Monday, December 6, 2010

शमीम भाई (पूर्व गेंग मेम्‍बर श्याम सुंदर) से एक मुलाकात

शमीम भाई (लुटेरा श्याम सुंदर) से मौलाना कलीम साहब के साहब ज़ादे मौलाना अहमद अव्वाह नदवी द्वारा लिया गया इन्‍ट्रव्‍यू

अहमद अव्वाहः अस्सलामु अलैकुम व रहमतुल्लाहि व बरकातुह
शमीमः व अलैकुमुस्सलाम व रहमतुल्लाहि व बरकातुह
अहमदः शमीम भाई आप जमाअत में से कब आए?
शमीमः मैं जमाअत में से 22 अप्रैल को वापस आ गया था।

मौलाना कलीम सिद्दीक़ी साहब के ड्राइवर सलीम अपनी छाती पर लगी गोली का निशान दिखाते हुए 



अहमदः आपका यह चिल्ला कहां लगा था?

शमीमः मेरा यह चिल्ला मेवात में लगा। बिजनोर की जमाअत थी मुफ्ती अब्बास साहब अमीर थे। अल्हम्दु लिल्लाह इस चिल्ले में मेरा पहले चिल्ले से बहुत अच्छा वक्त गुज़रा।
अहमदः अच्छा माशअल्लाह। आप का यह दूसरा चिल्ला था?
शमीमः हां अहमद भाई। पहला चिल्ला तो मेरा जब मौलाना साहब हज से आए थे उस के फोरन बाद लगा था। हज से आने के चार रोज़ बाद मैं ने कलमा पढा था और तीन दिन बाद मेरे काग़ज़ात बनवाकर निजामुददीन से मुझे जमाअत में भेज दिया गया था। वह चिल्ला मेरा सीतापुर में लगा था। मगर वह जमाअत ज़रा मेरे जैसी थी। मैं यह तो नहीं कहूंगा कि अच्छी नहीं थी। अमीर भी नए थे और साथियों में भी रोज लडाई होती रही। चार साथी दरमियान में वापस आ गए। मैं तो यही कहूंगा कि मेरी नहूसत थी कि अल्लाह की राह में मुझे मेरे जैसे हाल वालों से साबेका(संपर्क) पडा।
अहमदः अच्छा शमीम भाई। आप अपना खानदानी तआर्रुफ कराईये?
शमीमः मैं मुज़फ्फरनगर जिला के सखेडा गांव के पास एक गांव के गूजर ज़मीनदार परिवार में पैदा हुआ। 11 अप्रैल 1984 मेरी जन्म तिथि है। मेरे पिताजी ने नाम श्याम सुंदर रखा। मेरा खानदान पढा लिखा खानदान है। मेरे चचा सरकारी अफसर हैं। मेरे वालिद भी मास्टर थे और सत्तर बीघा ज़मीन भी थी। मेरे बडे भाई फौज़ में हैं। एक बहन है उन की शादी सरकारी स्कूल के टीचर से हुई है। मैं ने हाई स्कूल से पढाई छोड दी और फिल्म देखना, सिगरेट पीना, गुटका खाना और आवारा लडकों के साथ रहना मेरा काम था। मेरे पिताजी ने मुझे पढने पर जोर दिया तो मैं घर से भग गया। मेरी संगती अच्छी नही रही और मुझे गोलियां खाने की आदत हो गई। काफी दिनों के बाद मैं किसी तरह घर आया। मगर मेरा तअल्लुक गलत लोगों से था। खर्च घर वाले देते नहीं थे। मैं ने खर्च बढा रखा था। मजबूरत घर से चोरी करता कभी कुछ निकाल कर बेच आता, कभी कुछ। घर वालों ने एहतियात की तो फिर बाहर से चोरी करने लगा। बात गिड गई और मैं लूटमार करने वाले लडकों की गैंग में जा मिला और मेरे अल्लाह की रहमत पर कुर्बान कि यह गेंग ही मेरी नय्या पार लगा गई।
अहमदः असल में गेंग में रहना दुनिया को डुबोता ही है। बस अल्लाह की रहमत ने आपको फूल समझ कर इस गंदी गैंग की कीचड से आगोशे रहमत में उठा लिया।
शमीमः हां। आप सच कहते ह।। असल में मेरा खानदान और पूरा परिवार बडे सज्जन लोगों का परिवार है। मेरे घरवालों के ज्यदातर मुसलमानों से संबन्ध रहे हैं। मेरा बचपन भी इसी माहौल में गुजरा। मैं बदकिस्मती से इस माहौल से दूर होता रहा मगर मुझे इस गलत माहौल से स्वभाव के लिहाज से मेल महसूस न हुआ।
अहमदः अपने इस्लाम कुबूल करने के बारे में ज़रा बताइये?
शमीमः अहमद भाई। पिछले साल दुखेडी जलसा से वापस आते हुए रात को मन्सूरपुर से पहले आपके और हम सब के अबी मौलाना कलीम साहब की गाडी पर बदमाशों ने गोली चला दी थी। हमारे ड्राइवर सलीम मियां के दो गोलियां लगी थीं। एक हाथ में अन्दर घुस गयी थी। दूसरी गोली बिल्कुल दिल के सामने सीने पर लगी थी, कुरता बुरी तरह फटगया। 315 की गोली, मगर कलाई से (अल्लाह की रहमत से) बस छू कर वापस हो गयी। अल्लाह तआला अपने सच्चे बन्दों को साथी भी ऐसे देते हैं कि गोली लगने के बावजूद सलीम ने गाडी को दो तीन किलोमीटर उलटा बैक गेअर में दौडाया और मौका लगाकर मोडा और दस किलोमीटर दूर जाकर बताया कि मुझे गोली लग गयी है और हौसला नहीं खोया। वरना हमारे साथी तो कह रहे थे कि हम ने ऐसा निशाना नाकर गोली सामने से मारी थी कि हम को यकीन था कि ड्राइवर तो मर गया होगा। कोई बराबर वाला गाडी भगा रहो है।
वह गोली चलाने वाले लोग सब मेरे साथी थे मगर मेरे अल्लाह का करम था मैं दो हफ्ते से बीमार हो गया था और मुझे पीलिया हो गया था। मैं मुजफ्फरनगर अस्पताल में भरती था। यह खबर पूरी इलाके में जंगल की आग की तरह फैल गयी। हम आठ लोगों का गेंग था। सिर्फ एक हिन्दू था और सब सात लोग मुसलमान थे। इत्तेफाक से मरे अलावा सातों उस रोज उस वाकिए में मौजूद थे। खतौली कोतवाली ने सी.आई.डी. इन्चार्ज को बुलाया और दोनों ने कसम खाई कि ऐसे सज्जन भले और महान आदमी की गाडी पर हमारे क्षेत्र में यह हमला हुआ है। हमारे लिए डूब मरने की बात है। कसम खाकर अहद किया कि जब तक मुजरिमों को पकड न लेंगे उस वक्त तक खाना नहीं खाऐंगे। भला ऐसे लोगों पर गोली चलाने वाले कब बच सकते थे। तीसरे रोज़ उन में से तीन पकडे गए और पिटाई पर सबने बता दिया। बाकी चार भी एक हफ्ते में गिरफतार हो गए। बहुत से केस लूटमार चोरी डाके के खुले और थाना इन्चार्ज ने ऐसे केस बनाए कि जमानत तो सालों तक मुमकिन ही नहीं थी न हुई।
एक हफ्ते के बाद मेरी बतीअत कुछ ठीक हुयी। दोबारा खून भी चढा तो मेरी छुटटी हुई। दो हफ्ते तक घर पर ही रहा। साथियों के पकडे जाने की खबर मुझे मिल गयी थी। मेरा खून सूखता था कि सख्ती में मेरा नाम न ले लिया हो। मगर दो महीने तक जब हमारे घर पुलिस न आयी तो कुछ इत्मिनान हुआ। कुछ तबीअत भी ठीक हो गयी तो मैं किसी तरह मौका लगाकर जेल में मिलाई करने गया। जेल में साथियों ने सारा मुआमला बताया और मुझे बधाई दी कि तू बीमार हो गया वरना तू भी हमारे साथ जेल में होता। मुजफ्फरनगर जेल में उन की मुलाकात कुछ कैदियों से हुयी जो मौलाना साहब के उन साथियों की कोशिश से जिन को दुश्मनी में लोगों ने झूटे कत्ल के केस में फंसा दिया था। मुसलमान हो गए थे। उन कैदियों से मिलने मौलाना कलीम कई बार जेल आए। जेल वालों से मौलाना साहिब और उन के घर वालोऔर उन की वालिदा के बारे में कहानियां सी सुनाते रहते थे। उनके घर का हाल यह है कि अपने चोरों को खुद छुडाकर लाते हैं। मुआफ करते हैं उनके घर राशन पहुंचाते थे। कोकडा गांव के एक मेरे साथी ने जो हमारा सरदार था मुझ से कहा, तू फुलत जाना और मौलाना साहब को हमारी परेशानी बताना और खूब रोना, मुंह बनाकर खूब परेशानियां बताना, मैं ने कहा तुम्हें शर्म नहीं आती। भला उनके यहां जाने का किस तरह मुंह हो सकता है। मगर वह जोर देता रहा। तू जाकर देखना वह तुझे कुछ नहीं कहेंगे। उन से कहना सब साथी लि से मुआफी मांग रहे हैं और सभी अहद कर रहे हैं कि अब अच्छी जिन्दगी गुजारेंगे और आपके मुरीद भी बन जाऐंगे। मेरी हिम्मत न हुई हफ्ते दो हफ्ते के बाद वह मुझे जोर देते रहे।
बार-बार कहने पर मुझे उनके हाल पर तरस आ गया और मैं पता लेने के बाद फुलत पहुंचा। सर्दी का ज़माना था, रास्ते में बारिश हो गयी और मैं भीग गया। मौलाना साहब ज़ोहर (दोपहर की) की नमाज के लिए जा रहे थे। नमाज़ का वक्त करीब था। मुझे देखा मालूम किया कहां से आए हो? मैं ने अपने गांव का नाम बताया। मौलाना साहब घर में गए और मेरे लिए एक शर्ट पैन्ट लेकर आए और बोले सर्दी सख्त हो रही है आप अन्दर जाकर कपडे बदल लीजिए। मेरा नाम पूछा, मैं ने बताया श्यामसुंदर, तो उन्होंने रजाई में बैठ जाने को कहा और अन्दर से बच्चे को एक कप चाय लाने को कहा। नमाज़ के लिए जाते वक्त हंसते हुए बोले। आप तो इस इलाके के मेहमान हैं जहां हमारी अच्छी मेहमानी हुई थी। हमारे ड्राइवर के गोली लगी थी। मैं यह सुन कर सहम गया। मेरे चेहरे के उतरने से मौलाना बोले आप क्यूं शर्माते हैं। कोई आपने गोली नही चलाई थी। आप तो हमारे मेहमान हैं। मौलाना साहब नमाज़ पढने चले गए।
जमाज पढकर वापस आए तो मैं ने अलग बात करने के लिए कहा। बराबर के छोटे कमरे में मुझे ले गए। मैं ने अपना तआर्रुफ कराया और अपने साथियों का हाल और उनके घर का हाल खूब बनावटी रोना बनाकर सुनाया और मौलाना साहब से कहा आप चाहें तो उनकी जमानत हो सकती है। मौलाना साहब ने कहा न हमने उन को गिरफतार किया है और हम उन को मुजरिम कम और बीमार ज्यादा समझते हैं। ऐसे सच्चे और अच्छे दीन को मानने वाले ऐसे रहम भरे रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम पर ईमान रखने वाले, ऐसी बेधडक लोगों की जानें लेंगे तो फिर दुनिया का क्या होगा? उन का इलाज यह है कि उन कसे कहुं या उम्रकैद में रहो या तीन चिल्ले के लिए जमाअत में चले जाओ। अगर वह सच्चे दिल से अपनी गलती पर शर्मिन्दा हैं तो वह जेस से सीधे तीन चिल्ले के लिए सातों जमाअत में चले जाऐं। हम खुद गवाही देने के बजाए उनकी जमानत को तैयार हैं।
मौलाना साहब ने मुझ से कहा, आप पहले खाना खा लें मैं अभी आता हूं। एक साहब अन्दर से खाना ले आए। थोडी देर में मौलाना आए और मुझ से कहा अपने साथियों की जेल की तो तुम फिªक्र
करते हो। तुम्हें भी एक जेल में मरने के बाद जाना पड सकता है। वह जेल हमेशा की है जिस से जमानत भी नहीं है, वह नर्क की जेल है। जिस की ऐसी सजाएं हैं जिन का तसव्वुर(कल्पना) भी यह दुनिया की पुलिस वाले नहीं कर सकते। उस जेल से बचने के लिए यह किताब पढो। यह कह कर पुस्तक ‘आपकी अमानत आपकी सेवा में‘ मुझे दी फिर वह एक साथी को मेरे पास भेज कर चले गए। इन से बात करो, वह मुझे मुसलमान होने के लिए कहते रहे और बोले तुम बडे खुशकिस्मत हो कि मालिक ने आपको इस बहाने हमारे हज़रत के याहं भेज दिया। मालिक की मेहर होती है तो अल्लाह इस दर का पता देते हैं। मैं ने उन से इस किताब को पढने का वाअदा किया और इस लिहाज से खुश खुश घर लौटा कि चार महीने जमाअत में जाना तो बहुत आसान है। मैं ने अगले रोज जेल जाकर साथियों को खुशखबरी सुनाई। उन्होंने पूरी बात सुनी और बहुत रोए ऐसे आदमी के साथ हमने बडा जुल्म किया और फिर उन नव-मुस्लिम कैदियों के साथ रहने लगे। नमाज़ पढनी शुरू कर दी। रोज़ाना तालीम मैं बैठने लगे और तीन कैदी उनके कहने से भी मुसलमान हो गए।
मैंने दूसरे रोज वह किताब पढी। एक अजनबी आदमी के साथ मौलाना साहब के बरताव ने मेरे अन्दरून को मौलाना का कर दिया और मुझे अन्दर में ऐसा लग रहा था कि मैं मौलाना का गुलाम हो गया हूं। इस किताब ने मुझे भी जज़्बाती (भावुक) बना दिया। मैं तीन दिन के बाद फुलत गया। मौलाना नहीं मिले, बहुत मायूस लौटा, दूसरी बार गया, तो मालूम हुआ कि वह आए थे और आज ही हज के सफर पर चले जाऐंगे और एक महीने के बाद आएंगे।
एक-एक दिन करके दिन गिनता रहा। मै। बयान नहीं कर सकता अहमद भैया। मैं ने एक महीना सालों की कैद की तरह गुज़ारा। अल्लाह का करह हुआ मैं ने फुलत फोन किया मालूम हुआ कि मौलाना साहब आ गए हैं और कल तक रहेंगे। 16 जनवरी को सुबह मैं ने मौलाना साहब के पास जाकर कलमा पढा। मैं ने मौलाना साहब से कहा कि मेरे पिताजी मुझे मारते और डांटते तो कहा करते थे कि नालायक हमारे बडे तो यह कहा करते थे कि इन्सान वह है कि उसके दुश्मन भी उससे फायदा उठाएं। तू ने अपने ही घर को नर्क बना दिया है। मैं यह सुन कर कहता ऐसे लोग कसी दूसरे लोक में होंगे। लेकिन आपके कातिलों के साथ रहना मेरे लिए ईमान लाने का जरिआ बन गया। मौलाना साहब ने कहा मैं क्या बल्कि वह मालिक जिसने पैदा किया उसको आप पर रहम आ गया। आप रहमत की कद्र करें। मेरा मौलाना साहब से शमीम अहमद रखा।
अहमदः फिर उसके बाद आप जमाअत में चले गए?
शमीमः दूसरे रोज मेरे काग़ज़ात मेरठ भिजवाकर बनवाए और मुझे साथ लेकर मौलाना साहब दिल्ली गए और एक मौलाना के साथ मुझे मर्कज भेज दिया। सीतापुर चिल्ला लगा। कुछ नमाज वगैरा तो मैंने सीख ली, वापस आकर मैंने कारगुजारी सुनाई। मौलाना साहब ने कहा, चालीस दिन में अगर आप कलमा भी अच्छी तरह याद करके आ गए तो काफी है। आपको नमाज भी अच्छी खासी आ गयी है। दोबारा जाकर और अच्छी तरह याद कर लेना। कुछ रोज़ मैं मुज़फ्फरनगर एक मदरसा में रहा। फिर जमाअत में दोबारा गया। अलहम्दुलिल्लाह इस बार मैं ने एक पारा भी पढ लिया और उर्दू भी पढना सीख ली। घर वालों और साथियों के लिए दुआ भी की। वापस जाकर जेल गया और साथियों से जमाअत और मुसलमान होने की कारगुजारी सुनायी। वह बहुत खुश हुए अब इन्शाअल्लाह जल्दी उन की जमानत होने वाली है। दो लोगों की जमानत तो किसी तरह हो गयी मगर मैं ने उनको भी तैयार किया है। वह सातों इन्शा अल्लाह जल्द चार महीने की जमाअत में जाने वाले हैं।
अहमदः जमाअत से वापस आकर आप घर गए। तो घर वालों को आपने क्या बताया?
शमीमः मेरे घर वाले यह समझ रहे थे कि फिर गैंग में चला गया हूं, मेरे घर से बाहर जाने के वह आदी थे। उनके लिए यह कोई नयी बात नहीं थी। टोपी ओढ कर कुरता पहन कर मैं घर पहुंचा तो घर वाले हैरत में पड गए। शुरू में मेरे पिताजी बहुत नाराज हुए फिर मैंने फुलत जाने की और वहां की सारी रिपोर्ट सुनाइ्र तो वह खामोश हो गए। मैं ने एक दिन बहुत खुशामद से उन से वक्त लिया। कमरा बंद करके दो घंटे उन से दावत की बात की। फिर ‘आप की अमानत आपकी सेवा में‘ उन को दी। अलहम्दु लिल्लाह। अल्लाह ने उनके दिल को फेर दिया और वह फुलत जाकर मुसलमान हो गए। हमारे गांव में मुसलमान नाम के बराबर हैं। मौलाना साहब ने उर से अभी इज़हार और एलान करने के लिए मना कर दिया है। अलबत्ता वह घर वालों को समझाने में लग रहे हैं। खुदा करे हमारा सारा घर जल्द मुशर्रफ ब इस्लाम हो जाए।
अहमदः माशा अल्लाह बहुत खूब। अल्लाह तआला मुबारक करे। आप कोई पैगाम 'अरमुगान' के वास्ते से मुसलमानों को देना चाहेंगे।
शमीमः मैं अपनी बात क्या कहूं? मेरा मुंह कहां कि मैं कुछ कह सकूं मगर मैं ज़रूर कहूंगा जो मौलाना साहब कहते है। कि मुसलमान अपने को दायी और सारी इन्सानियत को मदू ( मद ऊ ) समझने लगे तो सारी दुनिया रश्के जन्नत बन जाएगी और दायी तबीब (डाक्टर) और मदू मरीज़ होता है वह आदमी नहीं जो अपने मरीज़ से मायूस हो और वह भी तबीब नहीं जो मरीज़ से नफरत करे। इस से कराहत करे, उसे धक्के दे दे, मुसलमानों ने अपने मरीजों को अपना हरीफ, अपना दुश्मन समझ लिया है इस की वजस से अपने मरीजों को अपना हरीफ, अपना दुश्मन समझ लिया है इस की वजह से खुद भी पिस रहे हैं और पूरी इन्सानियत ईमान और इस्लाम से महरूम (वंचित) हो रही है।
अहमदः माशाअल्लाह। बहुत अच्छा पैगाम दिया, शमीम भाई। बहुत दिनों से मैं इन्टरव्यू ले रहा हूं मगर इतनी अहम बात आपने कही। आप को यह समझ मुबारक हो।
शमीमः अहमद भाई बस याद करके मैं ने आपको सुना दिया है सबक़ तो मौलाना साहब ने याद कराया है।
अहमदः बहुत बहुत शुक्रिया। अस्सलामु अलैकुम
शमीमः आपका भी शुक्रिया। वअलैकुमुस्सलाम व रहमतुल्लाह

साभार,
प्रकाशित, उर्दू माहनामा ‘अरमुगान’ जून 2007
नसीमे हिदायत के झोंके (उर्दू, हिन्दी) , इन्टरव्यु नम्बर 32

Wednesday, May 19, 2010

जनाब अब्दुर्रहमान (शास्त्री अनिलराव) से मुलाकात interview 5

अहमद अव्वाह : अस्सलामु अलैकुम व रहमतुल्लाहि व बरकातुह
अब्दुर्रहमान(अनिलराव): व अलैकुमुस्सलाम व रहमतुल्लाहि व बरकातुह

अहमदः अब्दुर्रहमान साहब एक जमाना कब्ल(पूर्व) हमारे यहाँ से ‘अरमुगान’ दावत में हजरत मौलाना अली मियाँ नववरल्लाहू मरकदहू के नाम आप का एक खत शाये(प्रकाशित) हुआ था उस वक्त से आप से मुलाकात का इश्तियाक(उत्सुक) था। आप ऐसे वक्त तशरीफ लाये जब मुझे एक दूसरी भी जरूरत दरपेश(मौजूद) थी। फुलत से शाया होने वाले दावती माहनामे अरमुगान में दस्तरखाने इस्लाम पर आने वाले नये खुशनसीब भाई बहनों के इण्टरव्यु शाये करने का एक सिलसिला चल रहा है। सितम्बर के शुमारे के लिये मैं तलाश में था कि आप से मुलाकात करूँ। बहुत अच्छे वक्त पर आपका आना हुआ।
अब्दुर्रहमानः मुझे भी बाज बहुत जरूरी मशवरे मौलाना साहब (मौलाना कलीम सिद्दीकी साहब) से करने थे, सालों मिले भी हो गये थे। अच्छा हुआ आप से भी मुलाकात हो गयी। आपसे मिलने का मेरा भी दिल चाहता था। असल में हैदराबाद के हमारे बहुत से दोस्त आपका बहुत जिक्र करते हैं वहाँ के उर्दू अखबारों में ‘अरमुगान’ के हवाले से इण्टरव्यु शाये हो रहे हैं जिन से बडी दा्वती फिजा बन रही है और लोगों में अलहम्दु लिल्लाह बडा दअवती जज़्बा पैदा हो रहा है। हमारे यहाँ वरंगल से बहुत से लोग फुलत के सफर का खास तौर पर आप से मुलाकात के लिये प्रोग्राम बना रहे हैं। अल्लाह तआला आप की उम्र और इल्म में बरकत अता फरमाये। दिल बहुत खुश होता है कि हमारे हजरत के साहबजादे भी मिशन से जुड गये हैं अल्लाह तआला कुबूल फरमाये।

अहमदः आमीन, अल्लाह अपकी जश्बान मुबारक करे और मुझ ना-अहल(अयोग्य) को भी अपने दीन की खिदमत के लिये खुसूसन दाअवत के लिये कुबूल फरमाए, आमीन। जनाब अब्दुर्रहमान साहब। आप अपना खानदानी तआरूफ(परिचय) करायें।
अब्दुर्रहमानः मैं शहर वरंगल के एक बडे ताजिर के घर में अब से तकरीबन 51 साल पहले 13 अगस्त 1954 को पैदा हुआ नाम अनिलराव रखा गया, पाँच साल की उम्र में स्कूल में दाखिल हुआ, सन 1959 में हाईस्कूल फिर 1961 में बारहवीं क्लास साईंस साइड से और उसके बाद 1964 में बी. एस. सी और 1966 में फिजिक्स से एम. एस. सी. किया और उसके बाद पी. एच. डी में रजिस्ट्रेशन करा लिया।

अहमदः ऐसी मेयारी तालीम के बावजूद आप हरिद्वार, ऋषिकेश किस तरह गये?
अब्दुर्रहमानः हुआ यह कि मेरे वालिद साहब मेरी शादी करना चाहते थे मगर न जाने क्यूँँ मेरा दिल इस तरह के झमेलों से घबराता था। मेरे पिताजी ने शादी के लिये दबाव डाला तो मैं घर से फरार हो गया। मैं ने हरिद्वार का रूख किया। मैंने इरादा कर लिया कि मुझे बह्मचार्य जिन्दगी गुजारनी है। हमारा घराना आर्य समाजी था। हरिद्वार में एक के बाद एक छः आश्रमों में रहा। मगर वहाँ का माहौल मुझे न भाया। हरिद्वार में एक इन्जिनियर साहब बी. एच. इ. एल में मुलाजमत करते थे और विजयवाडा के रहने वाले थे मेरी उन से अच्छी दोस्ती हो गयी। उन्होंने मेरी बेचैनी देखकर मुझ मशवरा दिया कि तुम्हें शान्तिकुंज में जाना चाहिये या वहीं पर किसी और समाजी आश्रम को तलाश करना चाहिये। मैं ने ऋषिकेश जाकर तलाश शुरू की। बहुत तलाश के बाद मैं ने श्री नित्यानंदजी महाराज के सत्यप्रकाश आश्रम को अपने लिये मुनासिब समझा। जहाँ पर अक्सर लोग पढे लिखे और तालीम याफता थे और स्वामी नित्यानंदजी बहुत पढे लिखे और तालीम याफता थे। वह इलाहाबाद युनिवर्सिटी से संस्कृत में डॉक्ट्रेट करके एक जमाने तक वहाँ रीडर और फिर प्रोफेसर रह चुके थे। छः साल तक मैं वहाँ ब्रहम्चारी रहकर ज्ञान सीखता रहा। छः साल के बाद स्वामी जी ने मुझे परीक्षा के लिये यज्ञ कराये और मुझे शास्त्राी की पदवी प्रदान की। शास्त्राी बनने के बाद मैं ने सात साल मैं चैंतीस यज्ञ किए। जिन में बडा इम्तिहान था मगर मैं सब कुछ त्याग कर अपने मालिक को पाने के लिये आया था। इस लिये मैं ने मुश्किल वक्त में हिम्मत न हारी। वरंगल से आने के सात साल के बाद मेरे बडे भाई और पिताजी मुझे ढूंडते-ढूंडते ऋषिकेश पहुँचे और मुझे न जाने किस तरह तलाश कर लिया। आश्रम में आये एक हफ्ता तक मेरी खुशामद करते रहे और मुझे वापस घर ले जाने के लिये जोर देते रहे। लेकिन मेरा दिल घर जाते हुये घबराता था। मैंने अपने वालिद और भाई की बहुत खुशामद की और मुझे ईश्वर को पाने तक वहाँ रहने देने के लिये कहा, वह मुझे छोडकर इस शर्त पर चले गये की वह अपने खर्च पर आश्रम में रहेगा और दान वगैरा(आदि) यानि सदका खैरात नहीं खायेगा और आश्रम में उन्होंने अन्दाजे से अब तक का खर्च भी जमा किया और एक बडी रकम आईन्दा के लिये जमा कराके चले गये।

अहमदः इतने रोज तक एक प्रोफेसर स्वामी के जेरे तर्बियत ऐसे पढे लिखे लोगों के साथ आश्रम में रहने के बावजूद आपको इस्लाम की तरफ आने का ख्याल कैसे हुआ? अपने कुबूले इस्लाम के बारे में जरा तफसील से बताईये।
अब्दुर्रहमानः असल मेें जिस सच्चे मालिक की तलाश में मैं ने वरंगल छोडा था, उसको मुझ पर तरस आया है उसने मेरे लिये रास्ता खुद निकाल लिया। अहमद भाई आपको मालूम है कि आर्य समाज हिन्दू धर्म की बहुत संशोधित शक्ल है। उस में एक निराकार खुदा की इबादत का दावा किया गया है। मूर्तीपूजा और पुरानी देव मालाई बातों का रद्द किया गया है। उस मज़हब की असल किताब या ग्रंथ ‘सत्यार्थ प्रकाश’ है जो स्वामी दयानन्द सरस्वती की तस्नीफ है। इस मज़हब के बानी स्वामी विवेकानन्द इस्लाम मज़हब और उसकी तालीमात से बहुत ज़्यादा मुतअस्सिर(प्रभावित) हुए और उन्होंने हिन्दुओं को मुसलमान बनने से रोकने के लिये। हिन्दू मजहब को अकल के मुताबिक बनाने के लिये आर्य समाज की बुनियाद रखी। उनका दावा है कि आर्य समाज सौ फीसद वैदिक धर्म है। जो आज तर्कों (दलाइल) पर आधारित है। और बिल्कुल साइन्टिफिक और लॉजिक है। मगर जब मैं ने आर्य समाज को पढा तो मेरे दिल में बहुत सी बातें खटकती थीं। 13 साल की सख्त तरीन तपस्या(मुजाहिदे) के बावजूद मैं अपने अन्दर कोई तब्दीली महसूस नहीं करता था। मैं कभी-कभी स्वामी नित्यानन्दजी से करीब होने की कोशिश करता तो मैं उन को बहुत उलझा हुआ इन्सान पाता। मैं जब उनके सामने अपने इश्कालात(कठिन, वह बातें जिन्हें समझ न पाया) रखता तो कभी वह झुन्झला जाते। मुझे महसूस होता कि यह खुद ही अपनी बात से मुतमइन नहीं। सन 92 मेरे लिये सख्त गुजरा। मां बाप को दुख देकर 13 साल के सन्यास के बाद इसके अलावा लोग शास्त्राी कहने लगे थे। मै। ने अपने अन्दर के इन्सान को पहले से कुछ गिरा हुआ ही पाया। तरह-तरह के ख्यालात मेरे दिल में आये। बाज दफा कई रोज तक मेरी नींद उड जाती कभी ख्याल आता कि खुदा को पाने का यह रास्ता ही गलत है। मुझे किसी और रास्ते को तलाश करना चाहिए। कभी यह ख्याल आता कि मेरी आत्मा में गन्दगी है। इस लिये मुझ पर कुछ असर नहीं हो रहा है। जब कभी रात को मुझे नींद न आती तो मैं उठकर बैठ जाता और मन ही मन में अपने मालिक से दुआएं करता ‘‘सच्चे मालिक अगर तू मौजूद है और जरूर मौजूद है तो अपने अनिल राव का अपना रास्ता दिखा दे, तू खूब जानता है कि मैं ने सब कुछ सिर्फ और सिर्फ तुझे पाने के लिये छोडा है।
इस दौरान उत्तर काशी में सख्त तरीन जलजला आया। पूरा हरिद्वार और ऋषिकेश दहल गया। मेरा दिल और भी डर गया कि इस तरह किसी दिन मैं भी किसी हादसे में मर गया तो मेरा क्या होगा। 17 दिसम्बर 1992 की रात थी। मुझे सवामी जी ने बुलाया और कहा की हरियाण के जिला सोनीपत में राई में एक बडा आर्य समाजी आश्रम है। वहां वे लोग अपना पचास साला समारोह ‘जश्न’ कर रहे है। मुझे वहाँ जाना था मगर मेरी तबीअत अच्छी नहीं यूँ भी अब आपका तआरूफ(परिचय) कराना चाहता हूँ। वहाँ प्रोग्राम की सदारत और यज्ञ के लिये आपको जाना है। मुझे यह सनुकर बहुत खुशी हुई कि स्वामी जी मुझे कितना प्रेम करते हैं। खुखी-खुशी कमरे में आया सफर की तैयारी की मगर रात को बिस्तर पर गया तो मेरे मन में आया कि इस सन्सार के सामने तआरुफ और नाम भी हो जाये तो क्या, क्या इसी लिये तूने वरंगल छोडा था, मेरा दिल बहुत दुखा, मेरी नींद उड गयी। बिस्तर से उठा और आंखें बंद करके मालिक से प्रार्थना करने लगा ‘मेरे मालिक तू सब कुछ करने वाला है। मुझे गुरू की आज्ञा है तो जाना है। मेरे मालिक कब तक में अन्धकार में भटकता रहूंगा। मुझे सच्ची राह दिखा दे वह राह जो तुझे पसंद हो वह रास्ता जिस पर चलकर तुझे पाया जा सके खूब रो-रो कर मैं दुआ करता रहा। रोते रोते मैं सो गया। मैं ने ख्वाब में देखा मैं एक मस्जिद में हूँ वहाँ एक खुबसूरत मौलाना साहब हैं। एक सफेद चादर ऊपर और एक नीचे लुंगी बाँधे तकिया लगाये बैठे हैं बहुत सारे लोग अदब के साथ बैठे है।। लोगों ने बताया की यह हजरत मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम हैं। मैं ने लोगों से सवाल किया कि वह मुहम्मद साहब जो मुसलमानों के धर्म-गुरू हैं तो खुद हजरत मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने जवाब दिया नहीं नहीं में सिर्फ मुसलमानों का धर्म गुरू (रसूल) नहीं हूँ। बल्कि में तुम्हारा भी रसूल हूँ मेरा हाथ पकडा और अपने पास बिठाया और बडे प्यार से मुझे गले लगाया और फरमाया कि जो तलाश करता है वह पाता है तुम्हें कोई हमदर्द मिले तो कद्र करना,आज का दिन तुम्हारे लिये ईद का दिन है। मेरी आंखे खुल गयीं। आप ही आप खुश हो रहा था। मेरे साथियों ने मुझे इतना खुश कभी नहीं देखा था।
मेरे दिल का हाल अजीब था। गुदगुदी सी लग रही थी। आप ही आप खुश हो रहा था। मेरे साथियों ने मुझे इतना खुश कभी नहीं देखा था। वे कहने लगे कि स्वामी जी अपनी जगह अध्यक्षता के लिये भेज रहे हैं। वाकई आप को खुश होना ही चाहिए। उन को क्या मालूम था कि मैं क्यों खुश हो रहा हू। सुबह सवेरे उठकर मैं ऋषिकेश बस अड्डे पहुंचा वहां से सहारनपुर पहुंचा। बस अड्डे के पास एक मस्जिद दिखायी दी। मैं मस्जिद के अन्दर गया। लोग मुझे हैरत से देख रहे थे। मैं ने कहा मालिक का घर है दर्शन करने के लिये आया हूँ। मैं ने मस्जिद के अन्दर जाकर चारों तरफ तलाश किया की रात वाले लोगों में से कोई मिले अगर मस्जिद खाली थी। मस्जिद से वापस आया और बडोत की बस मिलनी थी। सोनीपत जाने वाली हरियाणा रोडवेज में सवार हुआ। आगे की सीट पर आपके अबी (मौलाना कलीम साहब) बैठे हुए थे। मैं ने उन से मालूम किया कि आप के पास कोई और है? उन्होंने कहा नहीं, कोई नहीं आप तशरीफ रखिये। बहुत खुशी के साथ बिठाया। मौलाना साहब ने मुझ से मालूम किया कि पन्डित जी कहाँं से आ रहे हो? मैं ने कहा ऋषिकेश सत्यप्रकाश आश्रम से। उन्होंने सवाल किया की सोनीपत जा रहे हो। हम ने कहा कि नहीं राई में आर्य समाज आश्रम के पचास साला जशन में एक यज्ञ के लिये जा रहा हूँ। उन्होंने पूछा कि आप आर्य समाजी हैं? मैं ने कहा जी हाँ। मौलाना साहब ने अखलाक(नैतिकता) के साथ खैर खैरियत मालूम करके थोडी देर में मुझ से कहा कि बहुत रोजश् से मुझे किसी आर्य समाजी गुरू की तलाश थी। असल में धर्म मेरी कमजोरी है और हर धर्म को पढता हूँ। मुझे ख्याल होता है कि जो हमारे पास है वह सत्य है, यह ख्याल तो अच्छा नहीं। जो सच है वह हमारा है वह कहीं पर भी हो, यह असल सच्चाई की बात है। मैं ने सत्यार्थ प्रकाश भी पढी और बार-बार पढी कुछ बातें समझ में नहीं आयीं। शायद मेरी अक्ल भी मोटी हैं अगर आप बुरा न मानें तो आप से मालूम कर लूँ। मैं एतराज के तौर पर नहीं बल्कि समझने के लिये मालूम करना चाहता हूं। मैं ने कहा जरूर मालूम कीजिये। मौलाना साहब ने सवालात करना शुरू किये मैं जवाब देता रहा। एक के बाद एक सवालात करते रहे। सच्ची बात यह है कि अहमद भाई, मौलाना साहब सवाल करते थे। मुझे ऐसा लगता था की मौलाना कलीम साहब अनिल राव से सवाल नहीं कर रहे हैं बल्कि अनिलराव स्वामी नित्यानंदजी से सवाल कर रहा है। बिल्कुल वो सवालात जो मैं अपने गुरू से करता था और वह मुझे जवाब न दे सकते थे। मुझ पर रात के ख्वाब का असर था। मैं ने चार पाँच सवाल के बाद हथियार डाल दिये और मौलाना साहब से कहा कि मौलाना साहब ये सवालात सारे, मेरे दिल में भी खटकते हैं और मेरे गुरू स्वामी नित्यानंदजी उस का इत्मिनान बख्श जवाब नहीं दे सके फिर मैं आपको किस तरह मुतमइन कर सकता हूं। थोडी देर खामोश रह कर मौलाना साहब ने मुझ से कहा कि मैं एक मुसलमान हूँ। इस्लाम के बारे में सब कुछ तो मैं भी नहीं जानता मगर कुछ जानने की कोशिश की है। मेरा दिल चाहता है कि मैं कुछ इस्लाम के बारे मेें आपको बताऊँ और आप इस्लाम के बारे में सवाल कर सकते हैं। मुझे कोई नागवारी नहीं होगी। मैं इस्लाम के बारे में कुछ भी नही जानता इस लिये सवाल क्या करता? बस सत्यार्थ प्रकाश में कुछ पढा था मगर वह बात मेरे दिल को नहीं लगती थी। मैं ने मौलाना साहब से कहा कि आप इस्लाम के बारे में मुझे जरूर बतायें। और अगर हजरत मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम के जीवन के बारे में मुझे बतायेंगे तो मुझ पर बडा अहसान होगा। मौलाना साहब ने मुझे बताना शुरू किया कि मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम के परिचय के लिये बडी गलत फहमी यह है कि लोग समझते है। की वह सिर्फ मुसलमानों के धार्मिक गुरू हैं। हालांकि कुरआन में जगह-जगह और हजरत मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने बार-बार बताया कि वह पूरी इन्सानियत(मानव-जाती) की तरफ भेजे गये आखरी रसूल (अन्तिम सन्देष्टा) हैं। वह जिस तरह मेरे रसूल हैं आप के भी हैं। अब जो मैं उनके बारे में बताऊँ तो आप यह समझकर सुनें आपको ज्यादा आनन्द आयेगा। मौलाना साहब ने यह कहा तो मुझे रात का ख्वाब याद आया और मुझे ऐसा लगा की रात जो लोग हजरत मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम के साथ थे। यह उन में जरूर थे। और वह हमदर्द यहीं हैं। मौलाना साहब ने ऐसे प्यार से हजरत मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम के जीवन, इन्सानियत पर उनके तरस और उनको रास्ता दिखाने के लिये कुरबानियों और अपने गैरों की दुश्मनी का हाल, कुछ इस तरह बताया कि मैं बार-बार रो दिया। तकरीबन डेढ घंटे का सफर पता भी न चला कि कब पूरा हुआ। बहालगढ़ आ गया। मुझे बहालगढ़ उतरकर दूसरी बसे लेनी थी। मौलाना साहब को सोनीपत जाना था मगर वह भी टिकट छोडकर मेरे साथ बहालगढ उतर गये, मुझ से कहा ‘‘सर्दी का मौसम है, एक कप चाय हमारे साथ पी लें।’’ मैं ने कहा, ‘‘बहुत अच्छा’’। मैं ने सामने एक रेस्टोरेंट की तरफ इशारा किया कि चलें। मगर मौलाना साहब ने कहा, ‘‘यहाँ पर हमारे एक दोस्त की दुकान है। वहीं पर चाय मंगा लेते हैं।’’ हम दोनों वहाँ पहुँचे, चाय मंगाई गयी। मैं मौलाना साहब को देखता तो बार बार मुझे रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम का फरमान याद आता, कोई हमदर्द मिले तो कद्र करना। मैं ने मौलाना साहब से मालूम किया कि ‘‘आप लोगों को मुसलमान बनाते है। तो क्या रस्म अदा करते हैं?’’ मौलाना साहब ने कहा की ‘‘इस्लाम में कोई रसम नहीं यह मज़हब तो एक हकीकत है बस दिल में एक खुदा को सच्चा जानकर उस को खुश और राजी करने के लिये और उसके आखरी और सच्चे रसूल के बताये हुये तरीके पर जिन्दगी गुजारने का अहद करने वाला मुसलमान होता है बस’’, मैं ने कहा ‘‘फिर भी कुछ तो आप कहलवाते होंगे।’’ उन्होंने कहा, ‘हाँ इस्लाम का कलमा है। हम अपने भले और साक्षी बनने के लिये वह कलमा पढवाते हैं।’’ मैं ने कहा ‘‘आप मुझे भी वह कलमा पढवा सकते हैं?’’। मौलाना साहब ने कहा, ‘‘बहुत शौक से, पढिये ‘अश्हदु अल्ल ला इलाह इल्लल्लाहु व अश्हदु अन्न मुहम्मदन अब्दुहू व रसूलुहू।’’ मौलाना साहब ने उस का तर्जमा भी हिन्दी में कहलवाया। अहमद भाई। मैं जबान से उस हाल को ब्यान नहीं कर सकता कि इस कलमे को पढने के बाद मैं ने अपने अन्दर क्या महसूस किया। बस ऐसा लगता था कि एक इन्सान बिल्कुल अन्धकार और घुटन से बिल्कुल प्रकाश और उजाले में आ गया और अन्दर से जैसे न जाने कितने बन्धन से आजाद हो गया। मुझे जब भी वह कैफियत याद आती है तो मुझे खुशी और मजे का एक नशा सा छा जाता है। ईमान के नूर का मजश अल्लाह अल्लाह देखिए अब भी मेरा रूआं (रोम) खडा है।

अहमदः माशा अल्लाह। वाकअी आप पर अल्लाह का खास फजल है। आप सच्चे मतलाशी(जिज्ञासु) थे इस लिये उस ने आप को राह दिखायी। उसके बाद राई के प्रोग्राम का क्या हुआ?
अब्दुर्रहमानः मौलाना साहब ने मुझे बहुत मुबारकबाद दी और गले लगाया। मुझ से पता वगैरा लिया और सोनीपत जाने लगे। वहाँ से मुरतदों(विमुख,विधर्मी) के एक गाँव भूरा रसूलपुर जाना था जो सन 47 में मुरतद(विमुख) हो गये थे और खानदानी हिन्दुओं से भी ज्यादा सख्त हिन्दू हो गये थे, मैं ने मौलाना साहब से कहा कि आप मुझे कहाँ छोडकर जा रहे हैं? अब आपको मुझे भी साथ लेना है। मौलाना साहब ने कहा वाकई अब आपको मेरे साथ ही जाना बल्कि रहना चाहिये मगर राई के प्रोग्राम का क्या होगा? मैं ने कहा कि मुझे उस प्रोग्राम में शरीक होना क्या अच्छा लगेगा, मौलाना साहब मेरे इस ख्याल से खुश हुये। पीले कपडों, माथे पर तिलक और डमरू हाथ में लिये मैं भी मौलाना साहब के साथ हो लिया और हम लोग भूरा रसूलपुर पहुँचे। मौलाना साहब ने बताया कि इस इलाके के लोग इस्लाम को जानते नहीं थे। उन को ईमान की कद्र व कीमत मालूम नहीं थी। इस लिये सन 47 में फसादात से घबराकर ये मुरतद(विमुख) हो गये थे। छोटे-छोटे बच्चे के हाथ में हीरा हो उसे हीरे की कीमत क्या मालूम। अब अगर उसको कोई डरा धमका दे तो वह हीरा दे देगा की यह पत्थर है। अगर वह जौहरी के हाथ में हो तो वह जान दे देगा मगर हीरा नहीं देगा। अब हम लोग उन को ईमान की जरूरत और कीमत बताकर दोबारा इस्लाम में लाने की कोशिश में हैं। भूरा गाँव में एक मस्जिद थी। बिल्कुल वीरान। मौलाना साहब ने बताया कि यहाँ सिर्फ एक गूजर घर मुसलमान है। हालांकि सन 47 से पहले यह पूरा गाँव मूला जाट मुसलमानों का था। अब ये मूला जाट ऐसे सख्त हो गये हैं की चन्द साल पहले यहाँ एक तब्लीगी जमात आयी थी मस्जिद में कयाम किया यह बेचारा गूजर मुसलमान उन को लेकर मूला जाटों में ले गया। बस गांव में फसाद हो गया उन मुर्तदों ने अदालत में मुकदमा कर दिया कि शर(उपद्रव) फैलाने के लिये यह हमारे यहाँ मुल्लाओं को लेकर आया है, मुकदमा चला और उस बेचारे गूजर को एक गश्त की रहबरी की कीमत मुकदमें में तकरीबन 20 हजार रूपये लगाकर चुकानी पडी, उत्तर काशी के जलजले के झटके यहाँ तक आए थे लोगों के दिल जरा डरे हुये थे। मौलाना साहब ने मस्जिद के इमाम साहब से कहा कि कोशिश करो कुछ जिम्मेदार लोगों को मस्जिद में बुला लाओ, कुछ मशवरा करना है, कम अज कम किसी बहाने लोग अल्लाह के घर में आ जायेंगे। इमाम साहब ने कहा भी कि लोग मस्जिद में नहीं आयेंगे, मगर मौलाना साहब ने कहा कोशिश करें अगर आ गये तो अच्छा है वरना प्रधान के घर में लोगों को बुलायेंगे, खुदा का करना ऐसा हुआ कि वह लोग मस्जिद में आ गये, मैं ने मौलाना साहब से पहले कुछ कहने की ख्वाहिश जाहिर की, मौलाना साहब ने इजाजत दे दी, मैं ने लोगों से अपना परिचय (तआरुफ) कराया कि मैं वरंगल के बहुत बडे ताजिर का बेटा हूं। एम. एस. सी. करने के बाद पी. एच. डी. मुकम्मल करने वाला था, कि घर वालों ने शादी के लिये बदाव दिया, मैंं दुनिया के झमेलों से बचकर हरिद्वार आगया एक के बाद एक तकरीबन हर आश्रम को देखा बाद में ऋषिकेश रहा, वहाँ भी बहुत से आश्रमों में रहा, 13 साल वहां तपस्या (मुजाहिदे) करता रहा, 13 साल में मुझे इस हिन्दू धर्म के मरकज में इस के अलावा कुछ न मिला कि लोग मुझे शास्त्राी कहने लग, इसके अलावा शान्ति जिस का नाम है उस का कहीं पता नहीं लगा, मालिक की मेहरबानी हुई मौलाना साहब के साथ बडोत से बालगढ तक मौलाना साहब के साथ सफर करके आया और कलमा पढ के मिली, वह 13 सालों में मुझे नहंी मिली। मेरे भाइयो! ऐसे शान्ति और सच्चे धर्म को छोड कर इस बेचैनी में आप क्यों वापस जा रहे हैं, यह कहते हुये मुझ से रहा न गया और मेरी हिचकियाँ बंध गयी, मेरी इस सच्ची और दर्द भरी बात का वहाँ के लोगों पर बडा असर हुआ और वहाँ के लोगों ने इस्लामी स्कूल कायम करने के लिये आमादगी जाहिर की, बल्कि उसके लिये चंदा भी दिया, उस में सब से ज्यादा दिलचस्पी गांव के प्रधान करण सिंह ने दिखायी जो सब से ज्यादा इस्लाम का मुखालिफ था। मौलाना साहब बहुत खुश हुए और मुझे मुबारकाद दी और कहने लगे आप का इस्लाम इन्शाअल्लाह न जाने कितने लोगों के लिये हिदायत का जरिआ बनेगा।

अहमदः उसके बाद आप कहाँ रहे?
अब्दुर्रहमानः मौलाना साहब के साथ फुलत वापस आये, कपडे उतारे, चोटी कटवाई, खत बनवाया, और हुलिया ठीक कराके मौलाना साहब ने मुझे जमाअत में चिल्ला(40 दिन) लगाने के लिये भेज दिया। हमारा चिल्ला मथुरा के इलाके में लगा, मुझे अपने इस्लाम की बहुत खुशी थी बार-बार मैं शुक्राने की नमाज पढता था, मेरे अल्लाह ने मेरी मुराद पूरी की मगर जब गैरमुस्लिम भाईयों को देखता कि बेचारे रास्ता न मालूम होने की वजह से कुफ्र(अधर्म, नास्तिकता) और शिर्क(अनेकेश्वरवाद) के लिये कैसी कुरबानियाँ दे रहे है। तो मुझे ख्याल होता कि यह तो मुसलमान का जुल्म हैं, कितने लोग कुफ्र और शिर्क पर मर कर हमेशा की दोजख का इन्धन बन रहे है।, प्यारे नबी सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने तो ये काम पूरे मुसलमानों के जिम्मे सोंपा था मै। इस लिससिले में बहुत सोचने लगा और मेरी खुशी एक तह गम की तरफ लौट आयी। इस गम में घुलता था कि किस तरह लोगों तक हक पहुंचे मैं ने मथुरा मर्कज से मौलाना अली मियाँ का पता लिया और उनके नाम अपने इस हाल के लिये खत लिखा वह खत आपने अरमुगान दावत में पढा होगा।

‘वह खत पाठकों के लिये दिया जा रहा हैः
आदरणीय जनाब मौलाना अली मियाँ साहब
अस्सलामु अलैकुम व रहमतुल्लाहि व बरकातुह।
आप को यह मालूम होकर आश्चर्य होगा कि मै। आपका नया सेवक हूँ। .... के साथ सफर किया और वहाँ सफर किया, जमाअत में जा रहा हूँ। वहाँ से आकर हरिद्वार में काम करने का इरादा है। वहाँ पर शान्ति की तलाश में आये मुझ जैसे कितने लोग भटक रहे हैं। आप मेरे लिये दुआ करें। एक प्रश्न गलती की मआफी के साथ आप से करता हूँ जो लोग इस्लाम की दावत न देने की वजह से इस्लाम से दूर रहकर दुनिया से चले गये और सदा के नर्क के इन्धन बन गये उन की जिम्मेदारी किस पर होगी? आप से दुआ की उम्मीद है।
आप का सेवक
अब्दुर्रहमान ‘अनिलराव शास्त्री’

अहमदः जमात से आने के बाद आप ने क्या मशगला(कार्य) अख्तियार किया?
अब्दुर्रहमानः मैं ने जमाअत में इरादा किया था मि मैं हरिद्वार और ऋषिकेश जाकर दावत का काम करूंगा। कितनी बडी तादाद में हक के मतलाशी गैर मुस्लिम भाई राह मालूम न होने की वजह से वहां भटक रहे हैं। बल्कि अब तो बडी तादाद अंगे्रजों और यहूदियों की भी वहाँ रहने लगी है। मैं जमात से वापस आया तो मौलाना साहब ने मुझे कहा की आपका मैदान तो हरिद्वार ओर ऋषिकेश ही है, मगर पहले अपने घरवालों का हक है। आप एक आध साल वरंगल जाकर रहें। मैं वरंगल गया। वहाँ जाकर मालूम हुआ कि मेरे वालिद और वालिदा का इन्तकाल हो चुका है। वे आखिर तक मुझे याद करते रहे और तडपते रहे। अभी तक मुझे गैर मुताल्लिक गैरमुस्लिमों के कुफ्र(अधर्म, नास्तिकता) और शिर्क(अनेकेश्वरवाद) पर मरने का गम सवार था मगर अब मेरी माँ जिस ने मुझे जन्म दिया। जिस ने अपने खून से बना दूध मुझे पिलाया। जिस ने मेरा पेशाब और पाखाना साफ किया। मेरे प्यारे वालिद जो मुझे अपनी आँखों का तारा समझकर पालते पोसते रहे। मेरे घर से जाने के बाद पाँच छः साल तक सारे देश में मुझे तलाश करते रोते फिरते रहे। मेरे मोहसिन माँ बाप ईमान से महरूम कुफ्र और शिर्क पर मर गये और वे दोजख में जल रहे होंगे बस यह ख्याल मेरे सीने का ऐसा जख्म है, मेरे भाई अहमद शायद आप इस दर्द को नहीं समझ सकते। यह एक जख्म है जिस का कोई मरहम नहीं और ऐसा दर्द है जिसकी कोई दवा नहीं और जब मैं सोचता हूँ कि मुसलमानों ने इनको ईमान नहीं पहुँचाया तो मैं सोचता हूँ की ऐसे जालिमों को कैसे मुसलमान कहूँ यह बात भी है कि मुझ भटके को मुसलमान ही ने रास्ता दिखाया। मगर शायद मेरे लिये मेरे ईमान से ज्यादा जरूरी मेरे माँ बाप का ईमान है। जब कि वह इस्लाम से बहुत करीब थे। अपने घर में मुसलमान मुलाजिम रखते थे। ड्राईवर हमेशा मुसलमान रखते थे। बीडी की फेक्ट्री में सारे काम करने वाले मुसलमान थे। हिन्दू धर्म में उनको जरा भी यकीन नहीं था। वह कहा करते थे की मैं तो पहले जन्म में मुसलमान ही रहा हूँगा। इस लिये मुझे सिर्फ इस्लाम की बातें भाती हैंं। एक रोज वह अपने ड्राईवर से कहने लगे किसी बुरे कर्म की वजह से में इस जन्म में गैर मुस्लिम पैदा हो गया अगले जन्म में उम्मीद है कि मैं मुसलमान पैदा हूँगा। अहमद भाई मैं ब्यान नहीं कर सकता कि इस गम में मैं किस कदर घुलता हूँ। और मुझे कभी-कभी मुसलमानों पर हद दर्जा गुस्सा भी आता है। मेरे भाई! काश में पैदा ही न होता (रोते हुये) आप जरा तसव्वुर करें उस बेटे के गम और जिन्दगी का दुख जिसको यकीन हो कि उसके प्यारे मुश्फिक(स्नेही) व मोहसिन(उपकारी) माँ बाप दोजख में जल रहे होंगे। (बहुत देर तक रोते हुये)
अहमदः क्या खबर अल्लाह तआला ने उन को ईमान अता कर दिया हो। जब वे ईमान के इस कदर करीब थे तो हो सकता है अल्लाह तआला ने फरिश्तों से उनकेा कलमा पढवा दिया हो, ऐसे भी वाकिआत मिलते हैं।
अब्दुर्रहमानः हाँ मेरे भाई काश यह बात सच हो। झूठी तसल्ली के लिये मैं अपने दिल को यह भी समझाता हूं। मगर जाहिर है यह सिर्फ तसल्ली है।
अहमदः बाकी रिशतेदारों की तो आप फिक्र करते? आपने उन पर कुछ दावती काम किया?
अब्दुर्रहमानः अलहम्दु लिल्लाह मेरे बडे भाई, भाभी और दो बच्चों के साथ मुसलमान हो गये हैं, वालिद के इन्तकाल के बाद कारोबार पर बहुत बुरा असर पडा। फेक्ट्री बंद हो गयी। उन्होंने घर बेचकर अब गुलबर्गा में मकान खरीदा है और कारोबार शुरू किया है।
अहमदः आपकी शादी का क्या हुआ?
अब्दुर्रहमानः मेरी तबियत जिम्मेदारी से घबराती है। इस लिये अन्दर से दिल शादी के लिये आमादा नहीं था मुझ जैसे माजूर(मजबूर) के लिये शायद शरियत में गुन्जाइश भी होती। मगर मौलाना साहब ने निकाह के सुन्नत होने और उस के फजाइल कुछ इस तरह ब्यान किये की मुझे उस में आफियत मालूम हुई। मैं ने एक गरीब लडकी से शादी कर ली है। अल्हम्दु लिल्लाह वह बहुत नेक सीरत और हद दर्जा खिदमत गुजार है और अल्लह तआला ने हमें दो बच्चे एक लडका और एक लडकी अता फरमायी।
अहमदः हरिद्वार और ऋषिकेश में काम के इरादे का ख्याल हुआ?
अब्दुर्रहमानः वालिद वालिदा के कुफ्र(अधर्म, नास्तिकता) और शिर्क(अनेकेश्वरवाद) पर मरने के गम ने मुझे निढाल कर दिया था। एक जमाने तक मेरे होश व हवास खत्म हो गये थे नीम पागल जंगलो में रहने लगा। भाई साहब मुझे पकडकर लाये। इलाज वगैरा कराया। कई साल में जाकर तबियत बहाल हुयी, तीन साल पहले मैं ऋषिकेश गया। सत्यप्रकाश आश्रम पहुँचा, स्वामी नित्यानंदजी से मिला। कुछ किताबें मेरे पास थीं। मौलवी साहब की, ‘आपकी अमानत-आपकी सेवा में’, उन को बहुत भायी। वह बहुत बीमार थे। उन के गदूद में कैंसर हो गया था। एक रोज उन्हों तन्हाई में मुझे बुलाया और मुझ से कहा कि मेरे दिल में भी यह बात आती है कि इस्लाम सच्चा मजहब है। मगर इस माहौल मे मेरे लिये इस को कुबूल करना सख्त मुश्किल है। में ने उस को बहुत समझाया कि आप इतने पढे लिखे आदमी हैं। अपने धर्म को मानने का हर इन्सान उसके पूरे सन्सार के लोगों के सामने जाहिर करने का हर इन्सान का कानूनी हक है। आप खुलकर एलान करें। मगर वह डरते रहे बार-बार मुझ से इस्लाम पर यकीन का जिक्र करते। मैं ने उन को कुरआन शरीफ हिन्दी अनुवाद के साथ लाकर दिया वह माथे और आँखों पर लगाकर रोज पढते थे। उन की बिमारी बढती रहीं। मैं ने इस ख्याल से कि कुफ्र पर मरने से बच जायेंं। उन से कहा कि आप सच्चे दिल से कलमा पढकर मुसलमान हो जायेंं। चाहे लोगों में एलान न करे। दिलों का भेद जानने वाला तो देखता और सुनता है। वह इस पर राजी हो गये। मैं ने उन को कलमा पढवाया और उन का नाम मुहम्मद उस्मान रखा। मौत से एक रोज पहले उन्होंने आश्रम के लोगों को बुलाया और उन से अपने मुसलमान होने का खुलकर ऐलान किया और कहा कि मुझे जलाया न जाये बल्कि इस्लाम के तरीके पर दफनाया जाये। लोगों ने इस्लाम के तरीके पर तो नहीं बल्कि हिन्दुओं के तरीके पर उनको बिठाकर समाधि बना दी। अल्लाह का शुक्र है कि वह यहाँ की आग से भी बच गये। उन के मुसलमान होने पर ऋषिकेश में बहुत से लोग मेरे मुखालिफ हो गये। मुझे वहाँ रहने का खतरा महसूस होने लगा। मैं ने फुलत आकर पूरे हालात बताए। मौलाना साहब ने मेरा हौसला बढाया कि दाअी(धर्म निमन्त्राक, आवाहक) को डरना नहीं चाहिये, कुरआन का इरशाद हैः
‘अल्लजीना युबल्लिगूना रिसालातिल्लाहि व यख्शौनहू व ला यख्शौना अहदन इल्लल्लाही व कफ़ा बिल्लाहि हसीबा’’
(अनुवादः ‘जो अल्लाह को पैगाम पहुँचाते हैं और उस से डरते हैं वह अल्लाह के सिवा किसी से नहीं डरते और उनके हिसाब के लिये अल्लाह काफी है’)
अल्लाह की मदद हमेशा दाईयों(धर्म निमन्त्राक, आवाहक) के साथ रही है। कुछ रोज गुलबर्गा रहकर मैं ने फिर ऋषिकेश का सफर किया, हमारे आश्रम के कई जिम्मेदार अब मेरे और इस्लाम के बहुत करीब हैं और दूसरे आश्रमों में भी लोग मानूस(परिचित) हो रहे हैं। शान्तिकुंज के तो बहुत से लोग इस्लाम को पढ रहे हैं। उम्मीद है कि दाअवत की फिज़ा ज़्ारूर बनेगी अब काफी लोग मेरी बातें मुहब्बत से सुनते हैं। मेरा इरादा मुस्तकिल वहीं रहने का है और काम करने का है। अल्लाह तआला मुझे हिम्मत अता फरमायें।
अहमदः बहुत बहुत शुक्रिया। अब्दुर्रहमान साहब, आपसे बहुत बातें पाठकों के हवाले से हो गयी।। आप उनको कुछ पैगाम देना चाहेंगे?
अब्दुर्रहमानः बस मुसलमान भाईयों से तो मेरी दरखास्त यही है कि हम जैसे दुखियारों के गम को समझें, जिन को अल्लाह ने हिदायत दी। मगर उनके माँ बाप दोजख में जल रहे हैं। जरा गहराई से इस गम को समझने की कोशिश करें और नबीये अकरम सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने जो जिम्मेदारी हम मुसलमानों के जिम्मे सुपुर्द की है उसके लिए फिक्र करें।
अहमदः वाकई आपकी बात सच है। अल्लाह तआला हमें इस दर्द को समझने की तौफिक अता फरमायें।
अब्दुर्रहमानः आमीन
अहमदः जजाकल्लाहु खैरा, अस्सलामु अलैकुम
अब्दुर्रहमानः व अलैकुमुस्सलाम व रहमतुल्लाहि व बरकातुह।

साभार मासिक ‘अरमुगान’ फुलत , सितम्बर 2005, पृष्ठ 13 से 21

डाक्टर मुहम्मद हुज़ेफा (डी. एस. पी. रामकुमार) से मुलाकात interview 4

डाक्टर मुहम्मद हुज़ेफा (डी. एस. पी. रामकुमार) से मुलाकात interview 4

अहमद अव्वाह: अस्सलामु अलैकुम व रहमतुल्लाहि व बरकातुह
डा. हुजैफाः व अलैकुमुस्सलाम व रहमतुल्लाहि व बरकातुह

अहमदः अल्लाह का शुक्र है आप आ गये, अबी (मौलाना कलीम सिश्द्दीकी साहब) से बहुत मर्तबा आपका जिक्र सुना। अबी अकसर लोगों के सामने आपका जिक्र करते हैं। अपने खूनी रिश्ते के भाईयों की खैर ख्वाही(शुभेच्छा) और उनको हमेशा की हलाकत और अजाब से बचाने के लिये इस्लाम की दअवत देना न सिर्फ यह की इस्लामी फरीजा है बल्कि यह एक खैरख्वाही होने की वजह से हमारे मुल्क के कानून के लिहाज से भी हमारा कानूनी हक है। इस सिलसिले में आपके कबूले इस्लाम का तज़्किरा(वर्णन) मिसाल के तौर पर किया करते हैं। मुझे आपसे मुलाकात का इश्तियाक(लालसा,उत्सुकता) था। अल्लाह ने मुलाकात करा दी।
डा. हुजैफाः मैं दिल्ली एक सरकारी काम से आया था। मौलाना साहब का फोन तो मिलता नहीं। ख्याल हुआ की फोन करके देख लूँ। अगर फुलत हुये तो मुलाकात करके जाऊंगा। बहुत दिनों से मुलाकात न हो पाने की वजह से बहुत बेचैन सा था। फोन मिलाया तो मालूम हुआ मौलाना साहब दिल्ली में ही हैं। मेरे लिये इस से ज्यादा खुशी की बात क्या हो सकती है कि दिल्ली में मुलाकात हो गयी। मेरे अल्लाह का करम है। रमजान से पहले मुलाकात हो गयी। बेकरारी भी बहुत हो रही थी और जरा ईमान की बेटरी भी चार्ज हो गयी। बहुत दिन मुलाकात को हो जाते हैं तो ऐसा लगता है जैसे अन्दर से बेटरी डाउन हो गयी। अल्हम्दुलिल्लाह मुलाकात हो गयी और एक प्रोग्राम में भी मौलाना साहब के साथ शिर्कत हो गयी। बयान से भी तसल्ली सी हो गयी।

अहमदः हुजैफा साहब मैं आपसे एक मतलब के लिये मिलना चाहता था। हमारे यहाँ फुलत से एक माहनाम ‘अरमुगान’ के नाम से निकलता है। शायद आप के इल्म में हो। उसके लिये एक इण्टरव्यू आप से लेना चाहता हूँँ ताकि दावत का काम करने वालों के लिये रहनुमाई भी हो। खुसूसन आपके इण्टरव्यू से खौफ कम हो और हौसला बढे।
डा. हुजैफाः हाँ अहमद भय्या। मैं अरमुगान को खूब जानता हूँँ। मैं ने मौलाना साहब से कई मर्तबा दरख्वास्त की है कि उस का हिन्दी एडीशन जरूर निकालें। मैं ने मौलाना साहब से कहा था की हिन्दी के कम से कम पाँच सौ सालाना मेम्बर मैं बनवाऊँगा, इन्शाअल्लाह। मुझे मालूम हुआ है कि सितंबर से हिन्दी एडीशन निकल रहा है मगर न जाने क्या वजह हुई की सितम्बर में भी वह नहीं आ सका।
अहमदः वह इन्शाअल्लाह जल्दी आ रहा है। आप फिक्र न करें और मौलाना वसी साहब उसके लिये बहुत फिक्रमन्द हैं और लोगों का तकाजा भी बहुत है।
डा. हुजैफाः खुदा करे यह खबर जल्दी सच हो। अहमद भाई हुक्म करें मुझ से क्या मालूम करना चाहते हैं?
अहमदः आप अपना तआरुफ(परिचय) कराइये।
डा. हुजैफाः मशरिकी यु. पी. बस्ती जिला के एक गाँव के जमीन्दार के यहाँ पैदाईश। 13 अगस्त 1957 को हुयी। 1977 में इन्टर पास किया। मेरे चचा यु. पी. पुलिस में डी. एस. पी. थे। उनकी ख्वाहिश पर पुलिस में भर्ती हो गयी। दौराने मुलाजमत 1982 में मैंने बी. काम किया और 1984 में एम. ए. किया। यु. पी. के 55 थानों में इंस्पेक्टर थाना इन्चार्ज रहा। 1990 में प्रोमोशन हुआ। सी. ओ. हो गया। 1997 में एक ट्रेनिंग के लिये फ्लोर एकेडमी जाना हुआ तो एकेडमी के डायरेक्टर जनाब ए. ए. सिद्दीकी साहब ने जो हमारे चचा के दोस्त भी थे। मुझे क्रिमिनोजॉजी में पी. एच. डी करने का मशवरा दिया और मैंने छुट्टी लेकर 2000 में पी. एच. डी की। 1997 में मेरा परफॉरमेंस(बेहतर काकर्दगी) की बुनियाद पर खुसूसी प्रोमोशन डी. एस. पी के ओहदे पर हो गया और मेरी पोस्टिंग मुजफ्फरनगर में खुफिया पुलिस के महकमे में हो गयी। मेरे एक छोटे भाई हैं जो इन्जिनियर हैं। एक बहन हैं जिस की शादी एक लेकचरार से हुई है। खानदान में अलहम्दुलिल्लाह तालीम का रिवाज रहा है। आजकल मेें मशरिकी यु. पी. में एक जिला हेडक्वार्टर में महकमा खुफिया पुलिस का जिम्मेदार हूँ।
अहमदः अपने कुबूले इस्लाम के बारे में बताईये।
डा. हुजैफाः हमारा खानदान पढा लिखा खानदान होने की वजह से अपनी मुस्लिम दुशमनी में मशहूर रहा है। उस की एक वजह यह रही की हमारे खानदान की एक शाख तकरीबन सौ साल पहले मुसलमान होकर फतेहपुर हंसवा और प्रतापगढ में जाकर आबाद हो गयी थी। जो बहुत पक्के मुसलमान हैं। इधर हमारी बस्ती में तीस साल पहले बस्ती के जमीन्दारों की छुआ-छूत से तंग आकर आठ दलित खानदानों ने इस्लाम कुबूल किया था। उन दोनों वाकिआत की वजह से हमारे खानदान में मुस्लिम दुश्मनी के जज़्बात और भी ज़्यादा हो गये थे। बाबरी मस्जिद की शहादत के जमाने में उस में और भी ज़्यादती हो गयी। हमारे खानदान के कुछ नौजवानों ने बजरंग दल की एक ब्रांच गांव में कायम कर ली थी। जिस में सब से ज्यादा हमारे खानदान के लडके मेम्बर थे। मैं ने यह बातें इस लिये बतायीं कि किसी आदमी के इस्लाम कुबूल करने के लिय मुखालिफत तरीन माहौल मेरे लिये था मगर अल्लाह को जिस का नाम हादी और रहीम(कृपालू व सण्मार्ग-प्रदर्शक) है अपनी शान का करिश्मा दिखाना था। उसने एक अजीब राह से मुझे राह दिखायी।
हुआ यह कि जब गाजियाबाद जिले के पिलखवा के एक खानदान के नौ लोगों ने मौलाना के पास आकर फुलत में इस्लाम कुबूल किया दो माँ बाप और चार लडकियाँ और तीन लडके। लडका शादीशुदा था। मौलाना साहब से उन लोगों ने कलमा पढवाने के लिये कहा और बताया कि हम आठ लोग तो अभी कलमा पढ रहे हैं। यह बडा लडका शादीशुदा है इस की बीवी अभी तैयार नहीं जब उसकी बीवी तैयार हो जायेगी। यह उसके साथ कलमा पढेगा। मौलाना साहब ने कहा मौत जिन्दगी का कुछ भरोसा नहीं यह भी साथ ही कलमा पढ ले अभी अपनी बीवी को न बताये और उसको तैयार करे और उसके साथ दोबार कलमा पढ ले। मौलाना साहब ने उन सबको कलमा पढवाया और उनकी फरमाइश पर उन सब के नाम भी इस्लामी रख दिये। उन लोगों के कहने पर एक पैड पर उनके कुबूले इस्लाम और उनके नये नामों का सर्टीफिकेट बनाकर दे दिया। उन लोगों को बता भी दिया कि कानूनी कारवाई जरूरी है, उसके लिये ब्याने हल्फी तैयार कराके डी.एम. को रजिस्टर्ड डाक से भेजना और किसी अखबार में एलान निकालना काफी होगा। ये लोग खुशी-खुशी वहाँ से गये और कानूनी कारवाई पक्की कराई। बच्चों को मदरसे में दाखिल कर दिया। बडी लडकियाँ और माँ औरतों के इज्तिमा (सम्मेलन) में जाने लगीं।
मुसलमान औरतों का मालूम हुआ तो उन्होंने खुशी में मिठाई तक्सीम कर दी। लडके के बीवी को मालूम हो गया तो उसने अपने मैके वालों को खबर कर दी। एक से एक को खबर होती गयी। और माहौल गर्म हो गया। इलाके की हिन्दू तन्जीमें जोश में आ गयीं। आज कल टी. वी. चैनल के लोग आ गये। देखते-देखते खबर फैल गयी। दैनिक जागरण और अमर उजाला दोनों हिन्दी अखबारों में चार कालमों की बडी-बडी खबरें छपीं। जिनका हैडिंग था ‘लालच देकर धर्मांतरण पर पूरी हिन्दू बिरादरी में रोष, धर्मांतरण फुलत मदरसे में हुआ’।
इस खबर से पूरे इलाके में गर्मी पैदा हो गयी, मेरी पोस्टिंग मुजफ्फरनगर में थी। अलावा अपनी दफ्तरी जिम्मेदारी के मुझे खुद इस खबर पर गुस्सा आया और हम अपने दो इस्पेक्टरों को लेकर फुलत पहुँचे। वहाँ जिन लोगों से मुलाकाता हुई, उन्होंने लाइल्मी का इज़्हार किया और बताया कि मौलाना साहब ही सही बता सकते हैं। और हमें इत्मिनान दिलाया की हमारे यहाँ कोई गैर कानूनी काम नहीं होता। मौलाना साहब से आप मिलें वह आप को बिल्कुल हक बात बता देंगे। मैं ने अपना फोन नम्बर वहाँ दिया कि मौलाना साहब से मालूम करके मुझे बताएँ कि वह फुलत कब आ रहे हैं?
तीसरे रोज मौलाना साहब का फुलत का प्रोग्राम था। 6 नवम्बर 2002 की सुबह 11 बजे हम फुलत पहुँचे। मौलाना साहब से मिले। मौलाना साहब बहुत खुशी से हम से मिले। हमारे लिये चाय नाश्ता मंगाया। बोले ‘बहुत खुशी हुई आप आये, असल में मौलवी, मुल्लाओं और मदरसे के सिलसिले में बहुत गलत प्रोपेगंडा किया जाता है। मैं तो अपने साथियों और मदरसे वालों से बार बार यह कहता हूँँ कि पुलिस वालों, हिन्दू तन्जीमों के जिम्मेदारों और सी. आई. डी, सी. बी. आई के लोगों को ज्यादा से ज्यादा मदरसों में बुलाना बल्कि चन्द दिन मदरसों में मेहमान रखना चाहिये ताकि वे अन्दर के हाल से वाकिफ हो जाएँ और मदरसों की कद्र पहचानें। मुझे मालूम हुआ कि आप एक दिन पहले भी आये थे। मुझे एक सफर पर इधर ही से जाना था मगर ख्याल हुआ कि आप को इन्तजार करना पडेगा। इस लिये में सिर्फ आपके लिये आज आ गया हूँँ।
मौलाना साहब ने हँस कर कहा ‘फरमाइये मेरे लायक क्या सेवा है?’ अहमद भाई! मौलाना साहब ने मुलाकात के शुरू में ही कुछ ऐसे एतमाद का और मुहब्बत का इजहार किया कि मेरी सोच का रूख बदल गया। मेरा अन्दर का गुस्सा आधा भी न रहा। मैं ने अखबार निकाले और मालूम किया कि आपने यह खबर पढी है? मौलाना साहब ने बताया की रात मुझे यह अखबार बताया गया था। मैं ने अमर उजाला में यह खबर पढी है। मैंने कहा फिर आप इस के बारे में क्या कहते हैं? मौलाना साहब ने बताया कि मैं एक सफर जा रहा था। गाडी मेंे सवार हो रहा था कि जीप गाडी आयी। मुझे सफर की जल्दी थी। मैं ने साथियों से कहा कि ये लोग हजरत जी से मिलने आये होंगे। उनको उधर कारी हिफजुर्रहमान साहब का पता बता दो। मगर एक साहब जानते थे कहा हमें किसी दूसरी जगह नहीं जाना है। हम लोग आप के पास आये हैं ये हमारे भाई अपने घरवालों के साथ मुसलमान होना चाहते हैं और एक महीने से परैशान हैं। मैं गाडी से उतरा और उन को कलमा पढवाया, उनके ज्यादा कहने पर उनके इस्लामी नाम भी बताये और उनकेा सर्टिफिकेट भी कुबूले इस्लाम का दिया। और उनको बता दिया कि कानूनी कारवाई पक्की जब होगी जब आप ब्याने हल्फी तैयार करके डी. एम. को इत्तिला करेंगे और एक अखबार में एलान कर देंगे और अच्छा है जिला गजट में दे दें। उन लोगों ने वादा किया कल ही जाकर हम सब कारवाई पूरी करेंगे। और मुझे इल्म हुआ कि उन्होंने सब काम पूरा कर लिये हैं। मौलाना साहब ने कहा की हमारा मुल्क सेक्युलर मुल्क है और मुल्क के कानून ने अपने मजहब को मानने और मजहब कि दावत देने का बुनियादी हक हमें दिया है। किसी को ईमान की दावत देना कोई मुसलमान होना चाहे उसको कलमा पढवाना हमारा बुनियादी कानूनी हक है। जिस चीज का कानून हमें हक देता है। उस के सिलसिले में हम लोग किसी से नहीं डरते और गैर कानूनी काम हम लोग जान बूझकर हरगिज नहीं करते। भूल में हो जाये तो उस की तलाफी की कोशिश करते हैं। जहाँ तक लालच देकर या डराकर मजहब बदलवाने की बात हैं यह बिलकुल गैरकानूनी हैं मेरा जाती ख्याल है कि यह गैरकानूनी काम मुम्किन नहीं। मजहब बदलना या किसी का मुसलमान होना उसके दिल के विश्वास का बदलना है। जो लालच और डर से हो ही नहीं सकता। आप को खुश करने के लिये कोई कह सकता है कि मैं हिन्दू होता हूँ मगर इतना बडा फैसला अपनी जिन्दगी को आदमी अन्दर से राजी हुये बगैर नहीं कर सकता।
दूसरी इस से भी ज्यादा अहम और जरूरी बात यह है कि मैं एक मुसलमान हूँ और मुसलमान उसको कहते हैं जो हर सच्ची बात को माने सारे सच्चों से सच्चा है हमारा मालिक और उसके भेजे हुये रसूल मुहम्मद सल्लालाहु अलैहि वसल्लम जिनके बारे में यह गलतफहमी है की वह सिर्फ मुसलमानों के रसूल हैं और उनके लिये मालिक के संदेश वाहक थेे। हालाँकि कुरआन में और आपकी हदीसों में सिर्फ यह बात मिलती है कि हम सब के मालिक की तरफ से भेजे हुये सारे इन्सानों की तरफ अन्तिम (आखरी) और सच्चे सन्देष्टा (रसूल) थे। वह ऐसे सच्चे थे कि उनके दीन के और उनकी जान के आखरी दुशमन भी उन को झूठा न कह सके बल्कि दुशमनों ने उनका लकब अस्सादिकुल अमीन और सच्चा और ईमानदार दिया। हमारा विश्वास यह है कि दिन हो रहा है, हमारी आँखें देख रही हैं। ये आँखें धोका दे सकती हैं। यह बात झूठ हो सकती है कि दिन हो रहा है मगर रसूल सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने जो हमें खबर दी हैं उसमें जर्रा बराबर भी गलती, धोका या झूठ नहीं हो सकता। हमारे रसूल सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने हमें खबर दी है कि सारी दुनिया के सारे इन्सान एक माँ-बाप की औलाद हैं इस लिये सारे जगत के इन्सान आपस में खूनी रिश्ते के भाई हैं, शायद आपके यहाँ भी यही माना जाता है। मैं ने कहा ‘यह बात तो हमारे यहाँ भी मानी जाती है।’ मौलाना साहब ने कहा ‘ये तो बिल्कुल सच्ची बात है, हम और आप खूनी रिश्ते से भाई हैं ज़्यादा से ज्यादा यह हो सकता है कि आप मेरे चचा हों या मैं आपका चचा हूँ मगर आपके और हमारे बीच खूनी रिश्ता है इस खूनी रिश्ते के अलावा आप भी इन्सान हैं और मैं भी इन्सान हूँ और इन्सान वह है जिस में उन्सियत हो यानी मुहब्बत हो, एक दूसरे की भलाई का जज़्बा हो। इस रिश्ते से अगर आप यह समझते हैं कि हिन्दू धर्म ही अकेला मुक्ती का रास्ता है और मोक्ष का तरीका है तो आप को मुझे इस रिश्ते का लिहाज करते हुए हिन्दू बनाने की जी जान से कोशिश करनी चाहिये और अगर आप इन्सान हैं और आप के सीने में पत्थर नहीं है दिल है तो उस वक्त तक आप को चैन नहंी आना चाहिये जब तक मैं गलत रास्ता छोडकर मुक्ति के रास्ते पर न आ जाऊँ।’ मौलाना साहब ने मुझ से पूछा कि ‘यह बात है या नहीं?’ मैंने कहा ‘बिल्कुल सच बात है’। मौलाना साहब ने कहा ‘आप को सब से पहले आकर मुझे हिन्दू बनने के लिये कहना चाहिये था। दूसरी बात यह है कि मैं मुसलमान हूँँ। निकलते सूरज की रौशनी से ज्यादा मुझे इस बात का यकीन है कि इस्लाम ही वाहिद सब से पहला और सब से आखरी फाइनल मजहब, और मुक्ति और मोक्ष यानि निजात का वाहिद रास्ता है, अगर आप ईमान कुबूल किये बगैर दुनिया से चले गये तो आपको हमेशा के नर्क में जलना पडेगा और जिन्दगी का एक सांस के लिये भी इत्मिनान नहीं। जो सांस अन्दर गया, क्या खबर कि बाहर जाने तक आप जिन्दा रहेंगे या नहीं और जो सांस बाहर निकल गया, क्या खबर की अन्दर आने तक जिन्दगी वफा करेगी? इस हाल में अगर मैं इन्सान हूँँ और मैं आपको अपना खूनी रिश्ते का भाई समझता हूँँ तो जब तक आप कलमा पढकर मुसलमान नहीं होंगे। मुझे चैन नहीं आयेगा, यह बात मैं कोई नाटक के तौर पर नहीं कह रहा हूँँ थोडी देर की इस मुलाकात के बाद इस खूनी रिश्ते की वजह से अगर रात मुझे सोते भी आपकी मौत और नर्क से जलने का ख्याल आयेगा तो मैं बेचैन होकर बिलकने लगूंगा। इस लिये सर आप पिलखवे वालों की फिक्र छोड दिजिये। जिस मालिक ने पैदा किया है जीवन दिया है उस के सामने मुँह दिखाना है। मेरे दर्द का इलाज तो जब होगा जब आप तीनों मुसलमान हो जायेंगे। इस लिये आप से रिक्वेस्ट है कि आप मेरे हाल पर तरस खाएँँ आप तीनों कलमा पढें।
अहमद भाई में अजीब हैरत में था। मौलाना साहब की मुहब्बत जैसे जादू हो। मैं ऐसे खानदान का मेम्बर हूँँ जिसकी घुट्टी में मुसलमानों, मुस्लिम बादशाहों और इस्लाम की दुशमनी पिलाई गयी है और इस खबर के सिलसिले में हद दर्जा बरहम (उत्तेजित) होकर मैं गोया मुखालिफ इन्कवायरी के लिये फैसला करके फुलत गया था और मौलाना साहब मुझे न इस्लाम के मुतालिआ (वाचन) को कहते हैं, न गलतफहमी दूर करने के लिये कहते हैं। बस सीधे-सीधे मुसलमान होने को कह रहे हैं। और मेरी अंतरात्मा, मेरा जमीर गोया मौलाना साहब की मुहब्बत के शिकंजे में जैसे बिल्कुल बेबस हो। मैंने कहा ‘बात तो आप की बिल्कुल सादी और सच्ची है और हमें सोचना ही पडेगा, मगर यह फैसला इतनी जल्दी करने का तो नहीं, कि इतना बडा फैसला इतनी जल्दी में ले सकें।’ मौलाना साहब ने कहा ‘सच्ची बात यह है कि आप और हम सब मालिक के सामने एक बडे दिन हिसाब के लिये इकट्ठा होंगे, तो उस वक्त इस सच्चाई को आप जरूर पाएँगे कि यह फैसला बहुत जल्दी में करने का है। और इस में देर की गुन्जाईश नहीं और आदमी इसमें जितनी देर करेगा पछताएगा पता नहीं फिर जिन्दगी फैसला लेने की मोहलत दे या न दे और मौत के बाद फिर अफसोस और पछतावे के अलावा आदमी कुछ नहीं कर सकता। बिलकुल यह बात सच्ची है कि ईमान कुबूल करने और मुसलमान होने से ज्यादा जल्दबाजी में करने का कोई और फैसला नहीं हो सकता। हाँ अगर आप हिन्दू धर्म को मुक्ति का रास्ता समझते हैं तो फिर मुझे हिन्दू बनाने में इतनी ही जल्दी करनी चाहिये जिस तरह मैं मुसलमान बनने के लिये जल्दी करने को कह रहा हूँ’। मुझे ख्याल हुआ कि जिस विश्वास (मजबूत एतिमाद और यकीन) के साथ मौलाना साहब मुसलमान होने को कह रहे हैं उस एतिमाद के साथ मैं हिन्दू बनने को नहीं कह सकता। बल्कि सच्ची बात यह है कि हम लोग अपने पूरे धर्म को कई सुनी-सुनाई रस्मों पर आधारित कहानियों के अलावा कुछ नहीं समझते। जब हमारा हिन्दू धर्म पर विश्वास का यह हाल है तो यह किसको किस बलबूते पर हिन्दू बनने को कह सकते हैं। मेरे अन्दर से जैसे कोई कह रहा था। रामकुमार इस्लाम में जरूर सच्चाई है जो मौलाना साहब के अन्दर यह विश्वास है। मौलाना साहब कभी-कभी बहुत खुशामद कभी जरा जोर से बार-बार हम लोगों से कलमा पढकर मुसलमान होने को कहते रहे। जब मौलाना साहब खुशामद करते तो मुझे लगता जैसे किसी जहर खाने का इरादा करने वाले या आग मेें कूदने वाले को हलाकत से बचाने के लिये कोई हमदर्द कोई माँ खुशामद करती है। मौलाना साहब हमें बार-बार कलमा पढने पर जोर देते रहे। मैं ने वादा किया कि हम लोग गौर करेंगे, हमेंे पढने के लिये भी दिजिये। मौलाना साहब ने अपनी किताब ‘आपकी अमानत- आपकी सेवा में’ दी और हमें सौ-सौ बार रोजाना या हादी, या रहीम इस विश्वास के साथ पढने को कहा की मालिक को जब आप इन नामों से याद करेंगे, तो आपके लिये इस्लामी रास्ते जरूर खोल देंगे, असल में दिलों को फेरने का फैसला उसी अकेले का काम है। मैं ने मौलाना साहब से कहा, अच्छा है, माहौल गर्म हो रहा है आप अखबारात में इस खबर का खंडन निकलवा दें। मौलाना साहब ने कहा ‘मैं ने उन को दीनी और उनका कानूनी हक समझकर कलमा पढवाया है। सच बात को छुपाना नहीं चाहिये।’ मैं ने कहा ‘अच्छा हम खुद कर देंगे। हम लोग वापस हो गये तो मेरे दोनों इस्पेक्टर्स मुझ से बोले ‘सर देखा कितने सच्चे और सज्जन आदमी हैं, हम लोगों का तो दिल का बोझ हलका हो गया मौलाना साहब तो ऐसे आदमी हैं कि कभी-कभी शान्ति के लिये उनकी संगती में आकर बैठा जाये। कोई लाग नहीं लपट नहीं साफ-साफ बातें।’
अहमदः आप ने कलमा नहीं पढा?
डा. हुजैफाः मैं ने घर जाकर ‘आपकी अमानत-आपकी सेवा’ में पढी। मुहब्बत, हमदर्दी और सच्चाई उसके लफ्ज-लफ्ज से फूट रही थी मुझे उस किताब को पढकर लगा की एक बार फिर मेरी मुलाकात मौलाना साहब से हो गयी है। उसके बाद बार-बार मेरे अन्दर मौलाना साहब से मुलाकात की हूक सी उठती रही। इस्लाम को पढने का शौक भी पैदा हुआ। मैं मुजफ्फरनगर में एक दुकान से कुरआन मजीद का हिन्दी तर्जमा(अनुवाद) लेकर आया। मैं ने फोन पर मौलाना साहब से उसके पढने की ख्वाहिश का इज़्हार किया। मौलाना साहब ने कहा, देखिये कुरआन मजीद को आप जरूर पढें मगर सिर्फ और सिर्फ ये समझकर पढिए कि मेरे मालिक का भेजा हुआ यह कलाम है और यह सोच कर पढे कि यह सिर्फ और सिर्फ मेरे लिये भेजा है। इस लिये मालिक का कलाम समझ कर पढना अच्छा है। आप इसे स्नान करके पढें। पाक कलाम, पाक नूर, पाक और साफ सुथरे हालत में पढना चाहिये। दो हफ्तों मैंने पूरा कुरआन मजीद पढ लिया। अब मेरे लिये मुसलमान होने के लिये अन्दर के दरवाजे खुल गये थे। मैंने फुलत जाकर मौलाना साहब के सामने कलमा पढा। मौलाना साहब ने मेरा नाम रामकुमार बदल कर मेरी ख्वाहिश पर मुहम्मद हुज़्ौफा रखा और बताया कि हमारे नबी सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम अपने एक सहाबी को राज़दारी और जासूसी के लिये भेजा करते थे मुझे इस लिहाज से यह नाम बहुत अच्छा लगा।
अहमदः उसके बाद इस्लाम के पढने के लिये आपने क्या किया?
डा. हुजैफाः मौलाना साहब के मश्वरे से ही छुट्टी लेकर चिल्ला(40 दिन) जमात में लगाया। मगर मौलाना साहब ने मुझे सख्ती से मना कर दिया था कि आप किसी से जमात में अपना पुराना तआरुफ(परिचय) न कराएँ न अपने आपको नव-मुस्लिम कहें। इस लिये कि आप सच्ची बात यह है कि पैदाइशी मुसलमान हैं। हमारे नबी ने सच्ची खबर दी है कि हर पैदा होने वाला इस्लाम नजरिये पर पैदा होता है। इस लिये हर मजहब के बच्चे को दफनाया ही जाता है। आप तो पैदाइशी मुसलमान हैं और हम सबके बाप हजरत आदम इस कायनात के सब से पहले मुसलमान थे इस लिये आप पुश्तैनी मुसलमान हैं। जमात में मेरा वक्त अच्छा गुजरा लोग मुझे अंग्रेजी पढा लिखा, दीनी तालीम से बिल्कुल कोरा मुसलमान समझकर मुझे नमाज वगैरा याद कराने की कोशिश करते रहे। गुजरात के एक नौजवान आलिम हमारी जमात के अमीर थे। मैं ने चालीस दिन में पूरी नमाज और बहुत दुआएँ याद कर लीं। जमात से वापस आया तो मेरा ट्रान्सफर इलाहाबाद हो गया। अपनी इलाहाबाद पोस्टिंग के दौरान मैं ने अपनी बीवी को बहुत कुछ बता दिया। वह बहुत फरमांबरदार, भोली-भाली औरत है। उन्होंने मेरे फैसले की जरा भी मुखालफत नहीं की बल्कि मेरे साथ हर हाल में रहने का वादा किया। मैंने उसको भी किताबें पढवायीं। हमारी शादी को दस साल हो गये थे मगर कोई औलाद नहीं थी। मैंने उसको लालच दिया। इस्लाम कुबूल करने से हमारा मालिक हमसे खुश हो जायेगा और हमें औलाद भी दे देगा। औलाद न होने के गम से वह बहुत घुलती थी वह इस बात से बहुत खुश हो गयी। एक मदरसे में लेजाकर उसको कलमा पढवाय। मैं ने अपने अल्लाह से बहुत दुआ की ‘मेरे रब मैंने आप के भरोसे उससे वादा कर लिया है आप मेरे भरोसे की लाज रख लीजिये और उसको चाहे एक ही हो, औलाद दीजिये।’ खुदा का करना ऐसा हुआ की अल्लाह ने ग्यारह साल के बाद हमें एक बेटा दिया और तीन साल के बाद एक बेटी भी हो गयी है।
अहमदः इस्लाम कुबूल करने के बाद आपकी मुलाजमत में कोई मुश्किल नहीं आयी?
डा. हुजैफाः मैं इलाहाबाद पोस्टिंग के दौरान अपने कुबूले इस्लाम का ऐलान कर दिया और कानूनी कारवाई हाईकोर्ट के एक वकील के जरिये करायी। जिसके लिये मुझे अपने महकमे से इजाजत लेनी ज़रूरी थी। मैंने उसकी दरख्वास्त की। द्विवेदी जी हमारे बास थे। उन्होंने मुझे बहुत सख्ती से रोका और धमकी दी कि अगर आपने यह फैसला किया तो मैं आपको मुअत्तल कर दूंंगा। मैंने उन से साफ तौर पर कह दिया की यह फैसला तो मैं कर चुका हूँँ अब वापसी का सवाल ही पैदा नहीं होता। आपको जो कुछ करना है कर दीजिये। उन्होंने मुझे सस्पेंड कर दिया। मैंने अल्लाह का शुक्र अदा किया और तीन चिल्ले(120 दिन) के लिये जमात में चला गया। बंगलौर और मैसूर में मेरा वक्त गुजरा और अलहल्मदु लिल्लाह बहुत अच्छा गुजरा। मुझे तीन बार हुजूर सल्लल्लहु अलैहि वसल्लम की ख्वाब में जियारत हुई जिसकी मुझे इतनी खुशी हुई कि मैं ब्यान नहीं कर सकता, वापस आया तो अल्लाह ने मेरे तमाम अफसरों को नरम कर दिया। लखनऊ में एक मुसलमान अफसर जो बहुत बडी पोस्ट पर हैं। मैं ने उन से अपना पूरा हाल सुनाया, वह फुलत जा चुके थे और मौलाना साहब को जानते थे उन्होंने मेरी मदद की और मुझे मुलाजश्मत पर बहाल कर दिया गया।
अहमदः आपके दोनों इंस्पेक्टर साथियों का क्या हुआ? जो अबी से आपके साथ मिलने गये थे?
डा. हुजैफाः उन में से एक ने इस्लाम कुबूल कर लिया है। उनके घरवालों की तरफ से उन पर बहुत मुश्किलें आयीं। उनकी बीवी उनको छोडकर चली गयी मगर वह जमे रहे और अल्लाह ने उनके हालात को हल किया। दूसरे भी अन्दर से तैयार हैं मगर वह भी अपने साथी की मुश्किलात देख कर डरे हुये हैं।
अहमदः आपने अपने खानदान वालों पर काम नहीं किया?
डा. हुजैफाः अलहम्दु लिल्लाह काम जारी है। उस काम की बडी तफसीलात हैं, मेरी ट्रेन का वक्त हो रहा है। फिर किसी मुलाकात में आप तफसीलात सुनिये तो आपको बडा मजा आयेगा।।
अहमदः एक मिनट में अरमुगान के पाठकों(कारिईन) के लिये आप का क्या पैगाम है?
डा. हुजैफाः इस्लाम से बडी कोई सच्चाई नहीं और जब यह ऐसी सच्चाई है तो उसके मानने वालों को न उस पर अमल करने में डरना चाहिये न उसको दूसरों तक पहुँचाने से रूकना चाहिये। थोडी बहुत मुखालिफतें आएँगी हमारे मौलाना साहब कहते हैं कि इस्लाम एक रौशनी है और सारे बातिल(असत्य, मिथ्या) मजाहिब अन्धेरे। अन्धेरे, कभी उजाले पर हावी नहीं हो सकते, उजाला ही गालिब हुआ करता है। कभी-कभी जब रोशनी की कमी होती है तो ऐसा लगता है की अन्धेरे छा गये और गालिब आ गये मगर जरा उजाला किजिये नौ-दो ग्यारह हो जाते हैं। बस मेरा यह मानना है और मेरा यही पैगाम है कि फतेह हमेशा रौशनी वालों की होती है। इस लिये किसी तरह के डर के बगैर इस्लाम की दावत देनी चाहिये और बगेर लालच के सच्ची हमदर्दी का हक अदा करने की नियत से दावत दी जाये तो मुझ जैसे इस्लाम और मुस्लिम दुशमनी में पले मुखालिफाना इन्कवायरी का फैसला करने वालों को जब हिदायत हो सकती है तो भोले-भाले सादा दिमाग लोगों पर असर न हो यह कैसे हो सकता है?
अहमदः शुक्रिया, जज़ाकल्लाह
डा. हुजैफाः अच्छा इजाजत दिजिये अस्सलामु अलैकुम व रहमतुल्लाही व बरकातुह
अहमदः व अलैकुमुस्सलाम व रहमतुल्लाहि व बरकातुह, बहुत-बहुत शुक्रिया, इन्शाअल्लाह जब कभी आप आयेंगे तो दूसरी किस्त जरूर सुनाएँ।

(साभारः मासिक ‘अरमुगान’, फुलत, अक्तूबर 2006)
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Thursday, May 6, 2010

बाबरी मस्जिद गिराने के लिये 25 लाख खर्च करने वाला सेठ रामजी लाल गुप्ता अब सेठ मुहम्मद उमर interview 3


अहमद अव्वाहः अस्सलामु अलैकुम रहमतुल्लाहि व बरकातुह

सेठ मुहम्मद उमरः मौलवी साहब व अलैकुमुस्सलाम

अहमदः सेठ साहब, दो तीन महीने से अबी(मौलाना कलीम सिद्दीकी साहब) आपका बहुत जिक्र कर रहे हैं, अपनी तकरीरों में आप का जिक्र करते हैं और मुसलमानों को डराते हैं कि अल्लाह तआला अपने बन्दों की हिदायत के लिये हर चीज से काम लेने पर कादिर हैं।

सेठ उमरः मौलवी साहब, हजरत साहब बिल्कुल सच कहते हैं, मेरी जिन्दगी खुद अल्लाह की दया व करम की खुली निशानी है, कहाँ मुझ जैसा, खुदा और खुदा के घर का दुश्मन और कहाँ मेरे मालिक का मुझ पर करम। काश! कुछ पहले मेरी हजरत साहब या हजरत के किसी आदमी से मुलाकात हो जाती तो मेरा लाडला बेटा ईमान के बगैर न मरता, (रोने लगते हैं और बहुत देर तक रोते रहते हैं, रोते हुये) मुझे कितना समझाता था और मुसलमानों से कैसा ताल्लुक रखता था वह और ईमान के बगैर मुझे बुढापे में अपनी मौत का गम दे कर चला गया।

अहमदः सेठ साहब, पहले आप अपना खानदानी परिचय(तआरूफ) कराईये।

सेठ उमरः मैं लखनऊ के करीब एक कस्बे के ताजिर खानदान में पहली बार अब से 69 साल पहले 6 दिसम्बर 1939 में पैदा हुआ, गुप्ता हमारी गौत है, मेरे पिताजी किराना की थोक की दुकान करते थे, हमारी छटी पीढी से हर एक के यहाँ एक ही औलाद होती आयी है, मैं अपने पिताजी का अकेला बेटा था, नवीं क्लास तक पढ़ कर दुकान पर लग गया, मेरा नाम रामजी लाल गुप्ता मेरे पिताजी ने रखा।

अहमदः पहली मर्तबा 6 दिसंबर को पैदा हुये तो क्या मतलब है?

सेठ उमरः अब दोबारा असल में इसी साल 22 जनवरी को चन्द महीने पहले मैं ने दोबारा जन्म लिया और सच्ची बात यह है कि पैदा तो में अभी हुआ, पहले जीवन को अगर गिनें ही नहीं तो अच्छा है, वह तो अन्धेरा ही अन्धेरा है।

अहमदः जी! तो आप खानदानी तआरूफ करा रहे थे?

सेठ उमरः घर का माहौल बहुत धार्मिक (मजहबी) था, हमारे पिताजी जिले के बी. जे. पी. जो पहले जनसंघ थी, के जिम्मेदार थे, उसकी वजह से इस्लाम और मुस्लिम दुश्मनी हमारे घर की पहचान थी और यह मुस्लिम दुश्मनी जैसे घुट्टी में पडी थी। 1986 में बाबरी मस्जिद का ताला खुलवाने से लेकर बाबरी मस्जिद की शहादत के घिनावने जुर्म तक में इस पूरी तहरीक में आखरी दरजे के जुनून के साथ शरीक रहा, मेरी शादी एक बहुत भले और सेक्यूलर खानदान में हुई, मेरी बीवी का मिजाज़ भी इसी तरह का था और मुसलमानों से उनके घरवालों के बिल्कुल घरेलू ताल्लुकात थे। मेरी बारात गयी, तो सारे खाने और शादी का इन्तजशम हमारे ससुर के एक दोस्त खाँ साहब ने किया था और दसयों दाढ़ियों वाले वहाँ इन्तज़ाम में थे जो हम लोगों को बहुत बुरा लगा था और मैं ने एक बार तो खाना खाने से इन्कार कर दिया था कि खाने में इन मुसलमानों का हाथ लगा है, हम नहीं खायेंगे मगर बाद में मेरे पिताजी के एक दोस्त पण्डित जी उन्होंने समझाया कि हिन्दू धर्म में कहाँ आया है कि मुसलमानों के हाथ लगा खाना नहीं खाना चाहिये। बडी कराहियत के साथ बात न बढाने के लिये मैं ने खाना खा लिया। 1952 में मेरी शादी हुयी थी, नौ साल तक हमारे कोई औलाद नहीं हुई, नो साल के बाद मालिक ने 1961 में एक बेटा दिया, उसका नाम मैं ने योगेश रखा, उसको मैं ने पढाया और अच्छे से स्कूल में दाखिल कराया और इस ख्याल से कि पार्टी और कोम के नाम इसको अर्पित (वक्फ) करूँगा, उसको समाज शास्त्र में पी. एच. डी कराया। शुरू से आखिर तक वह टापर रहा मगर उसका मिजाज़ अपनी माँ के असर में रहा और हमेशा हिन्दूओं के मुकाबले मुसलमानों की तरफ माइल रहता। फिर्केवाराना मिजाज़ से उसको अलर्जी थी, मुझ से बहुत अदब करने के बावजूद इस सिलसिले में बहस कर लेता था। दो बार वह एक-एक हफ्ते के लिये मेरे राम मन्दिर तहरीक में जुडने और उस पर खर्च करने से नाराज़ हो कर घर छोड कर चला गया, उसकी माँ ने फोन पर रो-रो कर उसको बुलाया।

अहमदः अपने कबुले इस्लाम के बारे में जरा तफसील से बताईये?

सेठ उमरः मुसलमानों को मैं इस मुल्क पर आक्रमण (हमला) करने वाला मानता था। या फिर मुझे राम-जन्म भूमि मन्दिर को गिरा कर मस्जिद बनाने की वजह से बहुत चिढ़ थी और मैं हर कीमत पर यहाँ राम मन्दिर बनाना चाहता था, इसके लिये मैं ने तन, मन, धन सब कुछ लगाया। 1987 से लेकर 2005 तक राम मन्दिर आन्दोलन और बाबरी मस्जिद गिराने वाले कारसेवकों पर विश्व हिन्दू परिषद को चन्दे में कुल मिला कर 25 लाख रूपये अपनी ज़ाती कमायी से खर्च किये। मेरी बीवी और योगेश इस पर नाराज़ भी हुये। योगेश कहता था इस देश पर तीन तरह के लोग आकर बाहर से राज करते आये, एक तो आर्यन आये उन्होंने इस देश में आकर जुल्म किया, यहाँ के शुद्रों को दास बनाया और अपनी साख बनायी, देश के लिये कोई काम नहीं किया, आखरी दरजे में अत्याचार (जुल्म) किये, कितने लोगों को मौत के घाट उतारा, तीसरे अंग्रेज आये उन्होंने भी यहाँ के लोगों को गुलाम बनाया, यहाँ का सोना, चाँदी, हीरे इंगलैण्ड ले गये, हद दरजे अत्याचार किये, कितने लोगों को मारा कत्ल किया, कितने लागों का फाँसी लगायी।

दूसरे नम्बर पर मुसलमान आये, उन्होंने इस देश को अपना देश समझ कर यहाँ लाल किले बनाये, ताज महल जैसा देश के गौरव का पात्र (काबिले फखर इमारत) बनायी, यहाँ के लोगों को कपडा पहनना सिखाया, बोलना सिखाया, यहाँ पर सडकें बनवायीं, सराएँ बनवायीं, खसरा खतोनी डाक का निजाम और आब-पाशी का निजाम बनाया, नहरे निकालीं और देश में छोटी-छोटी रियास्तों को एक करके एक बडा भारत बनाया। एक हजार साल अल्प-संख्या (अकल्लियत) में रह कर अक्सरियत पर हुकूमत की और उनको मजहब की आज़ादी दी, वह मुझे तारीख के हवालों से मुसलमान बादशाहों के इन्साफ के किस्से दिखाता, मगर मेरी घूट्टी में इस्लाम दुश्मनी थी वह न बदली।

30 दिसम्बर 1990 में भी मैं ने बढ-चढ कर हिस्सा लिया और 6 दिसम्बर 1992 में तो मैं खुद अयोध्या गया, मेरे जिम्मे एक पूरी टीम की कमान थी, बाबरी मस्जिद शहीद हुयी तो मैं ने घर आकर एक बडी दावत की, मेरा बेटा योगेश घर से नाराज़ होकर चला गया, मैं ने खूब धूम-धाम से जीत की तकरीब मनायी। राम मन्दिर के बनाने के लिये दिल खोल कर खर्च किया, मगर अन्दर से एक अजीब सा डर मेरे दिल में बैठ गया और बार-बार ऐसा ख्याल होता था कोई आसमानी आफत मुझ पर आने वाली है। 6 दिसम्बर 1993 आया तो सुबह मेरी दुकान और गोदाम मैं जो फासले पर थे बिलजी का तार शार्ट होने से दोनों में आग लग गयी और तकरीबन दस लाख रूपये से ज्यादा का माल जल गया। उसके बाद से तो और भी ज्यादा दिल सहम गया। हर 6 दिसम्बर को हमारा पूरा परिवार सहमा सा रहता था और कुछ न कुछ हो भी जाता था। 6 दिसम्बर 2005 को योगेश एक काम के लिये लखनऊ जा रहा था उसकी गाडी एक ट्रक से टकरायी और मेरा बेटा और ड्राईवर मौके पर इन्तकाल कर गये। उस का 9 साल का नन्हा सा बच्चा और 6 साल की एक बेटी है। यह हादसा मेरे लिये नाकाबिले बरदाश्त था और मेरा दिमागी तवाजुन खराब हो गया। कारोबार छोड कर दर-बदर मारा-मारा फिरा। बीवी मुझे बहुत से मौलाना लोगों को दिखाने ले गयी, हरदोई में बडे हजत साहब के मदरसे में ले गयी, वहाँ पर बिहार के एक कारी साहब हैं, तो कुछ होश तो ठीक हुये, मगर मेरे दिल में यह बात बैठ गयी कि मैं गलत रास्ते पर हूँ, मुझे इस्लाम को पढना चाहिये इस्लाम पढना शुरू किया।

अहमदः इस्लाम के लिये आपने क्या पढा?

सेठ उमरः मैं ने सब से पहले हजत मुहम्मद सल्ल. की एक छोटी सीरत पढ़ी, उसके बाद ‘इस्लाम क्या है?’ पढी। ‘इस्लाम एक परिचय’ मौलाना अली मियाँ की पढी। 5 दिसम्बर 2006 को मुझे हजत साहब की छोटी सी किताब ‘आप की अमानत -आपकी सेवा में’ एक लडके ने लाकर दी। 6 दिसंबर अगले रोज थी, मैं डर रहा था कि अब कल को किया हादसा होगा, उस किताब ने मेरे दिल में यह बात डाली कि मुसलमान होकर इस खतरे से जान बच सकती है और में 5 दिसंबर की शाम को पाँच छ लोगों के पास गया मुझे मुसलमान कर लो, मगर लोग डरते रहे, कोई आदमी मुझे मुसलमान करने का तैयार न हुआ।

अहमदः आप 6 दिसम्बर 2006 को मुसलमान हो गये थे, आप तो अभी फरमा रहे थे कि चन्द महीने पहले 22 जनवरी 2009 को आप मुसलमान हुये।

मुहम्मद उमरः मैं ने 5 दिसम्बर 2006 को मुसलमान होने का पक्का इरादा कर लिया था, मगर 22 जनवरी को इस साल तक मुझे कोई मुसलमान करने को तैयार नहीं था, हजरत साहब को एक लडके ने जो हमारे यहाँ से जाकर फुलत मुसलमान हुआ था बताया कि एक लाला जी जो बाबरी मस्जिद की शहादत में बहुत खर्च करते थे मुसलमान होना चाहते हैं, तो हजरत ने एक मास्टर साहब को (जो खुद बाबरी मस्जिद की शहादत में सब से पहले कुदाल चलाने वाले थे) भेजा, वह पता ठीक न मालूम होने की वजह से तीन दिन तक धक्के खाते रहे, तीन दिन के बाद 22 जनवरी को वह मुझे मिले और उन्होंने मुझे कलमा पढवाया और हजरत साहब का सलाम भी पहुँचाया, सुबह से शाम तक वह हजरत साहब से फोन पर बात कराने की कोशिश करते रहे मगर हजरत महाराष्ट्र के सफर पर थे, शाम को किसी साथी के फोन पर बडी मुश्किल से बात हुयी। मास्टर साहब ने बताया कि सेठ जी से मुलाकात हो गयी है और अल्हम्दु लिल्लाह उन्होंने कलमा पढ लिया है, आप से बात करना चाहते हैं और आप इन्हें दोबारा कल्मा पढवा दें, हजरत साहब ने मुझे दोबारा कल्मा पढवा दिया और हिन्दी में भी अहद(वचन, वादा) करवाया।

मैं ने जब हजत साहब से अर्ज किया कि हजत साहब! मुझ जालिम ने अपने प्यारे मालिक के घर को ढाने और उसकी जगह शिर्क(अनेकश्वरवाद) का घर बनाने में अपनी कमायी से 25 लाख रूपये खर्च किये हैं, अब मैं ने इस गुनाह की माफी के लिये इरादा किया है कि 25 लाख रूपये से एक मस्जिद और मदरसा बनवाऊँगा आप अल्लाह से दुआ किजिये कि जब उस करीम मालिक ने अपने घर को गिराने और शहीद करने को मेरे लिये हिदायत का जरिया बना दिया है तो मालिक मेरा नाम भी अपना घर ढाने वालों की फहरिस्त से निकाल कर अपना घर बनाने वालों में लिख लें और मेरा कोई इस्लामी नाम भी आप रख दिजिये, हजरत साहब ने फोन पर बहुत मुबारक बाद दी और दुआ भी की और मेरा नाम मुहम्मद उमर रखा, मेरे मालिक का मुझ पर कैसा अहसान हुआ, मौलवी साहब अगर मेरा रवाँ-रवाँ, मेरी जान, मेरा माल सब कुछ मालिक के नाम पर कुरबान हो जाये तो भी इस मालिक का शुक्र कैसे अदा हो सकता है कि मेरे मालिक ने मेरे इतने बडे जुल्म और पाप को हिदायत का जरिया बना दिया।

अहमदः आगे इस्लाम को पढने वगैरा के लिये आपने क्या किया?

सेठ उमरः मैंने अल्हम्दु लिल्लाह घर पर टयूशन लगाया है, एक बडे नेक मौलाना साहब मुझे मिल गये हैं वह मुझे कुरआन भी पढा रहे हैं समझा भी रहे हैं।

अहमदः आप की बीवी और पोते-पोती का कया हुआ?

सेठ उमरः मेरे मालिक का करम है कि मेरी बीवी, योगेश की बीवी और दोनों बच्चे मुसलमान हो गये हैं और हम सभी साथ में पढते हैं।

अहमदः आप यहाँ दिल्ली किसी काम से आये थे?

सेठ उमरः नहीं सिर्फ मौलाना ने बुलाया था, एक साहब मुझे लेने के लिये गये थे, हजरत साहब से मिलने का बहुत शौक था, बारहा(अकसर) फोन करता था मगर मालूम होता था कि सफर पर हैं, अल्लाह ने मुलाकात करा दी, बहुत ही तसल्ली हुयी।

अहमदः अबी (मौलाना कलीम सिद्दीकी साहब) से और क्या बातें हुयीं?

सेठ उमरः हजरत साहब ने मुझे तवज्जेह दिलायी कि आपकी तरह कितने हमारे खूनी रिश्ते के भाई बाबरी मस्जिद की शहादत में गलतफहमी में शरीक रहे, आपको चाहिये कि उन पर काम करें। उन तक सच्चाई को पहुँचाने का इरादा तो करें, मैं ने अपने ज न से एक फहरिस्त बनायी है, अब मेरी सहत इस लायक नहीं कि मैं कोई भाग दौड करूँ मगर जितना दम है वह तो अल्लाह का और उसके रसूल सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम का कलमा उसके बन्दों तक पहुँचाने में लगना चाहिये।

अहमदः मुसलमानों के लिये कोई पैगाम आप देगें?

सेठ मुहम्मद उमरः मेरे योगेश का ग़म मुझे हर लम्हे सताता है, मरना तो हर एक को है, मौलवी साहब! मौत तो वक्त पर आती है और बहाना भी पहले से तै है मगर ईमान के बगैर मेरा ऐसा प्यारा बच्चा जो मुझ जैसे जालिम और इस्लाम दुश्मन बल्कि खुदा दुश्मन के घर पैदा होकर सिर्फ मुसलमानों का दम भरता हो वह इस्लाम के बगैर मर गया, इसमें मुसलमानों के हक अदा न करने का अहसास मेरे दिल का ऐसा ज़ख्‍म है जो मुझे खाये जा जा रहा है, ऐसे न जाने कितने जवान, बूढे, मौत की तरफ जा रहे हैं उनकी खबर लें।

अहमदः बहुत-बहुत शुक्रिया सेठ उमर साहब! अल्लाह तआला आपको बहुत-बहुत मुबारक फरमाये, योगेश के सिलसिले में तो अबी ऐसे लोगों के बारे में कहते हैं कि फितरते इस्लामी पर रहने वाले लोगों को मरते वक्त फरिश्ते कलमा पढ़वा देते हैं, ऐसे वाकिआत ज़ाहिर भी हुये हैं, आप अल्लाह की रहमत से यही उम्मीद रखें, योगेश मुसलमान होकर ही मरे हैं।

मुहम्मद उमरः अल्लाह तआला आपकी जबान मुबारक करे, मौलवी अहमद साहब! अल्लाह करे ऐसा ही हो, मेरा फूल सा बच्चा मुझे जन्नत में मिल जाये।

अहमदः आमीन, सुम्मा आमीन, इन्शा अल्लाह जरूर मिलेगा, अस्सलामु अलैकुम

सेठ मुहम्मद उमरः व अलैकुमुस्सलाम

(साभारः मासिक ‘अरमुगान’ फुलत, जून 2009)

गायत्री परिवार के प्रोगराम में पण्डित जी के साथ मौलाना कलीम साहब और मौलाना तारिक अब्‍दुल्‍लाह साहब

मुहम्मद इसहाक (पूर्व बजरंग दल कार्यकर्त्ता अशोक कुमार) से एक दिलचस्प मुलाकात Interview 2


....हम तीनों ने बजरंग दल में अपना नाम लिखवाया। आडवाणी जी की रथयात्रा में हम लोग ग्वालियर जाकर शामिल हुए और चार रोज साथ चले। हमारे घरवाले सभी इस फैसले से खुश हुए। एक रोज योगेश के पिताजी ने जो स्कूल में टीचर भी थे। हम तीनों को अपने घर बुलाया, मेरे और योगेन्द्र के पिताजी को भी बुलाया और बोले ‘‘हम तुम तीनों भाईयों को राम नाम पर छोडते हैं। अगर राम मन्दिर के नाम पर तुम्हारी बली भी चढ जाए तो पीछे न हटना, दुनिया में तुम अमर हो जाओगे। उन्होंने हमारे तीनों के सरों पर अंगोछा बाँधा। हम लोगों का बडा हौसला बढा और भी जोश पैदा हुआ। 30 अक्तूबर को हम लोग कारसेवा में पहुँचे मगर.... - मुहम्मद इसहाक (अशोक कुमार)

अहमदः अस्सलामु अलैकुम व रहमतुल्लाहि व बरकातुह
इसहाक(अशोक): व अलैकुमुस्सलाम व रहमतुल्लाहि व बरकातुह

अहमदः इस्हाक भाई। आप से तो 7 दिसम्बर की रात के बाद मुलाकात ही न हो पायी, कल अबी (मौलाना कलीम सिददीकी साहब) ने बताया कि आपका फोन आया था, आप दिल्ली आ रहे हैं तो खुशी हुई रात ही अबी ने फरमा दिया था कि आईन्दा माह के लिए आपसे इन्टरव्यू लूं।
इसहाकः हाँ अहमद भाई मौलाना साहब ने मुझ से भी आज सुबह ही बताया कि अरमुगान में इस महीने तुम्हारा इन्टरव्यू छपना है। मैं ने कहा मुझे शर्म आती है मगर उन्होंने हुक्म दिया कि तुम्हारा हाल सुनकर लोगों में दावत (धर्म निमन्त्राण) का जज़्बा पैदा होगा और दावत का काम करने वालों में खौफ कम होगा। तुम्हें भी सवाब (फल) मिलेगा। मैं ने कहा फिर तो अच्छा है।

अहमदः इसहाक भाई, अपना खानदानी तआरुफ कराएँ।
इसहाकः अहमद भाई। मैं यु. पी. के मशहूर जिला रामपुर में टान्डा बादली कस्बे के करीब एक गाँव के सैनी खानदान में 7 दिसंबर 1968 में पैदा हुआ। घर वालों ने मेरा नाम अशोक कुमार रखा। पिताजी श्री पुरण सिंह जी एक कम पढे लिखे किसान थे। मैं ने आठवी क्लास तक अपने गांव के जूनियर हाई स्कूल में पढा। हाईस्कूल और इन्टर मैं ने रामपुर में किया, बाद में लखनऊ में सिविल इन्जिनियरिंग में डिप्लोमा किया। एक प्राईवेट कन्स्ट्रक्शन कम्पनी में नौकरी लग गयी थी। बचपन में गुस्सा बहुत था। कई बार स्कूल में टीचर से भी लडाई हुई। कम्पनी में रोज-रोज कुछ न कुछ होता रहता था, नौकरी छोड आया। मेरे दो दोस्त पहली क्लास से इन्टर तक साथ पढे थे। एक का नाम योगेश कुमार और दूसरे का योगेन्द्र सिंह था। दोनों हमारी बिरादरी के थे। एक रिश्ते में भाई होते थे। तीनों साथ पढते और वर्जिश भी साथ करते थे। कुछ रोज पहलवानी भी की। राम-जन्मभूमि-बाबरी मस्जिद का झगडा हुआ तो हम तीनों ने बजरंग दल में अपना नाम लिखवाया। आडवाणी जी की रथयात्रा में हम लोग ग्वालियर जाकर शामिल हुए और चार रोज साथ चले। हमारे घरवाले सभी इस फैसले से खुश हुए। एक रोज योगेश के पिताजी ने जो स्कूल में टीचर भी थे। हम तीनों को अपने घर बुलाया, मेरे और योगेन्द्र के पिताजी को भी बुलाया और बोले ‘‘हम तुम तीनों भाईयों को राम नाम पर छोडते हैं। अगर राम मन्दिर के नाम पर तुम्हारी बली भी चढ जाए तो पीछे न हटना, दुनिया में तुम अमर हो जाओगे। उन्होंने हमारे तीनों के सरों पर अंगोछा बाँधा। हम लोगों का बडा हौसला बढा और भी जोश पैदा हुआ। 30 अक्तूबर को हम लोग कारसेवा में पहुँचे मगर हम अभी जगह पर पहुँच नहीं पाये थे कि मुलायम सरकार में गोली चल गयी और हमें पुलिस ने गिरफ्तार कर लिया और ट्रेन में सवार करके रामपुर लाके छोडा। हमारे गुस्से की हद न रही। मैं ने रास्ते में कई सिपाहियों की पिटाई भी की मगर उन्होंने हमें यह कहकर ठण्डा किया कि मुलायम सरकार तो गिरेगी, हमारी सरकार आयेगी तो उस वक्त तुम अपने अरमान पूरे कर लेना। नवम्बर 1992 में हम लोग बाबरी मस्जिद शहीद करने के शौक में अयोध्या पहुँच गये। सर्दी के कपडे भी पूरे साथ नहीं थे। अलग-अलग आश्रमों में रहते-रहते हमें वहाँ रहकर बडी हैरत हुई कि अक्सर साधुओं ने हमें बाबरी मस्जिद शहीद करने में शामिल होने से मना किया और उन्होंने हमें इस तरह डराया जैसे हम कोई पाप कर रहे हैं। एक साधू ने तो यह कहा ‘‘मैं सच कहता हूँ अगर रामचन्द्र जी जिवित(जिन्दा) होते, तो भी हरगिज यह पाप यानी बाबरी मस्जिद गिराने का काम न करने देते। हमें उन समझाने वालों पर बहुत गुस्सा आता। 6 दिसम्बर 1992 को भीड मस्जिद के पास जमा हो गयी, हमारे संचालक ने हमें बताया था कि जैसे ही हम इशारा करेंगे, धावा बोल देना। अभी उमा भारती ने नारा लगाया था कि हम पिल पडे। योगेश तो भीड में गिरगया। लोग उस पर चलते रहे किसी ने देखकर उसका हाथ पकडा। वह उठा, महीनों बीमार रहा, उसकी पसलियाँ टूट गयी थीं। खुशी-खुशी हम एक ईंट लेकर घर आये। रास्ते में लोग हमारा स्वागत (इस्तकबाल) करते थे। घरवालों ने हमारे स्वागत में एक प्रोग्राम किया और हम को फूलों से तौला गया, कई साल तक लोग हम को शाबाशी देते रहे।

अहमदः अपने कुबूले इस्लाम के बारे में कुछ बताईये।
इस्हाकः बाबरी मस्जिद को शहीद करके अहमद भैया यूँ तो हमने अपने अरमान पूरे कर लिये, मगर न जाने सिर्फ मुझ अकेले को ही नहीं हम तीनों का हाल यह था कि हम अपने दिल में अन्जाने खतरे से डरे-डरे से रहते थे और हर एक को यह लगता था कि शायद अब कोई खतरा आ जाये, कभी-कभी तो ऐसा लगता था कि आसमान से कोई आग की चटटान हमें दबाने वाली है। बाबरी मस्जिद की शहादत की हर बर्सी पर यानी 6 दिसम्बर को हमारे लिए दिन रात काटना मुश्किल होता था। ऐसा लगता था कि आज तो जरूर कोई आफत आयेगी। पिछले 6 दिसम्बर को यह खतरा पिछले सालों से ज्यादा ही था। हम लोग डर की वजह से 6 दिसम्बर को कभी घर से नहीं निकलते थे और जब 6 तारीख गुजर जाती तो हम लोग बहुत सुकून महसूस करते। 7 दिसम्बर 2006 की सुबह को हम तीनों घर से निकले, मुझे रामपुर में एक जरूरी काम था मेरे साथी भी साथ हो लिए। रामपुर बस अड्डे पर हमारा एक कॉलिज का साथी रईस अहमद मिला। उस ने हमें देखा तो करीब आया। मजाक के अन्दाज में बोला ‘अशोक अब तुम लोगों की बारी है, तैयार हो जाओ’ मैं ने कहा किस चीज की बारी है?’ उसने कहा ‘पहले पागल होने की और फिर मुसलमान होने की।’ मैंने कहा ‘चोंच बंद कर। उसने कहा ‘अखबार पढा है कि नहीं? मैं ने कहा ‘अखबार में क्या है?’ उस ने अपने बैग से एक उर्दू ‘सहारा’ अखबार निकाला और मुहम्मद आमिर और उमर के इस्लाम कुबूल करने की खबर पूरी सुना दी। हम लोगों को गुस्सा भी आया और डर भी लगा, मैं ने कहा ‘उर्दू अखबार है झूठी खबर होगी। उसने हिन्दी के दो अखबार निकाले और मुझे दिखाए। छोटी-छोटी दोनों में खबरें दिखाईं। मैंने दोबारा उर्दू की खबर जो तफसील से थी, पढने को कहा। मेरे दूसरे साथियों को भी गुस्सा आया और मशवरा किया कि फुलत जाकर मालूम करना चाहिये। बात को साफ करना चाहिये वरना कितने ही लोगों के धर्म भ्रष्ट हो जायेंगे। रामपुर से हम लोग मेरठ की बस में बैठे और फिर खतौली पहुँचे और एक जुगाड में बैठ कर फुलत पहुँचे। मौलाना साहब नमाज के लिये गये थे। नमाज पढकर आये तो एक साहब ने बताया कि यह मौलाना कलीम साहब हैं। हम लोग कुछ तो गुस्से में थे और कुछ ज्यादा सख्त लहजे में मैं ने मौलाना साहब को अखबार दिखाकर कहा ‘यह खबर आपने छपवायी है, यह खबर आपने किस तरह छपवाई है?’ हम तीनों बिल्कुल जट अन्दाज में बडे सख्त लहजे में बात कर रहे थे। मगर मौलाना साहब न जाने किस दुनिया के आदमी थे। बहुत ही प्यार से बोले, मेरे भाई, आप अपने खूनी रिश्ते के भाई के यहाँ आये हैं। आप हमारे हम आपके। यह तड-बड तो शहर के लोगों में होती है। आप कहाँ से तशरीफ लाये हैं, पहले यह बताइये’। मैं ने कहा ‘हम रामपुर टान्डा बादली के पास से आये हैं। मौलाना साहब बोले, मेरे भाइयो। इतनी सर्दी में आपने इतना लंबा सफर किया। कितने थक रहे होंगे। यह आपका घर है, आप किसी गैर के यहाँ नहीं हैं। आप जो मालूम करेंगे हम बतायेंगे। पहले आप बैठिये, चाय, पानी, नाश्ता कीजिये, खाना खाइये। खबर हम लोगों ने नहीं छपवायी है, मगर है खबर सच्ची’ हम लोग कुछ ठण्डे हो गए थे फिर से गर्मी सी आ गई। मैं ने कहा ‘आप कैसे कह रहे हैं सच्चे लोगों का धर्म भ्रष्ट करना चाहते हैं। मौलाना साहब ने फिर प्यार से कहा ‘चलो अगर सच मानोगे तो मान लेना, वरना हमें उस की भी कोई जिद नहीं।’ आमिर और उमर में से मुहम्मद उमर इत्तफाक से एक नव-मुस्लिमों की जमाअत लेकर फुलत आए हुए थे जिस में सभी नव मुस्लिम थे। अमीर(जमात का अध्यक्ष, रहबरी करने वाला) न मिलने की वजह से मौलाना साहब ने उनको फुलत बुलाया था, जिन में तीन हरियाणा के थे और दो गुजरात के और चार यु. पी के, दो उन में मन्दिर के साधु भी थे। मौलाना साहब ने एक हाफिज साहब को बुलाया और उनसे कहा ‘उमर मियाँ को बुलाओ, थोडी देर में मुहम्मद उमर आ गए। मौलाना साहब ने हम से कहा ‘दो जिन की खबर छपी है उन में एक मुहम्मद उमर यह है। आप इन से मिल लें और मालूम कर लें खबर क्या है और कितनी सच्ची है?’ उमर भाई के साथ हम बराबर वाले छोटे कमरे में बैठ गये। मौलाना साहब ने उनको आवाज दी और कुछ समझाया। बाद में भाई उमर ने मुझे बताया कि मौलाना साहब ने मुझे बहुत ताकीद की कि ये कितना भी गुस्सा हों तुम सब्र करना और बहुत प्यार, नर्मी से मरीज समझकर बात करना और दिल ही दिल में अल्लाह से दुआ करना, मैं भी घर जाकर दो रकअत पढकर अल्लाह से हिदायत की दुआ करता हूँँ थोडी देर में नाश्ता आ गया। हम सभी को सर्दी लग रही थी। उमर भाई ने जिद करके दो प्याली चाय पिलाई और खूब खातिर की और हमें समझाते रहे और बताया कि पानीपत से सोनीपत तक आडवाणी जी की रथयात्राा में हम दोनों सब से ज्यादा पेश-पेश थे। 30 अक्तूबर को हम दोनों के ऊपर से गुम्बद पर गोली लगी थी। थोडी देर मेंे खाना भी आ गया। अब हम तीनों को लगा कि हमें जो खौफ था वह सच था और 6 दिसम्बर को हमारी यह हालत क्यों होती थी। मैंने उमर से कहा, अब हमें क्या करना चाहिये? उन्होंने बताया कि दुनिया का अजाब तो कुछ नहीं, मरने के बाद बडे दिन के अजाब से बचने के लिए आपको मेरी राय माननी चाहिये और कलमा पढकर मुसलमान हो जाना चाहिए। हम तीनों बाहर मश्वरे के लिए आने लगे, तो उमर भाई ने कहा ‘मैं एक काम के लिये बाहर जाता हूँँ आप अन्दर बैठे रहें। हम तीनों ने मशवरा किया और सब ने तै किया कि हम को मुसलमान हो जाना चाहिये। फिर उमर भाई को आवाज दी और अपना फैसला बताया। उमर भाई ने कहा ‘वह दो रकअत नमाज पढकर सच्चे मालिक से आप के लिये दुआ करने गये थे और मौलाना साहब भी आप के लिये दुआ ही करने अन्दर गये हैं। खुशी-खुशी उमर ने घर में मौलाना साहब को आवाज दी और दरख्वास्त की कि उन तीनों भाईयों को कलमा पढवा दें। मौलाना साहब ने हमें कलमा पढवाया। अहमद भाई वो हाल मैं बता नहीं सकता कि हम तीनों पर क्या गुजरी, जैसे-जैसे मौलाना साहब ने हमें कलमा पढवाया और तौबा करायी, ऐसा लग रहा था जैसे काँटों का एक लिबास जिस से जिस्म बंधा था, हमारे जिस्म से उतर गया। अन्दर से खौफ एकदम काफूर हो गया। जैसे हम न जाने किस खतरे से निकल कर एक महफूज किले में आ गए हों। मौलाना साहब ने मेरा नाम मुहम्मद इसहाक रखा, योगेश का मुहम्मद याकूब रखा और योगेन्द्र का मुहम्मद युसुफ और हजरत युसुफ, हजरत इसहाक और हजरत याकूब का किस्सा भी सुनाया और हमें बताया कि कल से फोन आ रहे थे कि यह खबर छप गयी है, खुदा खैर करे कोई फसाद न हो जा। मैं दोस्तों से कह रहा था आप डरिये नहीं हमने खबर नहीं छपवायी। अल्लाह ने छपवायी है इन्शाअल्लाह उस में जरूर खैर होगी। अल्लाह ने इतनी बडी खैर जाहिर कर दी। मौलाना साहब ने खडे होकर गले लगाया, मुबारकबाद दी और तीनों को किताब ‘आपकी अमानत, आपकी सेवा’ में दी।

अहमदः उस के बाद क्या हुआ?
इस्हाकः सुबह को नव-मुस्लिमों की जमाअत के साथ हम तीनों को शामिल कर दिया गया। एक मुफ्ती साहब बुलंदशहर के साल लगा रहे थे। उनको हमारा अमीर बनाया गया और दो लोगों को सिखाने के लिये शामिल किया गया। 15 लोगों की जमाअत एक रोज मेरठ रही। हम तीनों ने मेरठ में सर्टीफिकेट बनवाये और फिर जमाअत का रूख आगरा की तरफ बना। आगरा और मथुरा जिले में 40 दिन पूरे किये। जमाअत में वक्त ठीक लगा। नये-नये लोग थे एक दो बार लडाई भी हुई। एक रोज हम तीनों लडकर वापस आने की सोची। रात को पक्का इरादा किया कि सुबह को चले जायेंगे। रात में युसुफ ने एक ख्वाब देखा। मौलाना साहब फरमा रहे हैं, आपको अल्लाह ने किस तरह हिदायत दी, फिर भी आप अल्लाह के रास्ते से भाग रहे हैं। उस ने बाद में हम दोनों को बताया हम लोगों ने तय कर लिया कि जान भी चली जायेगी तो चिल्ला पूरा करके ही मौलाना साहब को मुँह दिखायेंगे। अल्हम्दुलिल्लाह हमारा चिल्ला पूरा हो गया।

अहमदः जमाअत से वापस आने के बाद क्या हुआ?
इसहाकः मौलाना साहब ने मुझ से मालूम किया कि अब आप का इरादा क्या है? और मशवरा दिया कि घर पर फौरन जाना ठीक नहीं है। मगर हम ने मौलाना साहब से कहा कि हम बच्चे नहीं हैं, मजहब हमारा जाती मामला है और हमारा हक है कि हक को मानें। हम घर जाकर घरवालों पर काम करेंगे और हमें किसी तरह का कोई खतरा नहीं है। मौलाना साहब के समझाने के बावजूद हम लोग अपने गाँव पहुँचे। पूरे इलाके में माहौल खराब था। खबर मशहूर थी कि मुसलमानों ने उन तीनों को कत्ल कर दिया है। हम लोगों ने घरवालों को जाकर साफ-साफ बता दियां फिर क्या था पूरी बिरादरी में मातम मच गया। बार-बार पंचायत हुई, दूर-दूर के रिश्तेदार आ गये। एक बार अखबार वाले भी आ गये। गाँव वालों ने उन को पैसे दे दिलाकर वापस किया और राजी किया कि खबर अखबार में हरगिज न दी जाये वरना और भी लोगों को खतरा है। हमारे घरवालों पर बिरादरी वालों ने दबाव दिया कि अपने लडकों को किसी तरह बाज रखें। मगर अल्लाह का शुक्र है कि अल्लाह ने हमें मुखालिफत से और पक्का कर दिया। हमारे साथ बहुत सख्तियाँ भी होने लगीं। हमारी बीवी बच्चों को घर भेज दिया गया। मजबूरन हमें घर छोडना पडा। हमें फुलत जाते हुये शर्म आयी कि मौलाना साहब की बात नहीं मानी। हम लोग पहले दिल्ली गये और फिर एक साहब हमें पटना ले गये। पटना में हम ने बडी मुश्किल उठाई। कुछ दिन रिक्शा भी चलाई। जरूरत के लिये मजदूरी भी की। बाद में मुझे एक साहब अपनी कम्पनी में कलकत्ता ले गये और फिर मेरे दोनों साथी भी कलकत्ता आ गये। अलहम्दु लिल्लाह हमारी मुश्किल का जमाना ज्यादा लम्बा नहीं हुआ और अब हम सेट हैं। इस दौरान हम तीनों को बारी-बारी हुजूर सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम की जियारत भी हुई। जिस से हमें बडी तसल्ली हुई। मौलाना साहब की याद हम लोगों को बहुत आ रही थी। मगर मौका नहीं मिल सका। अल्लाह का करम हैं, आज मुलाकात हो गयी। मौलाना साहब से मिलने के बाद नौ दस महीने की सारी तकलीफें जैसे हुई ही नहीं थीं।

अहमदः अपने घरवालों से कोई राब्ता आपने किया कि नहीं?
इसहाकः हम लोगों ने फोन पर बात की है माँ और भाई बहनों से बात हो जाती है। पिताजी से बात तो नहीं हो पाती, इन्शाअल्लाह वक्त के साथ-साथ सब कुछ ठीक हो जायेगा। अलबत्ता मेरी बीवी और दोनों बच्चे अभी मेरी ससुराल मेंे हैं। वे बात नहीं करते हैं। मैं ने एक दोस्त को किसी तरह भेजा था। उसने हमारी ससुराल की एक मुसलमान औरत को उनके घर भेजा था। मेरी बीवी ने कहा जहाँ कहो जाने को तैयार हूँ। मेरी भाभियों से बिलकुल नहीं बनती और मैं खुद एक पति की रहकर मरना चाहती हूँ। आज मौलाना साहब से मशवरा हो गया है, मैं अब किसी तरह उनको लेकर ही जाऊँगा।

अहमदः दअवत के सिलसिले में आप से अबी (मौलाना कलीम सिददीकी साहब) ने कोई बात नहीं की, इस सिलसिले में कुछ बताइये?
इसहाकः मौलाना साहब ने हम से अहद लिया है कि बाबरी मस्जिद शहीद करने वालों की फिक्र करनी है और कारसेवकों पर काम करना है और उन के लिए और घरवालों के लिये दुआ करनी है, मौलाना साहब से मशवरा हुआ है, मैं बहुत जल्दी कलकत्ते से जमाअत में वक्त लगाऊँगा और अल्लाह के रास्ते में निकलकर अपने अल्लाह से मन्जूर करवाने के लिये दुआ करूँगा और फिर आकर घरवालों पर और कारसेवकों पर काम करूँगा।

अहमदः अरमुगान के कारिईन के लिये कुछ पैगाम दिजिये।
इसहाकः इस्लाम हर इन्सान की जरूरत है, किसी आदमी को इस्लाम दुश्मनी में सख्त देखकर यह न सोचना चाहिये कि उसके मुसलमान होने की उम्मीद नहीं। सारे इस्लाम दुश्मन, गलतफहमी या न जानने की वजह से इस्लाम दुश्मन हैं। हमारे हाल से ज्यादा इसका और क्या सबूत हो सकता है। इस्लाम कुबूल करने से पहले हम बजरंग दली थे और इस्लाम और मुसलमान हमारे सब से बडे दुश्मन थे और अब हम ही हैं। यह तसव्वुर कि खुदा न ख्वास्ता हम हिन्दू मर जाते (धुड-धुडी देकर रोते हुये) तो हमारी हलाकत का क्या हाल होता? और किस तरह अल्लाह की नाराजगी और दोजख का हमेशा हमेशा का अजाब बर्दाश्त करते?

अहमद अव्वाहः शुक्रिया इसहाक भाई। आप तीनों का शुक्रिया। आप दोनों से भी किसी वक्त दोबारा बात होगी। अस्सलामु अलैकुम व रहमतुल्लाह व बरकातुह।
इसहाक(अशोक): व अलैकुमुस्सलाम व रहमतुल्लाही व बरकातुह।

(साभारः मासिक ‘अरमुगान’ फुलत दिसम्बर 2007)