना रास्ता दिखा दे, तू खूब जानता है कि मैं ने सब कुछ सिर्फ और सिर्फ तुझे पाने के लिये छोडा है।
इस दौरान उत्तर काशी में सख्त तरीन जलजला आया। पूरा हरिद्वार और ऋषिकेश दहल गया। मेरा दिल और भी डर गया कि इस तरह किसी दिन मैं भी किसी हादसे में मर गया तो मेरा क्या होगा। 17 दिसम्बर 1992 की रात थी। मुझे सवामी जी ने बुलाया और कहा की हरियाण के जिला सोनीपत में राई में एक बडा आर्य समाजी आश्रम है। वहां वे लोग अपना पचास साला समारोह ‘जश्न’ कर रहे है। मुझे वहाँ जाना था मगर मेरी तबीअत अच्छी नहीं यूँ भी अब आपका तआरूफ(परिचय) कराना चाहता हूँ। वहाँ प्रोग्राम की सदारत और यज्ञ के लिये आपको जाना है। मुझे यह सनुकर बहुत खुशी हुई कि स्वामी जी मुझे कितना प्रेम करते हैं। खुखी-खुशी कमरे में आया सफर की तैयारी की मगर रात को बिस्तर पर गया तो मेरे मन में आया कि इस सन्सार के सामने तआरुफ और नाम भी हो जाये तो क्या, क्या इसी लिये तूने वरंगल छोडा था, मेरा दिल बहुत दुखा, मेरी नींद उड गयी। बिस्तर से उठा और आंखें बंद करके मालिक से प्रार्थना करने लगा ‘मेरे मालिक तू सब कुछ करने वाला है। मुझे गुरू की आज्ञा है तो जाना है। मेरे मालिक कब तक में अन्धकार में भटकता रहूंगा। मुझे सच्ची राह दिखा दे वह राह जो तुझे पसंद हो वह रास्ता जिस पर चलकर तुझे पाया जा सके खूब रो-रो कर मैं दुआ करता रहा। रोते रोते मैं सो गया। मैं ने ख्वाब में देखा मैं एक मस्जिद में हूँ वहाँ एक खुबसूरत मौलाना साहब हैं। एक सफेद चादर ऊपर और एक नीचे लुंगी बाँधे तकिया लगाये बैठे हैं बहुत सारे लोग अदब के साथ बैठे है।। लोगों ने बताया की यह हजरत मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम हैं। मैं ने लोगों से सवाल किया कि वह मुहम्मद साहब जो मुसलमानों के धर्म-गुरू हैं तो खुद हजरत मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने जवाब दिया नहीं नहीं में सिर्फ मुसलमानों का धर्म गुरू (रसूल) नहीं हूँ। बल्कि में तुम्हारा भी रसूल हूँ मेरा हाथ पकडा और अपने पास बिठाया और बडे प्यार से मुझे गले लगाया और फरमाया कि जो तलाश करता है वह पाता है तुम्हें कोई हमदर्द मिले तो कद्र करना,आज का दिन तुम्हारे लिये ईद का दिन है। मेरी आंखे खुल गयीं। आप ही आप खुश हो रहा था। मेरे साथियों ने मुझे इतना खुश कभी नहीं देखा था।
मेरे दिल का हाल अजीब था। गुदगुदी सी लग रही थी। आप ही आप खुश हो रहा था। मेरे साथियों ने मुझे इतना खुश कभी नहीं देखा था। वे कहने लगे कि स्वामी जी अपनी जगह अध्यक्षता के लिये भेज रहे हैं। वाकई आप को खुश होना ही चाहिए। उन को क्या मालूम था कि मैं क्यों खुश हो रहा हू। सुबह सवेरे उठकर मैं ऋषिकेश बस अड्डे पहुंचा वहां से सहारनपुर पहुंचा। बस अड्डे के पास एक मस्जिद दिखायी दी। मैं मस्जिद के अन्दर गया। लोग मुझे हैरत से देख रहे थे। मैं ने कहा मालिक का घर है दर्शन करने के लिये आया हूँ। मैं ने मस्जिद के अन्दर जाकर चारों तरफ तलाश किया की रात वाले लोगों में से कोई मिले अगर मस्जिद खाली थी। मस्जिद से वापस आया और बडोत की बस मिलनी थी। सोनीपत जाने वाली हरियाणा रोडवेज में सवार हुआ। आगे की सीट पर आपके अबी (मौलाना कलीम साहब) बैठे हुए थे। मैं ने उन से मालूम किया कि आप के पास कोई और है? उन्होंने कहा नहीं, कोई नहीं आप तशरीफ रखिये। बहुत खुशी के साथ बिठाया। मौलाना साहब ने मुझ से मालूम किया कि पन्डित जी कहाँं से आ रहे हो? मैं ने कहा ऋषिकेश सत्यप्रकाश आश्रम से। उन्होंने सवाल किया की सोनीपत जा रहे हो। हम ने कहा कि नहीं राई में आर्य समाज आश्रम के पचास साला जशन में एक यज्ञ के लिये जा रहा हूँ। उन्होंने पूछा कि आप आर्य समाजी हैं? मैं ने कहा जी हाँ। मौलाना साहब ने अखलाक(नैतिकता) के साथ खैर खैरियत मालूम करके थोडी देर में मुझ से कहा कि बहुत रोजश् से मुझे किसी आर्य समाजी गुरू की तलाश थी। असल में धर्म मेरी कमजोरी है और हर धर्म को पढता हूँ। मुझे ख्याल होता है कि जो हमारे पास है वह सत्य है, यह ख्याल तो अच्छा नहीं। जो सच है वह हमारा है वह कहीं पर भी हो, यह असल सच्चाई की बात है। मैं ने सत्यार्थ प्रकाश भी पढी और बार-बार पढी कुछ बातें समझ में नहीं आयीं। शायद मेरी अक्ल भी मोटी हैं अगर आप बुरा न मानें तो आप से मालूम कर लूँ। मैं एतराज के तौर पर नहीं बल्कि समझने के लिये मालूम करना चाहता हूं। मैं ने कहा जरूर मालूम कीजिये। मौलाना साहब ने सवालात करना शुरू किये मैं जवाब देता रहा। एक के बाद एक सवालात करते रहे। सच्ची बात यह है कि अहमद भाई, मौलाना साहब सवाल करते थे। मुझे ऐसा लगता था की मौलाना कलीम साहब अनिल राव से सवाल नहीं कर रहे हैं बल्कि अनिलराव स्वामी नित्यानंदजी से सवाल कर रहा है। बिल्कुल वो सवालात जो मैं अपने गुरू से करता था और वह मुझे जवाब न दे सकते थे। मुझ पर रात के ख्वाब का असर था। मैं ने चार पाँच सवाल के बाद हथियार डाल दिये और मौलाना साहब से कहा कि मौलाना साहब ये सवालात सारे, मेरे दिल में भी खटकते हैं और मेरे गुरू स्वामी नित्यानंदजी उस का इत्मिनान बख्श जवाब नहीं दे सके फिर मैं आपको किस तरह मुतमइन कर सकता हूं। थोडी देर खामोश रह कर मौलाना साहब ने मुझ से कहा कि मैं एक मुसलमान हूँ। इस्लाम के बारे में सब कुछ तो मैं भी नहीं जानता मगर कुछ जानने की कोशिश की है। मेरा दिल चाहता है कि मैं कुछ इस्लाम के बारे मेें आपको बताऊँ और आप इस्लाम के बारे में सवाल कर सकते हैं। मुझे कोई नागवारी नहीं होगी। मैं इस्लाम के बारे में कुछ भी नही जानता इस लिये सवाल क्या करता? बस सत्यार्थ प्रकाश में कुछ पढा था मगर वह बात मेरे दिल को नहीं लगती थी। मैं ने मौलाना साहब से कहा कि आप इस्लाम के बारे में मुझे जरूर बतायें। और अगर हजरत मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम के जीवन के बारे में मुझे बतायेंगे तो मुझ पर बडा अहसान होगा। मौलाना साहब ने मुझे बताना शुरू किया कि मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम के परिचय के लिये बडी गलत फहमी यह है कि लोग समझते है। की वह सिर्फ मुसलमानों के धार्मिक गुरू हैं। हालांकि कुरआन में जगह-जगह और हजरत मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने बार-बार बताया कि वह पूरी इन्सानियत(मानव-जाती) की तरफ भेजे गये आखरी रसूल (अन्तिम सन्देष्टा) हैं। वह जिस तरह मेरे रसूल हैं आप के भी हैं। अब जो मैं उनके बारे में बताऊँ तो आप यह समझकर सुनें आपको ज्यादा आनन्द आयेगा। मौलाना साहब ने यह कहा तो मुझे रात का ख्वाब याद आया और मुझे ऐसा लगा की रात जो लोग हजरत मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम के साथ थे। यह उन में जरूर थे। और वह हमदर्द यहीं हैं। मौलाना साहब ने ऐसे प्यार से हजरत मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम के जीवन, इन्सानियत पर उनके तरस और उनको रास्ता दिखाने के लिये कुरबानियों और अपने गैरों की दुश्मनी का हाल, कुछ इस तरह बताया कि मैं बार-बार रो दिया। तकरीबन डेढ घंटे का सफर पता भी न चला कि कब पूरा हुआ। बहालगढ़ आ गया। मुझे बहालगढ़ उतरकर दूसरी बसे लेनी थी। मौलाना साहब को सोनीपत जाना था मगर वह भी टिकट छोडकर मेरे साथ बहालगढ उतर गये, मुझ से कहा ‘‘सर्दी का मौसम है, एक कप चाय हमारे साथ पी लें।’’ मैं ने कहा, ‘‘बहुत अच्छा’’। मैं ने सामने एक रेस्टोरेंट की तरफ इशारा किया कि चलें। मगर मौलाना साहब ने कहा, ‘‘यहाँ पर हमारे एक दोस्त की दुकान है। वहीं पर चाय मंगा लेते हैं।’’ हम दोनों वहाँ पहुँचे, चाय मंगाई गयी। मैं मौलाना साहब को देखता तो बार बार मुझे रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम का फरमान याद आता, कोई हमदर्द मिले तो कद्र करना। मैं ने मौलाना साहब से मालूम किया कि ‘‘आप लोगों को मुसलमान बनाते है। तो क्या रस्म अदा करते हैं?’’ मौलाना साहब ने कहा की ‘‘इस्लाम में कोई रसम नहीं यह मज़हब तो एक हकीकत है बस दिल में एक खुदा को सच्चा जानकर उस को खुश और राजी करने के लिये और उसके आखरी और सच्चे रसूल के बताये हुये तरीके पर जिन्दगी गुजारने का अहद करने वाला मुसलमान होता है बस’’, मैं ने कहा ‘‘फिर भी कुछ तो आप कहलवाते होंगे।’’ उन्होंने कहा, ‘हाँ इस्लाम का कलमा है। हम अपने भले और साक्षी बनने के लिये वह कलमा पढवाते हैं।’’ मैं ने कहा ‘‘आप मुझे भी वह कलमा पढवा सकते हैं?’’। मौलाना साहब ने कहा, ‘‘बहुत शौक से, पढिये ‘अश्हदु अल्ल ला इलाह इल्लल्लाहु व अश्हदु अन्न मुहम्मदन अब्दुहू व रसूलुहू।’’ मौलाना साहब ने उस का तर्जमा भी हिन्दी में कहलवाया। अहमद भाई। मैं जबान से उस हाल को ब्यान नहीं कर सकता कि इस कलमे को पढने के बाद मैं ने अपने अन्दर क्या महसूस किया। बस ऐसा लगता था कि एक इन्सान बिल्कुल अन्धकार और घुटन से बिल्कुल प्रकाश और उजाले में आ गया और अन्दर से जैसे न जाने कितने बन्धन से आजाद हो गया। मुझे जब भी वह कैफियत याद आती है तो मुझे खुशी और मजे का एक नशा सा छा जाता है। ईमान के नूर का मजश अल्लाह अल्लाह देखिए अब भी मेरा रूआं (रोम) खडा है।

अहमदः माशा अल्लाह। वाकअी आप पर अल्लाह का खास फजल है। आप सच्चे मतलाशी(जिज्ञासु) थे इस लिये उस ने आप को राह दिखायी। उसके बाद राई के प्रोग्राम का क्या हुआ?
अब्दुर्रहमानः मौलाना साहब ने मुझे बहुत मुबारकबाद दी और गले लगाया। मुझ से पता वगैरा लिया और सोनीपत जाने लगे। वहाँ से मुरतदों(विमुख,विधर्मी) के एक गाँव भूरा रसूलपुर जाना था जो सन 47 में मुरतद(विमुख) हो गये थे और खानदानी हिन्दुओं से भी ज्यादा सख्त हिन्दू हो गये थे, मैं ने मौलाना साहब से कहा कि आप मुझे कहाँ छोडकर जा रहे हैं? अब आपको मुझे भी साथ लेना है। मौलाना साहब ने कहा वाकई अब आपको मेरे साथ ही जाना बल्कि रहना चाहिये मगर राई के प्रोग्राम का क्या होगा? मैं ने कहा कि मुझे उस प्रोग्राम में शरीक होना क्या अच्छा लगेगा, मौलाना साहब मेरे इस ख्याल से खुश हुये। पीले कपडों, माथे पर तिलक और डमरू हाथ में लिये मैं भी मौलाना साहब के साथ हो लिया और हम लोग भूरा रसूलपुर पहुँचे। मौलाना साहब ने बताया कि इस इलाके के लोग इस्लाम को जानते नहीं थे। उन को ईमान की कद्र व कीमत मालूम नहीं थी। इस लिये सन 47 में फसादात से घबराकर ये मुरतद(विमुख) हो गये थे। छोटे-छोटे बच्चे के हाथ में हीरा हो उसे हीरे की कीमत क्या मालूम। अब अगर उसको कोई डरा धमका दे तो वह हीरा दे देगा की यह पत्थर है। अगर वह जौहरी के हाथ में हो तो वह जान दे देगा मगर हीरा नहीं देगा। अब हम लोग उन को ईमान की जरूरत और कीमत बताकर दोबारा इस्लाम में लाने की कोशिश में हैं। भूरा गाँव में एक मस्जिद थी। बिल्कुल वीरान। मौलाना साहब ने बताया कि यहाँ सिर्फ एक गूजर घर मुसलमान है। हालांकि सन 47 से पहले यह पूरा गाँव मूला जाट मुसलमानों का था। अब ये मूला जाट ऐसे सख्त हो गये हैं की चन्द साल पहले यहाँ एक तब्लीगी जमात आयी थी मस्जिद में कयाम किया यह बेचारा गूजर मुसलमान उन को लेकर मूला जाटों में ले गया। बस गांव में फसाद हो गया उन मुर्तदों ने अदालत में मुकदमा कर दिया कि शर(उपद्रव) फैलाने के लिये यह हमारे यहाँ मुल्लाओं को लेकर आया है, मुकदमा चला और उस बेचारे गूजर को एक गश्त की रहबरी की कीमत मुकदमें में तकरीबन 20 हजार रूपये लगाकर चुकानी पडी, उत्तर काशी के जलजले के झटके यहाँ तक आए थे लोगों के दिल जरा डरे हुये थे। मौलाना साहब ने मस्जिद के इमाम साहब से कहा कि कोशिश करो कुछ जिम्मेदार लोगों को मस्जिद में बुला लाओ, कुछ मशवरा करना है, कम अज कम किसी बहाने लोग अल्लाह के घर में आ जायेंगे। इमाम साहब ने कहा भी कि लोग मस्जिद में नहीं आयेंगे, मगर मौलाना साहब ने कहा कोशिश करें अगर आ गये तो अच्छा है वरना प्रधान के घर में लोगों को बुलायेंगे, खुदा का करना ऐसा हुआ कि वह लोग मस्जिद में आ गये, मैं ने मौलाना साहब से पहले कुछ कहने की ख्वाहिश जाहिर की, मौलाना साहब ने इजाजत दे दी, मैं ने लोगों से अपना परिचय (तआरुफ) कराया कि मैं वरंगल के बहुत बडे ताजिर का बेटा हूं। एम. एस. सी. करने के बाद पी. एच. डी. मुकम्मल करने वाला था, कि घर वालों ने शादी के लिये बदाव दिया, मैंं दुनिया के झमेलों से बचकर हरिद्वार आगया एक के बाद एक तकरीबन हर आश्रम को देखा बाद में ऋषिकेश रहा, वहाँ भी बहुत से आश्रमों में रहा, 13 साल वहां तपस्या (मुजाहिदे) करता रहा, 13 साल में मुझे इस हिन्दू धर्म के मरकज में इस के अलावा कुछ न मिला कि लोग मुझे शास्त्राी कहने लग, इसके अलावा शान्ति जिस का नाम है उस का कहीं पता नहीं लगा, मालिक की मेहरबानी हुई मौलाना साहब के साथ बडोत से बालगढ तक मौलाना साहब के साथ सफर करके आया और कलमा पढ के मिली, वह 13 सालों में मुझे नहंी मिली। मेरे भाइयो! ऐसे शान्ति और सच्चे धर्म को छोड कर इस बेचैनी में आप क्यों वापस जा रहे हैं, यह कहते हुये मुझ से रहा न गया और मेरी हिचकियाँ बंध गयी, मेरी इस सच्ची और दर्द भरी बात का वहाँ के लोगों पर बडा असर हुआ और वहाँ के लोगों ने इस्लामी स्कूल कायम करने के लिये आमादगी जाहिर की, बल्कि उसके लिये चंदा भी दिया, उस में सब से ज्यादा दिलचस्पी गांव के प्रधान करण सिंह ने दिखायी जो सब से ज्यादा इस्लाम का मुखालिफ था। मौलाना साहब बहुत खुश हुए और मुझे मुबारकाद दी और कहने लगे आप का इस्लाम इन्शाअल्लाह न जाने कितने लोगों के लिये हिदायत का जरिआ बनेगा।

अहमदः उसके बाद आप कहाँ रहे?
अब्दुर्रहमानः मौलाना साहब के साथ फुलत वापस आये, कपडे उतारे, चोटी कटवाई, खत बनवाया, और हुलिया ठीक कराके मौलाना साहब ने मुझे जमाअत में चिल्ला(40 दिन) लगाने के लिये भेज दिया। हमारा चिल्ला मथुरा के इलाके में लगा, मुझे अपने इस्लाम की बहुत खुशी थी बार-बार मैं शुक्राने की नमाज पढता था, मेरे अल्लाह ने मेरी मुराद पूरी की मगर जब गैरमुस्लिम भाईयों को देखता कि बेचारे रास्ता न मालूम होने की वजह से कुफ्र(अधर्म, नास्तिकता) और शिर्क(अनेकेश्वरवाद) के लिये कैसी कुरबानियाँ दे रहे है। तो मुझे ख्याल होता कि यह तो मुसलमान का जुल्म हैं, कितने लोग कुफ्र और शिर्क पर मर कर हमेशा की दोजख का इन्धन बन रहे है।, प्यारे नबी सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने तो ये काम पूरे मुसलमानों के जिम्मे सोंपा था मै। इस लिससिले में बहुत सोचने लगा और मेरी खुशी एक तह गम की तरफ लौट आयी। इस गम में घुलता था कि किस तरह लोगों तक हक पहुंचे मैं ने मथुरा मर्कज से मौलाना अली मियाँ का पता लिया और उनके नाम अपने इस हाल के लिये खत लिखा वह खत आपने अरमुगान दावत में पढा होगा।

‘वह खत पाठकों के लिये दिया जा रहा हैः
आदरणीय जनाब मौलाना अली मियाँ साहब
अस्सलामु अलैकुम व रहमतुल्लाहि व बरकातुह।
आप को यह मालूम होकर आश्चर्य होगा कि मै। आपका नया सेवक हूँ। .... के साथ सफर किया और वहाँ सफर किया, जमाअत में जा रहा हूँ। वहाँ से आकर हरिद्वार में काम करने का इरादा है। वहाँ पर शान्ति की तलाश में आये मुझ जैसे कितने लोग भटक रहे हैं। आप मेरे लिये दुआ करें। एक प्रश्न गलती की मआफी के साथ आप से करता हूँ जो लोग इस्लाम की दावत न देने की वजह से इस्लाम से दूर रहकर दुनिया से चले गये और सदा के नर्क के इन्धन बन गये उन की जिम्मेदारी किस पर होगी? आप से दुआ की उम्मीद है।
आप का सेवक
अब्दुर्रहमान ‘अनिलराव शास्त्री’

अहमदः जमात से आने के बाद आप ने क्या मशगला(कार्य) अख्तियार किया?
अब्दुर्रहमानः मैं ने जमाअत में इरादा किया था मि मैं हरिद्वार और ऋषिकेश जाकर दावत का काम करूंगा। कितनी बडी तादाद में हक के मतलाशी गैर मुस्लिम भाई राह मालूम न होने की वजह से वहां भटक रहे हैं। बल्कि अब तो बडी तादाद अंगे्रजों और यहूदियों की भी वहाँ रहने लगी है। मैं जमात से वापस आया तो मौलाना साहब ने मुझे कहा की आपका मैदान तो हरिद्वार ओर ऋषिकेश ही है, मगर पहले अपने घरवालों का हक है। आप एक आध साल वरंगल जाकर रहें। मैं वरंगल गया। वहाँ जाकर मालूम हुआ कि मेरे वालिद और वालिदा का इन्तकाल हो चुका है। वे आखिर तक मुझे याद करते रहे और तडपते रहे। अभी तक मुझे गैर मुताल्लिक गैरमुस्लिमों के कुफ्र(अधर्म, नास्तिकता) और शिर्क(अनेकेश्वरवाद) पर मरने का गम सवार था मगर अब मेरी माँ जिस ने मुझे जन्म दिया। जिस ने अपने खून से बना दूध मुझे पिलाया। जिस ने मेरा पेशाब और पाखाना साफ किया। मेरे प्यारे वालिद जो मुझे अपनी आँखों का तारा समझकर पालते पोसते रहे। मेरे घर से जाने के बाद पाँच छः साल तक सारे देश में मुझे तलाश करते रोते फिरते रहे। मेरे मोहसिन माँ बाप ईमान से महरूम कुफ्र और शिर्क पर मर गये और वे दोजख में जल रहे होंगे बस यह ख्याल मेरे सीने का ऐसा जख्म है, मेरे भाई अहमद शायद आप इस दर्द को नहीं समझ सकते। यह एक जख्म है जिस का कोई मरहम नहीं और ऐसा दर्द है जिसकी कोई दवा नहीं और जब मैं सोचता हूँ कि मुसलमानों ने इनको ईमान नहीं पहुँचाया तो मैं सोचता हूँ की ऐसे जालिमों को कैसे मुसलमान कहूँ यह बात भी है कि मुझ भटके को मुसलमान ही ने रास्ता दिखाया। मगर शायद मेरे लिये मेरे ईमान से ज्यादा जरूरी मेरे माँ बाप का ईमान है। जब कि वह इस्लाम से बहुत करीब थे। अपने घर में मुसलमान मुलाजिम रखते थे। ड्राईवर हमेशा मुसलमान रखते थे। बीडी की फेक्ट्री में सारे काम करने वाले मुसलमान थे। हिन्दू धर्म में उनको जरा भी यकीन नहीं था। वह कहा करते थे की मैं तो पहले जन्म में मुसलमान ही रहा हूँगा। इस लिये मुझे सिर्फ इस्लाम की बातें भाती हैंं। एक रोज वह अपने ड्राईवर से कहने लगे किसी बुरे कर्म की वजह से में इस जन्म में गैर मुस्लिम पैदा हो गया अगले जन्म में उम्मीद है कि मैं मुसलमान पैदा हूँगा। अहमद भाई मैं ब्यान नहीं कर सकता कि इस गम में मैं किस कदर घुलता हूँ। और मुझे कभी-कभी मुसलमानों पर हद दर्जा गुस्सा भी आता है। मेरे भाई! काश में पैदा ही न होता (रोते हुये) आप जरा तसव्वुर करें उस बेटे के गम और जिन्दगी का दुख जिसको यकीन हो कि उसके प्यारे मुश्फिक(स्नेही) व मोहसिन(उपकारी) माँ बाप दोजख में जल रहे होंगे। (बहुत देर तक रोते हुये)
अहमदः क्या खबर अल्लाह तआला ने उन को ईमान अता कर दिया हो। जब वे ईमान के इस कदर करीब थे तो हो सकता है अल्लाह तआला ने फरिश्तों से उनकेा कलमा पढवा दिया हो, ऐसे भी वाकिआत मिलते हैं।
अब्दुर्रहमानः हाँ मेरे भाई काश यह बात सच हो। झूठी तसल्ली के लिये मैं अपने दिल को यह भी समझाता हूं। मगर जाहिर है यह सिर्फ तसल्ली है।
अहमदः बाकी रिशतेदारों की तो आप फिक्र करते? आपने उन पर कुछ दावती काम किया?
अब्दुर्रहमानः अलहम्दु लिल्लाह मेरे बडे भाई, भाभी और दो बच्चों के साथ मुसलमान हो गये हैं, वालिद के इन्तकाल के बाद कारोबार पर बहुत बुरा असर पडा। फेक्ट्री बंद हो गयी। उन्होंने घर बेचकर अब गुलबर्गा में मकान खरीदा है और कारोबार शुरू किया है।
अहमदः आपकी शादी का क्या हुआ?
अब्दुर्रहमानः मेरी तबियत जिम्मेदारी से घबराती है। इस लिये अन्दर से दिल शादी के लिये आमादा नहीं था मुझ जैसे माजूर(मजबूर) के लिये शायद शरियत में गुन्जाइश भी होती। मगर मौलाना साहब ने निकाह के सुन्नत होने और उस के फजाइल कुछ इस तरह ब्यान किये की मुझे उस में आफियत मालूम हुई। मैं ने एक गरीब लडकी से शादी कर ली है। अल्हम्दु लिल्लाह वह बहुत नेक सीरत और हद दर्जा खिदमत गुजार है और अल्लह तआला ने हमें दो बच्चे एक लडका और एक लडकी अता फरमायी।
अहमदः हरिद्वार और ऋषिकेश में काम के इरादे का ख्याल हुआ?
अब्दुर्रहमानः वालिद वालिदा के कुफ्र(अधर्म, नास्तिकता) और शिर्क(अनेकेश्वरवाद) पर मरने के गम ने मुझे निढाल कर दिया था। एक जमाने तक मेरे होश व हवास खत्म हो गये थे नीम पागल जंगलो में रहने लगा। भाई साहब मुझे पकडकर लाये। इलाज वगैरा कराया। कई साल में जाकर तबियत बहाल हुयी, तीन साल पहले मैं ऋषिकेश गया। सत्यप्रकाश आश्रम पहुँचा, स्वामी नित्यानंदजी से मिला। कुछ किताबें मेरे पास थीं। मौलवी साहब की, ‘आपकी अमानत-आपकी सेवा में’, उन को बहुत भायी। वह बहुत बीमार थे। उन के गदूद में कैंसर हो गया था। एक रोज उन्हों तन्हाई में मुझे बुलाया और मुझ से कहा कि मेरे दिल में भी यह बात आती है कि इस्लाम सच्चा मजहब है। मगर इस माहौल मे मेरे लिये इस को कुबूल करना सख्त मुश्किल है। में ने उस को बहुत समझाया कि आप इतने पढे लिखे आदमी हैं। अपने धर्म को मानने का हर इन्सान उसके पूरे सन्सार के लोगों के सामने जाहिर करने का हर इन्सान का कानूनी हक है। आप खुलकर एलान करें। मगर वह डरते रहे बार-बार मुझ से इस्लाम पर यकीन का जिक्र करते। मैं ने उन को कुरआन शरीफ हिन्दी अनुवाद के साथ लाकर दिया वह माथे और आँखों पर लगाकर रोज पढते थे। उन की बिमारी बढती रहीं। मैं ने इस ख्याल से कि कुफ्र पर मरने से बच जायेंं। उन से कहा कि आप सच्चे दिल से कलमा पढकर मुसलमान हो जायेंं। चाहे लोगों में एलान न करे। दिलों का भेद जानने वाला तो देखता और सुनता है। वह इस पर राजी हो गये। मैं ने उन को कलमा पढवाया और उन का नाम मुहम्मद उस्मान रखा। मौत से एक रोज पहले उन्होंने आश्रम के लोगों को बुलाया और उन से अपने मुसलमान होने का खुलकर ऐलान किया और कहा कि मुझे जलाया न जाये बल्कि इस्लाम के तरीके पर दफनाया जाये। लोगों ने इस्लाम के तरीके पर तो नहीं बल्कि हिन्दुओं के तरीके पर उनको बिठाकर समाधि बना दी। अल्लाह का शुक्र है कि वह यहाँ की आग से भी बच गये। उन के मुसलमान होने पर ऋषिकेश में बहुत से लोग मेरे मुखालिफ हो गये। मुझे वहाँ रहने का खतरा महसूस होने लगा। मैं ने फुलत आकर पूरे हालात बताए। मौलाना साहब ने मेरा हौसला बढाया कि दाअी(धर्म निमन्त्राक, आवाहक) को डरना नहीं चाहिये, कुरआन का इरशाद हैः
‘अल्लजीना युबल्लिगूना रिसालातिल्लाहि व यख्शौनहू व ला यख्शौना अहदन इल्लल्लाही व कफ़ा बिल्लाहि हसीबा’’
(अनुवादः ‘जो अल्लाह को पैगाम पहुँचाते हैं और उस से डरते हैं वह अल्लाह के सिवा किसी से नहीं डरते और उनके हिसाब के लिये अल्लाह काफी है’)
अल्लाह की मदद हमेशा दाईयों(धर्म निमन्त्राक, आवाहक) के साथ रही है। कुछ रोज गुलबर्गा रहकर मैं ने फिर ऋषिकेश का सफर किया, हमारे आश्रम के कई जिम्मेदार अब मेरे और इस्लाम के बहुत करीब हैं और दूसरे आश्रमों में भी लोग मानूस(परिचित) हो रहे हैं। शान्तिकुंज के तो बहुत से लोग इस्लाम को पढ रहे हैं। उम्मीद है कि दाअवत की फिज़ा ज़्ारूर बनेगी अब काफी लोग मेरी बातें मुहब्बत से सुनते हैं। मेरा इरादा मुस्तकिल वहीं रहने का है और काम करने का है। अल्लाह तआला मुझे हिम्मत अता फरमायें।
अहमदः बहुत बहुत शुक्रिया। अब्दुर्रहमान साहब, आपसे बहुत बातें पाठकों के हवाले से हो गयी।। आप उनको कुछ पैगाम देना चाहेंगे?
अब्दुर्रहमानः बस मुसलमान भाईयों से तो मेरी दरखास्त यही है कि हम जैसे दुखियारों के गम को समझें, जिन को अल्लाह ने हिदायत दी। मगर उनके माँ बाप दोजख में जल रहे हैं। जरा गहराई से इस गम को समझने की कोशिश करें और नबीये अकरम सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने जो जिम्मेदारी हम मुसलमानों के जिम्मे सुपुर्द की है उसके लिए फिक्र करें।
अहमदः वाकई आपकी बात सच है। अल्लाह तआला हमें इस दर्द को समझने की तौफिक अता फरमायें।
अब्दुर्रहमानः आमीन
अहमदः जजाकल्लाहु खैरा, अस्सलामु अलैकुम
अब्दुर्रहमानः व अलैकुमुस्सलाम व रहमतुल्लाहि व बरकातुह।

साभार मासिक ‘अरमुगान’ फुलत , सितम्बर 2005, पृष्ठ 13 से 21









کتاب ’’نسیم ہدایت کے جھونکے‘‘ ان نو مسلم بھائیوں بہنوں کے انٹرویوز کا مجموعہ ہے  جو خداوند عالم کی توفیق و عنایت اور داعیِ اسلام حضرت مولانا محمد کلیم صاحب صدیقی اور ان کے  رفقاء کی کوششوں سے نعمت اسلام اور ہدایت کے نور سے سرفراز ہوئے ان نو مسلم بھائیوں کے قبول اسلام کےانٹرویوزماہ نامہ ’’ارمغان‘‘ میں مسلسل شائع ہوتے رہے ہیں اور الحمد للہ یہ سلسلہ اب بھی جاری ہے۔


Nasim e hidayat ke Jhonke Vol. 1 to 6 [ urdu ] نسیم ہدایت کے جھونکے  

This book Set is collection of interviews with newly converts to Islam who got guidance and Allah's blessing due to efforts of made preaches of Islam Hazrat Maulana Muhammad Kaleem Siddiqui and his associates. These interviews were published in Urdu Monthly "ARMUGHAN" and the series still continuing. This magazine is edited by Maulana Wasi Sulaiman Nadvi under the patronage of Hazrat Maulana Muhammad Kaleem Siddiqui
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"नसीमे हिदायत के झोंके" उन नो मुस्लिमों के इंटरव्यू का संग्रह है जो अल्लाह के आशीर्वाद से मौलाना कलीम सिद्दीकी और उनके साथियों की कोशिशों  से इस्लाम धर्म  में आये, ये साक्षात्कार फुलत, उत्तर प्रदेश की  उर्दू मासिक पत्रिका अरमुगान में छप चुके हैं।



Nasim e hidayat ke Jhonke Vol. 1 to 6 [ hindi ] नसीमे हिदायत के झोंके

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