Thursday, May 6, 2010

बाबरी मस्जिद गिराने के लिये 25 लाख खर्च करने वाला सेठ रामजी लाल गुप्ता अब सेठ मुहम्मद उमर interview 3


अहमद अव्वाहः अस्सलामु अलैकुम रहमतुल्लाहि व बरकातुह

सेठ मुहम्मद उमरः मौलवी साहब व अलैकुमुस्सलाम

अहमदः सेठ साहब, दो तीन महीने से अबी(मौलाना कलीम सिद्दीकी साहब) आपका बहुत जिक्र कर रहे हैं, अपनी तकरीरों में आप का जिक्र करते हैं और मुसलमानों को डराते हैं कि अल्लाह तआला अपने बन्दों की हिदायत के लिये हर चीज से काम लेने पर कादिर हैं।

सेठ उमरः मौलवी साहब, हजरत साहब बिल्कुल सच कहते हैं, मेरी जिन्दगी खुद अल्लाह की दया व करम की खुली निशानी है, कहाँ मुझ जैसा, खुदा और खुदा के घर का दुश्मन और कहाँ मेरे मालिक का मुझ पर करम। काश! कुछ पहले मेरी हजरत साहब या हजरत के किसी आदमी से मुलाकात हो जाती तो मेरा लाडला बेटा ईमान के बगैर न मरता, (रोने लगते हैं और बहुत देर तक रोते रहते हैं, रोते हुये) मुझे कितना समझाता था और मुसलमानों से कैसा ताल्लुक रखता था वह और ईमान के बगैर मुझे बुढापे में अपनी मौत का गम दे कर चला गया।

अहमदः सेठ साहब, पहले आप अपना खानदानी परिचय(तआरूफ) कराईये।

सेठ उमरः मैं लखनऊ के करीब एक कस्बे के ताजिर खानदान में पहली बार अब से 69 साल पहले 6 दिसम्बर 1939 में पैदा हुआ, गुप्ता हमारी गौत है, मेरे पिताजी किराना की थोक की दुकान करते थे, हमारी छटी पीढी से हर एक के यहाँ एक ही औलाद होती आयी है, मैं अपने पिताजी का अकेला बेटा था, नवीं क्लास तक पढ़ कर दुकान पर लग गया, मेरा नाम रामजी लाल गुप्ता मेरे पिताजी ने रखा।

अहमदः पहली मर्तबा 6 दिसंबर को पैदा हुये तो क्या मतलब है?

सेठ उमरः अब दोबारा असल में इसी साल 22 जनवरी को चन्द महीने पहले मैं ने दोबारा जन्म लिया और सच्ची बात यह है कि पैदा तो में अभी हुआ, पहले जीवन को अगर गिनें ही नहीं तो अच्छा है, वह तो अन्धेरा ही अन्धेरा है।

अहमदः जी! तो आप खानदानी तआरूफ करा रहे थे?

सेठ उमरः घर का माहौल बहुत धार्मिक (मजहबी) था, हमारे पिताजी जिले के बी. जे. पी. जो पहले जनसंघ थी, के जिम्मेदार थे, उसकी वजह से इस्लाम और मुस्लिम दुश्मनी हमारे घर की पहचान थी और यह मुस्लिम दुश्मनी जैसे घुट्टी में पडी थी। 1986 में बाबरी मस्जिद का ताला खुलवाने से लेकर बाबरी मस्जिद की शहादत के घिनावने जुर्म तक में इस पूरी तहरीक में आखरी दरजे के जुनून के साथ शरीक रहा, मेरी शादी एक बहुत भले और सेक्यूलर खानदान में हुई, मेरी बीवी का मिजाज़ भी इसी तरह का था और मुसलमानों से उनके घरवालों के बिल्कुल घरेलू ताल्लुकात थे। मेरी बारात गयी, तो सारे खाने और शादी का इन्तजशम हमारे ससुर के एक दोस्त खाँ साहब ने किया था और दसयों दाढ़ियों वाले वहाँ इन्तज़ाम में थे जो हम लोगों को बहुत बुरा लगा था और मैं ने एक बार तो खाना खाने से इन्कार कर दिया था कि खाने में इन मुसलमानों का हाथ लगा है, हम नहीं खायेंगे मगर बाद में मेरे पिताजी के एक दोस्त पण्डित जी उन्होंने समझाया कि हिन्दू धर्म में कहाँ आया है कि मुसलमानों के हाथ लगा खाना नहीं खाना चाहिये। बडी कराहियत के साथ बात न बढाने के लिये मैं ने खाना खा लिया। 1952 में मेरी शादी हुयी थी, नौ साल तक हमारे कोई औलाद नहीं हुई, नो साल के बाद मालिक ने 1961 में एक बेटा दिया, उसका नाम मैं ने योगेश रखा, उसको मैं ने पढाया और अच्छे से स्कूल में दाखिल कराया और इस ख्याल से कि पार्टी और कोम के नाम इसको अर्पित (वक्फ) करूँगा, उसको समाज शास्त्र में पी. एच. डी कराया। शुरू से आखिर तक वह टापर रहा मगर उसका मिजाज़ अपनी माँ के असर में रहा और हमेशा हिन्दूओं के मुकाबले मुसलमानों की तरफ माइल रहता। फिर्केवाराना मिजाज़ से उसको अलर्जी थी, मुझ से बहुत अदब करने के बावजूद इस सिलसिले में बहस कर लेता था। दो बार वह एक-एक हफ्ते के लिये मेरे राम मन्दिर तहरीक में जुडने और उस पर खर्च करने से नाराज़ हो कर घर छोड कर चला गया, उसकी माँ ने फोन पर रो-रो कर उसको बुलाया।

अहमदः अपने कबुले इस्लाम के बारे में जरा तफसील से बताईये?

सेठ उमरः मुसलमानों को मैं इस मुल्क पर आक्रमण (हमला) करने वाला मानता था। या फिर मुझे राम-जन्म भूमि मन्दिर को गिरा कर मस्जिद बनाने की वजह से बहुत चिढ़ थी और मैं हर कीमत पर यहाँ राम मन्दिर बनाना चाहता था, इसके लिये मैं ने तन, मन, धन सब कुछ लगाया। 1987 से लेकर 2005 तक राम मन्दिर आन्दोलन और बाबरी मस्जिद गिराने वाले कारसेवकों पर विश्व हिन्दू परिषद को चन्दे में कुल मिला कर 25 लाख रूपये अपनी ज़ाती कमायी से खर्च किये। मेरी बीवी और योगेश इस पर नाराज़ भी हुये। योगेश कहता था इस देश पर तीन तरह के लोग आकर बाहर से राज करते आये, एक तो आर्यन आये उन्होंने इस देश में आकर जुल्म किया, यहाँ के शुद्रों को दास बनाया और अपनी साख बनायी, देश के लिये कोई काम नहीं किया, आखरी दरजे में अत्याचार (जुल्म) किये, कितने लोगों को मौत के घाट उतारा, तीसरे अंग्रेज आये उन्होंने भी यहाँ के लोगों को गुलाम बनाया, यहाँ का सोना, चाँदी, हीरे इंगलैण्ड ले गये, हद दरजे अत्याचार किये, कितने लोगों को मारा कत्ल किया, कितने लागों का फाँसी लगायी।

दूसरे नम्बर पर मुसलमान आये, उन्होंने इस देश को अपना देश समझ कर यहाँ लाल किले बनाये, ताज महल जैसा देश के गौरव का पात्र (काबिले फखर इमारत) बनायी, यहाँ के लोगों को कपडा पहनना सिखाया, बोलना सिखाया, यहाँ पर सडकें बनवायीं, सराएँ बनवायीं, खसरा खतोनी डाक का निजाम और आब-पाशी का निजाम बनाया, नहरे निकालीं और देश में छोटी-छोटी रियास्तों को एक करके एक बडा भारत बनाया। एक हजार साल अल्प-संख्या (अकल्लियत) में रह कर अक्सरियत पर हुकूमत की और उनको मजहब की आज़ादी दी, वह मुझे तारीख के हवालों से मुसलमान बादशाहों के इन्साफ के किस्से दिखाता, मगर मेरी घूट्टी में इस्लाम दुश्मनी थी वह न बदली।

30 दिसम्बर 1990 में भी मैं ने बढ-चढ कर हिस्सा लिया और 6 दिसम्बर 1992 में तो मैं खुद अयोध्या गया, मेरे जिम्मे एक पूरी टीम की कमान थी, बाबरी मस्जिद शहीद हुयी तो मैं ने घर आकर एक बडी दावत की, मेरा बेटा योगेश घर से नाराज़ होकर चला गया, मैं ने खूब धूम-धाम से जीत की तकरीब मनायी। राम मन्दिर के बनाने के लिये दिल खोल कर खर्च किया, मगर अन्दर से एक अजीब सा डर मेरे दिल में बैठ गया और बार-बार ऐसा ख्याल होता था कोई आसमानी आफत मुझ पर आने वाली है। 6 दिसम्बर 1993 आया तो सुबह मेरी दुकान और गोदाम मैं जो फासले पर थे बिलजी का तार शार्ट होने से दोनों में आग लग गयी और तकरीबन दस लाख रूपये से ज्यादा का माल जल गया। उसके बाद से तो और भी ज्यादा दिल सहम गया। हर 6 दिसम्बर को हमारा पूरा परिवार सहमा सा रहता था और कुछ न कुछ हो भी जाता था। 6 दिसम्बर 2005 को योगेश एक काम के लिये लखनऊ जा रहा था उसकी गाडी एक ट्रक से टकरायी और मेरा बेटा और ड्राईवर मौके पर इन्तकाल कर गये। उस का 9 साल का नन्हा सा बच्चा और 6 साल की एक बेटी है। यह हादसा मेरे लिये नाकाबिले बरदाश्त था और मेरा दिमागी तवाजुन खराब हो गया। कारोबार छोड कर दर-बदर मारा-मारा फिरा। बीवी मुझे बहुत से मौलाना लोगों को दिखाने ले गयी, हरदोई में बडे हजत साहब के मदरसे में ले गयी, वहाँ पर बिहार के एक कारी साहब हैं, तो कुछ होश तो ठीक हुये, मगर मेरे दिल में यह बात बैठ गयी कि मैं गलत रास्ते पर हूँ, मुझे इस्लाम को पढना चाहिये इस्लाम पढना शुरू किया।

अहमदः इस्लाम के लिये आपने क्या पढा?

सेठ उमरः मैं ने सब से पहले हजत मुहम्मद सल्ल. की एक छोटी सीरत पढ़ी, उसके बाद ‘इस्लाम क्या है?’ पढी। ‘इस्लाम एक परिचय’ मौलाना अली मियाँ की पढी। 5 दिसम्बर 2006 को मुझे हजत साहब की छोटी सी किताब ‘आप की अमानत -आपकी सेवा में’ एक लडके ने लाकर दी। 6 दिसंबर अगले रोज थी, मैं डर रहा था कि अब कल को किया हादसा होगा, उस किताब ने मेरे दिल में यह बात डाली कि मुसलमान होकर इस खतरे से जान बच सकती है और में 5 दिसंबर की शाम को पाँच छ लोगों के पास गया मुझे मुसलमान कर लो, मगर लोग डरते रहे, कोई आदमी मुझे मुसलमान करने का तैयार न हुआ।

अहमदः आप 6 दिसम्बर 2006 को मुसलमान हो गये थे, आप तो अभी फरमा रहे थे कि चन्द महीने पहले 22 जनवरी 2009 को आप मुसलमान हुये।

मुहम्मद उमरः मैं ने 5 दिसम्बर 2006 को मुसलमान होने का पक्का इरादा कर लिया था, मगर 22 जनवरी को इस साल तक मुझे कोई मुसलमान करने को तैयार नहीं था, हजरत साहब को एक लडके ने जो हमारे यहाँ से जाकर फुलत मुसलमान हुआ था बताया कि एक लाला जी जो बाबरी मस्जिद की शहादत में बहुत खर्च करते थे मुसलमान होना चाहते हैं, तो हजरत ने एक मास्टर साहब को (जो खुद बाबरी मस्जिद की शहादत में सब से पहले कुदाल चलाने वाले थे) भेजा, वह पता ठीक न मालूम होने की वजह से तीन दिन तक धक्के खाते रहे, तीन दिन के बाद 22 जनवरी को वह मुझे मिले और उन्होंने मुझे कलमा पढवाया और हजरत साहब का सलाम भी पहुँचाया, सुबह से शाम तक वह हजरत साहब से फोन पर बात कराने की कोशिश करते रहे मगर हजरत महाराष्ट्र के सफर पर थे, शाम को किसी साथी के फोन पर बडी मुश्किल से बात हुयी। मास्टर साहब ने बताया कि सेठ जी से मुलाकात हो गयी है और अल्हम्दु लिल्लाह उन्होंने कलमा पढ लिया है, आप से बात करना चाहते हैं और आप इन्हें दोबारा कल्मा पढवा दें, हजरत साहब ने मुझे दोबारा कल्मा पढवा दिया और हिन्दी में भी अहद(वचन, वादा) करवाया।

मैं ने जब हजत साहब से अर्ज किया कि हजत साहब! मुझ जालिम ने अपने प्यारे मालिक के घर को ढाने और उसकी जगह शिर्क(अनेकश्वरवाद) का घर बनाने में अपनी कमायी से 25 लाख रूपये खर्च किये हैं, अब मैं ने इस गुनाह की माफी के लिये इरादा किया है कि 25 लाख रूपये से एक मस्जिद और मदरसा बनवाऊँगा आप अल्लाह से दुआ किजिये कि जब उस करीम मालिक ने अपने घर को गिराने और शहीद करने को मेरे लिये हिदायत का जरिया बना दिया है तो मालिक मेरा नाम भी अपना घर ढाने वालों की फहरिस्त से निकाल कर अपना घर बनाने वालों में लिख लें और मेरा कोई इस्लामी नाम भी आप रख दिजिये, हजरत साहब ने फोन पर बहुत मुबारक बाद दी और दुआ भी की और मेरा नाम मुहम्मद उमर रखा, मेरे मालिक का मुझ पर कैसा अहसान हुआ, मौलवी साहब अगर मेरा रवाँ-रवाँ, मेरी जान, मेरा माल सब कुछ मालिक के नाम पर कुरबान हो जाये तो भी इस मालिक का शुक्र कैसे अदा हो सकता है कि मेरे मालिक ने मेरे इतने बडे जुल्म और पाप को हिदायत का जरिया बना दिया।

अहमदः आगे इस्लाम को पढने वगैरा के लिये आपने क्या किया?

सेठ उमरः मैंने अल्हम्दु लिल्लाह घर पर टयूशन लगाया है, एक बडे नेक मौलाना साहब मुझे मिल गये हैं वह मुझे कुरआन भी पढा रहे हैं समझा भी रहे हैं।

अहमदः आप की बीवी और पोते-पोती का कया हुआ?

सेठ उमरः मेरे मालिक का करम है कि मेरी बीवी, योगेश की बीवी और दोनों बच्चे मुसलमान हो गये हैं और हम सभी साथ में पढते हैं।

अहमदः आप यहाँ दिल्ली किसी काम से आये थे?

सेठ उमरः नहीं सिर्फ मौलाना ने बुलाया था, एक साहब मुझे लेने के लिये गये थे, हजरत साहब से मिलने का बहुत शौक था, बारहा(अकसर) फोन करता था मगर मालूम होता था कि सफर पर हैं, अल्लाह ने मुलाकात करा दी, बहुत ही तसल्ली हुयी।

अहमदः अबी (मौलाना कलीम सिद्दीकी साहब) से और क्या बातें हुयीं?

सेठ उमरः हजरत साहब ने मुझे तवज्जेह दिलायी कि आपकी तरह कितने हमारे खूनी रिश्ते के भाई बाबरी मस्जिद की शहादत में गलतफहमी में शरीक रहे, आपको चाहिये कि उन पर काम करें। उन तक सच्चाई को पहुँचाने का इरादा तो करें, मैं ने अपने ज न से एक फहरिस्त बनायी है, अब मेरी सहत इस लायक नहीं कि मैं कोई भाग दौड करूँ मगर जितना दम है वह तो अल्लाह का और उसके रसूल सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम का कलमा उसके बन्दों तक पहुँचाने में लगना चाहिये।

अहमदः मुसलमानों के लिये कोई पैगाम आप देगें?

सेठ मुहम्मद उमरः मेरे योगेश का ग़म मुझे हर लम्हे सताता है, मरना तो हर एक को है, मौलवी साहब! मौत तो वक्त पर आती है और बहाना भी पहले से तै है मगर ईमान के बगैर मेरा ऐसा प्यारा बच्चा जो मुझ जैसे जालिम और इस्लाम दुश्मन बल्कि खुदा दुश्मन के घर पैदा होकर सिर्फ मुसलमानों का दम भरता हो वह इस्लाम के बगैर मर गया, इसमें मुसलमानों के हक अदा न करने का अहसास मेरे दिल का ऐसा ज़ख्‍म है जो मुझे खाये जा जा रहा है, ऐसे न जाने कितने जवान, बूढे, मौत की तरफ जा रहे हैं उनकी खबर लें।

अहमदः बहुत-बहुत शुक्रिया सेठ उमर साहब! अल्लाह तआला आपको बहुत-बहुत मुबारक फरमाये, योगेश के सिलसिले में तो अबी ऐसे लोगों के बारे में कहते हैं कि फितरते इस्लामी पर रहने वाले लोगों को मरते वक्त फरिश्ते कलमा पढ़वा देते हैं, ऐसे वाकिआत ज़ाहिर भी हुये हैं, आप अल्लाह की रहमत से यही उम्मीद रखें, योगेश मुसलमान होकर ही मरे हैं।

मुहम्मद उमरः अल्लाह तआला आपकी जबान मुबारक करे, मौलवी अहमद साहब! अल्लाह करे ऐसा ही हो, मेरा फूल सा बच्चा मुझे जन्नत में मिल जाये।

अहमदः आमीन, सुम्मा आमीन, इन्शा अल्लाह जरूर मिलेगा, अस्सलामु अलैकुम

सेठ मुहम्मद उमरः व अलैकुमुस्सलाम

(साभारः मासिक ‘अरमुगान’ फुलत, जून 2009)

गायत्री परिवार के प्रोगराम में पण्डित जी के साथ मौलाना कलीम साहब और मौलाना तारिक अब्‍दुल्‍लाह साहब

5 comments:

saiyed noor said...

Allah jisko hidayat dena chahe use kon rok sakta he...... alhamdulilla ya rab

drzakir hussain said...

allah tabarak wa tala poori duniya ko islam aur eeman ki daulat se malamal farmaaye AAMEEN SUMMA AAMEEN.

shahnawaz hussain said...

kya je news 100% such h..........

shahnawaz hussain said...

kya ye news such h.....

GsmXplorer said...

Alhudulillah yeh sach hai ke sach ki jet hamesha hoti hai aur yaqini hai Jis ke liye allah ne hidayat likhde woh kise ke roke nahi rukega khud woh bhi apne aap ko nahi rok sakta islam ko toh har haal mey pehlna hai qaymat tak ke har insaan ke dil aur ghar ke darwaze ko khatkhatana hai jo apna liya uss ki jeet hai yehan per bhi aur marne ke baad bhi Allah hum ko sahi mano mey islam pesh karne wala banaye aur maulana kalim sahab ke khurbani qubul kare aamin

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