Wednesday, March 31, 2010

मास्टर मुहम्मद आमिर (बलबीर सिंह,पूर्व शिवसेना युवा शाखा अध्‍यक्ष) से एक मुलाकात interview

अहमद अव्वाहः अस्सलामु अलैकुम
मास्टर मुहम्मद आमिरः व अलैकुमुस्सलाम
अहमदः मास्टर साहब। एक अरसे से अबी (मौलाना कलीम सिद्दीकी) का हुक्म था कि ‘अरमुगान’(मासिक पत्रिका) के लिए आप से इण्टरव्यू लूँ, अच्छा हुआ आप खुद ही तशरीफ ले आए, आपसे कुछ बातें करनी हैं।
आमिरः अहमद भाई! आपने मेरे दिल की बात कही। जब से ‘अरमुगान’ में नव-मुस्लिमों के इण्टरव्यू का सिलसिला चल रहा है। मेरी ख्वाहिश(इच्छा) थी कि मेरे कुबूले इस्लाम का हाल उस में छपे। इस लिए नहीं कि मेरा नाम ‘अरमुगान’ में आये बल्कि इस लिए कि दावत का काम करने वालों को हौसला बढे और दुनिया के सामने करीम व हादी (कृपालू व सण्मार्ग-प्रदर्शक) रब की करम फरमाई की एक मिसाल सामने आये और दावत का काम करने वालों को यह मालूम हो कि जब ऐसे कमीने इन्सान और अपने मुबारक घर को ढाने वाले को अल्लाह तआला हिदायत (पथ-प्रदर्शन, निर्देश) से नवाज़ सकते हैं तो आम शरीफ और भोले भाले लोगों के लिए हिदायत (पथ-प्रदर्शन) के कैसे मवाके (अवसर) हैं।
आमिरः आप अपना खानदानी तआरुफ(परिचय) कराएँ।
अहमदः मेरा तअल्लुक सूबा हरियाणा के पानीपत जिले के एक गाँव से है, मेरी पैदाईश 6 दिसम्बर 1970 को एक राजपूत घराने में हुयी, मेरे वालिद साहब (पिताजी) एक अच्छे किसान होने के साथ-साथ एक प्राइमरी स्कूल में हेडमास्टर थे। वह बहुत अच्छे इन्सान थे और इन्सानियत दोस्ती उनका मज़हब था। किसी पर भी किसी तरह के जुल्म से उन्हें सख्त चिढ थी। सन 47 के फसादात उन्होंने अपनी आँखों से देखे थे। वह बहुत कर्ब(तकलीफ) के साथ उनका जिक्र करते थे और मुसलमानों के कत्लेआम को मुल्क पर बडा दाग समझते थे। बचे-खुचे मुसलमानों को बसाने में वह बहुत मदद करते थे। मेरा पैदाईशी नाम बलबीर सिंह था। अपने गाँव के स्कूल में मैं ने हाइस्कूल करके इंटरमीडीएट में, पानीपत में दाखिला लिया। पानीपत शायद मुम्बई के बाद शिवसेना का सबसे मजबूत गढ है। खास तौर पर जवान तब्का और स्कूल के लोग शिव सेना में बहुत लगे हुये हैं। वहाँ मेरी दोस्ती कुछ शिवसैनिकों से हो गयी और मैंने भी पानीपत शाखा में नाम लिखा लिया। पानीपत के इतिहास के हवाले से वहाँ नौजवानों में मुसलमानों खास तौर पर और दूसरे मुसलमान बादशाहों के खिलाफ बडी नफरत घोली जा रही थी। मेरे वालिद साहब को मेरे बारे में मालूम हुआ कि मैं शिवसेना में शामिल हो गया हूँ तो उन्होंने मुझे बहुत समझाया, उन्होंने मुझे इतिहास के हवाले से समझाने की कोशिश की और उन्होंने ‘बाबर’ खास तौर पर औरंगजेब के हुकूमत के इन्साफ और गैरमुस्लिमों के साथ उनके उमदा सुलूक (अच्छा व्यवहार) के किस्से सुनाये और मुझे बताने की कोशिश की कि अंग्रेजों ने गलत तारीख(इतिहास) हमें लडाने के लिये और देश को कमजोर करने के लिये घड कर तैयार की है, उन्होंने 1947 के ज़ुल्म और कत्ल गारत के किस्सों के हवाले से मुझे शिव सेना से बाज (दूर) रखने की कोशिश की, मगर मेरी समझ में कुछ न आया।अहमदः आपने फुलत के क्याम(संस्थापन) के दौरान बाबरी मस्जिद की शहादत में अपनी शिर्कत का किस्सा सुनाया था, जरा अब दोबारा तफसील से सुनाईये। आमिरः वह किस्सा इस तरह है कि 1990 में आडवाणी जी की रथ-यात्रा में मुझे पानीपत के प्रोग्राम की खासी बडी जिम्मेदारी सोंपी गयी, रथ यात्रा में उन जिम्मेदारियों ने हमारे रोयें-रोयें में मुस्लिम नफरत की आग भर दी। मैं ने शिवा जी की सौगंध खायी कि कोई कुछ भी करे मैं खुद अकेले जाकर राम मन्दिर पर से उस जालिमाना ढांचे को मस्मार (ध्वस्त) कर दूंगा, उस यात्रा में मेरी कारकर्दगी(कर्मण्यता, प्रफॉर्मेन्स) की वजह से मुझे शिवसेना यूथ विंग का सदर(अध्यक्ष) बना दिया गया, मैं अपनी नौजवान टीम को लेकर 30 अक्तूबर को अयोध्या गया, रास्ते में हमें पुलिस ने फेजाबाद में रोक दिया, मैं और कुछ साथी किसी तरह बच-बचाकर फिर भी अयोध्या पहुँचे मगर पहुँचने में देर हो गयी और उस से पहले गोली चल चुकी थी और बहुत कोशिश के बावजूद मैं बाबरी मस्जिद के पास न पहुँच सका मेरी नफरत की आग उससे और भडकी मैं अपने साथियों से बार-बार कहता था। इस जीवन से मर जाना बहतर है। राम के देश में अरब लुटेरों की वजह से राम के भगतों पर राम-जन्म भूमि पर गोली चला दी जाये, यह कैसा अन्याय और जुल्म है, मुझे बहुत गुस्सा था, कभी ख्याल होता था कि खुदकशी कर लूँ कभी दिल में आता था कि लखनऊ जाकर मुलायम सिंह के अपने हाथ से गोली मार दूँ, मुल्क में फसादात चलते रहे और मैं उस दिन की वजह से बेचैन था कि मुझे मौका मिले और मैं बाबरी मस्जिद को अपने हाथों मसमार(ध्वस्त) करूं। एक-एक दिन करके वह मनहूस दिन करीब आया जिसे मैं उस वक्त खुशी का दिन समझता था। मैं अपने कुछ जज्बाती साथियों के साथ एक दिसम्बर 1992 को पहले अयोध्या पहुँचा, मरे साथ सोनीपत के पास एक जाटों के गाँव का एक नौजवान योगेन्द्रपाल भी था जो मेरा सबसे करीबी दोस्त था। उसके वालिद एक बडे ज़मींदार थे और वह भी बडे इन्सान दोस्त आदमी थे, उन्होंने अपने इकलौते बेटे को अयोध्या जाने से बहुत रोका। उस के ताऊ भी बहुत बिगडे। मगर वह नहीं रूका। हम लोग 6 दिसम्बर से पहले की रात में बाबरी मस्जिद के बिलकुल करीब पहुँच गये और हमने बाबरी मस्जिद के सामने कुछ मुसलमानों के घरों की छतों पर रात गुजशरी। मुझे बार-बार ख्याल होता था कि कहीं 30 अक्तूबर की तरह आज भी हम इस शुभ काम से महरूम (वंचित) न रह जाएँ। कई बार ख्याल आया कि लीडर न जाने क्या करें। हमें खुद ही कारसेवा शुरू करनी चाहिए। मगर हमारे संचलालक ने हमें रोका और डिसिप्लिन(अनुशासन) बनाये रखने को कहा। उमा भारती ने भाषण दिया और कारसेवकों में आग भर दी। मैं भाषण सुनते-सुनते मकान की छत से उतरकर कुदाल लेकर बाबरी मस्जिद की छत पर चढ़ गया। योगेंद्र भी मेरे साथ था। जैसे ही उमा भारती ने नारा लगाया ‘‘एक धक्का और दो, बाबरी मस्जिद तोड दो’’। बस मेरी मुरादों (इच्छाओं) के पूरा होने का वक्त आ गया और मैंने बीच वाले गुंबद पर कुदाल चलाई और भगवान राम की जय के ज़ोर-ज़ोर से नारे लगाये। देखते ही देखते मस्जिद मस्मार हो गयी। मस्जिद के गिरने से पहले हम लोग नीचे उतर आये। हम लोग बडे खुश थे। रामलला के लगाये जाने के बाद उसके सामने माथा टेककर हम लोग खुशी से घर आये और बाबरी मस्जिद की दो ईंटें अपने साथ लाये। जो मैं ने खुशी-खुशी पानीपत के साथियों को दिखायीं। वह लोग मेरी पीठ ठोंकते थे। शिवसेना के दफ्तर में वे ईंटे रख दी गयीं और एक जलसा किया गया और सब लोगों ने भाषण में फखर (गर्व) से मेरा जिक्र(उल्लेख) किया कि हमें गर्व है कि पानीपत के नौजवान शिवसैनिक ने सब से पहले राम भक्ती में कुदाल चलायी। मैंने घर भी खुशी से जाकर बताया। मेरे पिताजी बहुत नाराज़ हुए और उन्होंने गहरे दुख का इजहार किया और मुझ से साफ कह दिया कि, अब इस घर में तू और मैं दोनों नहीं रह सकते, अगर तू रहेगा तो मै घर छोडकर चला जाऊँगा, नहीं तो तू हमारे घर से चला जा। मालिक के घर को ढाने वाले की मैं सूरत भी देखना नहीं चाहता। मेरी मौत तक तू मुझे कभी सूरत न दिखाना। मुझे इस का अन्दाज़ा नहीं था। मैं ने उनको समझाने की कोशिश की और पानीपत में जो सम्मान मुझे इस कारनामें पर मिला था वह बताने की कोशिश की। उन्होंने कहा कि यह देश ऐसे ज़ालिमों की वजह से बर्बाद हो जायेगा और गुस्से में घर से जाने लगे। मैं ने मौके को भाँपा और कहा ‘‘आप घर से न जाएँ, मैं खुद इस घर में नहीं रहना चाहता, जहाँ राम मन्दिर भक्त को ज़ालिम समझा जाता हो’’ और मैं घर छोडकर आ गया और पानीपत में रहने लगा’’
अहमदः अपने कुबूले इस्लाम के बारे में बताइये।
आमिरः प्यारे भाई अहमद। मेरे अल्लाह कैसे करीम (कृपालू) हैं कि जुल्म और शिर्क (अनेकश्वरवाद) के अन्धेरे से मुझे न चाहते हुए इस्लाम के नूर और हिदायत से माला-माल किया। मुझ जैसे ज़ालिम को जिसने उसका मुकद्दस (पवित्र) घर शहीद किया। हिदायत से नवाज़ा। हुआ यह कि मेरे दोस्त योगेंद्र ने बाबरी मस्जिद की दो ईंटें लाकर रखीं और माईक से एलान किया कि राम मन्दिर पर बने ज़ालिमाना ढाँचे की ईंटें सौभाग्य से हमारे तकदीर में आ गयी हैं। सब हिन्दू भाई आकर उन पर (मुत्रादान) पेशाब करें। फिर किया था, भीड लग गयी। हर कोई आता था और उन ईंटों पर हिकारत (तुच्छता) से पेशाब करता था। मस्जिद के मालिक को अपनी शान भी दिखानी थी। चार पाँच रोज़ के बाद योगेंद्र का दिमाग खराब हो गया। पागल होकर वह नंगा रहने लगा। सारे कपडे उतारता था। वह इज्जत वाले ज़मींदार चैधरी का इकलौता बेटा था। उस पागलपन में वह बार-बार अपनी माँ के कपडे उतारकर उस से मुँह काला करने को कहता। बार-बार इस गंदे जज्बे से उस को लिपट जाता। उस के वालिद बहुत परेशान हुए। बहुत से सियानों और मौलाना लोगों को दिखाया। बार-बार मालिक से माफी मांगते। दान करते, मगर उस की हालत और बिगडती थी। एक रोज़ वह बाहर गए, तो उसने अपनी माँ के साथ गंदी हरकत करनी चाही। उस ने शौर मचा दिया। मौहल्ले वाले आये तो जान बची। उस को जन्जीरों में बाँध दिया गया। योगेंद्र के वालिद इज्जत वाले आदमी थे, उन्होंने उसको गोली मारने का इरादा कर लिया। किसी ने बताया कि यहाँ सोनीपत में ईदगाह में एक मदरसा है। वहाँ बडे मौलाना साहब आते हैं। आप एक दफा उन से और मिल लें। अगर वहाँ कोई हल न हो तो फिर जो चाहे करना। सोनीपत गये तो मालूम हुआ कि मौलाना साहब तो यहाँ पहली तारीख को आते हैं। और परसों पहली जनवरी को आकर दो तारीख की सुबह में जा चुके हैं। चौधरी साहब बहुत मायूस हुए और किसी झाडफूंक करने वाले को मालूम किया। मालूम हुआ कि मदरसे के जिम्मेदार कारी साहब ये काम कर देते हैं, मगर वह भी मौलाना साहब के साथ सफर पर निकल गये हैं। ईदगाह के एक दुकानदार ने उन्हें मौलाना का दिल्ली का पता दिया और यह भी बताया कि परसों बुध को हजरत मौलाना ने (बवाना, दिल्ली) में उनके यहाँ आने का वादा किया है। वह लडके को जन्जीर में बाँधकर बवाना के इमाम साहब के पास ले गए वह आप के वालिद साहब के मुरीद(धर्म-शिष्य) थे और बहुत ज़माने से उन से बवाना के लिये तारीख लेना चाहते थे, मौलाना साहब हर बार उन से माजरत (खेद) कर रहे थे। इस बार उन्होंने इधर के सफर में दो रोज़ के बाद जोहर (दोपहर) की नमाज़ पढने का वादा कर लिया था। बवाना के इमाम साहब ने बताया कि हालात के खराब होने की वजह से 6 दिसम्बर से पहले हरियाणा के बहुत से इमाम और मुदर्रीसीन (शिक्षक) यहाँ से यु. पी. अपने घरों को चले गए थे और बाज(बहुत से) उन में से एक महीने तक नहीं आये इस लिए मौलाना साहब ने पहली तारीख को इस मौजु (विषय) पर तकरीर की और बडी जोर देकर यह बात कही कि अगर मुसलमानों ने इन गैरमुस्लिम भाईयों को दावत दी होती और इस्लाम और अल्लाह और मस्जिद का परिचय कराया होता तो ऐसे वाकिआत पेश न आते। उन्होंने कहा कि बाबरी मस्जिद की शहादत के बयक वास्ता हम मुसलमान जिम्‍मेदार हैं और अगर अब भी हमें होश आ जाये और हम दावत का हक अदा करने लगें तो मस्जिद गिराने वाले मस्जिद बनाने और उन को आबाद करने वाले बन सकते हैं। ऐसे मौके पर हमारे आका ‘‘अल्लाहुम्मा अहद कोमी फअन्नाहुम ला यालमून’’ (ऐ अल्लाह मेरी कौम को हिदायत दे, इस लिए कि ये लोग जानते नहीं) फरमाया करते थे। योगेंद्र के वालिद चैधरी रघुबीर सिंह जब बवाना के इमाम (जिन का नाम शायद बशीर अहमद था) के पास पहुंचे तो उन पर उस वक्त अपने शेख (गुरू) की तकरीर का बडा असर था। उन्होंने चौधरी साहब से कहा कि मैं झाड फूँक का काम करता था। मगर अब हमारे हजरत ने हमें इस काम से रोक दिया। क्योंकि इस पेशे में झूठ और औरतों से इख्तेलात (मेल मिलाप) बहुत होता है और इस लडके पर कोई असर या जादू वगैरा नहीं बल्कि मालिक का अजाब (प्रकोप) है। आप के लिए एक मौका है। हमारे बडे हजरत साहब परसों बुध के रोज़ दोपहर को यहाँ आ रहे हैं। आप उनके सामने बात रखें आप का बेटा हमें उम्मीद है कि ठीक हो जायेगा मगर आप को एक काम करना पडेगा। वह यह कि अगर आप का बेटा ठीक हो जाए तो ईमानवाला बनना पडेगा। चौधरी साहब ने कहा ‘‘मेरा बेटा ठीक हो जाये तो मैं सब काम करने को तैयार हूँ’’। तीसरे रोज बुध था। चौधरी रघुबीर साहब योगेन्द्र को लेकर सुबह 8 बजे बवाना पहुँच गये। दोपहर को जोहर से पहले मौलाना साहब आये। योगेन्द्र जन्जीर में बंधा नंग-धडंग खडा था। चैधरी साहब रोते हुए मौलाना साहब के कदमों में गिर गए और बोले कि, मौलाना साहब मैंने इस कमीने को बहुत रोका मगर पानीपत के एक ओत के चक्कर में आ गया। मौलाना साहब मुझे क्षमा करा दीजिये मेरे घर को बचा लिजिए। मौलाना साहब ने सख्ती से उन्हें सर उठाने के लिए कहा और पूरा वाकिआ(घटना) सुना। उन्होंने चैधरी साहब से कहा, सारे सन्सार के चलाने वाले सर्व-शक्तिमान (कादिरे मुतलक) खुदा का घर ढाकर इन्होंने ऐसा बडा पाप किया है कि अगर वह मालिक सारे सन्सार को खत्म कर दे तो ठीक हैं, यह तो बहुत कम है कि इस अकेले पर पडी है। हम भी उस मालिक के बंदे हैं और एक तरह से इस बडे घन्घोर पाप में हम भी कुसूरवार हैं। कि हमने मस्जिद को शहीद करने वालों को समझाने का हक अदा नहीं किया। अब हमारे बस में कुछ भी नहीं है। बस यह है कि आप भी और हम भी उस मालिक के सामने गिडगिडाएँ और क्षमा माँगें और हम भी माफी माँगे। मौलाना साहब ने कहा, जब तक हम मस्जिद में प्रोग्राम से फारिग (निवृत्त) हों आप अपने ध्यान को मालिक की तरफ लगाकर सच्चे दिल से माफी और प्रार्थना करें कि मालिक मेरी मुश्किल को आपके अलावा कोई नहीं हटा सकता। चौधरी साहब फिर मौलाना साहब के कदमों में गिर गये और बोले, जी मैं इस लायक होता तो यह हद क्यों देखता? आप मालिक के करीब हैं। आप ही कुछ करें। मौलाना साहब ने उनसे कहा, आप मेरे पास इलाज के लिए आये हैं। अब जो इलाज में बता रहा हूँ। वह आपको करना चाहिये। वह राजी हो गये। मौलाना साहब मस्जिद में गये नमाज़ पढ़ी, थोडी देर तकरीर (भाषण) की और दुआ की। मौलाना साहब ने सभी लोगों से चौधरी साहब के लिए दुआ को कहा, प्रोग्राम के बाद मस्जिद में नाश्ता हुआ, नाश्ते से फारिग होकर मसिजद से बाहर निकले तो मालिक का करम कि योगेंद्र ने अपने बाप की पगडी उतारकर अपने नंगे जिस्म पर लपेट ली थी और ठीक-ठाक अपने वालिद से बात कर रहा था। सब लोग बहुत खुश हुए। बवाना के इमाम साहब तो बहुत खुश हुए। उन्होंने चौधरी साहब को वादा याद दिलाया और इस से डराया भी कि जिस मालिक ने इस को अच्छा किया है अगर तुम वादे के मुताबिक ईमान नहीं लाएँ तो फिर ये दोबारा इस से ज्यादा पागल हो सकता है। वह तैयार हो गये और इमाम साहब से बोले, मौलाना साहब मेरी सात पुश्ते आप के अहसान (उपकार) का बदला नहीं दे सकतीं आपका गुलाम हूँ, जहाँ चाहें पाप मुझे बेच सकते हैं, हजरत मौलाना को जब यह मालूम हुआ कि इमाम साहब ने उनसे ठीक होने का ऐसा वादा कर लिया था। तो उन्हों ने इमाम साहब को समझाया कि इस तरह करना एहतियात के खिलाफ है। चौधरी साहब को मस्जिद में ले जाने लगे तो योगेन्द्र ने पूछा ‘‘पिताजी कहाँ जा रहे हो? तो उन्होंने कहा, मुसलमान बनने’’। तो योगेन्द्र ने कहा ‘‘मुझे आप से पहले मुसलमान बनना है और मुझे तो बाबरी मस्जिद दोबारा जरूर बनवानी है। खुशी-खुशी उन दोनों को वुजु कराया और कलमा पढवाया गया। वालिद साहब का मुहम्मद उस्मान और बेटे का मुहम्मद उमर नाम रखा गया। खुशी-खुशी वे दोनों अपने गाँव पहुँचे। वहाँ पर एक छोटी सी मस्जिद है उस के इमाम साहब से जाकर मिले। इमाम साहब ने मुसलमानों को बता दिया। बात पूरे इलाके में फैल गयी। गैरों तक बात पहुँची तो कुव्वतदार(ताकतवर) लोगों की मीटिंग हुयी और तय किया कि उन दोनों को रात में कत्ल करवा दिया जाये। वरना न जाने कितने लोगों का धर्म खराब करेंगे। इस मीटिंग में एक मुर्तद(धर्म-भ्रष्ट) भी शरीक था उसने इमाम साहब को बता दिया। अल्लाह ने खेर की उन दोनों को रातों रात गाँव से निकाला गया। फुलत गये और बाद में जमाअत में 40 दिन के लिए चले गये। योगेन्द्र ने फिर अमीर साहब के मशवरे (सलाह) से तीन चिल्ले (120 दिन) लगाये। बाद में उनकी वालिदा (माँ) भी मुसलमान हो गयीं। मुहम्मद उमर की शादी दिल्ली में एक अच्छे मुसलमान घराने में हो गयी। और वे सब लोग खुशी खुशी दिल्ली में रह रहे हैं, गाँव का मकान और जमीन वगैरा बेचकर दिल्ली में एक कारखाना लिया है।अहमदः मास्टर साहब, आप से मैं ने आप के इस्लाम कुबूल करने के बारे में सवाल किया था। आप ने योगेंद्र और उन के खानदान की दास्तान सुनायी। वाकई यह खुद अजीबो गरीब कहानी है, मगर मुझे तो आप के कुबूले इस्लाम के बारे में मालूम करना है।आमिरः प्यारे भाई। असल में मेरे कुबूले इस्लाम को उस कहानी से अलग करना मुमकिन नहीं इस लिए मैंने उस का पहला हिस्सा सुनाया। अब आगे दूसरा हिस्सा सुन लिजिए। मार्च 93 को अचानक मेरे वालिद का हार्ट फेल होकर इंतेकाल (देहांत) हो गया। उन पर बाबरी मस्जिद की शहादत और उस में मेरी शिरकत का बडा गम था। वह मेरी ममी से कहते थे कि मालिक ने हमें मुसलमानों में पैदा क्यों नहीं किया? अगर मुसलमान घराने में पैदा होते, कम अज़ कम जुल्म सहने वालों में हमारा नाम आता। हद से तजावुज(बढने) करने वाली कौम में हमें क्यों पैदा कर दिया? उन्होंने घरवालों को वसीयत की थी कि मेरी अर्थी पर बलबीर न आने पाये, मेरी अर्थी को मिट्टी में दबाना या पानी में बहा देना। हद से तजवावुज़ (बढने) करने वाली कौम के रिवाज के मुताबिक आग मत लगाना। बल्कि शमशान में भी न ले जाना। घरवालों ने उन की इच्छा के मुताबिक अमल गिया और आठ दिन बाद मुझे उनके इन्तेकाल की खबर हुई। मेरा दिल बहुत टूटा। उनके इन्तेकाल के बाद बाबरी मस्जिद का गिराना मुझे जुल्म लगने लगा और मुझे इस पर फख्र (गर्व) के बजाये अफसोस होने लगा और मेरा दिल बुझ सा गया। मैं घर को जाता तो मेरी मम्मी मेरे वालिद के गम को याद करके रोने लगती और कहती, कि ऐसे देवता बाप को तूने सताकर मार दिया, तू कैसा नीच इन्सान है। मैं ने घर जाना बंद कर दिया। जून में मुहम्मद उमर जमाअत से वापस आया तो पानीपत मेरे पास आया और अपनी पूरी कहानी बतायी। दो महीने से मेरा दिल हर वक्त खौफजदा सा रहता था कि कोई आसमानी आफत मुझ पर न आ जाये। वालिद का दुख और बाबरी मस्जिद की शहादत आफत मुझ पर न आ जाए। वालिद का दुख और बाबरी मस्जिद की शहादत दोनों की वजह से हर वक्त दिल सहमा-सहमा(डरा-डरा) सा रहता था। मुहम्मद उमर ने मुझ पर जोर दिया कि 23 जून को सोनीपत में मौलाना साहब आने वाले हैं। आप उन से जरूर मिलें और अच्छा है कुछ दिन साथ रहें। मैं ने प्रोग्राम बनाया। मुझे पहुँचने में देर हो गयी उमर भाई पहले पहुँच गये थे और मौलाना साहब से मेरे बारे में पूरा हाल बता दिया था। मैं गया तो मौलाना साहब बडी मुहब्बत से मिले और मुझ से कहा, आप की इस तहरीक (प्रेरणा) पर उस गुनाह को करने वाले योगेन्द्र के साथ मालिक यह मामला कर सकते हैं। आप के साथ भी यही मामला पेश आ सकता है और अगर इस दुनिया में वह मालिक सजा न भी दें तो मरने के बाद हमेशा के जीवन में जो सजा मिलेगी आप उस का तसव्वुर (कल्पना) भी नहीं कर सकते। एक घंटा साथ रहने के बाद मैं ने फैसला कर लिया कि अगर मुझे आसमानी आफत से बचना है तो मुसलमान हो जाना चाहिए। मौलाना साहब दो रोज़ के सफर पर जा रहे थे। मैं ने दो रोज़ साथ रहने की ख्वाहिश का इजहार किया तो उन्होंने खुशी से कुबूल किया। एक रोज़ हरियाणा फिर दिल्ली और खुर्जा का सफर था। दो रोज़ के बाद फुलत पहुंचे। दो रोज़ के बाद मैं दिल से इस्लाम के लिए आमादा (तैयार) हो चुका था। मैं ने उमर भाई से अपना ख्याल जाहिर किया तो उन्होंने खुशी खुशी मौलाना साहब से बताया और अलहम्दुलिल्लाह मैं ने 25 जून 93 जोहर (दोपहर) के बाद इस्लाम कुबूल किया। मौलाना साहब ने मेरा नाम मुहम्मद आमिर रखा। इस्लाम के मुताला (वाचन) ओर नमाज़ वगैरा याद करने के लिए मुझे फुलत रहने का मशवरा दिया। मैंने अपनी बीवी और बच्चों की मजबूरी का जिक्र किया तो मेरे लिए मकान का नज्म (व्यवस्था) कर दिया गया। मैं चंद माह फुलत आकर रहा। और अपनी बीवी पर काम करता रहा तीन महीने के बाद वह भी मुसलमान हो गयी, अलहम्दुलिल्लाह।अहमदः आपकी वालिदा का क्या हुआ? आमिरः मैं ने अपनी माँ से अपने मुसलमान होने के बारे में बताया, वह बहुत खुश हुईं और बोली कि मेरे पिताजी को इससे शांति मिलेगी। वह भी इसी साल मुसलमान हो गयीं।
अहमदः आजकल आप क्या कर रहे हैं?
आमिरः आजकल मैं जूनियर हाई-स्कूल चला रहा हूँ। जिसमें इस्लामी तालीम के साथ अंग्रेजी मीडियम में तालीम का नज्म है।अहमदः अबी बता रहे थे कि हरियाणा पंजाब वगैरा की गैरआबाद मस्जिदों को आबाद करने की बडी कोशिश आप कर रहे हैं।आमिरः मैंने उमर भाई से मिलकर यह प्रोग्राम बनाया कि अल्लाह के घर को शहीद करने के बाद इस बडे गुनाह की तलाफी(क्षति-पूर्ति) के लिये हम वीरान मस्जिदों को आबाद करने और कुछ नई मस्जिदें बनाने का बेडा उठाएँ। हम दोनों ने यह तय किया कि काम तकसीम(बाँट) कर लें, मैं वीरान मस्जिदों को आबाद करवाऊँ और उमर भाई नयी मस्जिदें बनाने की कोशिश करें और एक दूसरे का तआवुन(मदद) करें। हम दोनों ने जिन्दगी में सौ-सौ मस्जिदें बनाने और वागुजार (मुक्त) कराने का प्रोग्राम बनाया है। अलहम्दु लिल्लाह 6 दिसम्बर 2004 तक 13 वीरान और मकबूजा मस्जिदें हरियाणा, पंजाब और दिल्ली और मेरठ केंट में वागुजार कराके यह पापी आबाद करा चुका है। (जुलाई 2009 तक 67 मस्जिदें वागुजार और 37 नई बन चुकी हैं)। उमर भाई मुझ से आगे निकल गए वह अब तक बीस मस्जिदें नयी बनवा चुके हैं ओर इक्कीसवीं की बुनियाद रखी है। हम लोगों ने यह तय किया है कि बाबरी मस्जिद की शहादत की हर बरसी पर 6 दिसंबर को एक वीरान मस्जिद में नमाज़ शुरू करानी है और उमर भाई को नई मस्जिद की बुनियाद जरूर रखनी है। अलहम्दु लिल्लाह कोई साल नागा नहीं हुआ। अलबत्ता सौ का निशाना अभी बहुत दूर है। इस साल उम्मीद है तादाद बहुत बढ जायेगी। आठ मस्जिदों की बात चल रही है। उम्मीद है वे आईन्दा चंद माह में जरूर आबाद हो जायेंगी। उमर भाई तो मुझ से बहुत आगे पहले ही हैं। और असल में काम भी उनही के हिस्से में है। मुझे अन्धेरे से निकालने का जरिया वही बने।
अहमदः आप के खानदान वालों क्या ख्याल है?
आमिरः मेरी वालिदा के अलावा एक बडे भाई हैं। हमारी भाभी का चार साल पहले इन्तेकाल हो गया। उनकी शादी मुझ से बाद में हुई थी। उनके चार छोटे-छोटे बच्चे हैं। एक बच्चा माजूर (अपंग) सा है हमारी भाभी बडी भली औरत थी। भाई साहब के साथ बडी मिसाली बीवी बनकर रही उनके इन्तेकाल के बाद भाई साहब बिल्कुल टूट से गये थे। मेरे बडे भाई खुद एक बहुत शरीफ आदमी हैं। वह मेरी बीवी की इस खिदमत से बहुत मुतअस्सिर (प्रभावित) हुए। मैं ने उनको इस्लाम की दावत दी मगर मेरी वजह से मेरे वालिद के सदमे (झटके) की वजह से वह मुझे कोई अच्छा आदमी नहीं समझते थे। मैंने अपनी बीवी से मशवरा किया। मेरे बच्चे बडे हैं और भाई मुश्किल से जूझ रहे हैं। अगर मैं तुम्हें तलाक दे दूँ और इद्दत के बाद भाई तैयार हो जाएँ कि वह मुसलमान होकर तुमसे शादी करलें तो दोनों के लिए निजात का जरिया बन सकता है। वह पहले तो बहुत बुरा मानी। मगर जब मैंने उस को दिल से समझाने की कोशिश की तो वह राजी हो गई। मैंने भाई को समझाया, इन बच्चों की जिन्दगी के लिए अगर आप मुसलमान हो जाएँ और मेरी बीवी से शादी करलें तो इस में क्या हर्ज है और कोई ऐसी औरत मिलना मुश्किल है जो माँ की तरह इन बच्चों की परवरिश कर सके। वह भी शुरू में बुरा मानें कि लोग क्या कहेंगे? मैंने कहा, अक्ल से जो बात सही है उसको मानने में क्या हर्ज है? बाहम(परस्पर, आपसी) मशवरा हो गया। मैं ने अपनी बीवी को तलाक दी और इद्दत गुज़ारकर भाई को कलमा पढ़वाया और उनसे उस का निकाह कराया। अल्हमदु लिल्लाह वे बहुत खुशी-खुशी जिन्दगी गुजार रहे हैं। मेरे और उनके बच्चे उनके साथ रहते हैं।
अहमदः आप अकेले रहते हैं?
आमिरः हजरत मौलाना के मशवरे से मैं ने एक नव-मुस्लिम औरत से जो काफी मुअम्मर (वयोवृद्ध) हैं शादी कर ली है। अलहम्दुलिल्लाह खुशी-खुशी हम दोनों भी रह रहे हैं।
अहमदः कारिईने अरमुगान के लिए कुछ पैगाम आप देना चाहेंगे?
आमिरः मेरी हर मुसलमान से दरख्वास्त है कि अपने मकसदे जिन्दगी को पहचाने और इस्लाम को इन्सानियत की अमानत समझकर उस को पहुंचाने की फिक्र करे। महज़ इस्लाम दुश्‍मनी की वजह से उनसे बदले का जज्बा ना रखे। अहमद भाई मैं यह बात बिलकुल अपने जाती (व्यक्तिगत, निजि) तजर्बे से कह रहा हूँ कि बाबरी मस्जिद की शहादत में शरीक हर एक शिव सैनिक, बजरंग दली और हिन्दू को अगर यह मालूम होता कि इस्लाम क्या है? मुसलमान किसे कहते हैं? कुरआन क्या है? और मस्जिद क्या चीज़ है? तो उन में से हर एक मस्जिद बनाने की तो सोच सकता है, मस्जिद गिराने की तो सोच ही नहीं सकता। मैं यकीन से कह सकता हूँ कि बाल ठाकरे जी, विनय कटियार, उमा भारती और अशोक सिंघल जैसे सरकर्दा (प्रमुख) लोगों को भी इस्लाम की हकीकत मालूम हो जाए और यह मालूम हो जाए कि इस्लाम हमारा भी मजहब है हमारे लिए भी जरूरी है तो उन में से हर एक अपने खर्च से दोबारा बाबरी मस्जिद तामीर करने को सआदत (सौभाग्य) समझेगा। अहमद भाई कुछ ही लोग ऐसे हैं जो मुसलमानों की दुशमनी के लिए मशहूर हैं। एक अरब हिन्दुओं में ऐसे लोग एक लाख भी नहीं होंगे। एक लाख भी सच्ची बात यह है हैं कि मैं शायद ज्यादा बता रहा हूँ। 99 करोड 99 लाख तो मेरे वालिद की तरह हैं। जो इन्सानियत दोस्त बल्कि इस्लामी उसूलों (तत्वों) को दिल से पसंद करते हैं। अहमद भाई। मेरे वालिद (रोते हुए) क्या फितरतन (स्वभावतः) मुसलमान नहीं थे? मगर ईमान वालों के दावत न देने की वजह से वह इन्कार पर मर गए। मेरे साथ और मेरे वालिद के साथ मुसलमानों का कितना बडा जुल्म है। यह बात सच्ची है कि बाबरी मस्जिद को शहीद करने वाले मुझसे ज्यादा जालिम तो वे मुसलमान हैं जिन की दअवत से गफलत की वजह से मेरे ऐसे प्यारे बाप दोजख में चले गए। मौलाना साहब सच कहते हैं, हम शहीद करने वाले भी न जानने और मुसलमानों के ना पहचानने की वजह से हुए। हम ने अन्जाने में ऐसा जुल्म किया और मुसलमान जान बूझकर उनके दोजख़ में जाने का जरिया बन रहे हैं। मुझे जब अपने वालिद के कुफ्र पर मरने का रात में भी ख्याल आता है तो मेरी नींद उड जाती है। हफ्ता-हफ्ता नींद नहीं आती। नींद की गोलियां खानी पडती हैं। काश मुसलमानों को इस दर्द का एहसास हो।
अहमदः बहुत बहुत शुक्रिया। माशा अल्लाह आपकी जिन्दगी अल्लाह की सिफते हादी (सण्मार्ग-दर्शक गुण) और इस्लाम की हक्कानियत (सच्चाई) की खुली निशानी है।
आमिरः बिलाशुबा(बे-शक) अहमद भाई। इस लिए मेरी ख्वाहिश थी कि अरमुगान में यह छपे, अल्लाह तआला इस की इशाअत (प्रकाशन) को मुसलमानों के लिए आँख खोलने का जरिया बनाये। आमीन, अच्छा, अल्लाह हाफिज। (साभारः उर्दू मासिक ‘अरमुगान‘ फुलत, जून 2005)

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 (Ex Shiv sena leader Balbeer singh (Mohammed amir) with Kaleem siddiqui)


Wednesday, March 17, 2010

Mosque Breakers become Mosque Makers – II

“6th December 1992: Balbir Singh, Vice president Shiv Sena Youth Wing leads the demolition squad and becomes the first person to strike his pickaxe against the central Dome of Babri Masjid. Within minutes the whole structure is razed to ground. 25th June 1993: Balbir Singh takes rebirth as Mohammad Aamir when he embraces Islam (Al-hamdu Lillah) having lived lives and experienced psyches poles apart from each other Mohammad Aamir admonishes the Muslim ummah about their responsibilities and is trying his utmost to awaken them from the slumber they are in. Here is the part II of his story in continuation to part I which appeared in the June issue of CRESCENT.

Pride hath a fall

My embracing Islam can not be separated from this story of Mohammad Omar (former Yoginder Pal Singh) which is incomplete yet. On 9th March 1993, my father succumbed to cardiac arrest. He was worried about the demolition of the Babri Masjid and my participation in the demolition. He used to ask my mother: “Why hasn’t Lord given us birth in some Muslim family. Being Muslim we could have been among the oppressed and not the oppressors”. He had advised the family that Balbir shall not attend his funeral. His body shall either be buried or thrown in water and not burned according to the customs of oppressors. He had advised that his body shall not be taken to Hindus crematory. Family members acted as per his will. I came to know about his death eight days later. My heart was broken. After his death the demolition of Babri Masjid seemed to me some gruesome act. I started feeling sorry instead of proud about that. With my heart sunk, whenever I visited my home my mother would cry in memory of my father. She would blame me for hurting the noble soul and subsequent death of my angle like father. Finally I stopped visiting my home.

Encounter with Truth

In June 1993, Mohammad Omar (former Yoginder) returned from Jamaat and came to visit me in Panipat. He related to me his story in detail. Since two months I was feeling scared as if something was going to befall me. My father’s tragic death and demolition of Babri Masjid were breaking my heart. The story of Mohammad Omar worried me further. Br. Omar insisted that I should see Molvi Kalim Sidiqi who was arriving in Sonipat on 23rd June. I scheduled the trip but was a little late. Br. Omar had reached early and told Molvi Sahib about me. When I reached there Molvi Sahib received me with love and affection and said, “What ever has happened to Omar (former Yoginder) who sinned at your behest can well be repeated by Almighty Lord with you too. Even if He does not punish anyone in this world the punishment in the eternal life of Hereafter is beyond your imagination”. After being with him for an hour I decided that if I have to save myself from some supernatural disaster I have to embrace Islam. Molvi Sahib was leaving for a two days trip. I expressed my desire to be with him during the trip, which was gladly accepted. One day in Haryana, then Delhi followed by Khorja and back to Phulat after two days. After these two days I was ready to embrace Islam. I expressed my desire to Br. Omar and he gladly conveyed the same to Molvi Sahib. On 25th June 1993 after Zuhar prayer I came within the fold of Islam (alhamdulillah). Mohammad Aamir was the name given to me by Molvi Sahib and he suggested me to remain in Phulat to study Islam and learn prayers, etc.

Family Welcomes my Reversion

I expressed my obligations regarding my wife and little child to Molvi Sahib and a house was arranged for me and my family. We continued in Phulat for a few months and constant teaching helped my wife to learn and understand Islam. Thank God she embraced Islam after three months.

When I told my mother about my reversion to Islam she was very happy and said, “Your father’s soul will rest in peace by this”. She too embraced Islam the same year.

New Mission

Brother Omar and myself decided to rehabilitate the abandoned mosques and construct some new one to somehow counter the evil we had incurred by demolishing the Babri Masjid. For smooth functioning, while co-operating with each other, I took the responsibility of rehabilitating the deserted mosques and Brother Omar took the responsibility of constructing new mosques. We have set a target of rehabilitating one hundred deserted mosques and constructing one hundred new mosques. With the grace of Almighty I (the sinner) have been able to rehabilitate thirteen abandoned and forcibly occupied mosques in Haryana, Punjab, Delhi and Meeruth upto 6th December 2004. Brother Omar is ahead of me. He has constructed twenty mosques and laid the foundation of twenty first (See note at the end). We have further decided that at each anniversary of Babri Masjid demolition on 6th December the regular prayers must be started in one deserted mosque and foundation must be laid for one new mosque. Thank God we have maintained this so far but the target of one hundred is yet far off. This year hopefully the progress is better. We are working on eight mosques and hope to rehabilitate those within a few months. Brother Omar is ahead of me. In fact my work is a part of only his work, for he became the reason to lead me out of darkness.

Now-a-days I am running an English medium junior high school with Islamic Studies as a part of our curriculum. In addition to my mother, my elder brother has also embraced Islam now.

Finally the Message

My submission to my Muslim brethren is that they should recognize objective of their life and consider Islam as something they owe to humanity. Just being anti-Muslim shall not persuade you for revenge against any one. Based on personal experience I am sure that if all the participants in Babri Masjid demolition whether Shiv Saniks, Bajrang Dal, or any other Hindu know about what Islam is, what a Muslim means, what Quran teaches or what a mosque prepares one for every one of them can think of constructing a mosque. The question of demolition of mosque will not arise.
I am sure if leaders like Bal Thakrey Ji, Vinay Katyar, Oma Bharti or Ashok Singhal will come to know about the spirit of Islam and that Islam is their’s too, they will consider themselves fortunate to help reconstruction of Babri Masjid at their expenses.

Some people are notorious for their anti-Muslim attitude and activities but out of one billion Hindus their number will not be even one lac- perhaps one lac is too big a number. The remaining ninety nine crore and ninety nine lac Hindus are just like my father- philanthropists, loving the Islamic principles from the core of their heart. Wasn’t my father a Muslim by nature. I consider my self to be a great sinner being the demolisher of Babri Masjid but even worse are the Muslism whose carelessness and indifference caused my dear father to end in hell. Molvi Sahib speaks with sincerity when he says, “You became, the demolishers of Babri Masjid as you didn’t know Muslims and Islam. You have sinned unknowingly. But Muslims deliberately promote the cause of leading others to hell”. The very idea of my father dying as a rejecter of faith renders my nights sleepless and compels me to resort to sleep inducing drugs.

I wish Muslims feel my pain.

Note : Br. Mohammad Aamir has been kind enough to visit Kashmir along with Allama Kaleem Siddiqui in May 2009. His visit was earlier scheduled last year, but could not materialize. In an interview to Crescent Br. Aamir said that till date 38 new mosques have been constructed by Br. Omar. He and his team have rehabilitated 69 mosques in Haryana, Punjab, Delhi & Meerut. – Editor


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 (Ex Shiv sena leader Balbeer singh (Mohammed amir) with Kaleem siddiqui)

بلبیرسنگھ: سابق صدر، شیو سینا یوتھ ونگ کی اسلام قبول کرکے ماسٹر محمد عامرہونے کی کہانی خود اُن کی زبانی

ایک چشم کشاملاقات )
ماسٹرمحمد عامر : السلام علیکم وحمتہ اللہ
احمد اواہ : وعلیکم السلام و رحمة اللہ و برکاتہ‘
سوال : ماسٹر صاحب ایک عرصے سے ابی( مولانا کلیم صدیقی) کا حکم تھا کہ میں ارمغان کے لئے آپ سے انٹرویو لوں اچھا ہوا آپ خود ہی تشریف لے آئے آپ سے کچھ باتیں کرنی ہیں۔
جواب : احمد بھائی آپ نے میرے دل کی بات کہی، جب سے ارمغان میں نو مسلموں کے انٹرویو کا یہ سلسلہ چل رہا ہے، میری خواہش تھی کہ میرے قبول اسلام کا حال اس میں چھپے،اس لئے نہیں کہ میرا نام ارمغان میں آئے، بلکہ اس لئے کہ دعوت کا کام کرنے والوں کا حوصلہ بڑھے اور دنیا کے سامنے کریم وہادی رب کی کرم فرمائی کی ایک مثال سامنے آئے اور دعوت کا کام کرنے والوں کو یہ معلوم ہوکہ جب ایسے کمینے انسان اور اپنے مبارک گھر کو ڈھانے والے کو اللہ تعالیٰ ہدایت سے نواز سکتے ہیں تو عام شریف اور بھولے بھالے لوگوں کے لئے ہدایت کے کیسے مواقع ہیں۔

سوال : آپ اپنا خاندانی تعارف کرائیں ؟
جواب : میرا تعلق صوبہ ہریانہ کے پانی پت ضلع کے ایک گاﺅں سے ہے میری پیدائش ۶(چھ) دسمبر ۱۹۷۰ءکو ایک راجپوت گھرانے میں ہوئی، میرے والد صاحب ایک اچھے کسان ہونے کے ساتھ ساتھ ایک پرائمری اس کول میں ہیڈ ماسٹر تھے، وہ بہت اچھے انسان تھے اور انسانیت دوستی ان کا مذہب تھا، کسی پر بھی کسی طرح کے ظلم سے انہیں سخت چڑ تھی ۱۹۴۷ءکے فسادات انہوں نے اپنی آنکھوں سے دیکھے تھے وہ بہت کرب کے ساتھ ان کا ذکر کرتے اور مسلمانوں کے قتل عام کو ملک پر بڑا داغ سمجھتے تھے بچے کھچے مسلمانوں کو بسانے میں وہ بہت مدد کرتے تھے، اپنے اسکول میں مسلمان بچوں کی تعلیم کا وہ خاص خیال رکھتے تھے، میراپیدائشی نام بلبیر سنگھ تھا اپنے گاﺅں کے اسکول سے میں نے ہائی اسکول کرکے انٹرمیڈیٹ میں پانی پت میں داخلہ لیا، پانی پت شاید بمبئی کے بعد شیوسینا کا سب سے مضبوط گڑھ ہے، خاص طور پر جو ان طبقہ اور اسکول کے لوگ شیوسینا میں بہت لگے ہوئے ہیں، وہاں میری دوستی کچھ شیوسینکوں سے ہوگئی اور میں نے بھی پانی پت شاکھا میں نام لکھا لیا، پانی پت کے اتہاس (تاریخ) کے حوالے سے وہاں نوجوانوں میں، مسلمانوں خاص طور پر بابر اور دوسرے مسلمان بادشاہوں کے خلاف بڑی نفرت گھولی جاتی تھی، میرے والد صاحب کو جب میرے بارے میں معلوم ہوا کہ میں شیو سینا میں شامل ہوگیا ہوں تو انہوں نے مجھے بہت سمجھایا، انہوں نے مجھے اتہاس کے حوالے سے سمجھانے کی کوشش کی، انہوں نے بابر خاص طور پر اورنگ زیب کی حکومت کے انصاف اور غیر مسلموں کے ساتھ ان کے عمدہ سلوک کے قصے سنائے اور مجھے بتانے کی کوشش کی کہ انگریزوں نے غلط تاریخ ہمیں لڑانے کے لئے اور دیش کو کمزور کرنے کے لئے گھڑ کر تیار کی ہے، انہوں نے ۱۹۴۷ءکے ظلم اور قتل غارت گری کے قصوں کے حوالے سے مجھے شیوسینا سے باز رکھنے کی کوشش کی، مگر میری سمجھ میں کچھ نہ آیا۔
سوال : آپ نے پھلت کے قیام کے دوران بابری مسجد کی شہادت میں اپنی شرکت کا قصہ سنایاتھا، ذرا اب دوبارہ تفصیل سے سنایئے؟
جواب : وہ قصہ اس طرح ہے کہ ۱۹۹۰ءمیں ایڈوانی جی کی رتھ یا ترا میںمجھے پانی پت کے پروگرام کی خاصی بڑی ذمہ داری سونپی گئی رتھ یاترا میں ان ذمہ داروں نے ہمارے روئیں روئیں میں مسلم نفرت کی آگ بھر دی میں نے شیواجی کی سوگندھ کھا ئی کہ کوئی کچھ بھی کرے میں خود ا کیلے جاکر رام مندر پر سے اس ظالمانہ ڈھانچہ کو مسمار کروں گا، اس یاترا میں میری کارکردگی کی وجہ سے مجھے شیو سینا کے یوتہ ونگ کا صدر بنا دیا گیا، میں اپنی نوجوان ٹیم کو لے کر ۳ اکتوبر کو ایودھیا گیا، راستہ میں ہمیں پولس نے فیض آباد میں روک دیا،میں اور کچھ ساتھی کسی طرح بچ بچا کر پھر بھی ایودھیا پہنچے، مگر پہنچنے میں دیر ہو گئی اور اس سے پہلے گولی چل چکی تھی اور بہت کوشش کے با وجود میں بابری مسجد کے پاس نہ پہنچ سکا میری نفرت کی آگ اس سے اور بھڑکی میں اپنے ساتھیوں سے بار بار کہتا تھا اس جیون سے مر جانا بہتر ہے رام کے دیش میں عرب لٹیروں کی وجہ سے رام کے بھگتوں پر رام جنم بھومی پر گولی چلا دی جائے، یہ کیسا انیائے اور ظلم ہے، مجھے بہت غصہ تھا، کبھی خیال ہوتا تھا کہ خود کشی کر لوں کبھی دل میں آتا تھا کہ لکھنو_¿ جا کر ملائم سنگھ کو اپنے ہاتھ سے گولی مار دوں، ملک میں فسادات چلتے رہے اور میں اس دن کی وجہ سے بے چین تھا کہ مجھے موقعہ ملے اور میں بابری مسجد کو اپنے ہاتھوں مسمار کروں۔
ایک ایک دن کر کے وہ منحوس دن قریب آیا جسے میں اس وقت کاخوشی کا دن سمجھتا تھا میں اپنے کچھ جذباتی ساتھیوں کے ساتھ ایک دسمبر ۱۹۹۲ ءکو پہلے ایودھیا پہنچا میرے ساتھ سونی پت کے پاس ایک جاٹوں کے گاو_¿ں کا ایک نوجوان یوگیندر پال بھی تھا جو میرا سب سے قریبی دوست تھا،
اس کے والد ایک بڑے زمیندار تھے اور وہ بھی بڑے انسان دوست آدمی تھے، انہوں نے اپنے اکلوتے بیٹے کو ایودھیا جانے سے بہت روکا اس کے تاو بھی بہت بگڑے مگر وہ نہیں رکا۔
ہم لوگ چھ دسمبر سے پہلے کی رات میں بابری مسجد کے بالکل قریب پہنچ گئے اور ہم نے بابری مسجد کے سامنے کچھ مسلمانوں کے گھروں کی چھتوں پر رات گزاری، مجھے با ر بار خیال ہوتا تھا کہ کہیں ۳ اکتوبر کی طرح آج بھی ہم اس شبھ کام سے محروم نہ رہ جائیں، کئی بار خیال آیا کہ لیڈر نہ جانے کیا کریں، ہمیں خود جاکر کارسیوا شروع کرنی چاہیئے، مگر ہمارے سنچالک نے ہمیں روکا اور ڈسیپلن بنائے رکھنے کو کہا، اوما بھارتی نے بھاشن دیا اور کارسیوکوں میں آگ بھر دی میں بھاشن سنتے سنتے مکان کی چھت سے اتر کر کدال لے کر بابری مسجد کی چھت پر چڑھ گیا، یوگیندر بھی میرے ساتھ تھا، جیسے ہی اوما بھارتی نے نعرہ لگایا، ایک دھکا اور دو، بابری مسجد توڑ دو، بس میری مرادوں کے پورا ہونے کا وقت آگیا اور میں نے بیچ والے گنبد پر کدال چلائی اور بھگوان رام کی جے کے زور زور سے نعرے لگائے، دیکھتے دیکھتے مسجد مسمار ہوگئی، مسجد کے گرنے سے پہلے ہم لوگ نیچے اتر آئے، ہم لوگ بڑے خوش تھے رام للا کے لگائے جانے کے بعد اس کے سامنے ماتھا ٹیک کر ہم لوگ خوشی سے گھر آئے اور بابری مسجد کی دو دو اینٹیں اپنے ساتھ لائے، جو میں نے خوشی خوشی پانی پت کے ساتھیوں کو دکھائیں، وہ لوگ میری پیٹھ ٹھونکتے تھے، شیو سینا کے دفتر میں وہ اینٹیں رکھ دی گئیں اور ایک جلسہ کیا گیا اور سب لوگوں نے بھاشن میں فخر سے میرا ذکر کیا کہ ہمیں گرَو (فخر)ہے کہ پانی پت کے نوجوان شیوسینک نے سب سے پہلے رام بھکتی میں کدال چلائی، میں نے گھر بھی خوشی سے جاکر بتایا میرے پتا جی بہت ناراض ہوئے اور انھوں نے گہرے دکھ کا اظہار کیا اور مجھ سے صاف کہہ دیا کہ” اب اس گھر میں تو اور میں دونوں نہیں رہ سکتے، اگر تو رہے گا تو میں گھر چھوڑ کر چلاجاﺅں گا نہیں تو تو ہمارے گھر سے چلاجا، مالک کے گھر کے ڈھانے والے کی میں صورت دیکھنا نہیں چاہتا، میری موت تک تو مجھے کبھی صورت نہ دکھانا “مجھے اس کا اندازہ نہیں تھا، میں نے ان کو سمجھانے کی کوشش کی اور پانی پت میں جو سماّن (عزت) مجھے اس کارنامہ پر ملا وہ بتانے کی کوشش کی انھوں نے کہا کہ یہ دیش ایسے ظالموں کی وجہ سے برباد ہوجائے گا اور غصہ میں گھر سے جانے لگے، میں نے موقع کو بھانپا اور کہا آپ گھر سے نہ جائیے میں خود اس گھر میں رہنا نہیں چاہتا جہاں رام مندر بھگت کو ظالم سمجھا جاتا ہو اور میں گھر چھوڑ کر آگیا اور پانی پت میں رہنے لگا ۔
سوال : اپنے قبول اسلام کے بارے میں بتائیں ؟
جواب : پیارے بھائی احمد !میرے اللہ کیسے کریم ہیں کہ ظلم اور شرک کے اندھیرے سے مجھے، نہ چاہتے ہوئے، اسلام کے نور اور ہدایت سے مالا مال کیا، مجھ جیسے ظالم کو جس نے اس کا مقدس گھر شہید کیا ہدایت سے نوازا، ہوا یہ کہ میرے دوست یوگیندر نے بابری مسجد کی اینٹیں لاکر رکھیں اور مائک سے اعلان کیا کہ رام مندر پر بنے ظالمانہ ڈھانچہ کی اینٹیں سوبھاگیہ(خوش قسمتی ) سے ہماری تقدیر میں آگئی ہیں سب ہندو بھائی آکر ان پر (موت دان ) پیشاب کریں، پھر کےا تھا،بھیڑلگ گئی، ہر کوئی آتا تھا اور ان اینٹوں پر حقارت سے پیشاب کرتا تھا مسجد کے مالک کو اپنی شان بھی دکھانی تھی چار پانچ روز کے بعد یوگیندر کا دماغ خراب ہوگیا، پاگل ہوکر وہ ننگا رہنے لگا، سارے کپڑے اتاراتھا، وہ عزت والے زمیندار چودھری کا اکلوتا بیٹا تھا، اس پاگل پن میں وہ بار بار اپنی ماں کے کپڑے اتار کر اس سے منھ کالا کر نے کو کہتا، بار بار اس گندے جذبہ سے اس کو لپٹ جاتا اس کے والد بہت پریشان ہوئے بہت سے سیانے اور مولانا لوگوں کو دکھایا، بار بار مالک سے معافی مانگتے، دان کرتے، مگر اس کی حالت اور بگڑتی تھی، ایک روز وہ باہر گئے تو اس نے اپنی ماں کے ساتھ گندی حرکت کرنی چاہی، اس نے شور مچایا دیا، محلہ والے آئے، تو جان بچی، اس کو زنجیر میں میں باند ھ دیا گیا، یوگیندر کے والد عزت والے آدمی تھے، انھوں نے اس کو گولی مارنے کا اراد ہ کرلیاکسی نے بتایا کہ یہاں سونی پت میں عیدگاہ میں ایک مدرسہ ہے وہاں بڑے مولانا صاحب آتے ہیں، آپ ایک دفعہ ان سے اور مل لیں، اگر وہاں کوئی حل نہ ہو تو پھر جو چاہے کرنا، وہ سونی پت گئے تو معلوم ہوا کہ مولانا صاحب تو یہاں پہلی تاریخ کو آتے ہیں اور پرسوں پہلی جنوری کو آکر ۲تاریخ کی صبح میں جاچکے ہیں، چودھری صاحب بہت مایوس ہوئے اور کسی جھاڑ پھونک کرنے والے کو معلوم کیا، معلوم ہواکہ مدرسہ کے ذمہ دار قاری صاحب یہ کام کر دیتے ہیں، مگر وہ بھی مولانا صاحب کے ساتھ سفر پر نکل گئے ہیں، عیدگاہ میں ایک دوکاندار نے انہیں مولانا کا دہلی کا پتہ بتایا کہ پرسوں بدھ میں حضرت مولانا نے (بوانے، دہلی )میں ان کے یہاں آنے کا وعدہ کیا ہے، وہ لڑکے کو زنجیر میں باندھ کر بوانہ کے امام صاحب کے پاس لے گئے، وہ آپ کے والد صاحب کے مرید تھے اور بہت زمانے سے ان سے بوانہ کے لئے تاریخ لیناچاہتے تھے مولانا صاحب ہر بار ان سے معذرت کررہے تھے، اس بار انھوں نے ادھر کے سفر میں دو روز کے بعد ظہر کی نماز پڑھنے کا وعدہ کر لیا تھا،بوانہ کے امام صاحب نے بتایا کہ حالات کے خراب ہونے کی وجہ سے ۶ (چھ)دسمبر ۱۹۹۲ءسے پہلے ہریانہ کے بہت سے امام اور مدرسین یہاں سے یوپی اپنے گھروں کو چلے گئے تھے اور ان میں سے بعض ایک مہینہ تک نہیں آئے اس لئے مولانا صاحب نے پہلی تاریخ کواس موضوع پر تقریر کی اور بڑا زور دے کریہ بات کہی کہ مسلمان نے ان غیر مسلم بھائیوں کو اگر دعوت دی ہوتی اور اسلام، اللہ اور مساجد کا تعارف کرایا ہوتا تو ایسے واقعات پیش نہ آتے، انھوں نے کہا کہ بابری مسجد کی شہادت کے بیک واسطہ ہم مسلمان ذمہ دار ہیں اور اگر اب بھی ہمیں ہوش آجائے اور ہم دعوت کا حق ادا کرنے لگیں تو یہ مسجد گرانے والے، مسجدیں بنانے اور کرنے والے بن سکتے ہیں، ایسے موقع پر ہمارے آقااللّھم اھد قومی فانھم لا یعلمون (اے اللہ، میری قوم کو ہدایت دے، اس لئے کہ یہ لوگ جانتے نہیں)فرمایا کرتے تھے۔
یوگیندر کے والد چودھری رگھوبیر سنگھ جب بوانہ کے کے امام (جن کا نام شاید مولانا بشیر احمد تھا )کے پاس پہنچے، تو ان پر اس وقت اپنے شیخ کی تقریر کا بڑااثرتھا، انھوں نے چودھری صاحب سے کہا کہ میں جھاڑ پھونک کا کام کرتا تھا مگر اب ہمارے حضرت نے ہمیں اس کام سے روک دیا، کیونکہ اس پیشہ میں جھوٹ اور عورتوں سے اختلاط (میل ملاپ )بہت ہوتا ہے اور اس لڑکے پر کوئی اثر یا جادو وغیرہ نہیں بلکہ مالک کا عذاب ہے، آپ کے لئے ایک موقع ہے، ہمارے بڑے حضرت صاحب پر سوں بدھ کے روز دوپہر کو یہاں آرہے ہیں، آپ ان کے سامنے بات رکھیں، آپ کا بیٹا ہمیں امید ہے کہ ٹھیک ہو جائے گا، مگر آپ کو ایک کام کرنا پڑے گا، وہ یہ کہ اگر آپ کا بیٹا ٹھیک ہو جائے تو مسلمان ہونا پڑے گا، چودھری صاحب نے کہا کہ میرا بیٹا ٹھیک ہو جائے تو میں سب کام کرنے کو تیار ہوں۔
تیسرے روز بدھ تھا چودھری رگھو بیر صاحب یو گیندر کو لے کر صبح ۸بجے بوانہ پہنچ گئے، دوپہر کو ظہر سے پہلے مولانا صاحب آئے، یو گیندر زنجیر میں بندھا ننگ دھڑنگ کھڑا تھا، چودھری صاحب روتے ہوئے مولانا کے قدموں میں گر گئے اور بولے کہ مولانا صاحب میں نے اس کمینہ کو بہت روکا، مگر یہ پانی پت کے ایک اوت کے چکر میں آگیا مولانا صاحب مجھے شما کرا دیجئے میرے گھر کو بچا لیجئے مولانا صاحب نے سختی سے انہیں سر اٹھانے کے لئے کہا اور پورا واقعہ سنا۔
انہوں نے چودھری صاحب سے کہا کہ سارے سنسار کو چلانے والے سرو شکتی مان (قادر مطلق )خدا کا گھر ڈھا کر انہوں نے ایسا بڑا پاپ( ظلم ) کیا ہے کہ اگر وہ مالک سارے سنسار کوختم کردے تو ٹھیک ہے، یہ تو بہت کم ہے کہ اس اکیلے پر پڑی ہے، ہم بھی اس مالک کے بندے ہیں اورایک طرح سے اس بڑے گھنگھور پاپ (بڑے گناہ ) میں ہم بھی قصوروار ہیں کہ ہم نے مسجد کو شہید کرنے والوں کو سمجھانے کاحق ادا نہیں کیا، اب ہمارے بس میں کچھ بھی نہیں ہے بس یہ ہے کہ آپ بھی اس مالک کے سامنے گڑگڑ ائیں اور شمامانگیں اور ہم بھی معافی مانگیں، مولانا صاحب نے کہا، جب تک ہم مسجد میں پروگرام سے فارغ ہوں آپ اپنے دھیان کو مالک کی طرف لگا کر سچے دل سے معافی مانگیں اور
پرارتھنا (دعا) کریں کہ مالک میری مشکل کو آپ کے علاوہ کوئی نہیں ہٹا سکتا، چودھری صاحب پھر مولانا صاحب کے قدموں میں گر گئے اوربولے جی میں اس لائق ہوتا یہ دن کیوں دیکھتا، آپ مالک کے قریب ہیں، آپ ہی کچھ کریں مولانا صاحب نے ان سے کہا کہ آپ میرے پاس علاج کے لئے آئے ہیں، اب جو علاج میں بتا رہا ہوں وہ آپ کوکرنا چاہنے، وہ راضی ہوگئے مولا نا صاحب مسجد میں گئے، نما ز پڑھی تھوڑی دیر تقریر کی اور دعا کی، مولانا صاحب نے سبھی لوگوںسے چودھری صاحب کے لئے دعا کو کہا، پروگرام کے بعد مسجد میں ناشتہ ہوا، ناشتہ سے فارغ ہو کر مسجد سے باہرنکلے تومالک کا کرم کہ یوگیندر نے اپنے باپ کی پگڑی اتار کر اپنے ننگے جسم پر لپیٹ لی تھی اورٹھیک ٹھاک اپنے والد صاحب سے بات کررہا تھا، سب لوگ بہت خوش ہوئے ، بوانہ کے امام صاحب تو بہت خوش ہوئے، انھوں نے چودھری صاحب کو وعدہ یاد دلایا اور اس کو ڈرایا بھی کہ جس مالک نے اس کو اچھا کیاہے اگر تم وعدہ کے مطابق مسلمان نہیں ہوتے ہوتو پھر یہ دوبارہ اس سے زیادہ پاگل ہوسکتا ہے، وہ تیار ہوگئے اور امام صاحب سے بولے، مولانا صاحب میری سات پشتیں آپ کے احسان کا بدلہ نہیں دے سکتیں، آپ کاغلام ہوں، جہاں چاہیں آپ مجھے بیچ سکتے ہیں، حضرت مولانا کو جب یہ معلوم ہوا کہ امام صاحب نے اس سے ٹھیک ہونے کا ایسا وعدہ کرلیا تھا، تو انھوں نے امام صاحب کو سمجھا یاکہ اس طرح کرنااحتیاط کے خلاف ہے۔
چودھری صاحب کو مسجد میں لے جانے لگے، تو یوگیندر نے پوچھا پتا جی کہاں جارہے ہو انھوں نے کہا مسلمان بننے، تو یوگیندر نے کہا، مجھے آپ سے پہلے مسلمان بننا ہے اور مجھے تو بابری مسجد دوبارہ ضرور بنوانی ہے، خوشی خوشی ان دونوں کو وضو کرایا اور کلمہ پڑھوایا گیا، والد صاحب کا محمد عثمان اور بیٹے کا محمد عمر نام رکھا گیا، خوشی خوشی وہ دونوں اپنے گاﺅں پہنچے وہاں پر ایک چھوٹی سی مسجد ہے، اس کے امام صاحب سے جاکر ملے، امام صاحب نے مسلمانوں کو بتادیا، بات پورے علاقہ میں پھیل گئی، ہندﺅوں تک بات پہنچی، تو قوت دار لوگوں کی میٹنگ ہوئی اور طئے کیا کہ ان دونوں کو رات میں قتل کروایا جائے، ورنہ نہ جانے کتنے لوگوں کا دھرم خراب کریں گے، اس میٹنگ میں ایک مرتد بھی شریک تھا اس نے امام صاحب کو بتادیا، اللہ نے خیر کی ان دونوں کو راتوں رات گاﺅں سے نکالا گیا، پھلت گئے اور بعد میں جماعت میں ۴۰ چالیس دن کے لئے چلے گئے، یوگیندر نے پھر امیر صاحب کے مشورہ سے تین چلے لگائے، بعد میں ان کی والدہ بھی مسلمان ہوگئیں، محمد عمر کی شادی دہلی میں ایک اچھے مسلمان گھرانے میں ہوگئی اور وہ سب لوگ خوشی خوشی دہلی میں رہ رہے ہیں گاﺅں کا مکان اور زمین وغیرہ بیچ کر دہلی میں ایک کارخانہ لگالیا ہے۔
سوال : ماسٹر صاحب آپ سے میں نے، آپ کے اسلام قبول کرنے کے بارے میں سوال کیا تھا آپ نے یوگیندر اور ان کے خاندان کی داستان سنائی، واقعی یہ خود عجیب و غریب کہانی ہے، مگر مجھے تو آپ کے قبول اسلام کے بارے میں معلوم کرنا ہے ؟
جواب : پیارے بھائی اصل میں میرے قبول اسلام کو اس کہانی سے الگ کرنا ممکن نہیں، اس لئے میں نے اس کا پہلا حصہ سنایا، اب آگے دوسرا حصہ سن لیجیے، ۹مارچ ۱۹۹۳ءکو اچانک میرے والد کا ہارٹ فیل ہوکر انتقال ہوگیا، ان پر بابری مسجد کی شہادت اور اس میں میر ی شر کت کابڑا غم تھا، وہ میری ممی سے کہتے تھے کہ مالک نے ہمیں مسلمانوں میں پیدا کیوں نہیں کیا، اگر مسلمان گھرانے میں پیدا ہوتے، کم از کم ظلم سہنے والوں میں ہمارا نام آتا، ظلم کرنے والی قوم میں ہمیں کیوں پیدا کردیا، انھوں نے گھر والوں کو وصیت کی تھی کہ میری ارتھی پر بلبیر نہ آنے پائے، میری ارتھی کو یا تو مٹی میں دبانا، یا پانی میں بہادینا، ظالم قوم کے رواج کے مطابق آگ مت لگانا بلکہ ہندﺅوں کے شمشان میں بھی نہ لے جانا، گھر والوں نے ان کی اِچھّا(خواہش ) کے مطابق عمل کیا اور آٹھ دن بعد مجھے ان کے انتقال کی خبر ہوئی، میرا دل بہت ٹوٹا، ان کے انتقال کے بعد بابری مسجد کا گرانا مجھے ظلم لگنے لگا اور مجھے اس پر فخر کے بجائے افسوس ہونے لگا اور میرا دل بجھ سا گیا، میں گھر کو جاتا تو میری ممی میرے والد کے غم کو یاد کرکے رونے لگتیں اور کہتیں کہ ایسے دیوتا باپ کو تونے ستاکر ماردیا تو کیسا نیچ انسان ہے میں نے گھر جانا بند کردیا، جون میں محمد عمر جما عت سے واپس آیا تو پانی پت میرے پاس آیا اور اپنی پوری کہانی بتائی دو مہینہ سے میرا دل ہر وقت خوف زدہ سا رہتا تھا کہ کوئی آسمانی آفت مجھ پر نہ آجائے، والد کا دکھ اور بابری مسجد کی شہادت دونوں کی وجہ سے ہر وقت دل سہما سہما سا رہتا تھا، محمد عمر کی کہا نی سن کرمیں اور بھی پریشان سا ہوا، عمر بھائی نے مجھ پر زور دیا کہ۲۳جون کو سونی پت میں مولانا صاحب آنے والے ہیں، آپ ان سے ضرور ملیں اور اچھا ہے کچھ دن ان کے ساتھ رہیں، میں نے پروگرام بنایا، مجھے پہنچنے میں دیر ہوگئی، عمر بھائی پہلے پہنچ گئے تھے اور مولانا صاحب سے میرے بارے میں پورا حال بتادیا تھا، میں گیا تو مولانا صاحب بڑی محبت سے ملے،اور مجھ سے کہا کہ آپ کی تحریک پر اس گناہ کو کرنے والے یوگیندر کے ساتھ مالک یہ معاملہ کر سکتے ہیں تو آپ کے ساتھ بھی یہی معاملہ پیش آسکتا ہے اور اگر اس دنیا میں وہ مالک سزانہ بھی دے تو مرنے کے بعد ہمیشہ کے جیون میں جو سزاملے گی آپ اس کا تصور بھی نہیں کرسکتے۔
ایک گھنٹہ ساتھ رہنے کے بعد میں نے فیصلہ کرلیا کہ اگر مجھے آسمانی آفت سے بچنا ہے تو مسلمان ہوجانا چاہئے،مولانا صاحب دو روز کے سفر پر جارہے تھے، میں نے دو روزساتھ رہنے کی خواہش کا اظہار کیا، تو انھوں نے خوشی سے قبول کیا،ایک روز ہریانہ پھر دہلی اور خورجہ کا سفر تھا، دو روز کے بعد پھلت پہنچے دوروز کے بعد میں دل سے اسلام کے لئے آمادہ ہوچکا تھا، میں نے عمر بھائی سے اپنا خیال ظاہر کیا تو انھوں نے خوشی خوشی مولانا صاحب سے بتایا اور الحمد للہ میں نے ۲۵ جون ۱۹۹۳ ءظہر کے بعد اسلام قبول کیا مولانا صاحب نے میرا نام محمد عامر رکھا اسلام کے مطالعہ اور نماز وغیرہ یاد کرنے کے لئے مجھے پھلت رہنے کا مشورہ دیا، میں نے اپنی بیوی اور چھوٹے بچوں کی مجبوری کاذکر کیا تو میرے لئے مکان کا نظم کردیا گیا، میں چند ماہ پھلت آکر رہا اور اپنی بیوی پر کام کرتا رہا، تین مہینے کے بعد وہ بھی مسلمان ہو گئی۔ الحمدللہ
سوال : آپ کی والدہ کا کیا ہوا؟
جواب : میں نے اپنی ماں سے اپنے مسلمان ہونے کے بارے میں بتایا، وہ بہت خوش ہوئیں اور بولیں کہ تیرے پتا کو اس سے شانتی ملے گی، وہ بھی اسی سال مسلمان ہوگئیں۔
سوال : آج کل آپ کیا کررہے ہیں ؟
جواب : آج کل میں ایک جونیرہا ئی ا سکول چلارہا ہوں، جس میں اسلامی تعلیم کے ساتھ انگریزی میڈیم میں تعلیم کا نظم ہے۔
سوال : ابی بتا رہے تھے کہ ہریانہ پنجاب وغیرہ کی غیر آباد مسجدوں کو آباد کرنے کی بڑی کوششیں آپ کررہے ہیں ؟
جواب : میں نے عمر بھائی سے مل کر یہ پروگرام بنایا کہ اللہ کے گھر کو شہید کرنے کے بعد اس بڑے گناہ کی تلافی کے لئے ہم ان ویران مسجدوں کو آباد کرنے اور کچھ نئی مسجدیں بنانے کا بیڑا اٹھائیں، ہم دونوں نے طئے کیا کہ کام تقسیم کر لیں، میںتوویران مسجدوں کو آباد کراﺅں اور عمر بھائی نئی مسجد یں بنانے کی کوشش کریں اور ایک دوسرے کا تعاون کریں، ہم دونوں نے زندگی میں سو سو مسجدیں بنانے اور واگزارکرانے کا پروگرام بنایا ہے، الحمدللہ ۶چھ دسمبر ۲۰۰۴ءتک ۱۳ویران اور مقبوضہ مسجدیں ہریانہ، پنجاب اور دہلی اور میرٹھ کینٹ میں واگزار کراکے یہ پاپی آباد کراچکاہے(جولائی ۲۰۰۹ءتک ۶۷مسجدےں واگزار اور ۳۷نئی مسجد یںبنا چکے ہیں )عمر بھائی مجھ سے آگے نکل گئے وہ اب تک بیس مسجدیں نئی بنواچکے ہیں اور اکیسویں کی بنیاد رکھی ہے ہم لوگوں نے یہ بھی طے کیا ہے کہ بابری مسجد کی شہادت کی ہر برسی پر ۶د چھ سمبر کو ایک ویران مسجد میں نماز شروع کرانی ہے اور عمر بھائی کو نئی مسجد کی بنیاد ضرور رکھنی ہے، الحمدللہ کوئی سال ناغہ نہیں ہوا، البتہ سو کا نشانہ ابھی بہت دور ہے، اس سال امید ہے تعداد بہت بڑھ جائے گی، آٹھ مسجدوں کی بات چل رہی ہے، امید ہے وہ آئندہ چندماہ میں ضرور آباد ہوجائیں گی، عمر بھائی تو مجھ سے بہت آگے پہلے ہی ہیںاور اصل میں ہمارا کام بھی ان ہی کے حصہ میں ہے، مجھے اندھیرے سے نکالنے کا ذریعہ وہی بنے۔
سوال : آپ کے خاندان والوں کا کیا خیال ہے؟
جواب :میری والدہ کے علاوہ صرف ایک بڑے بھائی ہیں ہماری بھا بھی کا چار سال پہلے انتقال ہو گیا ان کی شادی مجھ سے بعد میں ہوئی تھی، ان کے چار چھوٹے چھوٹے بچے ہیں، ایک بچہ معذور سا ہے ہماری بھابھی بڑی بھلی عورت تھیں، بھائی صاحب کے ساتھ مثالی بیوی بن کر رہیں ان کے انتقال کے بعد بھائی بالکل ٹوٹ سے گئے تھے، میری بیوی نے بھابھی کے مرنے کے بعد ان بچوں کی بڑی خدمت کی، میرے بڑے بھائی خود بہت شریف آدمی ہیں، وہ میری بیوی کی اس خدمت سے بہت متاثر ہوئے، میںنے ان کو اسلام کی دعوت دی مگرمیری وجہ سے میرے والد کے صدمہ کی وجہ سے وہ مجھے کوئی اچھا آدمی نہیں سمجھتے تھے، میں نے اپنی بیوی سے مشورہ کیا میرے بچے بڑے ہں اور بھائی مشکل سے جی رہے ہیں، اگر میں تمھیں طلاق دےدوں اور عدت کے بعد بھائی تیار ہوجائیں کہ وہ مسلمان ہوکر تم سے شادی کرلیںتو دونوں کے لئے نجات کا ذریعہ بن سکتا ہے، وہ پہلے تو بہت برامانی مگر جب میں نے اس کو دل سے سمجھانے کی کوشش کی تو وہ راضی ہوگئی، میں نے بھائی کوسمجھایا ان بچوں کی زندگی کے لئے اگر آپ مسلمان ہوجائیں اور میری بیوی سے شادی کرلیں تو اس میں کیا حرج ہے اور کوئی عورت ایسی ملنا مشکل ہے جو ماں کی طرح ان بچوں کی پرورش کرسکے، وہ بھی شروع میںتو بہت برامانے کہ لوگ کیا کہیں گے میں نے کہا عقل سے جو بات صحیح ہے اس کے ماننے میں کےاحرج ہے، باہم مشورہ ہوگیا، میںنے اپنی بیوی کو طلاق دی اورعدت گزار کر بھائی کو کلمہ پڑھوایا اور ان سے اس کا نکاح کرایا، الحمد للہ وہ بہت خوشی خوشی زندگی گزاررہے ہیں، میرے اور ان کے بچے ان کے ساتھ رہتے ہیں۔
سوال : آپ اکیلے رہتے ہیں؟
جواب : حضرت مولانا کے مشورہ سے میں نے ایک نو مسلم عورت جو کافی معمر ہیں شادی کرلی ہے الحمد للہ خوشی خوشی ہم دونوں بھی رہ رہے ہیں۔
سوال : قار ئین ارمغان کے لئے کچھ پغام آپ دےنا چاہیں گے ؟
جواب : میری ہر مسلمان سے درخواست ہے کہ اپنے مقصد زندگی کو پہچانیں اور اسلام کو انسانیت کی امانت سمجھ کر اس کو پہنچا نے کی فکرکریں، محض اسلام دشمنی کی وجہ سے ان سے بدلہ کا جذبہ نہ رکھیں احمد بھائی میں یہ بات بالکل اپنے ذاتی تجربہ سے کہہ رہا ہوں کہ بابری مسجد کی شہادت میں شریک ہر ایک شیوسینک بجرنگ دلی اور ہر ہندو کو اگر ےہ معلوم ہوتا کہ اسلام کےا ہے ؟ مسلمان کسے کہتے ہیں؟قرآن کیاہے اور مسجد کیا چیزہے تو ان میں سے ہر ایک مسجد بنانے کی تو سوچ سکتا ہے، مسجد گرانے کا تو سوال ہی نہیں ہو سکتا، میں یقین سے کہہ سکتاہوں کہ بال ٹھاکرے جی، ونئے کٹیار، اومابھارتی اور اشوک سنگھل جیسے سرکردہ لوگوں کو بھی اگر اسلام کی حقیقت معلوم ہوجائے اور یہ معلوم ہوجا ئے کہ اسلام ہمارا بھی مذہب ہے، ہمارے لئے بھی ضروری ہے، تو ان میں سے ہر ایک اپنے خرچ سے بابری مسجد دوبارہ تعمیر کرنے کو سعادت سمجھے گا، احمد بھائی چلئے کچھ لوگ تو اسے ہیں جو مسلمان کی دشمنی کے لئے مشہور ہیں مگر ایک ارب ہندﺅوں میں ایسے لوگ ایک لاکھ بھی نہیں ہوں گے، ایک لاکھ بھی سچی بات یہ ہے کہ میں شاید زیادہ بتارہا ہوں، ننانوے کروڑ۹۹ لاکھ تو میرے والد کی طرح ہیں، جو انسانیت دوست بلکہ اسلامی اصولوں کو دل سے پسندکرتے ہیں، احمد بھائی میرے والد (روتے ہوئے )کیا فطرتاََ مسلمان نہیں تھے مگر مسلمانوں کے دعوت نہ دینے کی وجہ سے وہ کفر پر مرگئے میرے ساتھ اور میرے والدکے ساتھ مسلمانوں کا کتنا بڑا ظلم ہے، یہ بات سچی ہے کہ بابری مسجدکو شہید کرنے والے مجھ سے زیادہ ظالم کون ہوسکتا ہے ؟مگر مجھ سے بہت زیادہ ظالم تو وہ مسلمان ہیں، جن کی دعوت سے غفلت کی وجہ سے میرے ایسے پیارے باپ دوزخ میں چلے گئے، مولانا صاحب سچ کہتے ہیں، ہم شہید کرنے والے بھی، نہ جاننے اور مسلمانوں کے نہ پہنچانے کی وجہ سے ہوئے، ہم نے انجانے میں ایسا ظلم کیا اور مسلمان جان بوجھ کران کو دوزخ میں جانے کا ذریعہ بن رہے ہیں، مجھے جب اپنے والد کے کفر پر مر نے کا رات میںبھی خیال آتا ہے تو میری نیند اڑ جاتی ہے، ہفتوں ہفتوںنیند نہیں آتی نیند کی گولیاں کھانی پڑتی ہیں، کاش مسلمانوں کو اس دردکااحساس ہو۔
سوال : بہت بہت شکریہ، ماشاءاللہ آپ کی زندگی اللہ کی صفت ہادی اور اسلام کی حقانیت کی کھلی نشانی ہے ۔
جواب : بلاشبہ احمد بھائی، اس لئے میری خواہش تھی کہ ارمغان میں یہ چھپے، اللہ تعالی اس کی اشاعت کو مسلمانوں کے لئے ان کی آنکھیں کھولنے کا ذریعہ بنائے۔آمین

پیغام ماسٹر عامر:
میری ہر مسلمان سے درخواست ہے کہ اپنے مقصد زندگی کو پہچانیں اور اسلام کو انسانیت کی امانت سمجھ کر اس کو پہنچا نے کی فکرکرےں، محض اسلام دشمنی کی وجہ سے ان سے بدلہ کا جذبہ نہ رکھیں احمد بھائی میں یہ بات بالکل اپنے ذاتی تجربہ سے کہہ رہا ہوں کہ بابری مسجد کی شہادت میں شریک ہر ایک شیوسنک بجرنگ دلی اور ہر ہندو کو اگر یہ معلوم ہوتا کہ اسلام کیا ہے ؟ مسلمان کسے کہتے ہیں؟قرآن کیاہے اور مسجد کیا چےزہے تو ان میں سے ہر ایک مسجد بنانے کی تو سوچ سکتا ہے، مسجد گرانے کا تو سوال ہی نہیں ہو سکتا، میں یقین سے کہہ سکتاہوں کہ بال ٹھاکرے جی ،ونئے کٹیار، اومابھارتی اور اشوک سنگھل جیسے سرکردہ لوگوں کو بھی اگر اسلام کی حقیقت معلوم ہوجائے اور یہ معلوم ہوجا ئے کہ اسلام ہمارا بھی مذہب ہے، ہمارے لئے بھی ضروری ہے، تو ان میں سے ہر ایک اپنے خرچ سے بابری مسجد دوبارہ تعمیر کرنے کو سعادت سمجھے گا۔

اچھا
اللہ حافظ
مستفادازما ہ نا مہ ارمغان، جو ن ۲۰۰۵
ایڈیٹرما ہ نا مہ ارمغان
www.armughan.in

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 (Ex Shiv sena leader Balbeer singh (Mohammed amir) with Kaleem siddiqui)