Thursday, May 6, 2010

मुहम्मद इसहाक (पूर्व बजरंग दल कार्यकर्त्ता अशोक कुमार) से एक दिलचस्प मुलाकात Interview 2


....हम तीनों ने बजरंग दल में अपना नाम लिखवाया। आडवाणी जी की रथयात्रा में हम लोग ग्वालियर जाकर शामिल हुए और चार रोज साथ चले। हमारे घरवाले सभी इस फैसले से खुश हुए। एक रोज योगेश के पिताजी ने जो स्कूल में टीचर भी थे। हम तीनों को अपने घर बुलाया, मेरे और योगेन्द्र के पिताजी को भी बुलाया और बोले ‘‘हम तुम तीनों भाईयों को राम नाम पर छोडते हैं। अगर राम मन्दिर के नाम पर तुम्हारी बली भी चढ जाए तो पीछे न हटना, दुनिया में तुम अमर हो जाओगे। उन्होंने हमारे तीनों के सरों पर अंगोछा बाँधा। हम लोगों का बडा हौसला बढा और भी जोश पैदा हुआ। 30 अक्तूबर को हम लोग कारसेवा में पहुँचे मगर.... - मुहम्मद इसहाक (अशोक कुमार)

अहमदः अस्सलामु अलैकुम व रहमतुल्लाहि व बरकातुह
इसहाक(अशोक): व अलैकुमुस्सलाम व रहमतुल्लाहि व बरकातुह

अहमदः इस्हाक भाई। आप से तो 7 दिसम्बर की रात के बाद मुलाकात ही न हो पायी, कल अबी (मौलाना कलीम सिददीकी साहब) ने बताया कि आपका फोन आया था, आप दिल्ली आ रहे हैं तो खुशी हुई रात ही अबी ने फरमा दिया था कि आईन्दा माह के लिए आपसे इन्टरव्यू लूं।
इसहाकः हाँ अहमद भाई मौलाना साहब ने मुझ से भी आज सुबह ही बताया कि अरमुगान में इस महीने तुम्हारा इन्टरव्यू छपना है। मैं ने कहा मुझे शर्म आती है मगर उन्होंने हुक्म दिया कि तुम्हारा हाल सुनकर लोगों में दावत (धर्म निमन्त्राण) का जज़्बा पैदा होगा और दावत का काम करने वालों में खौफ कम होगा। तुम्हें भी सवाब (फल) मिलेगा। मैं ने कहा फिर तो अच्छा है।

अहमदः इसहाक भाई, अपना खानदानी तआरुफ कराएँ।
इसहाकः अहमद भाई। मैं यु. पी. के मशहूर जिला रामपुर में टान्डा बादली कस्बे के करीब एक गाँव के सैनी खानदान में 7 दिसंबर 1968 में पैदा हुआ। घर वालों ने मेरा नाम अशोक कुमार रखा। पिताजी श्री पुरण सिंह जी एक कम पढे लिखे किसान थे। मैं ने आठवी क्लास तक अपने गांव के जूनियर हाई स्कूल में पढा। हाईस्कूल और इन्टर मैं ने रामपुर में किया, बाद में लखनऊ में सिविल इन्जिनियरिंग में डिप्लोमा किया। एक प्राईवेट कन्स्ट्रक्शन कम्पनी में नौकरी लग गयी थी। बचपन में गुस्सा बहुत था। कई बार स्कूल में टीचर से भी लडाई हुई। कम्पनी में रोज-रोज कुछ न कुछ होता रहता था, नौकरी छोड आया। मेरे दो दोस्त पहली क्लास से इन्टर तक साथ पढे थे। एक का नाम योगेश कुमार और दूसरे का योगेन्द्र सिंह था। दोनों हमारी बिरादरी के थे। एक रिश्ते में भाई होते थे। तीनों साथ पढते और वर्जिश भी साथ करते थे। कुछ रोज पहलवानी भी की। राम-जन्मभूमि-बाबरी मस्जिद का झगडा हुआ तो हम तीनों ने बजरंग दल में अपना नाम लिखवाया। आडवाणी जी की रथयात्रा में हम लोग ग्वालियर जाकर शामिल हुए और चार रोज साथ चले। हमारे घरवाले सभी इस फैसले से खुश हुए। एक रोज योगेश के पिताजी ने जो स्कूल में टीचर भी थे। हम तीनों को अपने घर बुलाया, मेरे और योगेन्द्र के पिताजी को भी बुलाया और बोले ‘‘हम तुम तीनों भाईयों को राम नाम पर छोडते हैं। अगर राम मन्दिर के नाम पर तुम्हारी बली भी चढ जाए तो पीछे न हटना, दुनिया में तुम अमर हो जाओगे। उन्होंने हमारे तीनों के सरों पर अंगोछा बाँधा। हम लोगों का बडा हौसला बढा और भी जोश पैदा हुआ। 30 अक्तूबर को हम लोग कारसेवा में पहुँचे मगर हम अभी जगह पर पहुँच नहीं पाये थे कि मुलायम सरकार में गोली चल गयी और हमें पुलिस ने गिरफ्तार कर लिया और ट्रेन में सवार करके रामपुर लाके छोडा। हमारे गुस्से की हद न रही। मैं ने रास्ते में कई सिपाहियों की पिटाई भी की मगर उन्होंने हमें यह कहकर ठण्डा किया कि मुलायम सरकार तो गिरेगी, हमारी सरकार आयेगी तो उस वक्त तुम अपने अरमान पूरे कर लेना। नवम्बर 1992 में हम लोग बाबरी मस्जिद शहीद करने के शौक में अयोध्या पहुँच गये। सर्दी के कपडे भी पूरे साथ नहीं थे। अलग-अलग आश्रमों में रहते-रहते हमें वहाँ रहकर बडी हैरत हुई कि अक्सर साधुओं ने हमें बाबरी मस्जिद शहीद करने में शामिल होने से मना किया और उन्होंने हमें इस तरह डराया जैसे हम कोई पाप कर रहे हैं। एक साधू ने तो यह कहा ‘‘मैं सच कहता हूँ अगर रामचन्द्र जी जिवित(जिन्दा) होते, तो भी हरगिज यह पाप यानी बाबरी मस्जिद गिराने का काम न करने देते। हमें उन समझाने वालों पर बहुत गुस्सा आता। 6 दिसम्बर 1992 को भीड मस्जिद के पास जमा हो गयी, हमारे संचालक ने हमें बताया था कि जैसे ही हम इशारा करेंगे, धावा बोल देना। अभी उमा भारती ने नारा लगाया था कि हम पिल पडे। योगेश तो भीड में गिरगया। लोग उस पर चलते रहे किसी ने देखकर उसका हाथ पकडा। वह उठा, महीनों बीमार रहा, उसकी पसलियाँ टूट गयी थीं। खुशी-खुशी हम एक ईंट लेकर घर आये। रास्ते में लोग हमारा स्वागत (इस्तकबाल) करते थे। घरवालों ने हमारे स्वागत में एक प्रोग्राम किया और हम को फूलों से तौला गया, कई साल तक लोग हम को शाबाशी देते रहे।

अहमदः अपने कुबूले इस्लाम के बारे में कुछ बताईये।
इस्हाकः बाबरी मस्जिद को शहीद करके अहमद भैया यूँ तो हमने अपने अरमान पूरे कर लिये, मगर न जाने सिर्फ मुझ अकेले को ही नहीं हम तीनों का हाल यह था कि हम अपने दिल में अन्जाने खतरे से डरे-डरे से रहते थे और हर एक को यह लगता था कि शायद अब कोई खतरा आ जाये, कभी-कभी तो ऐसा लगता था कि आसमान से कोई आग की चटटान हमें दबाने वाली है। बाबरी मस्जिद की शहादत की हर बर्सी पर यानी 6 दिसम्बर को हमारे लिए दिन रात काटना मुश्किल होता था। ऐसा लगता था कि आज तो जरूर कोई आफत आयेगी। पिछले 6 दिसम्बर को यह खतरा पिछले सालों से ज्यादा ही था। हम लोग डर की वजह से 6 दिसम्बर को कभी घर से नहीं निकलते थे और जब 6 तारीख गुजर जाती तो हम लोग बहुत सुकून महसूस करते। 7 दिसम्बर 2006 की सुबह को हम तीनों घर से निकले, मुझे रामपुर में एक जरूरी काम था मेरे साथी भी साथ हो लिए। रामपुर बस अड्डे पर हमारा एक कॉलिज का साथी रईस अहमद मिला। उस ने हमें देखा तो करीब आया। मजाक के अन्दाज में बोला ‘अशोक अब तुम लोगों की बारी है, तैयार हो जाओ’ मैं ने कहा किस चीज की बारी है?’ उसने कहा ‘पहले पागल होने की और फिर मुसलमान होने की।’ मैंने कहा ‘चोंच बंद कर। उसने कहा ‘अखबार पढा है कि नहीं? मैं ने कहा ‘अखबार में क्या है?’ उस ने अपने बैग से एक उर्दू ‘सहारा’ अखबार निकाला और मुहम्मद आमिर और उमर के इस्लाम कुबूल करने की खबर पूरी सुना दी। हम लोगों को गुस्सा भी आया और डर भी लगा, मैं ने कहा ‘उर्दू अखबार है झूठी खबर होगी। उसने हिन्दी के दो अखबार निकाले और मुझे दिखाए। छोटी-छोटी दोनों में खबरें दिखाईं। मैंने दोबारा उर्दू की खबर जो तफसील से थी, पढने को कहा। मेरे दूसरे साथियों को भी गुस्सा आया और मशवरा किया कि फुलत जाकर मालूम करना चाहिये। बात को साफ करना चाहिये वरना कितने ही लोगों के धर्म भ्रष्ट हो जायेंगे। रामपुर से हम लोग मेरठ की बस में बैठे और फिर खतौली पहुँचे और एक जुगाड में बैठ कर फुलत पहुँचे। मौलाना साहब नमाज के लिये गये थे। नमाज पढकर आये तो एक साहब ने बताया कि यह मौलाना कलीम साहब हैं। हम लोग कुछ तो गुस्से में थे और कुछ ज्यादा सख्त लहजे में मैं ने मौलाना साहब को अखबार दिखाकर कहा ‘यह खबर आपने छपवायी है, यह खबर आपने किस तरह छपवाई है?’ हम तीनों बिल्कुल जट अन्दाज में बडे सख्त लहजे में बात कर रहे थे। मगर मौलाना साहब न जाने किस दुनिया के आदमी थे। बहुत ही प्यार से बोले, मेरे भाई, आप अपने खूनी रिश्ते के भाई के यहाँ आये हैं। आप हमारे हम आपके। यह तड-बड तो शहर के लोगों में होती है। आप कहाँ से तशरीफ लाये हैं, पहले यह बताइये’। मैं ने कहा ‘हम रामपुर टान्डा बादली के पास से आये हैं। मौलाना साहब बोले, मेरे भाइयो। इतनी सर्दी में आपने इतना लंबा सफर किया। कितने थक रहे होंगे। यह आपका घर है, आप किसी गैर के यहाँ नहीं हैं। आप जो मालूम करेंगे हम बतायेंगे। पहले आप बैठिये, चाय, पानी, नाश्ता कीजिये, खाना खाइये। खबर हम लोगों ने नहीं छपवायी है, मगर है खबर सच्ची’ हम लोग कुछ ठण्डे हो गए थे फिर से गर्मी सी आ गई। मैं ने कहा ‘आप कैसे कह रहे हैं सच्चे लोगों का धर्म भ्रष्ट करना चाहते हैं। मौलाना साहब ने फिर प्यार से कहा ‘चलो अगर सच मानोगे तो मान लेना, वरना हमें उस की भी कोई जिद नहीं।’ आमिर और उमर में से मुहम्मद उमर इत्तफाक से एक नव-मुस्लिमों की जमाअत लेकर फुलत आए हुए थे जिस में सभी नव मुस्लिम थे। अमीर(जमात का अध्यक्ष, रहबरी करने वाला) न मिलने की वजह से मौलाना साहब ने उनको फुलत बुलाया था, जिन में तीन हरियाणा के थे और दो गुजरात के और चार यु. पी के, दो उन में मन्दिर के साधु भी थे। मौलाना साहब ने एक हाफिज साहब को बुलाया और उनसे कहा ‘उमर मियाँ को बुलाओ, थोडी देर में मुहम्मद उमर आ गए। मौलाना साहब ने हम से कहा ‘दो जिन की खबर छपी है उन में एक मुहम्मद उमर यह है। आप इन से मिल लें और मालूम कर लें खबर क्या है और कितनी सच्ची है?’ उमर भाई के साथ हम बराबर वाले छोटे कमरे में बैठ गये। मौलाना साहब ने उनको आवाज दी और कुछ समझाया। बाद में भाई उमर ने मुझे बताया कि मौलाना साहब ने मुझे बहुत ताकीद की कि ये कितना भी गुस्सा हों तुम सब्र करना और बहुत प्यार, नर्मी से मरीज समझकर बात करना और दिल ही दिल में अल्लाह से दुआ करना, मैं भी घर जाकर दो रकअत पढकर अल्लाह से हिदायत की दुआ करता हूँँ थोडी देर में नाश्ता आ गया। हम सभी को सर्दी लग रही थी। उमर भाई ने जिद करके दो प्याली चाय पिलाई और खूब खातिर की और हमें समझाते रहे और बताया कि पानीपत से सोनीपत तक आडवाणी जी की रथयात्राा में हम दोनों सब से ज्यादा पेश-पेश थे। 30 अक्तूबर को हम दोनों के ऊपर से गुम्बद पर गोली लगी थी। थोडी देर मेंे खाना भी आ गया। अब हम तीनों को लगा कि हमें जो खौफ था वह सच था और 6 दिसम्बर को हमारी यह हालत क्यों होती थी। मैंने उमर से कहा, अब हमें क्या करना चाहिये? उन्होंने बताया कि दुनिया का अजाब तो कुछ नहीं, मरने के बाद बडे दिन के अजाब से बचने के लिए आपको मेरी राय माननी चाहिये और कलमा पढकर मुसलमान हो जाना चाहिए। हम तीनों बाहर मश्वरे के लिए आने लगे, तो उमर भाई ने कहा ‘मैं एक काम के लिये बाहर जाता हूँँ आप अन्दर बैठे रहें। हम तीनों ने मशवरा किया और सब ने तै किया कि हम को मुसलमान हो जाना चाहिये। फिर उमर भाई को आवाज दी और अपना फैसला बताया। उमर भाई ने कहा ‘वह दो रकअत नमाज पढकर सच्चे मालिक से आप के लिये दुआ करने गये थे और मौलाना साहब भी आप के लिये दुआ ही करने अन्दर गये हैं। खुशी-खुशी उमर ने घर में मौलाना साहब को आवाज दी और दरख्वास्त की कि उन तीनों भाईयों को कलमा पढवा दें। मौलाना साहब ने हमें कलमा पढवाया। अहमद भाई वो हाल मैं बता नहीं सकता कि हम तीनों पर क्या गुजरी, जैसे-जैसे मौलाना साहब ने हमें कलमा पढवाया और तौबा करायी, ऐसा लग रहा था जैसे काँटों का एक लिबास जिस से जिस्म बंधा था, हमारे जिस्म से उतर गया। अन्दर से खौफ एकदम काफूर हो गया। जैसे हम न जाने किस खतरे से निकल कर एक महफूज किले में आ गए हों। मौलाना साहब ने मेरा नाम मुहम्मद इसहाक रखा, योगेश का मुहम्मद याकूब रखा और योगेन्द्र का मुहम्मद युसुफ और हजरत युसुफ, हजरत इसहाक और हजरत याकूब का किस्सा भी सुनाया और हमें बताया कि कल से फोन आ रहे थे कि यह खबर छप गयी है, खुदा खैर करे कोई फसाद न हो जा। मैं दोस्तों से कह रहा था आप डरिये नहीं हमने खबर नहीं छपवायी। अल्लाह ने छपवायी है इन्शाअल्लाह उस में जरूर खैर होगी। अल्लाह ने इतनी बडी खैर जाहिर कर दी। मौलाना साहब ने खडे होकर गले लगाया, मुबारकबाद दी और तीनों को किताब ‘आपकी अमानत, आपकी सेवा’ में दी।

अहमदः उस के बाद क्या हुआ?
इस्हाकः सुबह को नव-मुस्लिमों की जमाअत के साथ हम तीनों को शामिल कर दिया गया। एक मुफ्ती साहब बुलंदशहर के साल लगा रहे थे। उनको हमारा अमीर बनाया गया और दो लोगों को सिखाने के लिये शामिल किया गया। 15 लोगों की जमाअत एक रोज मेरठ रही। हम तीनों ने मेरठ में सर्टीफिकेट बनवाये और फिर जमाअत का रूख आगरा की तरफ बना। आगरा और मथुरा जिले में 40 दिन पूरे किये। जमाअत में वक्त ठीक लगा। नये-नये लोग थे एक दो बार लडाई भी हुई। एक रोज हम तीनों लडकर वापस आने की सोची। रात को पक्का इरादा किया कि सुबह को चले जायेंगे। रात में युसुफ ने एक ख्वाब देखा। मौलाना साहब फरमा रहे हैं, आपको अल्लाह ने किस तरह हिदायत दी, फिर भी आप अल्लाह के रास्ते से भाग रहे हैं। उस ने बाद में हम दोनों को बताया हम लोगों ने तय कर लिया कि जान भी चली जायेगी तो चिल्ला पूरा करके ही मौलाना साहब को मुँह दिखायेंगे। अल्हम्दुलिल्लाह हमारा चिल्ला पूरा हो गया।

अहमदः जमाअत से वापस आने के बाद क्या हुआ?
इसहाकः मौलाना साहब ने मुझ से मालूम किया कि अब आप का इरादा क्या है? और मशवरा दिया कि घर पर फौरन जाना ठीक नहीं है। मगर हम ने मौलाना साहब से कहा कि हम बच्चे नहीं हैं, मजहब हमारा जाती मामला है और हमारा हक है कि हक को मानें। हम घर जाकर घरवालों पर काम करेंगे और हमें किसी तरह का कोई खतरा नहीं है। मौलाना साहब के समझाने के बावजूद हम लोग अपने गाँव पहुँचे। पूरे इलाके में माहौल खराब था। खबर मशहूर थी कि मुसलमानों ने उन तीनों को कत्ल कर दिया है। हम लोगों ने घरवालों को जाकर साफ-साफ बता दियां फिर क्या था पूरी बिरादरी में मातम मच गया। बार-बार पंचायत हुई, दूर-दूर के रिश्तेदार आ गये। एक बार अखबार वाले भी आ गये। गाँव वालों ने उन को पैसे दे दिलाकर वापस किया और राजी किया कि खबर अखबार में हरगिज न दी जाये वरना और भी लोगों को खतरा है। हमारे घरवालों पर बिरादरी वालों ने दबाव दिया कि अपने लडकों को किसी तरह बाज रखें। मगर अल्लाह का शुक्र है कि अल्लाह ने हमें मुखालिफत से और पक्का कर दिया। हमारे साथ बहुत सख्तियाँ भी होने लगीं। हमारी बीवी बच्चों को घर भेज दिया गया। मजबूरन हमें घर छोडना पडा। हमें फुलत जाते हुये शर्म आयी कि मौलाना साहब की बात नहीं मानी। हम लोग पहले दिल्ली गये और फिर एक साहब हमें पटना ले गये। पटना में हम ने बडी मुश्किल उठाई। कुछ दिन रिक्शा भी चलाई। जरूरत के लिये मजदूरी भी की। बाद में मुझे एक साहब अपनी कम्पनी में कलकत्ता ले गये और फिर मेरे दोनों साथी भी कलकत्ता आ गये। अलहम्दु लिल्लाह हमारी मुश्किल का जमाना ज्यादा लम्बा नहीं हुआ और अब हम सेट हैं। इस दौरान हम तीनों को बारी-बारी हुजूर सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम की जियारत भी हुई। जिस से हमें बडी तसल्ली हुई। मौलाना साहब की याद हम लोगों को बहुत आ रही थी। मगर मौका नहीं मिल सका। अल्लाह का करम हैं, आज मुलाकात हो गयी। मौलाना साहब से मिलने के बाद नौ दस महीने की सारी तकलीफें जैसे हुई ही नहीं थीं।

अहमदः अपने घरवालों से कोई राब्ता आपने किया कि नहीं?
इसहाकः हम लोगों ने फोन पर बात की है माँ और भाई बहनों से बात हो जाती है। पिताजी से बात तो नहीं हो पाती, इन्शाअल्लाह वक्त के साथ-साथ सब कुछ ठीक हो जायेगा। अलबत्ता मेरी बीवी और दोनों बच्चे अभी मेरी ससुराल मेंे हैं। वे बात नहीं करते हैं। मैं ने एक दोस्त को किसी तरह भेजा था। उसने हमारी ससुराल की एक मुसलमान औरत को उनके घर भेजा था। मेरी बीवी ने कहा जहाँ कहो जाने को तैयार हूँ। मेरी भाभियों से बिलकुल नहीं बनती और मैं खुद एक पति की रहकर मरना चाहती हूँ। आज मौलाना साहब से मशवरा हो गया है, मैं अब किसी तरह उनको लेकर ही जाऊँगा।

अहमदः दअवत के सिलसिले में आप से अबी (मौलाना कलीम सिददीकी साहब) ने कोई बात नहीं की, इस सिलसिले में कुछ बताइये?
इसहाकः मौलाना साहब ने हम से अहद लिया है कि बाबरी मस्जिद शहीद करने वालों की फिक्र करनी है और कारसेवकों पर काम करना है और उन के लिए और घरवालों के लिये दुआ करनी है, मौलाना साहब से मशवरा हुआ है, मैं बहुत जल्दी कलकत्ते से जमाअत में वक्त लगाऊँगा और अल्लाह के रास्ते में निकलकर अपने अल्लाह से मन्जूर करवाने के लिये दुआ करूँगा और फिर आकर घरवालों पर और कारसेवकों पर काम करूँगा।

अहमदः अरमुगान के कारिईन के लिये कुछ पैगाम दिजिये।
इसहाकः इस्लाम हर इन्सान की जरूरत है, किसी आदमी को इस्लाम दुश्मनी में सख्त देखकर यह न सोचना चाहिये कि उसके मुसलमान होने की उम्मीद नहीं। सारे इस्लाम दुश्मन, गलतफहमी या न जानने की वजह से इस्लाम दुश्मन हैं। हमारे हाल से ज्यादा इसका और क्या सबूत हो सकता है। इस्लाम कुबूल करने से पहले हम बजरंग दली थे और इस्लाम और मुसलमान हमारे सब से बडे दुश्मन थे और अब हम ही हैं। यह तसव्वुर कि खुदा न ख्वास्ता हम हिन्दू मर जाते (धुड-धुडी देकर रोते हुये) तो हमारी हलाकत का क्या हाल होता? और किस तरह अल्लाह की नाराजगी और दोजख का हमेशा हमेशा का अजाब बर्दाश्त करते?

अहमद अव्वाहः शुक्रिया इसहाक भाई। आप तीनों का शुक्रिया। आप दोनों से भी किसी वक्त दोबारा बात होगी। अस्सलामु अलैकुम व रहमतुल्लाह व बरकातुह।
इसहाक(अशोक): व अलैकुमुस्सलाम व रहमतुल्लाही व बरकातुह।

(साभारः मासिक ‘अरमुगान’ फुलत दिसम्बर 2007)

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