Wednesday, May 19, 2010

डाक्टर मुहम्मद हुज़ेफा (डी. एस. पी. रामकुमार) से मुलाकात interview 4

डाक्टर मुहम्मद हुज़ेफा (डी. एस. पी. रामकुमार) से मुलाकात interview 4

अहमद अव्वाह: अस्सलामु अलैकुम व रहमतुल्लाहि व बरकातुह
डा. हुजैफाः व अलैकुमुस्सलाम व रहमतुल्लाहि व बरकातुह

अहमदः अल्लाह का शुक्र है आप आ गये, अबी (मौलाना कलीम सिश्द्दीकी साहब) से बहुत मर्तबा आपका जिक्र सुना। अबी अकसर लोगों के सामने आपका जिक्र करते हैं। अपने खूनी रिश्ते के भाईयों की खैर ख्वाही(शुभेच्छा) और उनको हमेशा की हलाकत और अजाब से बचाने के लिये इस्लाम की दअवत देना न सिर्फ यह की इस्लामी फरीजा है बल्कि यह एक खैरख्वाही होने की वजह से हमारे मुल्क के कानून के लिहाज से भी हमारा कानूनी हक है। इस सिलसिले में आपके कबूले इस्लाम का तज़्किरा(वर्णन) मिसाल के तौर पर किया करते हैं। मुझे आपसे मुलाकात का इश्तियाक(लालसा,उत्सुकता) था। अल्लाह ने मुलाकात करा दी।
डा. हुजैफाः मैं दिल्ली एक सरकारी काम से आया था। मौलाना साहब का फोन तो मिलता नहीं। ख्याल हुआ की फोन करके देख लूँ। अगर फुलत हुये तो मुलाकात करके जाऊंगा। बहुत दिनों से मुलाकात न हो पाने की वजह से बहुत बेचैन सा था। फोन मिलाया तो मालूम हुआ मौलाना साहब दिल्ली में ही हैं। मेरे लिये इस से ज्यादा खुशी की बात क्या हो सकती है कि दिल्ली में मुलाकात हो गयी। मेरे अल्लाह का करम है। रमजान से पहले मुलाकात हो गयी। बेकरारी भी बहुत हो रही थी और जरा ईमान की बेटरी भी चार्ज हो गयी। बहुत दिन मुलाकात को हो जाते हैं तो ऐसा लगता है जैसे अन्दर से बेटरी डाउन हो गयी। अल्हम्दुलिल्लाह मुलाकात हो गयी और एक प्रोग्राम में भी मौलाना साहब के साथ शिर्कत हो गयी। बयान से भी तसल्ली सी हो गयी।

अहमदः हुजैफा साहब मैं आपसे एक मतलब के लिये मिलना चाहता था। हमारे यहाँ फुलत से एक माहनाम ‘अरमुगान’ के नाम से निकलता है। शायद आप के इल्म में हो। उसके लिये एक इण्टरव्यू आप से लेना चाहता हूँँ ताकि दावत का काम करने वालों के लिये रहनुमाई भी हो। खुसूसन आपके इण्टरव्यू से खौफ कम हो और हौसला बढे।
डा. हुजैफाः हाँ अहमद भय्या। मैं अरमुगान को खूब जानता हूँँ। मैं ने मौलाना साहब से कई मर्तबा दरख्वास्त की है कि उस का हिन्दी एडीशन जरूर निकालें। मैं ने मौलाना साहब से कहा था की हिन्दी के कम से कम पाँच सौ सालाना मेम्बर मैं बनवाऊँगा, इन्शाअल्लाह। मुझे मालूम हुआ है कि सितंबर से हिन्दी एडीशन निकल रहा है मगर न जाने क्या वजह हुई की सितम्बर में भी वह नहीं आ सका।
अहमदः वह इन्शाअल्लाह जल्दी आ रहा है। आप फिक्र न करें और मौलाना वसी साहब उसके लिये बहुत फिक्रमन्द हैं और लोगों का तकाजा भी बहुत है।
डा. हुजैफाः खुदा करे यह खबर जल्दी सच हो। अहमद भाई हुक्म करें मुझ से क्या मालूम करना चाहते हैं?
अहमदः आप अपना तआरुफ(परिचय) कराइये।
डा. हुजैफाः मशरिकी यु. पी. बस्ती जिला के एक गाँव के जमीन्दार के यहाँ पैदाईश। 13 अगस्त 1957 को हुयी। 1977 में इन्टर पास किया। मेरे चचा यु. पी. पुलिस में डी. एस. पी. थे। उनकी ख्वाहिश पर पुलिस में भर्ती हो गयी। दौराने मुलाजमत 1982 में मैंने बी. काम किया और 1984 में एम. ए. किया। यु. पी. के 55 थानों में इंस्पेक्टर थाना इन्चार्ज रहा। 1990 में प्रोमोशन हुआ। सी. ओ. हो गया। 1997 में एक ट्रेनिंग के लिये फ्लोर एकेडमी जाना हुआ तो एकेडमी के डायरेक्टर जनाब ए. ए. सिद्दीकी साहब ने जो हमारे चचा के दोस्त भी थे। मुझे क्रिमिनोजॉजी में पी. एच. डी करने का मशवरा दिया और मैंने छुट्टी लेकर 2000 में पी. एच. डी की। 1997 में मेरा परफॉरमेंस(बेहतर काकर्दगी) की बुनियाद पर खुसूसी प्रोमोशन डी. एस. पी के ओहदे पर हो गया और मेरी पोस्टिंग मुजफ्फरनगर में खुफिया पुलिस के महकमे में हो गयी। मेरे एक छोटे भाई हैं जो इन्जिनियर हैं। एक बहन हैं जिस की शादी एक लेकचरार से हुई है। खानदान में अलहम्दुलिल्लाह तालीम का रिवाज रहा है। आजकल मेें मशरिकी यु. पी. में एक जिला हेडक्वार्टर में महकमा खुफिया पुलिस का जिम्मेदार हूँ।
अहमदः अपने कुबूले इस्लाम के बारे में बताईये।
डा. हुजैफाः हमारा खानदान पढा लिखा खानदान होने की वजह से अपनी मुस्लिम दुशमनी में मशहूर रहा है। उस की एक वजह यह रही की हमारे खानदान की एक शाख तकरीबन सौ साल पहले मुसलमान होकर फतेहपुर हंसवा और प्रतापगढ में जाकर आबाद हो गयी थी। जो बहुत पक्के मुसलमान हैं। इधर हमारी बस्ती में तीस साल पहले बस्ती के जमीन्दारों की छुआ-छूत से तंग आकर आठ दलित खानदानों ने इस्लाम कुबूल किया था। उन दोनों वाकिआत की वजह से हमारे खानदान में मुस्लिम दुश्मनी के जज़्बात और भी ज़्यादा हो गये थे। बाबरी मस्जिद की शहादत के जमाने में उस में और भी ज़्यादती हो गयी। हमारे खानदान के कुछ नौजवानों ने बजरंग दल की एक ब्रांच गांव में कायम कर ली थी। जिस में सब से ज्यादा हमारे खानदान के लडके मेम्बर थे। मैं ने यह बातें इस लिये बतायीं कि किसी आदमी के इस्लाम कुबूल करने के लिय मुखालिफत तरीन माहौल मेरे लिये था मगर अल्लाह को जिस का नाम हादी और रहीम(कृपालू व सण्मार्ग-प्रदर्शक) है अपनी शान का करिश्मा दिखाना था। उसने एक अजीब राह से मुझे राह दिखायी।
हुआ यह कि जब गाजियाबाद जिले के पिलखवा के एक खानदान के नौ लोगों ने मौलाना के पास आकर फुलत में इस्लाम कुबूल किया दो माँ बाप और चार लडकियाँ और तीन लडके। लडका शादीशुदा था। मौलाना साहब से उन लोगों ने कलमा पढवाने के लिये कहा और बताया कि हम आठ लोग तो अभी कलमा पढ रहे हैं। यह बडा लडका शादीशुदा है इस की बीवी अभी तैयार नहीं जब उसकी बीवी तैयार हो जायेगी। यह उसके साथ कलमा पढेगा। मौलाना साहब ने कहा मौत जिन्दगी का कुछ भरोसा नहीं यह भी साथ ही कलमा पढ ले अभी अपनी बीवी को न बताये और उसको तैयार करे और उसके साथ दोबार कलमा पढ ले। मौलाना साहब ने उन सबको कलमा पढवाया और उनकी फरमाइश पर उन सब के नाम भी इस्लामी रख दिये। उन लोगों के कहने पर एक पैड पर उनके कुबूले इस्लाम और उनके नये नामों का सर्टीफिकेट बनाकर दे दिया। उन लोगों को बता भी दिया कि कानूनी कारवाई जरूरी है, उसके लिये ब्याने हल्फी तैयार कराके डी.एम. को रजिस्टर्ड डाक से भेजना और किसी अखबार में एलान निकालना काफी होगा। ये लोग खुशी-खुशी वहाँ से गये और कानूनी कारवाई पक्की कराई। बच्चों को मदरसे में दाखिल कर दिया। बडी लडकियाँ और माँ औरतों के इज्तिमा (सम्मेलन) में जाने लगीं।
मुसलमान औरतों का मालूम हुआ तो उन्होंने खुशी में मिठाई तक्सीम कर दी। लडके के बीवी को मालूम हो गया तो उसने अपने मैके वालों को खबर कर दी। एक से एक को खबर होती गयी। और माहौल गर्म हो गया। इलाके की हिन्दू तन्जीमें जोश में आ गयीं। आज कल टी. वी. चैनल के लोग आ गये। देखते-देखते खबर फैल गयी। दैनिक जागरण और अमर उजाला दोनों हिन्दी अखबारों में चार कालमों की बडी-बडी खबरें छपीं। जिनका हैडिंग था ‘लालच देकर धर्मांतरण पर पूरी हिन्दू बिरादरी में रोष, धर्मांतरण फुलत मदरसे में हुआ’।
इस खबर से पूरे इलाके में गर्मी पैदा हो गयी, मेरी पोस्टिंग मुजफ्फरनगर में थी। अलावा अपनी दफ्तरी जिम्मेदारी के मुझे खुद इस खबर पर गुस्सा आया और हम अपने दो इस्पेक्टरों को लेकर फुलत पहुँचे। वहाँ जिन लोगों से मुलाकाता हुई, उन्होंने लाइल्मी का इज़्हार किया और बताया कि मौलाना साहब ही सही बता सकते हैं। और हमें इत्मिनान दिलाया की हमारे यहाँ कोई गैर कानूनी काम नहीं होता। मौलाना साहब से आप मिलें वह आप को बिल्कुल हक बात बता देंगे। मैं ने अपना फोन नम्बर वहाँ दिया कि मौलाना साहब से मालूम करके मुझे बताएँ कि वह फुलत कब आ रहे हैं?
तीसरे रोज मौलाना साहब का फुलत का प्रोग्राम था। 6 नवम्बर 2002 की सुबह 11 बजे हम फुलत पहुँचे। मौलाना साहब से मिले। मौलाना साहब बहुत खुशी से हम से मिले। हमारे लिये चाय नाश्ता मंगाया। बोले ‘बहुत खुशी हुई आप आये, असल में मौलवी, मुल्लाओं और मदरसे के सिलसिले में बहुत गलत प्रोपेगंडा किया जाता है। मैं तो अपने साथियों और मदरसे वालों से बार बार यह कहता हूँँ कि पुलिस वालों, हिन्दू तन्जीमों के जिम्मेदारों और सी. आई. डी, सी. बी. आई के लोगों को ज्यादा से ज्यादा मदरसों में बुलाना बल्कि चन्द दिन मदरसों में मेहमान रखना चाहिये ताकि वे अन्दर के हाल से वाकिफ हो जाएँ और मदरसों की कद्र पहचानें। मुझे मालूम हुआ कि आप एक दिन पहले भी आये थे। मुझे एक सफर पर इधर ही से जाना था मगर ख्याल हुआ कि आप को इन्तजार करना पडेगा। इस लिये में सिर्फ आपके लिये आज आ गया हूँँ।
मौलाना साहब ने हँस कर कहा ‘फरमाइये मेरे लायक क्या सेवा है?’ अहमद भाई! मौलाना साहब ने मुलाकात के शुरू में ही कुछ ऐसे एतमाद का और मुहब्बत का इजहार किया कि मेरी सोच का रूख बदल गया। मेरा अन्दर का गुस्सा आधा भी न रहा। मैं ने अखबार निकाले और मालूम किया कि आपने यह खबर पढी है? मौलाना साहब ने बताया की रात मुझे यह अखबार बताया गया था। मैं ने अमर उजाला में यह खबर पढी है। मैंने कहा फिर आप इस के बारे में क्या कहते हैं? मौलाना साहब ने बताया कि मैं एक सफर जा रहा था। गाडी मेंे सवार हो रहा था कि जीप गाडी आयी। मुझे सफर की जल्दी थी। मैं ने साथियों से कहा कि ये लोग हजरत जी से मिलने आये होंगे। उनको उधर कारी हिफजुर्रहमान साहब का पता बता दो। मगर एक साहब जानते थे कहा हमें किसी दूसरी जगह नहीं जाना है। हम लोग आप के पास आये हैं ये हमारे भाई अपने घरवालों के साथ मुसलमान होना चाहते हैं और एक महीने से परैशान हैं। मैं गाडी से उतरा और उन को कलमा पढवाया, उनके ज्यादा कहने पर उनके इस्लामी नाम भी बताये और उनकेा सर्टिफिकेट भी कुबूले इस्लाम का दिया। और उनको बता दिया कि कानूनी कारवाई पक्की जब होगी जब आप ब्याने हल्फी तैयार करके डी. एम. को इत्तिला करेंगे और एक अखबार में एलान कर देंगे और अच्छा है जिला गजट में दे दें। उन लोगों ने वादा किया कल ही जाकर हम सब कारवाई पूरी करेंगे। और मुझे इल्म हुआ कि उन्होंने सब काम पूरा कर लिये हैं। मौलाना साहब ने कहा की हमारा मुल्क सेक्युलर मुल्क है और मुल्क के कानून ने अपने मजहब को मानने और मजहब कि दावत देने का बुनियादी हक हमें दिया है। किसी को ईमान की दावत देना कोई मुसलमान होना चाहे उसको कलमा पढवाना हमारा बुनियादी कानूनी हक है। जिस चीज का कानून हमें हक देता है। उस के सिलसिले में हम लोग किसी से नहीं डरते और गैर कानूनी काम हम लोग जान बूझकर हरगिज नहीं करते। भूल में हो जाये तो उस की तलाफी की कोशिश करते हैं। जहाँ तक लालच देकर या डराकर मजहब बदलवाने की बात हैं यह बिलकुल गैरकानूनी हैं मेरा जाती ख्याल है कि यह गैरकानूनी काम मुम्किन नहीं। मजहब बदलना या किसी का मुसलमान होना उसके दिल के विश्वास का बदलना है। जो लालच और डर से हो ही नहीं सकता। आप को खुश करने के लिये कोई कह सकता है कि मैं हिन्दू होता हूँ मगर इतना बडा फैसला अपनी जिन्दगी को आदमी अन्दर से राजी हुये बगैर नहीं कर सकता।
दूसरी इस से भी ज्यादा अहम और जरूरी बात यह है कि मैं एक मुसलमान हूँ और मुसलमान उसको कहते हैं जो हर सच्ची बात को माने सारे सच्चों से सच्चा है हमारा मालिक और उसके भेजे हुये रसूल मुहम्मद सल्लालाहु अलैहि वसल्लम जिनके बारे में यह गलतफहमी है की वह सिर्फ मुसलमानों के रसूल हैं और उनके लिये मालिक के संदेश वाहक थेे। हालाँकि कुरआन में और आपकी हदीसों में सिर्फ यह बात मिलती है कि हम सब के मालिक की तरफ से भेजे हुये सारे इन्सानों की तरफ अन्तिम (आखरी) और सच्चे सन्देष्टा (रसूल) थे। वह ऐसे सच्चे थे कि उनके दीन के और उनकी जान के आखरी दुशमन भी उन को झूठा न कह सके बल्कि दुशमनों ने उनका लकब अस्सादिकुल अमीन और सच्चा और ईमानदार दिया। हमारा विश्वास यह है कि दिन हो रहा है, हमारी आँखें देख रही हैं। ये आँखें धोका दे सकती हैं। यह बात झूठ हो सकती है कि दिन हो रहा है मगर रसूल सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने जो हमें खबर दी हैं उसमें जर्रा बराबर भी गलती, धोका या झूठ नहीं हो सकता। हमारे रसूल सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने हमें खबर दी है कि सारी दुनिया के सारे इन्सान एक माँ-बाप की औलाद हैं इस लिये सारे जगत के इन्सान आपस में खूनी रिश्ते के भाई हैं, शायद आपके यहाँ भी यही माना जाता है। मैं ने कहा ‘यह बात तो हमारे यहाँ भी मानी जाती है।’ मौलाना साहब ने कहा ‘ये तो बिल्कुल सच्ची बात है, हम और आप खूनी रिश्ते से भाई हैं ज़्यादा से ज्यादा यह हो सकता है कि आप मेरे चचा हों या मैं आपका चचा हूँ मगर आपके और हमारे बीच खूनी रिश्ता है इस खूनी रिश्ते के अलावा आप भी इन्सान हैं और मैं भी इन्सान हूँ और इन्सान वह है जिस में उन्सियत हो यानी मुहब्बत हो, एक दूसरे की भलाई का जज़्बा हो। इस रिश्ते से अगर आप यह समझते हैं कि हिन्दू धर्म ही अकेला मुक्ती का रास्ता है और मोक्ष का तरीका है तो आप को मुझे इस रिश्ते का लिहाज करते हुए हिन्दू बनाने की जी जान से कोशिश करनी चाहिये और अगर आप इन्सान हैं और आप के सीने में पत्थर नहीं है दिल है तो उस वक्त तक आप को चैन नहंी आना चाहिये जब तक मैं गलत रास्ता छोडकर मुक्ति के रास्ते पर न आ जाऊँ।’ मौलाना साहब ने मुझ से पूछा कि ‘यह बात है या नहीं?’ मैंने कहा ‘बिल्कुल सच बात है’। मौलाना साहब ने कहा ‘आप को सब से पहले आकर मुझे हिन्दू बनने के लिये कहना चाहिये था। दूसरी बात यह है कि मैं मुसलमान हूँँ। निकलते सूरज की रौशनी से ज्यादा मुझे इस बात का यकीन है कि इस्लाम ही वाहिद सब से पहला और सब से आखरी फाइनल मजहब, और मुक्ति और मोक्ष यानि निजात का वाहिद रास्ता है, अगर आप ईमान कुबूल किये बगैर दुनिया से चले गये तो आपको हमेशा के नर्क में जलना पडेगा और जिन्दगी का एक सांस के लिये भी इत्मिनान नहीं। जो सांस अन्दर गया, क्या खबर कि बाहर जाने तक आप जिन्दा रहेंगे या नहीं और जो सांस बाहर निकल गया, क्या खबर की अन्दर आने तक जिन्दगी वफा करेगी? इस हाल में अगर मैं इन्सान हूँँ और मैं आपको अपना खूनी रिश्ते का भाई समझता हूँँ तो जब तक आप कलमा पढकर मुसलमान नहीं होंगे। मुझे चैन नहीं आयेगा, यह बात मैं कोई नाटक के तौर पर नहीं कह रहा हूँँ थोडी देर की इस मुलाकात के बाद इस खूनी रिश्ते की वजह से अगर रात मुझे सोते भी आपकी मौत और नर्क से जलने का ख्याल आयेगा तो मैं बेचैन होकर बिलकने लगूंगा। इस लिये सर आप पिलखवे वालों की फिक्र छोड दिजिये। जिस मालिक ने पैदा किया है जीवन दिया है उस के सामने मुँह दिखाना है। मेरे दर्द का इलाज तो जब होगा जब आप तीनों मुसलमान हो जायेंगे। इस लिये आप से रिक्वेस्ट है कि आप मेरे हाल पर तरस खाएँँ आप तीनों कलमा पढें।
अहमद भाई में अजीब हैरत में था। मौलाना साहब की मुहब्बत जैसे जादू हो। मैं ऐसे खानदान का मेम्बर हूँँ जिसकी घुट्टी में मुसलमानों, मुस्लिम बादशाहों और इस्लाम की दुशमनी पिलाई गयी है और इस खबर के सिलसिले में हद दर्जा बरहम (उत्तेजित) होकर मैं गोया मुखालिफ इन्कवायरी के लिये फैसला करके फुलत गया था और मौलाना साहब मुझे न इस्लाम के मुतालिआ (वाचन) को कहते हैं, न गलतफहमी दूर करने के लिये कहते हैं। बस सीधे-सीधे मुसलमान होने को कह रहे हैं। और मेरी अंतरात्मा, मेरा जमीर गोया मौलाना साहब की मुहब्बत के शिकंजे में जैसे बिल्कुल बेबस हो। मैंने कहा ‘बात तो आप की बिल्कुल सादी और सच्ची है और हमें सोचना ही पडेगा, मगर यह फैसला इतनी जल्दी करने का तो नहीं, कि इतना बडा फैसला इतनी जल्दी में ले सकें।’ मौलाना साहब ने कहा ‘सच्ची बात यह है कि आप और हम सब मालिक के सामने एक बडे दिन हिसाब के लिये इकट्ठा होंगे, तो उस वक्त इस सच्चाई को आप जरूर पाएँगे कि यह फैसला बहुत जल्दी में करने का है। और इस में देर की गुन्जाईश नहीं और आदमी इसमें जितनी देर करेगा पछताएगा पता नहीं फिर जिन्दगी फैसला लेने की मोहलत दे या न दे और मौत के बाद फिर अफसोस और पछतावे के अलावा आदमी कुछ नहीं कर सकता। बिलकुल यह बात सच्ची है कि ईमान कुबूल करने और मुसलमान होने से ज्यादा जल्दबाजी में करने का कोई और फैसला नहीं हो सकता। हाँ अगर आप हिन्दू धर्म को मुक्ति का रास्ता समझते हैं तो फिर मुझे हिन्दू बनाने में इतनी ही जल्दी करनी चाहिये जिस तरह मैं मुसलमान बनने के लिये जल्दी करने को कह रहा हूँ’। मुझे ख्याल हुआ कि जिस विश्वास (मजबूत एतिमाद और यकीन) के साथ मौलाना साहब मुसलमान होने को कह रहे हैं उस एतिमाद के साथ मैं हिन्दू बनने को नहीं कह सकता। बल्कि सच्ची बात यह है कि हम लोग अपने पूरे धर्म को कई सुनी-सुनाई रस्मों पर आधारित कहानियों के अलावा कुछ नहीं समझते। जब हमारा हिन्दू धर्म पर विश्वास का यह हाल है तो यह किसको किस बलबूते पर हिन्दू बनने को कह सकते हैं। मेरे अन्दर से जैसे कोई कह रहा था। रामकुमार इस्लाम में जरूर सच्चाई है जो मौलाना साहब के अन्दर यह विश्वास है। मौलाना साहब कभी-कभी बहुत खुशामद कभी जरा जोर से बार-बार हम लोगों से कलमा पढकर मुसलमान होने को कहते रहे। जब मौलाना साहब खुशामद करते तो मुझे लगता जैसे किसी जहर खाने का इरादा करने वाले या आग मेें कूदने वाले को हलाकत से बचाने के लिये कोई हमदर्द कोई माँ खुशामद करती है। मौलाना साहब हमें बार-बार कलमा पढने पर जोर देते रहे। मैं ने वादा किया कि हम लोग गौर करेंगे, हमेंे पढने के लिये भी दिजिये। मौलाना साहब ने अपनी किताब ‘आपकी अमानत- आपकी सेवा में’ दी और हमें सौ-सौ बार रोजाना या हादी, या रहीम इस विश्वास के साथ पढने को कहा की मालिक को जब आप इन नामों से याद करेंगे, तो आपके लिये इस्लामी रास्ते जरूर खोल देंगे, असल में दिलों को फेरने का फैसला उसी अकेले का काम है। मैं ने मौलाना साहब से कहा, अच्छा है, माहौल गर्म हो रहा है आप अखबारात में इस खबर का खंडन निकलवा दें। मौलाना साहब ने कहा ‘मैं ने उन को दीनी और उनका कानूनी हक समझकर कलमा पढवाया है। सच बात को छुपाना नहीं चाहिये।’ मैं ने कहा ‘अच्छा हम खुद कर देंगे। हम लोग वापस हो गये तो मेरे दोनों इस्पेक्टर्स मुझ से बोले ‘सर देखा कितने सच्चे और सज्जन आदमी हैं, हम लोगों का तो दिल का बोझ हलका हो गया मौलाना साहब तो ऐसे आदमी हैं कि कभी-कभी शान्ति के लिये उनकी संगती में आकर बैठा जाये। कोई लाग नहीं लपट नहीं साफ-साफ बातें।’
अहमदः आप ने कलमा नहीं पढा?
डा. हुजैफाः मैं ने घर जाकर ‘आपकी अमानत-आपकी सेवा’ में पढी। मुहब्बत, हमदर्दी और सच्चाई उसके लफ्ज-लफ्ज से फूट रही थी मुझे उस किताब को पढकर लगा की एक बार फिर मेरी मुलाकात मौलाना साहब से हो गयी है। उसके बाद बार-बार मेरे अन्दर मौलाना साहब से मुलाकात की हूक सी उठती रही। इस्लाम को पढने का शौक भी पैदा हुआ। मैं मुजफ्फरनगर में एक दुकान से कुरआन मजीद का हिन्दी तर्जमा(अनुवाद) लेकर आया। मैं ने फोन पर मौलाना साहब से उसके पढने की ख्वाहिश का इज़्हार किया। मौलाना साहब ने कहा, देखिये कुरआन मजीद को आप जरूर पढें मगर सिर्फ और सिर्फ ये समझकर पढिए कि मेरे मालिक का भेजा हुआ यह कलाम है और यह सोच कर पढे कि यह सिर्फ और सिर्फ मेरे लिये भेजा है। इस लिये मालिक का कलाम समझ कर पढना अच्छा है। आप इसे स्नान करके पढें। पाक कलाम, पाक नूर, पाक और साफ सुथरे हालत में पढना चाहिये। दो हफ्तों मैंने पूरा कुरआन मजीद पढ लिया। अब मेरे लिये मुसलमान होने के लिये अन्दर के दरवाजे खुल गये थे। मैंने फुलत जाकर मौलाना साहब के सामने कलमा पढा। मौलाना साहब ने मेरा नाम रामकुमार बदल कर मेरी ख्वाहिश पर मुहम्मद हुज़्ौफा रखा और बताया कि हमारे नबी सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम अपने एक सहाबी को राज़दारी और जासूसी के लिये भेजा करते थे मुझे इस लिहाज से यह नाम बहुत अच्छा लगा।
अहमदः उसके बाद इस्लाम के पढने के लिये आपने क्या किया?
डा. हुजैफाः मौलाना साहब के मश्वरे से ही छुट्टी लेकर चिल्ला(40 दिन) जमात में लगाया। मगर मौलाना साहब ने मुझे सख्ती से मना कर दिया था कि आप किसी से जमात में अपना पुराना तआरुफ(परिचय) न कराएँ न अपने आपको नव-मुस्लिम कहें। इस लिये कि आप सच्ची बात यह है कि पैदाइशी मुसलमान हैं। हमारे नबी ने सच्ची खबर दी है कि हर पैदा होने वाला इस्लाम नजरिये पर पैदा होता है। इस लिये हर मजहब के बच्चे को दफनाया ही जाता है। आप तो पैदाइशी मुसलमान हैं और हम सबके बाप हजरत आदम इस कायनात के सब से पहले मुसलमान थे इस लिये आप पुश्तैनी मुसलमान हैं। जमात में मेरा वक्त अच्छा गुजरा लोग मुझे अंग्रेजी पढा लिखा, दीनी तालीम से बिल्कुल कोरा मुसलमान समझकर मुझे नमाज वगैरा याद कराने की कोशिश करते रहे। गुजरात के एक नौजवान आलिम हमारी जमात के अमीर थे। मैं ने चालीस दिन में पूरी नमाज और बहुत दुआएँ याद कर लीं। जमात से वापस आया तो मेरा ट्रान्सफर इलाहाबाद हो गया। अपनी इलाहाबाद पोस्टिंग के दौरान मैं ने अपनी बीवी को बहुत कुछ बता दिया। वह बहुत फरमांबरदार, भोली-भाली औरत है। उन्होंने मेरे फैसले की जरा भी मुखालफत नहीं की बल्कि मेरे साथ हर हाल में रहने का वादा किया। मैंने उसको भी किताबें पढवायीं। हमारी शादी को दस साल हो गये थे मगर कोई औलाद नहीं थी। मैंने उसको लालच दिया। इस्लाम कुबूल करने से हमारा मालिक हमसे खुश हो जायेगा और हमें औलाद भी दे देगा। औलाद न होने के गम से वह बहुत घुलती थी वह इस बात से बहुत खुश हो गयी। एक मदरसे में लेजाकर उसको कलमा पढवाय। मैं ने अपने अल्लाह से बहुत दुआ की ‘मेरे रब मैंने आप के भरोसे उससे वादा कर लिया है आप मेरे भरोसे की लाज रख लीजिये और उसको चाहे एक ही हो, औलाद दीजिये।’ खुदा का करना ऐसा हुआ की अल्लाह ने ग्यारह साल के बाद हमें एक बेटा दिया और तीन साल के बाद एक बेटी भी हो गयी है।
अहमदः इस्लाम कुबूल करने के बाद आपकी मुलाजमत में कोई मुश्किल नहीं आयी?
डा. हुजैफाः मैं इलाहाबाद पोस्टिंग के दौरान अपने कुबूले इस्लाम का ऐलान कर दिया और कानूनी कारवाई हाईकोर्ट के एक वकील के जरिये करायी। जिसके लिये मुझे अपने महकमे से इजाजत लेनी ज़रूरी थी। मैंने उसकी दरख्वास्त की। द्विवेदी जी हमारे बास थे। उन्होंने मुझे बहुत सख्ती से रोका और धमकी दी कि अगर आपने यह फैसला किया तो मैं आपको मुअत्तल कर दूंंगा। मैंने उन से साफ तौर पर कह दिया की यह फैसला तो मैं कर चुका हूँँ अब वापसी का सवाल ही पैदा नहीं होता। आपको जो कुछ करना है कर दीजिये। उन्होंने मुझे सस्पेंड कर दिया। मैंने अल्लाह का शुक्र अदा किया और तीन चिल्ले(120 दिन) के लिये जमात में चला गया। बंगलौर और मैसूर में मेरा वक्त गुजरा और अलहल्मदु लिल्लाह बहुत अच्छा गुजरा। मुझे तीन बार हुजूर सल्लल्लहु अलैहि वसल्लम की ख्वाब में जियारत हुई जिसकी मुझे इतनी खुशी हुई कि मैं ब्यान नहीं कर सकता, वापस आया तो अल्लाह ने मेरे तमाम अफसरों को नरम कर दिया। लखनऊ में एक मुसलमान अफसर जो बहुत बडी पोस्ट पर हैं। मैं ने उन से अपना पूरा हाल सुनाया, वह फुलत जा चुके थे और मौलाना साहब को जानते थे उन्होंने मेरी मदद की और मुझे मुलाजश्मत पर बहाल कर दिया गया।
अहमदः आपके दोनों इंस्पेक्टर साथियों का क्या हुआ? जो अबी से आपके साथ मिलने गये थे?
डा. हुजैफाः उन में से एक ने इस्लाम कुबूल कर लिया है। उनके घरवालों की तरफ से उन पर बहुत मुश्किलें आयीं। उनकी बीवी उनको छोडकर चली गयी मगर वह जमे रहे और अल्लाह ने उनके हालात को हल किया। दूसरे भी अन्दर से तैयार हैं मगर वह भी अपने साथी की मुश्किलात देख कर डरे हुये हैं।
अहमदः आपने अपने खानदान वालों पर काम नहीं किया?
डा. हुजैफाः अलहम्दु लिल्लाह काम जारी है। उस काम की बडी तफसीलात हैं, मेरी ट्रेन का वक्त हो रहा है। फिर किसी मुलाकात में आप तफसीलात सुनिये तो आपको बडा मजा आयेगा।।
अहमदः एक मिनट में अरमुगान के पाठकों(कारिईन) के लिये आप का क्या पैगाम है?
डा. हुजैफाः इस्लाम से बडी कोई सच्चाई नहीं और जब यह ऐसी सच्चाई है तो उसके मानने वालों को न उस पर अमल करने में डरना चाहिये न उसको दूसरों तक पहुँचाने से रूकना चाहिये। थोडी बहुत मुखालिफतें आएँगी हमारे मौलाना साहब कहते हैं कि इस्लाम एक रौशनी है और सारे बातिल(असत्य, मिथ्या) मजाहिब अन्धेरे। अन्धेरे, कभी उजाले पर हावी नहीं हो सकते, उजाला ही गालिब हुआ करता है। कभी-कभी जब रोशनी की कमी होती है तो ऐसा लगता है की अन्धेरे छा गये और गालिब आ गये मगर जरा उजाला किजिये नौ-दो ग्यारह हो जाते हैं। बस मेरा यह मानना है और मेरा यही पैगाम है कि फतेह हमेशा रौशनी वालों की होती है। इस लिये किसी तरह के डर के बगैर इस्लाम की दावत देनी चाहिये और बगेर लालच के सच्ची हमदर्दी का हक अदा करने की नियत से दावत दी जाये तो मुझ जैसे इस्लाम और मुस्लिम दुशमनी में पले मुखालिफाना इन्कवायरी का फैसला करने वालों को जब हिदायत हो सकती है तो भोले-भाले सादा दिमाग लोगों पर असर न हो यह कैसे हो सकता है?
अहमदः शुक्रिया, जज़ाकल्लाह
डा. हुजैफाः अच्छा इजाजत दिजिये अस्सलामु अलैकुम व रहमतुल्लाही व बरकातुह
अहमदः व अलैकुमुस्सलाम व रहमतुल्लाहि व बरकातुह, बहुत-बहुत शुक्रिया, इन्शाअल्लाह जब कभी आप आयेंगे तो दूसरी किस्त जरूर सुनाएँ।

(साभारः मासिक ‘अरमुगान’, फुलत, अक्तूबर 2006)
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