Wednesday, May 8, 2019

indian top class businessman family नव मुस्लिम असअद उमर interview


अहमद अव्वाह : अस्सलामु अलैकुम  armughan.net  
नव मुस्लिम असअद उमर :वाअलैकुम अस्सलाम

अहमद अव्वाह : असअद उमर साहिब अबी ( वालिद कलीम साहिब ) ने बताया कि आप दिल्ली आए हुए हैं, इत्तिफ़ाक़ की बात है कि में भी एक दिन के लिए फुलत , ज़िला मुज़फ़्फ़र नगर से आया था, शायद आपसे भी अबी ने बताया होगा कि हमारे यहां फुलत ( मदरसा ) से एक दावती मैगज़ीन ” अरमूग़ान “ के नाम से निकलती है, इस के लिए आपसे कुछ बातें करना चाहता हूँ
असअद उमर  :जी हाँ, हज़रत ने मुझे बताया था, पहले तो मेरा ख़्याल थाकि मेरे मसाइल कुछ हल हो जाएं तो ही में कुछ बातें करूँ, मगर हज़रत ने फ़रमाया कि रमज़ान का महीना है और इस माह में हर नेकी का अज्र-ओ-सवाब सत्तर गुना हो जाता है, और मेरे रब ने मुझे हिदायत दी है, हज़रत ने कहा कि इंटरव्यू शाये करने का मक़सद लोगों में दीनी ख़ुसूसन दावती स्पिरिट पैदा करना होता है, तो इस महीना में मेरी बातें और कार-गुज़ारी पढ़ कर कुछ बंदों को नेकी ख़ुसूसन दावत( इस्लाम से वाक़िफ़ कराना )जो सबसे बड़े नेकी है, करने की तौफ़ीक़ होगी तो दूसरे महीनों के मुक़ाबले में सत्तर गुना अज्र-ओ-सवाब मिलेगा, फिर ये भी है कि मौत का एक लम्हा इतमीनान नहीं, ना मालूम आइन्दा मुझे ये बातें सुनाने की मोहलत भी मिलेगी या नहीं? आप शौक़ से जो चाहें मुझसे सवाल करें




अहमद अव्वाह : डाक्टर राहत आपके साथ मुंबई से आए हुए हैं आपका उनसे कितने दिनों से ताल्लुक़ है, और ये दोस्ती और ताल्लुक़ किस तरह हुआ, मुझे महसूस हो रहा है बिलकुल हक़ीक़ी भाईयों की तरह आप एक दूसरे से बातें करते रहे हैं
असअद उमर : डाक्टर साहिब से मेरा ताल्लुक़ तक़रीबन सात साल पुराना है।असल में डाक्टर साहिब एक सय्यद घराना से ताल्लुक़ रखते हैं, और शायद हज़रत ने बताया भी होगा कि सहारनपूर के रहने वाले हैं और शायद हज़रत से उनकी दूर की कई रिश्तेदारीयां हैं, डाक्टर साहिब ने सहारनपूर से एक मैडीकल डिप्लोमा कोर्स किया था उन को अपनी ख़ानदानी किताबों से बांझपन और अमराज़ पोशीदा ( गुप्त  रोग )के बहुत कामयाब नुस्खे़ हाथ लग गए हैं और वो इन दोनों बीमारीयों का ईलाज करते हैं, ईलाज के दौरान उन्होंने ये भी महसूस किया कि मियां बीवी के अज़दवाजी ताल्लुक़ात और बार-बार हमल के गिरने में जादू और जिन्नात का भी असर होता है, कि आदमी तंदरुस्त है और बीवी के पास पहुंचा तो गोया बिलकुल बीमार है, और किसी काम का नहीं, ऐसा हो जाता है, तो उस के लिए उन्होंने बहुत से आमिलों से अमलीयात सीखे, उनको ट्रेन में एक फ़क़ीर मिला और उसने उनको जादू और सह्र के ईलाज के लिए अमलीयात की इजाज़त दी और डाक्टर साहिब ने ईलाज शुरू कर दिया, हमारी शादी को भी ۱ ۵ /साल हो गए थे, हमारे यहां मालिक ने कोई ख़ुशी नहीं दी,और मेरे साथ कुछ जादू का भी मुआमला था, मुझे और मेरी बीवी को शक थाकि मेरी एक भाभी जो अपनी एक भतीजी से मेरी शादी कराना चाहती थी उसने हम पर जादू किया था, मेरे एक ब्योपारी दोस्त ने जिसका डाक्टर राहत साहिब ने ईलाज किया था, उनके हाँ अलहमदु लिल्लाह डाक्टर साहिब के ईलाज से तीन औलाद हुई थीं, मुझे डाक्टर साहिब से मिलने का मश्वरा दिया, डाक्टर साहिब को देखकर मेरा ज़रा दिल खटका कि चलो बीमारी का ईलाज तो ये कर सकते हैं मगर पैंट बू शर्ट बग़ैर दाढ़ी के अंग्रेज़ दिखने वाले ये साहिब झाड़ फूंक का ईलाज कैसे करेंगे, कोई सूफ़ी संत ही इस का ईलाज कर सकता है, मगर चूँकि मेरे दोस्त का ईलाज उन्होंने किया था और फ़ायदा हुआ था इस लिए मैंने उनसे ईलाज कराया, मालिक का करना हुआ कि अब से पाँच साल पहले मेरे यहां एक बेटी और दो साल बाद एक बेटा हुआ, और हमारी डाक्टर साहिब की दोस्ती हो गई, और में और मेरी बीवी ही नहीं मेरी ससुराल और घरवाले डाक्टर साहिब के एक तरह से ग़ुलाम हो गए, और हमारे घर में हर काम डाक्टर साहिब के मश्वरा से होने लगा, रफ़्ता-रफ़्ता ये ताल्लुक़ दोस्ती में बदल गया, मालिक ने मुझे बहुत कुछ दिया है, मैंने डाक्टर साहिब को एक फ़्लैट गिफ्ट करने को कहा तो डाक्टर साहिब ने साफ़ मना कर दिया और बोले मेरी अपनी कमाई की झोंपड़ी मेरे लिए किसी रईस की एहसानमंदी में हासिल किए गए महल से बड़ा महल है, और शायद डाक्टर साहिब से हमारी दोस्ती से ज़्यादा मज़बूत यही बेलौस ताल्लुक़ था, यहां तक कि डाक्टर साहिब ईलाज के लिए जो दवा देते थे, उन्होंने उस के भी पैसे तलब नहीं किए और ना तै किए और जब मैंने देने चाहे तो भी मामूली रक़म जो बहुत ही कम होती थी सो दो सौ लेकर वापिस कर दिए
Aapki Amanat Aapki Sewa Mein Hindi - Urdu 
(good sound,  micro Lady voice )
https://youtu.be/ZOp2xxs-kMo




अहमद अव्वाह : आप ज़रा अपना तआरुफ़ तो कराईए
असअद उमर : अभी अपना पूरा तआरुफ़ कराने के हाल में नहीं हूँ बस इतना काफ़ी है कि हिन्दोस्तान के सबसे बड़े ताजिर ख़ानदान, जिसका आजकल मुल्क पर राज चल रहा है उसी ताजिर ख़ानदान से ताल्लुक़ रखता हूँ, मालिक का करम ये है कि उसने धंदा के लिहाज़ से ख़ूब से भी ज़्यादा नवाज़ा है, असलन हम गुजराती हैं और मलिक के बहुत से सूबों में हमारे ख़ानदान का कारोबार है

अहमद अव्वाह : क्या अभी आपके क़बूल इस्लाम का लोगों को इलम नहीं हुआ, यानी ख़ानदान वालों को
असअद उमर : अभी मैंने आम ऐलान नहीं किया है, इंशाअल्लाह ख़ानदान के कुछ लोगों पर काम चल रहा है, अब तो हज़रत के मश्वरा से जब कहेंगे ऐलान वग़ैरा सब करेंगे

अहमद अव्वाह : अपने क़बूल इस्लाम के बारे में ज़रा बताईए
असअद उमर :शादी के दस साल औलाद ना होने की वजह से हम दोनों मियां बीवी बहुत परेशान थे, और मुझसे ज़्यादा मेरी बीवी परेशान थी, ख़ानदान वाले सब उस को ताना देते थे, औलाद की हवस में, दरबदर मारे मारे फिरते थे, और जो कोई बताता, दान पुने सब कुछ करते थे, मंदिरों, आश्रमों, गुरूदुवारों और दरगाहों में जाकर माथा टेकते और आशीर्वाद लेने की कोशिश करते, मुंबई में हाजी अली की दरगाह बहुत मशहूर है, इस के बारे में सुना था। हाजी अली के यहां से बे औलादों को औलाद मिल जाती है, वहां भी बार-बार जाते, वहां भी कुछ हुआ नहीं, एक-बार हम हाजी अली की दरगाह गए तो एक बाबा ने कहा हाजी अली के नाम पर तीन रोज़े ( बरत ) हर महीने रखू, औलाद मिल जाएगी,उस के बाद डाक्टर साहिब हमारी मुलाक़ात हो गई, हमने डाक्टर साहिब से कहा कि मैं और मेरी बीवी ने हाजी अली के नाम के तीन बरत मान रखे हैं, हम क्या करें, डाक्टर राहत ने कहा कि हाजी अली की दरगाह पर अगर मक्खी प्रसाद उठाकर ले जाती है तो वो उसे छीन नहीं सकते, ये सब बंदे हैं औलाद देना ना देना सिर्फ एक मालिक के क़बज़े में है, जो हाजी अली का भी ख़ुदा है और हमारा और आप का भी, अगर आपको रखना ही है तो आप इस मालिक के लिए और इसी के नाम का बरत रखू, और अच्छा है कि अगला महीना रमज़ान का है आप बरत के बजाय तीन तीन रोज़े दोनों रखकर इस से औलाद देने की दुआ करो, हमें चूँकि बयोपारी दोस्त ने बताया था कि डाक्टर साहिब के ईलाज के बाद हमारे घर में ख़ुशी आई है, हमने डाक्टर साहिब के मश्वरा से रमज़ान के तीन रोज़े रखे, रोज़ा रखने का तरीक़ा डाक्टर साहिब से मालूम किया और ख़ूब रो रो कर ऊपर वाले मालिक से गोद भरने की दुआ की, दवाओं का ईलाज और डाक्टर साहिब से झाड़ फूंक का भी चल रहा था, ईद के बाद लेडी डाक्टर से चैक कराया तो उन्होंने ख़ुशी की उम्मीद दिलाई और अगले महीना और बात पक्की हो गई, मालिक का करम है कि उसने एक बेटी दे दी, और इस के दो साल बाद एक बेटा भी दे दिया, दूसरी बात ये हुई कि जब मैंने और मेरी बीवी ने रोज़ा रखा तो हम दोनों को भूख और प्यास लगी,  तब हम दोनों ए सी चलाकर भूख प्यास कम करने के लिए दोपहर बाद सो गए, इत्तिफ़ाक़ की बात मैंने और मेरी बीवी दोनों ने ख़ाब देखा कि हम दोनों मक्का में हैं,और दोनों सफ़ैद चादरों में काअबा का चक्कर लगा रहे हैं और हमें वहां चक्कर लगाने में अजीब शांति और मज़ा आ रहा है, इस के बाद मैंने इंटरनैट पर हर्म के चैनल पर मक्का और मदीना को बार-बार देखा, और मुझे काअबा देखने का बेहद शौक़ हो गया, डाक्टर राहत से हमारी दोस्ती हो गई थी, और घर और कारोबार का हर काम में डाक्टर साहिब के मश्वरा से करता था, इस लिए मैं उनसे बार-बार कहता थाकि मुझे मक्का जाने का बहुत शौक़ हो रहा है, आप मुझे मालिक का वो घर एक बार दिखा दें, डाक्टर साहिब मुझे उम्मीद दिलाते रहे और कहते रहे कि मैं ज़रूर आपको ख़ुद वहां लेकर जाऊँगा, डाक्टर साहिब कई देशों में ईलाज के लिए जाते थे और मुझ पता लगा कि कई मुल्कों का ग्रीन कार्ड उनके पास है, और वहां उन्होंने घर भी बना रखा है, ताइफ सऊदी अरब में भी डाक्टर साहिब का एक अपना मकान है जो किसी शेख़ के नाम डाक्टर साहिब ने अपने पैसे से ख़रीद रखा है
एक साल पहले डाक्टर साहिब ने मुझसे कहा कि रमज़ान आने वाले हैं, रमज़ान में मक्का मदीना जाने का अलग ही मज़ा है, वहां बड़ी रौनक होती है, आपको रमज़ान में लेकर चलूँगा, रमज़ान में जाना ज़रा महंगा होता है, मैंने डाक्टर साहिब से कहा सस्ता महंगा आप क्यों देखते हैं, मालिक ने हमें किसी चीज़ की कमी नहीं रखी है, आपका और मेरा दोनों का ख़र्च मेरे ज़िम्मा होगा, मुझे बता दीजिए आपका बिज़नस क्लास में टिकट बनवा लेता हूँ, डाक्टर साहिब ने कहा आपके टिकट से बिज़नस क्लास में जाने के मुक़ाबला में मेरे लिए पैदल वहां जाना ज़्यादा ख़ुशी की बात होगी, आप अपना टिकट बनवायें, मैं ख़ुद अपना टिकट बनवा लूं गा




अहमद अव्वाह : डाक्टर साहिब की बड़ी बात
असअद उमर : असल में डाक्टर साहिब वाक़ई बहुत ऊंचे दर्जा के इन्सान हैं, उनके मुआमलात से मुझे लगा कि वो बड़े आला दर्जा के सय्यद हैं, लालच और लुभाओ उनके पास को भी नहीं फटकता, शायद उनकी इस सिफ़त ने ही मुझे मुस्लमानों और इस्लाम का ग़ुलाम बना दिया

अहमद अव्वाह : जी तो फिर किया हुआ
असअद उमर : डाक्टर साहिब ने किसी एजैंट से मेरा उमरा का वीज़ा लगवा दिया

अहमद अव्वाह : आपका पासपोर्ट तो हिंदू नाम से होगा, उमरा ( काअबा देखने का सफ़र ) का वीज़ा कैसे लगा, क्या क़बूल इस्लाम का कोई सर्टीफ़िकेट बनवाया था
असअद उमर:डाक्टर साहिब ने ना मुझसे कहा कि वहां जाने के लिए मुस्लमान होना ज़रूरी है, और ना कोई सरटीफ़ीकट बनवाया, डाक्टर साहिब ने बताया कि जानने वाले एजैंट थे, और सिफ़ारत ख़ाना में अच्छा रसूख़ था बस उनसे ही कह दिया कि नाम ऐसा है, असल में ये मुस्लमान हैं, झूट ही डाक्टर साहिब ने कह दिया, गुज़श्ता साल चौथे रोज़ा को हम लोग मुंबई से जद्दा पहुंचे, एयरपोर्ट से उतरकर डाक्टर साहिब ने कहा आपको काअबा मैं ख़ुद अपनी गाड़ी से लेकर चलूँगा, उनकी गाड़ी जद्दा में खड़ी थी, जो किसी दोस्त को फ़ोन करके उन्होंने मंगवा ली थी, उन्होंने कहा कि आपको एक नाटक करना पड़ेगा। मैंने पूछा क्या, बोले नहाकर आपको एहराम एक चादर सफ़ैद ऊपर और सफ़ैद लुंगी पहननी पड़ेगी, मैंने नहाकर जैसे डाक्टर साहिब ने कहा एहराम बांध लिया, दोपहर एक बजे के आस-पास हमने अपनी गाड़ी किसी पार्किंग में मक्का से बाहर लगाकर रोकी और बसों से हर्म पहुंचे, जैसे ही में हर्म में दाख़िल हुआ, मेरे होश ख़राब हो गए, मुझे ऐसा लगा कि मैं किसी अंधेर नगरी से रोशन दुनिया में आगया हूँ, मैं वो कैफ़ीयत ना कभी भूल सकता हूँ और ना लफ़्ज़ों में बता सकता हूँ, मैंने काअबा को देखा तो ना जाने मुझे क्या मिल गया, मैंने डाक्टर राहत साहिब से कहा क्या मैं मालिक के इस घुरको छू सकता हूँ? दोपहर में रोज़ा की वजह से ज़रा भीड़ कम थी डाक्टर साहिब ने कहा सब लोग पर्दा पकड़ कर दुआ मांग रहे हैं आपको कौन रोक रहा है, शौक़ से जाईए, मैंने काअबा को जैसे ही हाथ लगाया, ना जाने मैंने किया पा लिया, मुझे रोना शुरू हो गया और फूट फूटकर बच्चा की तरह रोने को दिल हुआ और देर तक रोता रहा, डाक्टर साहिब मुझे देखा तो ज़मज़म लेकर आए, असल में कुछ रोज़ से मुझे दिल की तकलीफ़ भी शुरू हो गई थी, वो डर गए कि कुछ ना हो जाएगी, डाक्टर साहिब ने मुझे ज़मज़म पिलाया, मैंने उनसे रोते हुए कहा, मैंने बहुत ग़लत क्या, मुझे इस पाक घर में आना नहीं चाहीए था, में तो अपवित्र (नापाक) हूँ, डाक्टर साहिब ने कहा अपवित्र कहाँ हो तुम, तुमने यहां आकर पाक एहराम बाँधा है, मैंने कहा ये आत्मा (रूह) तो नापाक है, मुझे वो कलिमा पढ़वाओ जो आत्मा को पवित्र ( पाक ) करता है, डाक्टर साहिब ने मुझे जल्दी जल्दी बताया कि ये कलिमा है :
‘‘अशहदु अल्लाइलाह इल्लल्लाहु व अशहदु अन्न मुहम्मदन अब्दुहू व रसूलुहू’

‘‘मैं गवाही देता हूँ इस बात की कि अल्लाह के सिवा कोई उपासना योग्य नहीं (वह अकेला है उसका कोई साझी नहीं) और मैं गवाही देता हूँ कि मुहम्मद अल्लाह के बन्दे और उसके रसूल (दूत) हैं’’।

मैंने कहा डाक्टर साहिब ऐसे दिल से  नहीं , मुझे अंतर आत्मा( अंदर दिल ) से पढ़वाओ, उन्होंने मुझे कलिमा पढ़वाया, डाक्टर साहिब से कह कर हम लोगों ने दारालतोहीद जो हर्म के बराबर एक फाईव स्टार बड़ा होटल है, इस के काअबा वेव स्वीट (जहां से काअबा दिखाई देता है ) दो रोज़ के लिए बुक कराये, और घर फ़ोन कर दिया कि मुझे काफ़ी दिनों से दिल की तकलीफ़ हो रही थी, यहां पर एक दिल का डाक्टर मिल गया है, मैं ईलाज कराके आऊँगा

अहमद अव्वाह : माशा अल्लाह उस के बाद आप दो रोज़ तक वहीं रहे
असअद उमर :जी, ये दो रोज़ कैसे गुज़र गए में बयान नहीं कर सकता, रमज़ान उल-मुबारक की रौनक और हर्म की नूरानियत और सुकून शांति, बस में नमाज़ पढ़ने हर्म जाता( जैसी भी पढ़ पाता ) ، एक तवाफ़ ( काअबा का चक्कर ) रोज़ाना करता, और ऊपर रुम में जा कर बैठ जाता, सारा सारा दिन और रात का अक्सर हिस्सा हर्म को देखता रहता, हर्म की अलग शान, में बयान नहीं कर सकता कि वो शब-ओ-रोज़ मेरे कैसे गुज़रे

अहमद अव्वाह : इस के बाद हिन्दोस्तान आकर आपने क्या महसूस किया
असअद उमर : वहां रह कर डाक्टर साहिब ने मुझे में एक नौजवान मौलाना साहिब का नज़म कर दिया था, उन्होंने मुझे दीन की बुनियादी बातें बताएं और नमाज़ याद कराई, और पढ़ना सिखाई, अलहमदु लिल्लाह में पाबंदी से पाँच वक़्त की नमाज़, और तहज्जुद की आठ रकात पढ़ रहा हूँ

अहमद अव्वाह : आपके घर वालों को नमाज़ पढ़ने पर एतराज़ नहीं है
असअद उमर : मेरी बीवी जो डाक्टर साहिब की बहुत फ़ैन है, उस को मैंने अभी तक नहीं बताया है कि मैं मुस्लमान हो गया हूँ, इस महीना हज़रत ने मुझे एक मौलाना का नंबर दिया है, उनको डाक्टर साहिब के साथ लेकर अपनी बीवी को कलिमा पढ़वाने का इरादा है, मुझे उम्मीद है कि वो मेरे साथ नमाज़ पढेंगी और उन्हें भी शांति महसूस होगी। इंशाअल्लाह वो कलिमा पढ़ने में देर नहीं करेंगी

अहमद अव्वाह : अबी ( कलीम साहिब ) बता रहे थे कि पहले डाक्टर साहिब ख़ुद भी नमाज़ रोज़ा के पाबंद नहीं थे
असअद उमर : डाक्टर साहिब वाक़ई नमाज़ रोज़ा से दूर थे, और दीन से उनकी दूरी की इस से ज़्यादा और क्या बात हो सकती है कि उन्होंने मुझे हर्म ले जाने के लिए एक बार भी नहीं कहा, कि वहां जाने के लिए मुस्लमान होना ज़रूरी है, चलो ऊपर से ही कलिमा तो पढ़ लू ( और वहां रमज़ान में पानी पिला दिया ) ، डाक्टर साहिब का ख़ानदानी ताल्लुक़ सय्यद घराना से है, वो कैरक्टर के लिहाज़ से बहुत ऊंची सतह के इन्सान हैं, जब मैं नमाज़ पढ़ने लगा और नमाज़ में मुझे जो मज़ा आता है इस को डाक्टर साहिब से मैंने शेयर किया, तो अल्लाह का शुक्र है कि वो भी पाँच वक़्त की नमाज़ और तहज्जुद की पाबंदी करने लगे

अहमद अव्वाह : अबी ( कलीम साहिब ) बता रहे थे कि इस के बाद डाक्टर साहिब भी दावत (इस्लाम से तआरुफ़,वाक़िफ़ कराने ) से लग गए
असअद उमर : मुझे कलिमा पढ़वाया तो उन्हें ख़्याल हुआ कि इस तरह तो बहुत से लोग मुस्लमान हो सकते हैं, उस के बाद जो मरीज़ उनके पास आता उस को कलिमा पढ़वाते थे, मेरे बाद डाक्टर साहिब ने कई लोगों को कलिमा पढ़वाया, उनमें से कई लोग ऐसे मुस्लमान बने कि उनके हालात देखकर सहाबा ( रसूल के साथी ) की याद ताज़ा होती है, फिर डाक्टर साहिब को ख़्याल हुआ कि जब यही काम करना है तो सीख कर काम करूँ, उनके एक साले खतौली, ज़िला मुज़फ़्फ़रनगर के रहने वाले हैं,उन्होंने हज़रत का तआरुफ़ किराया, हज़रत से वो मदीना में मिले, फिर मुंबई में घर आने को कहा, और अलहमदु लिल्लाह अब डाक्टर साहिब जिस्मानी, बांझपन और पोशीदा अमराज़ के डाक्टर होने से ज़्यादा रूह के डाक्टर यानी फ़ुल टाइम दाई ( इस्लाम से तआरुफ़,वाक़िफ़ कराने वाले ) बन गए हैं। उन्होंने हज़रत से  ۳ ۲ / ऐसे लोगों को बैअत किराया जो सब ताजिर (कारोबारी ) हैं, और एक साल के अंदर अल्लाह ने उनको डाक्टर साहिब के ज़रीया हिदायत अता फ़रमाई है



अहमद ओ्वाह : अब आपका आइन्दा क़्या प्रोग्राम है
असअद उमर :रमज़ान उल-मुबारक में इस साल अपनी बीवी के साथ अगर उन्होंने कलिमा पढ़ लिया तो हर्म में रमज़ान गुज़ारने का इरादा है, अल्लाह से पूरी उम्मीद है वो ज़रूर उन्हें हिदायत देगा। हर्म के रमज़ान की बात ही कुछ और है, ऐसा लगता है कि जन्नत इस ज़मीन पर उतर आई है, हज़रत ने बताया कि रमज़ान हिदायत के निसाब क़ुरआन-ए-मजीद के नुज़ूल का सीज़न है, और हिदायत के जश्न का महीना है,और काअबा के बारे में क़ुरआन ने कहा है कि वो आलिमों के लिए हिदायत है( हुदल  लिल आलमीन ) मौलाना अहमद में अपनी बात बताऊं मक्का आकर रमज़ान का महीना किसी ऐसी जगह आए कि जहां पर किसी को पता ना चले कि रमज़ान आए कि नहीं, तो मैं बहुत तौबा तौबा करके कह रहा हूँ कि मैं गारंटी से रमज़ान की नूरानियत और हिदायत को अंतर आत्मा यानी अपनी अंदरूनी रूह से महसूस करके बतादूं गा कि  रमज़ान की नूरानियत और हिदायत का महीना शुरू हो गया है, और अगर मेरी आँखों पर पट्टी बांध कर मुझे घूमते घुमाते बग़ैर बताए हर्म शरीफ़ में ले जाया जाये तो में एक हज़ार परसेंट गारंटी के साथ सौ बार तौबा तौबा करके कहता हूँ कि मैं अपने अंदर की आँखों से रब का नूर, हर्म का नूर वहां के आलमी हिदायत के माहौल को महसूस करके शर्त लगा कर बता दूँगा कि मुझे हर्म में दाख़िल कर दिया गया है
मैं हज़रत से भी कह रहा था कि रमज़ान और हर्म में जितना दावत और हिदायत के लिए माहौल साज़गार होता है उतना दूसरे दिनों और मुक़ाम पर इस का हज़ारवां हिस्सा भी नहीं होता, इस लिए माह-ए-मुबारक में दावत के स्पैशल प्लान बनाने चाहीए और हर्म की तक़ाज़ों को भी दावत के लिए ख़ुसूसी तौर पर इस्तिमाल करना चाहीए

अहमद अव्वाह :वाक़ई आपने बहुत अहम नुक्ता की तरफ़ तवज्जा दिलाई, ....  क़ुरआन-ए-मजीद का एक अछूता पहलू है, इस पर आम तौर पर दाई हज़रात भी तवज्जा नहीं करते और हम सभी लोग रमज़ान उल-मुबारक के हिदायत और दावत के सीज़न में ज़्यादा इस्लाम की दावत की मार्केटिंग करने के बजाय, रोज़ा में कैसे ये काम होगा वो काम होगा सोचते हैं। दूसरी इबादात में लग जाते हैं, ऐसे ही हर्म के हुदल  लिल आलमीन के पहलू से कमाहक़ा फ़ायदा नहीं उठाया जाता। जज़ा कम अल्लाह आपने अहम पहलू की तरफ़ तवज्जा दिलाई
असअद उमर : आपकी मुहब्बत है जो ऐसा समझते हैं वर्ना में क्या हूँ

अहमद अव्वाह : क़ारईन अरमूग़ान ( माहनामा ) के लिए आप कोई पैग़ाम देंगे
असअद उमर : बस में तो यही कहूँगा कि में एक ख़ानदानी ताजिर हूँ, हम लोग हर चीज़ को बयोपोरी ज़हनीयत से देखते हैं, इस मुबारक हिदायत और दावत के सीज़न में इस्लाम की मार्केटिंग और दावत को बड़े पैमाना पर करना चाहीए कि हिदायत की राह में रुकावट पैदा करने वाले शयातीन भी क़ैद करलिए जाते हैं, और हिदायत दावत की मंडी और बाज़ार हर्म ( काअबा ) है। जिसके बारे में ख़ुद हिदायत देने वाले मालिक ने हुदल  लिल आलमीन की ख़बर दी है, इस बाज़ार में थोक में हिदायत लेने और वहां से आने वाले रिटेल बयोपोरियों को डिस्टरीब्यूटर बनाने के लिए एक मज़बूत प्रोग्राम बनाना चाहीए

अहमद अव्वाह : माशा अल्लाह बहुत ख़ूब, जज़ाकम अल्लाह बहुत बहुत शुक्रिया

असअद उमर :शुक्रिया तो आपका कि माह-ए-मुबारक में मुझे इस कार-ए-ख़ैर में शरीक किया, आपसे और अरमूग़ान के तमाम क़ारईन से मेरे सारे परिवार और पूरी इन्सानियत के लिए ख़ुसूसन इस माह-ए-मुबारक में दुआ की दरख़ास्त की जाती है
  अस्सलामु अलैकुम
2
Apr
--

नौ मुस्लिम शमीम भाई ﴾ श्यामसुंदर से एक मुलाक़ात

( हज़रत मौलाना कलीम सिद्दीक़ी पर हमला करने वाले गिरोह के मैंबर का इंटरव्यू )

शमीम भाई (पूर्व गेंग मेम्‍बर श्याम सुंदर) से एक मुलाकातhttps://youtu.be/-Zdfqa3wt8Y




Thursday, August 2, 2012

पूर्व सुखराम ब्रह्मण अब नव-मुस्लिम फारूक़ आजम से एक मुलाकात interview

तिहाड और दूसरी जेलों  में हजारों खतरनाक कैदियों को और नागपुर जेल में जेलर को ही अनेकश्‍वरवाद की दुनिया से निकालने वाले  पूर्व ब्रह्मण अब नव मुस्लिम फारूक़ आजम का उर्दू मासिक पत्रीका 'अरमुगान' अगस्‍त 2012 ईं  के लिए मौलाना मुहम्‍मद कलीम सिद्दीकी साहब के सुपुत्र अहमद अव्‍वाह को दिया गया interview साक्षात्कार 

अहमद अव्वाहः अस्सलामु अलैकुम
पूर्व ब्रह्मण अब नव मुस्लिम अब्दुर्रहमान: वालैकुम सलाम

अहमद अव्वाहः अस्सलामु अलैकुम
(ब्रह्मण) पूर्व सुखराम अब नव-मुस्लिम फारूक़ आजम: वालैकुम सलाम

अहमद: आप इस वक्त कहां से आ रहे हैं?
फारूक आजम: में चार महीने की तब्लीगी जमात में हूं, हमारी जमात दो चिल्ले लगाकर पहुंची है, तीसरी चिल्ले के लिए महाराष्‍ट्र का रूख बना है अर्थात तय हुआ है, परसों का रिजर्वेशन हुआ है, आज सोचा हजरत से मुलाकात हो जाए, अल्लाह का शुक्र है मुलाकात हो गयी।

अहमद: जमात में आपने वक्त कहां लगाया?
फारूक आजम: पहला चिल्ला गुजरात में लगा और दूसरा राजस्थान में।
  (जमात या तब्‍लीगी जमात यानि कुछ मुसलमान मिलकर धर्म के लिए इधर उधर अपने खर्चे से यात्रा करते हैं, चिल्‍ला यानि 40 दिन, नव-मुस्लिमों के लिए यह चलता फिरता मदरसा साबित होता है)

अहमद: आपके यह तीनों साथी भी आपके साथ जमात में हैं?
फारूक आजम: जी यह मेरे जेल के साथी हैं और इन्होंने भी मुझ से ही कुछ महीने पहले इस्लाम कुबूल किया है। यह  अब्दुर्रहमान भाई जो बहराईच यु पी के रहने वाले हैं, यह भी एक झूटे मुकदमें में दिल्ली में फंस गए थे, तिहाड जेल में थे, मुझ से ही दो महीने बाद मुसलमान हो गए, और छ महीने बाद जेल से छुट गए, इनको मैं ने जमात(धर्म के लिए यात्रा) के लिए घर से बुलाया है, और यह दूसरे शकील अहमद भाई हैं यह पन्जाब में पटियाला के रहने वाले हैं, यह भी जेल में मेरे साथ थे, और मुझ से चार महीने बाद मुसलमान हुए, यह भी तीन साल पहले बरी हो गए थे, इनको भी साथ में जमात के लिए मैं ने बुलाया था, और यह तीसरे मुहम्मद सलमान भाई यह लोनी गाजीयाबाद के हैं, इन्हों ने मुझ से छ महीने बाद इस्लाम कुबूल क्या था, और इस्लाम कुबूल करने के छ रोज बाद यह रिहा हो गए थे, इन्हों ने जेल से जाकर चालिस दिन जमात में लगाए थे, मगर मेरे साथ वकत लगाने का वादा था इस लिए फिर मेरे साथ चार महीने लगा रहे हैं।

अहमद: आपका वतन कहां है?
फारूक आजम: मैं गोरखपुर यू.पी. के एक गांव का रहने वाला हूं, आठवीं क्लास के बाद चाचा के साथ दिल्ली 1989 में रोजगार के लिए आ गया था, जिन्दगी का अकसर हिस्सा दिल्ली में गुजरा, आखिर के यह छ साल तो जेल में गुजरे।

अहमद: जेल में आप कैसे चले गये?
फारूक आजम: असल में हमारे नबी सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने बुरी सोहबत से बचने का हुकुम दिया है, लुहार के पास अगर आग न लगे तो धुवां तो लगेगा ही, हम कुछ लोग जमनापार में साथ रहते थे, लक्ष्मीनगर के एक आदमी का कतल हो गया उसकी हमारे एक साथी से चंद रोज पहले लडाई हुई थी, जिस से लडाई हुई थी, उसकी सोहबत अच्छी नहीं थी, जो असल कातिल थे उन्होंने पैसे दे कर होशियारी से हम लोगों के नाम वो कतल लगा दिया और हम लोगों को जेल जाना पडा, मेरे अल्लाह का करम था, हमारे मुकदमे की कोई पेरवी करने वाला नहीं था।

अहमद: ये क्या बात आप कह रहे हैं?
फारूक आजम: मैं सच कह रहा हूं, मौलाना अहमद साहब, हमारे प्यारे नबी सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने क्या सच फरमाया कि कुछ लोग ऐसे होंगे कि उनकी गरदन में तोक(रस्‍सी) डाल कर अल्लाह ताला खींचकर जन्नम में दाखिल करेंगे, मुझे बिल्कुल ऐसा लगता है कि मेरे अल्लाह का वो करम हमारे और हमारे जेल के साथियों के लिए है, मेरे अल्लाह ने जिस तरह हमें जेल में भेज कर हिदायत से नवाजा।


 कुरआन से इलाज(Hindi/Arabi)(PB)

अहमद: आप जरा तफसील बताइए?
फारूक आजम: मैं ने बताया न कि मैं बचपन में अपने चाचा के साथ रोजगार के लिए दिल्ली आ गया था, शुरू में एक हार्डवेयर की दुकान पर मेरे चाचा ने मुझे लगाया फिर मेरे चाचा यहां आकर एक औरत के चक्कर में पड गए और फिर घरबार को छोड दिया, मेरे पिताजी का देहांत हो गया बाद में मैं ने कुछ बेकरी(बिस्‍कुट,पापे, डबल रोटी आदि) आईटम सप्लाई के लिए एक रेहडा रिक्शा खरीदा और एक के बाद एक कुछ न कुछ सप्लाई का काम करता रहा। मार्च 2001 में मेरी शादी मां ने करादी, 2006 में मुझ पर मुकदमा कायम हुआ और मैं अपने साथियों के साथ जेल में चला गया, जेल में तन्हाई में मैं बहुत गौर करता, कि मुझे भगवान ने किस जुर्म में जेल भेजा, असल में, जब मैं हिंदू था, जब भी मेरे दिल में इसका पक्का यकीन था कि जो कुछ होता है मालिक की मरजी से होता है, यह दुनिया के सारे लोग कठपुतली हैं, जैसे वहां से उंगली हिलती है यह नाचते हैं, तो मैं सोच में बहुत डूब जाता कि मुझे जेल में मालिक ने क्यूं भेजा है, जब मैं बेकसूर हूं और मेरी कोई पेरवी करने वाला भी नहीं तो मेरे दिल में कोई कहता कि तुझे कुछ देने के लिए और बनाने के लिए। तीन साल पहले दिल्ली के एक वकील साहब बचपन के किसी मुकदमे में सजायाब होकर तिहाड जेल पहुंचे, जेल में बहुत चर्चे थे, कि दिल्ली हाईकोर्ट के इतने बडे वकील साहब जेल में आ गए हैं, वकील साहब के बाकायदा दाढी थी, बडे मौलाना लगते थे, सब कैदी उनसे दबे रहते, मुकदमों के सिलसिले में मशवरा करते, वो मुफीद मशवरा देते, लोग उनसे मालूम करते कि आप इतने बडे वकील हैं फिर भी जेल में आगए, उन्होंने कहा जज रिश्‍वत मांग रही थी, मैं ने रिश्वत देने के मुकाबले में जेल को मुनासिब समझा, लोग कहते कि रिश्वत दे देनी चाहिए थी, तो वो कहते, रिश्वत देने से, मरने के बाद खतरनाक जेल जहन्नुम में जाने के बजाए यह आरजी अर्थात कुछ समय की तिहाड जेल अच्छी है। (रिश्‍वल लेना-देना हराम है)

 वो मुकदमों के सिलसिले में मशवरे के दौरान कैदियों से मालूम करते कि इस कैद में इतने परैशन हो रहे हो, जहां खाना, पानी, इलाज, पंखे, बिस्तर सब हैं, मरने के बाद की जहन्नुम की जेल की परवा क्यूं नहीं? जहां न खना, न पानी और सजा ही सजा है, कैदियों को उनके मौलवियाना हुलिए और हर एक की हमदर्दी के जज्बे की वजह से बहुत ताल्लुक हो गया था, वो उनकी बात को बहुत गहराई से लेते थे, जेल में वो मुसलमानों में भी नमाज वगेरा की दावत का काम करते थे, और गैर मुस्लिम कैदियों को हजरत की किताब ‘‘आपकी अमानत - आपकी सेवा में‘‘ देते, ‘‘मरने के बाद क्या होगा?‘‘ और ‘‘नसीमे हिदायत के झोंके‘‘ यानि हिन्दी में नव-मुस्लिमों के इन्टरव्यूज भी पढवाते।

मौलाना अहमद साहब मेरे जितने साथियों ने इस्लाम कुबूल किया है, सारे साथियों का खयाल यह है कि हिन्‍दी में ‘‘आपकी अमानत - आपकी सेवा में‘‘ (इंग्लिश में RETURNING YOUR TRUST) ऐसी लगती है जैसे किसी उमरकैद की सजा काट रहे कैदी को अचानक रिहाई का परवाना मिल जाए, और मैं तो बिल्कुल इसको मालिक के यहां से कैद से रिहाई का परवाना ही समझता हूं, 17 जनवरी 2010 को मैं ने तिहाड में इस्लाम कुबूल किया, दिसम्बर 2010 में हम कुछ लोगों को नागपुर जेल भेजा गया, वकील साहब के साथ मिलकर मैंने काम किया, अल्हम्दु लिल्लाह कुल मिलाकर तिहाड में 37 लोगों ने इस्लाम कुबूल किया, उनमें एक बजरंग दल के वो साहब भी थे, जिन्हों ने 1992 के फसादात में दो मस्जिद के इमामों को कतल किया था, और बाद में वो खुद इतने पछताए कि कतल में जेल चले गए।

अहमद: नागपुर में भी आप ने काम किया?
फारूक आजम: नागपुर में इस साल मार्च में रिहाई तक रहा, और अल्हम्दु लिल्लाह में यह सोच कर जेल में रहा कि मुझे अल्लाह ताला ने हजरत यूसुफ अलैहिस्सलाम की सुन्नत जिन्दा करने के लिए जेल के अन्दर कैदियों को जहन्नुम की जेल से आजाद कराने के लिए भेजा है, अल्हम्दु लिल्लाह 67 लोग नागपुर जेल में मुसलमान हुए। नागपुर जेलर के पास लोगों ने शिकायत की, मुझे मालूम हुआ कि वो मुझे बुलाकर बात करने वाले हैं, मैं ने इस खयाल से, इससे पहले कि अन्धेरे वाले चिराग को बुझाने को कहें, हमें अन्धेरों को रोशन करना चाहिए, जेलर आर के पाटिल से वकत लिया, सब से पहले मैं ने उनको कानून की आरटीकल 25 के हवाले से मुलक के हर शहरी को अपने मजहब की दावत देने के मूल अधिकार की बात जरा जोर देकर कही, कि आप मुलक के किसी शहरी को इस से रोकेंगे तो कानून तोडेंगे, उसके बाद मैं ने उनको अपना परिचय कराया और बताया कि मालिक जानता है कि मैं बिल्कुल बे-कुसूर सजा पा रहा हूं, और उस मालिक ने मुझ कैदी को नागपुर जेल में आप जेलर पाटिल साहब को नर्क की खतरनाक जेल से छुडाने के लिए भेजा है, मैं ने कुछ आखिरत की बात कह कर उनको   ‘‘आपकी अमानत - आपकी सेवा में‘‘  पुस्तक दी और उनसे पढने का वादा लिया, और इस पर कि वो जरूर इस किताब को पढें, उनकी मां के दूध की कसम ली, वो किताब उन्होंने पढी, उनकी सोच की दुनिया बदल गयी, उन्होंने दूसरी कोई पुस्तक मांगी तो मैं ने  ‘‘मरने के बाद क्या होगा?‘'  फिर ‘‘नसीमे हिदायत के झोंके‘‘ यानि हिन्दी में नव-मुस्लिमों के इन्टरव्यूज की पुस्तक उन तक पहुंचाई। मालिक का करम है, उन्होंने इस्लाम कुबूल किया, पिछले साल रमजान से पहले वो मुसलमान हो गए हैं, अभी आम एलान तो नहीं कर सके, उन्होंने पिछले साल रमजान के ऐसे सख्त रोजे रखे और नागपुर के कुछ कारोबारी मुसलमानों के साथ मिल कर जेल में इफतार  और सहरी (रोजा रखने के  खाना-पीना)का बहुत अच्छा इन्तजाम कराया और फिर दिल्ली सफर करके मेरे केस की पेरवी की, वकील अपने खर्च से किया, अल्हम्दु लिल्लाह मेरी रिहाई हो गयी।

अहमद: आपके घर वालों को मालूम हो गया?
फारूक आजम: मैं जेल से ही अपनी मां और भाईयों को खत के जरिए दावत देता रहा, जेल से रिहा होकर घर गया, मेरी मां और दो भाई अल्हम्दु लिल्लाह पहले से तैयार थे, उन्होंने इस्लाम कुबूल कर लिया है, मेरे चचा के बेटे जो डाक्टर हैं वो भी मुसलमान हो गए हैं, मैं हजरत की तकरीर की सी डी नागपुर से लाया था, उसमें उन्होंने कहा है कि इस्लाम एक नूर है, अगर कोई शख्स इस्लाम लाएगा तो चिराग की तरह इस्लाम के नूर से मुनव्वर होगा, जहां रहेगा वो रौशनी फेलाएगा, मोमिन जहां हो, इस्लाम का नूर उससे जरूर फेलेगा, किसी चिराग के बस में नहीं कि वो रौशन हो और रौशनी न फैलाए, इसी तरह मोमिन के बस में ही नहीं कि वो दाई न हो(दाई यानि इस्‍लाम की दावत देने वाला), अल्हम्दु लिल्लाह हमारे जो साथी तिहाड जेल से मुसलमान हुए और जो नागपुर से हुए हर एक को दावत की धुन है, एक मुहम्मद उमर नागपुर से औरंगाबाद जेल में गए वहां पर बहुत लोगों ने इस्लाम कुबूल किया, एक महुम्मद इकबाल बरेली जेल गए, वहां पर एक डाक्टर साहब के साथ मिलकर बहुत काम किया, एक मुहम्मद इस्माइल रोहतक जेल में गए, वहां पर इक्कीस लोग मुसलमान हुए और ‘‘या हादी या रहीम‘‘ पढ कर लोग रिहा होते गए, उनमें से अक्सर ने जाकर काम किया, और अपने घरों में अपनी जिन्दगी की मकसद दावत बना कर काम कर रहे हैं।
(हजरत कलीम साहब के मुताबिक इन शब्‍दों को सौ-सौ बार रोजाना दोहराने से दुआ कुबूल हो जाती हैं,,अधिक समझने के लिए इस विडियो से दावत देने के सवाब और विडियो के आखिर हिस्‍से में इस दुआ बारे में समझें  http://www.youtube.com/watch?v=tgZP4fN5RMg)

अहमद: अबी से (यानि मौलाना मुहम्‍मद कलीम सिद्दीकी) तो आप पहली मर्तबा मिले होंगे?
फारूक आजम: बजाहिर तो पहली मर्तबा मिले, मगर आपकी अमानत और नसीमे हिदायत के झोंके पुस्तक और वकील साहब से चूंकी वो हजरत साहब से मुरीद हैं उनकी बातें सुन-सुन कर ऐसा ताल्लुक हो गया है, ऐसा लगता है जैसे हम हजरत की तर्बीयत से पले हैं, और अब बयानात की सी डी ने हजरत के बोल याद करा दिए हैं, देखने और मिलने से भी ऐसा लगा जैसे हजरत को बहुत देखा है।

अहमद: अब आप का क्या इरादा है?
फारूक आजम: जमात में वक्ल लगा कर हजरत के पास कुछ वक्त गुजारना है, और फिर गोरखपुर के आस-पास दावत का काम करना है।

अहमद: आपके बीवी बच्चों का क्या हुआ?
फारूक आजम: अल्हम्दु लिल्लाह मेरी बीवी और दोनों बच्चे इस्लाम में आ गए हैं।

अहमद: उनके खर्चे वगेरा का इस दौर में क्या हो रहा है?
फारूक आजम: मेरी बीवी ने अपने जेवर बेच कर अपने भाई के साथ मिल कर एक कारोबार क्या था, अल्हम्दु लिल्लाह उस में बडी बरकत हुइ, मेरी बीवी ने मुझे जमात का खर्च दिया, और उसने तै किया है कि वो हजरत खदीजा रजि. की तरह अपने माल को दावत पर खर्च करेगी, इत्तफाक से हमारे रिवाज के खिलाफ वो उमर में मुझ से आठ साल बडी हैं, इस तरह अल्लाह का करम यह है कि एक तरह यह सुन्नत भी अल्लाह ने बे-मांगे दे दी।

अहमद: तब्लीगी जमात में आप रहे तो आपका दिल गैर मुस्लिमों में दावत को नहीं चाहा?
फारूक आजम: असल में अभी तब्लीगी जमात में इसकी खुल कर इजाजत नहीं, मगर कोई मौका मिल जाता है तो फिर आदमी क्या करे, राजस्थान में हम कोटा में काम कर रहे थे, गश्त के लिए जा रहे थे, एक आश्रम के सामने कुछ लोग बैठे थे, आश्रम के जिम्मेदार भी थी, हमें रोक कर बोले, आप लोग धर्म के नाम पर जमात में निकले हो, तो क्या हम तुम्हारे भाई नहीं? हम से ऐसी नफरत के साथ क्यूं निगाह चुरा कर जा रहे हो, हमें भी बताओ, मैं ने अमीर साहब से इजाजत ली और सब से गले मिला और बात की, अल्हम्दु लिल्लाह चारों लोगों ने नकद कलिमा पढा, और हमारे साथ गश्त कराया, नमाज पढी और फिर बात के बाद तशकील हुई, चिल्ले के लिए  यानि 40 दिन की धर्म यात्रा के लिए नाम भी लिखाए, इस तरह से एक दो कहीं-कहीं काम होता रहा।

अहमद: इस मर्तबा आप के अमीर जमात(टोली अध्‍यक्ष) कौन हैं?
फारूक आजम: असल में मुझ से मालूम क्या तो मैं ने बताया कि मैं दो चिल्ले लगा चुका हूं, तो फिर जमात का मुझे ही अमीर बना दिया गया, जमात में अलग-अलग जगह के लोग हैं, मैं ने बहुत मना भी किया। मगर मेरे साथ बस मेरे यह तीनों साथी भी हैं जिनका यह तीसरा चिल्ला है, दो साहब हैं जिनके छ साल पहले चिल्ले लगे थे, इन साथियों में से कोई तैयार नहीं हुआ, मजबूरन मुझे ही अमीरे जमात बना दिया गया।

अहमद: आप का पहले नाम क्या था? क्या आप ने नाम जेल में ही बदल लिया था?
फारूक आजम: मेरा नाम सुखराम था, हमारा खान्दान ब्रह्मण खान्दान है, वकील साहब ने मेरा नाम मुहम्मद फारूक आजम रखा, और मुझ से कहा तुम फारूक आजम रह. की तरह इस्लाम की मजबूती और कुव्वत के लिए काम करना, मुझे भी अच्छा लगा, अल्लाह के लिए क्या मुश्किल है कि नाम की बरकत से मुझ कमजोर को ताकतवर बनाकर इस्लाम की ताकत का जरिया बना दे।

अहमद: आप रमजान में अल्लाह के रास्ते में होंगे, आप हमारे लिए भी दुआ किजिए?
फारूक आजम: मौलाना अहमद साहब, आपके घर से जिस्मानी और जाहिरी ताल्लुक मेरा पुराना नहीं, मगर रोएं रोएं में आपके घराने से ताल्लुक है, हजरत और हजरत के हर साथी बल्कि कुत्ते का भी में अपने को अहसानमंद पाता हूं

अहमद: वाकई अल्लाह ताला की रहमत और शाने हिदायत देखनी हो तो आपको देखिए, कि अल्लाह ने गले में रस्सी डाल कर आपको इस्लाम और जन्नत की राह पर डाल दिया।
फारूक आजम: अच्छा आपको नहीं लगता। वो हदीस जब पढता हूं कि कुछ लोग ऐसे होंगे कि फरिश्ते उनको अल्लाह के हुकुम से गले में रस्सी डाल कर घसीटते हुए जन्नत में दाखिल करेंगें, मुझे तो एसा लगता है कि वो रस्सी मेरे गले मे पडी है, और फरिश्ते मुझको घसीटते ले जा रहे हैं।

अहमद: आपक का यह इन्टरव्यू हमारे उर्दू मेगजीन ‘‘अरमुगान‘‘ में छपेगा। आप इसके पढने वालों को कुछ सन्देश,पेगाम देंगे?
फारूक आजम: मैं दो दिन का मुसलमान क्या पेगाम दे सकता हूं, बस मैं तो यह कह सकता हूं कि एक मुसलमान की हैसियत रौशन चिराग की है जो रौशन होगा तो रौशनी फेलाएगा, जहां रहेगा रौशनी फेलाएगा, और जिस चिराग की लो से उसकी लो करीब होगी, तो बुझे चिराग का जला देगा,
मुसलमान जहां रहे अगर वो इस्लाम और इमान का नूर वहां नहीं फैला रहा है, और वो दावत का काम नहीं कर रहा है, और कुफर और शिर्क के अन्धेरे दिल, ईमान से मुनव्वर नहीं हो रहे हैं तो वो बुझे चिराग की तरह है, बुझा चिराग, चिराग कहलाने के लायक नहीं, मुसलमान को दाई यानि इस्‍लाम की दावत देने वाला होना चाहिए, जहां कुफर और शिर्क के अन्धेरे दिल हों, वहां ईमान और इस्लाम की दावत से उन्हें मुनव्वर करना चाहिए और जो मुसलमान दावत का काम नहीं कर रहे हैं उन बुझे चिरागों की लो से अपने दिल की कोई लो लगाकर उनको रौशन करना चाहिए, ताकि वो भी दाइ बन जाऐं, एक वकील साहब ने जेल में आकर मुझ बेजान आदमी के दिल के चिराग को अपने चिराग की लो लगा कर जलाया और इमान से मुनव्वर किया, अब अगर में, चिराग से चिराग और चिरागों से चिराग, तिहाड जेल नागपुर, बरेली, रोहतक, औरंगाबाद और जेल से रिहाई पाकर घर जाकर काम करने वालों के जरिए हिदायत पाने वालों का हिसाब लगाउं तो तादाद हजार से भी ज्यादा हो जाएगी, यह बात सही है कि यह तादाद है ही क्या, इस सिलसिले में हजरत की बात ही ठीक है कि जो लोग अभी कुफर और शिर्क पर जहन्नुम की तरफ जा रहे हैं उनकी तादाद साढे चार अरब से ज्यादा है, उनके मुकाबले में जो इस्लाम की तरफ आ रहे हैं हरगिज काबिले जिकर नहीं। मगर यह भी हकीकत है कि एक चिराग से एक चिराग जलकर की सारी दुनिया के साढे चार अरब की अन्धेरियां दूर हो सकती हैं, इस लिए सारी दुनिया के मुसलमानों से, खसुसन मासिक 'अरमुगान' पढने वालों से मेरी दरखास्त है कि अगर आपके जरिए सुबह से शम तक कोई करीब रहने वाले खूनी रिश्ते के भाई बहन की कुफर और शिर्क की अन्धेरी कम नहीं हुई और आप उसको इस्लाम के करीब न कर सके, और साथ रहने वाले मुसलमान भाईयों के दिल की कोई लो अपने दिल की लो लगाकर आपने उसके अंदर कुछ दावती जज्बा और जौत नही जलाई तो फिर आप जिन्दा मोमिन नहीं बल्कि बुझे चिराग हैं, जो हकीकत में चिराग कहलाए जाने के लायक नहीं। दूसरी दरखास्त यह है कि रमजान का मुबारक महीना आ रहा है, अल्लाह की खास अता का महीना है हमें वफादार बंदों की तरह इस माह का इस्तकबाल करना चाहिए और हुदा लिलनास कुरआन मजीद के इस जशन शाही में इस बार अपने अल्लाह से पूरी दुनिया के लोगों की हिदायत मांगनी चाहिए, मैं ने तो पिछले दो सालों में तजुर्बा किया, मैं ने जिन-जिन लोगों का नाम ले कर पिछले दोनों रमजानों में हिदायत की दुआ मांगी, मेरे अल्लाह ने मेरी दरखासत कुबूल कर ली, और फिर दावत देने में बिल्कुल भी मुश्किल पेश नहीं आई।

अहमद: माशा अल्लाह आपको अल्लाह की जात पर यकीन में सहाबा के ईमान का हिस्सा मिल गया है?
फारूक आजम: इतनी बडी बात कहां कह रहे हैं? हम तो सहाबा के पांव की खाक भी नहीं, हां मगर उनको अपना बडा कहने पर फखर है, और हम उनका अकीदत से नाम लेने वाले जरूर हैं।

अहमद: बहुत बहुत शुक्रिया , अस्सलामु अलैकुम
फारूक आजम: वालैकुम सलाम



साभार उर्दू मासिक ‘अरमुगान‘ अगस्त 2012
with thanks: www.armughan.net

--







کتاب ’’نسیم ہدایت کے جھونکے‘‘ ان نو مسلم بھائیوں بہنوں کے انٹرویوز کا مجموعہ ہے  جو خداوند عالم کی توفیق و عنایت اور داعیِ اسلام حضرت مولانا محمد کلیم صاحب صدیقی اور ان کے  رفقاء کی کوششوں سے نعمت اسلام اور ہدایت کے نور سے سرفراز ہوئے ان نو مسلم بھائیوں کے قبول اسلام کےانٹرویوزماہ نامہ ’’ارمغان‘‘ میں مسلسل شائع ہوتے رہے ہیں اور الحمد للہ یہ سلسلہ اب بھی جاری ہے۔


Nasim e hidayat ke Jhonke Vol. 1 to 6 [ urdu ] نسیم ہدایت کے جھونکے  

This book Set is collection of interviews with newly converts to Islam who got guidance and Allah's blessing due to efforts of made preaches of Islam Hazrat Maulana Muhammad Kaleem Siddiqui and his associates. These interviews were published in Urdu Monthly "ARMUGHAN" and the series still continuing. This magazine is edited by Maulana Wasi Sulaiman Nadvi under the patronage of Hazrat Maulana Muhammad Kaleem Siddiqui
---------------------------------------------------------------------------------
"नसीमे हिदायत के झोंके" उन नो मुस्लिमों के इंटरव्यू का संग्रह है जो अल्लाह के आशीर्वाद से मौलाना कलीम सिद्दीकी और उनके साथियों की कोशिशों  से इस्लाम धर्म  में आये, ये साक्षात्कार फुलत, उत्तर प्रदेश की  उर्दू मासिक पत्रिका अरमुगान में छप चुके हैं।



Nasim e hidayat ke Jhonke Vol. 1 to 6 [ hindi ] नसीमे हिदायत के झोंके
-
Nateeje nikalne Lage
उपरोक्‍त बातें पढकर हम जान गए कैसे जेलों में भी माशाअल्‍लाह दायी हजरात काम कर रहे हैं,,, अब नतीजे सामने आने लगे - Urdu Daily 'inquilab' 29-11-2012 merut edition


Thursday, June 28, 2012

अब्दुर्रहमान (पूर्व ब्रह्मण) से एक मुलाकात

बंदर के द्वारा अनेकश्वरवाद की दुनिया से निकले  पूर्व ब्रह्मण अब नव मुस्लिम अब्दुर्रहमान  का उर्दू मासिक पत्रीका 'अरमुगान' जूलाई  2012 ईं में मौलाना मुहम्‍मद कलीम सिद्दीकी साहब के सुपुत्र अहमद अव्वाह को दिया गया interview साक्षात्कार

अहमद अव्वाहः अस्सलामु अलैकुम
पूर्व ब्रह्मण अब नव मुस्लिम अब्दुर्रहमान: वालैकुम सलाम

अहमद: अब्दुर्रहमान भाई आप दिल्ली में कहां से तशरीफ लाए हैं?
अब्दुर्रहमान: जी में दिल्ली में रोहिणीमें रहता हूं, वहीं से आया हूं ।

अहमद: आप पिछले हफ्ते भी तशरीफ लाए थे?
अब्दुर्रहमान: जी हां अपनी पत्नि के साथ पिछले इतवार को आया था आज में अपने दोनों बेटों और बेटी को हजरत कलीम साहब से मिलाने लाया हू, असल में कल मेरी बेटी ससुराल से आयी थी, हमने बताया कि हजरत से हमारी मुलाकात हो गयी है तो बेटी ने बहुत जिद की कि मुझे भी मिलाइए, असल में उसने ‘‘नसीमे हिदायत के झोंके‘‘ किताब पढी है इस लिए वो बहुत ज्यादा हजरत से मिलना चाहती थी।

अहमद: आप पहले से कहां के रहने वाले हैं, रोहिणि तो अब रहते होंगे?
अब्दुर्रहमान: जी हम लोग पहले से रोहतक जिले के एक गांव के रहने वाले हैं, 26 साल हुए दिल्ली शिफ्ट हो गए हैं, हमारा खानादान धार्मिक हिन्दू घराना है, जात से हम लोग खानदानी ब्रह्मण हैं, मुझे ऐसा लगता है कि यह ब्रहमण आर्यन कोमें हैं, शायद यह लोग इब्राहिमी लोग होंगे, इस लिए कि मक्का के मुशरिक जो अपने को इब्राहिमी दीन पर कहते थे, उनका कलचर हमसे बहुत मिलता जुलता है, हो सकता है कि हम लोग हजरत इबराहीम के खानदान में भी रहे हों।

अहमद: आपने खूब सोचा, हो सकता है ऐसा ही हो, आपको इस्लाम कुबूल किए कितना जमाना हो गया?
अब्दुर्रहमान: यूं तो इस्लाम कुबूल किए मुझ आठ साल हो गए, मगर ऐसा लगता है कि मैं असली मुसलमान तो पिछले इतवार को हूआ हूं, असल में हिन्दू पंडितों के चक्कर से तो आठ साल पहले निकल गया था, मगर मिशाल मशहूर है आसमान से गिरा खजूर में अटका, मुसलमान बनके, पीरनुमा एक पेशावर बहरूपिए मुसलमान पंडित के चंगुल में फंस गया था और इस जालिम ने हिंदू पन्डितों को अच्छा कहलवा दिया।

अहमद: अबू कलीम साहब बता रहे थे कि एक जाहिल पीर आपको एक जमाने तक ठगता रहा, क्या उन्होंने ही आपको इस्लाम की दावत दी थी?



 कुरआन से इलाज(Hindi/Arabi)(PB)
अब्दुर्रहमान: नहीं वह इस्लाम की दावत किया देते, मुझे तो एक बंदर ने दावत दे कर मुसलमान बनाया, हजरत कह रह थे कि आपका इस्लाम हमारे लिए एक बडी वार्निंग है कि अगर मुसलमान अपनी जिम्मेदारी अदा नहीं करेंगे और दावत इस्लाम के अपने फरीजे अर्थात कर्तव्य को अदा नहीं करेंगे तो अल्लाह ताला बंदरों से दावत का काम लेकर ब्रहमणों को मुसलमान बनाएंगे।

अहमद: जरा तफसील से सुनाइए , अल्लाह ताला ने आपको किस तरह हिदायत दी?
पूर्व ब्रह्मण अब नव मुस्लिमअब्दुर्रहमान: असल में खानदानी तौर पर ब्रहमण होने की वजह से मैं बहुत धार्मिक किसम का हिंदू था, और सब से अधिक मेरी अकीदत वैष्णो देवी से थी, उसके अलावा काली और अबा जी का भी उपाषक था, इस लिए साल में दो बार वैष्णो देवी की यात्रा करता था, शायद आप जानते होंगे, वैष्णो देवी का खास मन्दिर कशमीर में है, वहां जाना ऐसा है जैसे हज वगेरा करना, यूं समझो कि मैं भी साल में दो बार उमरे को जाता था, उमरा तो आदमी सौ फीसद अपने एक अल्लाह के साथ अपने इमान और एक अल्लाह की मुहब्बत को बढाने के लिए जाता है, वैष्णो देवी पर तो आदमी, हक को छोड कर शिर्क में भटकने के लिए जाता है, मेरे कहने का मकसद यह है कि जितना वक्त और पैसा उमरा में लगता है, उतना ही तकरीबन वैष्णो देवी की यात्रा में लगता है, हां महनत वैष्णो देवी की यात्रा में और ज्यादा है, यह कि वहां पैदल पहाड की बडी चढाई में आदमी का हाल खराब हो जाता है, इस के एलावा भी अलग अलग मंदिरों में जाता था, मेरी कमाई और वकत का एक खास हिस्सा इन पूजाओं में लगता था, बहुत बर्त यानि हिंदू रोजे रखता था, मेरे घर में एक खास कमरा जिसके तीन हिस्से करके अलग अलग देवियों के मन्दिर बनाए हुए थे, आठ साल पहले नोरते यानि खास हिंदू रोजे चल रहे थे, एक शाम को मैं बरत में पूजा में मगन था, बडी अकीदत से नम्बरवार एक के बाद एक देवी की पूजा की प्रशाद चढाता और अकीदत से दीप जलाता, अचानक पीछे के रास्ते से एक बंदर घर में घुस गया उसने कमरे में घुस कर प्रसाद पर झपटे लगाए तो दीप गिर गए और पूरे कमरे में आग लग गयी, और आग इस कदर लगी की तीनों देवियां और पूरा कमरा आग में झुलस गया, मेरे दिल में आया कि जो देवियां खुद अपनी हिफाजत नहींकर सकीं और जल कर झुलस गयीं, वो पूजा के लायक कैसे हो सकती हैं ? मैं इस आस्‍था और अकीदत से बहुत बद दिल होकर घर से निकला, घर से कुछ दूर एक किसी पीर की कबर पर एक मेवाती बाबा हजार दाने वाली तस्बीह (माला) लिए बैठे थे, मैं ने उनसे कहा मैं मुसलमान होना चाहता हूं, वो पीर बाबा बोले, मुसलमान होकर तुम्हें मेरा मुरीद (धर्म शिष्य) भी होना पडेगा, मैं ने कहा कि मुसलमान होने के लिए मुरीद होना भी जरूरी है, वो बोले पक्का मुसलमान तो तब ही होगा जब मुरीद हो जाएगा, मैं ने कहा कि मैं मुरीद भी हो जाउंगा, वो बोले मैं दो तरह के मुरीद करता हूं, एक मुरीद तो ऐसा होता है कि मुरीद होकर नमाज और रोजे और सारी इबादतें तुम्हें ही करना होंगी, एक मुरीद ऐसे होते हैं कि मुरीद तो मुरीद ही होता है, वो इबादात ठीक तरीके पर कहां कर सकता है, मैं ही तुम्हारी तरफ से नमाज और रोजे अदा करूंगा, उसके लिए तुम्हें माहाना खर्च देना पडेगा, मैंने मालूम किया कि माहाना खर्च किया पडेगा, वो बोले तुम्हारी आमदनी कितनी है, तुम बताओ उस मालिक के नाम पर तुम कितने खर्च कर सकते हो, मैं ने कहा मैं हाथ से बनी देवियों के नाम पर इतना खर्च करता था, तो उस मालिक के नाम पर मैं जान भी दे सकता हूं, वो बोले तो फिर अच्छा मुरीद और अच्छी नमाज रोजा पीर साहब से करवाने के लिए दस हजार रूपए माहाना खर्च करने पडेंगे, मैंने कहा मालिक का दिया बहुत है उसके नाम पर हजार रूपए कोई बडी बात नहीं। पीर बाबा ने मुझे कलिमा पढाया और एक चादर मेरे सर पर डाल कर मुझे मुरीद कर लिया, मुरीद(धर्म शिष्‍य) करने के लिए देर तक नाटक करते रहे।






अहमदः आपको लग रहा था कि यह नाटक है?
अब्दुर्रहमान: खुली आंखों दिखाइ दे रहा था कि यह नाटक है।

अहमद: जब आपको लग रहा था यह नाटक है, फिर भी आप सब करते रहे?
अब्दुर्रहमान: असल बात यह थी कि मुझे इस्लाम के बारे में जरा भी मालूम नहीं था, अब यह जानने वाले थे तो फिर मुझे उनकी बात माननी थी, इस डर से कि कहीं मेरे इस्लाम में कोई कमी न रह जाए, मजहब के मामले में इन्सान अपनी अकल नहीं लडाता बल्कि वो अपनी अकल को मजहब के सुपूर्द करता है। मैं आपको एक लतीफा बताउं, पिछली इतवार को जब हम हजरत से मिलने आए थे, तो मुरादाबाद के एक अंग्रेजी के प्रोफेसर साहब कलिमा पढने आए हुए थे, बहुत मुहब्बत और अकीदत से उन्होंने हजरत से कलिमा पढाने को कहा, हजरत ने उन्हें कलिमा पढवाया, हजरत ने कलिमा पढवाने से पहले कहा अपने मालिक को राजी करने के लिए और इस इरादे से कि मैं अपनी जिन्दगी अल्लाह के आखिरी कानून ‘‘कुरआन मजीद‘‘ को मान कर, और अल्लाह के आखिरी रसूल सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने जो जिन्दगी गुजारने का तरीका बताया है उसके मुताबिक गुजरने के अहद अर्थात वादे की नियत से कलिमा पढ रहा हूं, पहले हम कलिमा अरबी में पढेंगे और फिर हिन्दी अनुवाद कहलवादूंगा, हजरत ने कहा जिस तरह मं कहूं कहिए, हजरत ने कलिमा कहलवाना शुरू किया ‘‘अशहदु अन्ला इलाहा इलल्लाह‘‘ यह कहते हुए हजरत के कान में खुजली आ रही थी, हजरत ने दायें हाथे से कान खुजलाया, तो प्रोफेसर साहब ने भी दायें हाथ से कान खुजलाया, हजरत ने कहलवाया ‘‘व अशहदू अन्ना मुहमदन अब्दुहू व रसूलू‘‘ सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम , हजरत की नाक के उपर एक दाना सा हो रहा था, हजरत ने बाएं हाथ से नाक पर हाथ फेरा, प्रोफेसर साहब ने भी नाक को पकडा, हम सभी को हंसी आगयी, हजरत को भी हंसी आ गयी, प्रोफेसर साहब अजीब से हो गए, हजरत ने बताया कि असल में मेरे कान औरनाक पर खुजली आ रही थी, कलिमा पढते हुए किसी ऐक्शन की जरूरत नहीं, बल्कि अन्दर से यकीन और विश्वास की जरूरत है, प्रोफेसर साहब बोले कि मजहब का मामला है, धर्म में आदमी अपनी अकल को मालिक के हुकुम के सुपुर्द करने आता है, मैं यह समझा कि कान नाक पकड कर अहद (प्रतिज्ञा) करना है, इस लिए मैं ने ऐसा किया, हजरत साहब ने समझाया कि इस्लाम इलम और अकल को मुतमईन करने वाला मजहब है, अहमद साहब इस लिए में ने बावजूद यह कि मेरी अकल कह रही थी कि यह पीर बाबा का नाटक है, मगर वो जैसा कहते गए मैं ने किया, मुरीद होकर पहले हफते की नमाज, रोजा, इबादात की फीस दस हजार रूपए, और मिठाई के लिए दो सौ रूपए में ने एडवांस में पीर साहब को जमा करा दिए।

अहमदः माशा अल्लाह ऐसे मुरीद खरी फीस अदा करने वाले कहां किसी को मिलते होंगे इसके बाद आप माहाना जमा करत रहे?
अब्दुर्रहमान: मौलाना अहम! दस हजार तो जमा करता ही थी, इसके अलावा पीर साहब आंखें लाल पीली करके मुटठी भी खोलते थे कि आज तुम्हारे लिए शुशखबरी है, तुम्हारे दरजे आसमान की तरफ चढ रहे हैं, इसकी खुशी में फरिश्तों को मनाने के लिए अब इस चीज की जरूरत है। आठ साल हो गए इस्लाम कुबूल किए, ओसतन बीस हजार रूपए माहाना मैं ने पीर बाबा को जरूर दिए होंगे।

अहमदः इतने पैसे पीर बाबा को देते थे। आपका कारोबार क्या है?
अब्दुर्रहमान: मेरा एक महूर ब्यूटी पार्लर है, मैं और मेरी बीवी दोनों उस में काम करते हैं।

अहमदः इसमें इतनी आमदनी हो जाती है, आपकी फीस क्या है?
अब्दुर्रहमान: मालिक का करम है, काम बहुत अच्छा है, मेरी बीवी दुल्हन बनाने की फीस पचास हजार रूपए भी ले लेती हैं।
  • The Quran Pen – It is a Multi Langauage translation with 8GB Memory. This Pen can read any Verse, Surah and Page of the given Holy Quran Book by just touching the Pen pointer at any Verse, Surah Title & Page number. This Package comes with Hardcover Tajweed Quran, Sahih Muslim, Sahih Al-Bukhari, Qaida Noorania, Talking Dictionary, Hajj & Umrah Booklet and Electronic Pen ****Translations: URDU (Like hindi), English, Tamil, Malayalam, Bangali. Fersia, 6 (Recitation of quran (Qirat 15 Qurra)
buy amazon

अहमदः तो पीर बाबा की क्या खता है। आप भी भरते के लिए लेते हैं, पीर बाबा भी रूप भरने के लिए ही लेते हैं।
अब्दुर्रहमान: बात तो आपकी ठीक है, जब मैं हजरत से पिछले दिनों बैत (भक्ति प्रतिष्ठा)  हुआ था तो हजरत ने मालूम किया था कि आप का कारोबार क्या है? मैं ने कहा कि ब्यूटी पार्लर है, तो हजरत ने फरमाया कि रोजगार पाक और हलाल होना चाहिए, मैं ने हजरत से कहा कि मैं आज से ब्यूटी पार्लर बंद कर दूं, हजरत ने फरमाया कि कोई अच्छा हलाल तैयब रोजगार तलाश करें, बिल्कुल हराम तो नहीं हां अच्छा नहीं, जब दूसरा रोजगार मिल जाए तो इसको छोड देना, हां अलबत्ता तब तक मुफती साहब का नाम बताया कि उनसे मालूम करें कि ब्यूटी पार्लर में क्या कर सकते हैं और क्या नहीं, इसका खयाल करें, मैं ने कहा कि हजरत मैं ने देवियों को राजी करने के लिए इतनी कुरबानियां दी हैं, मैं अपने अल्लाह को राजी करने के लिए आप से  (भक्ति प्रतिष्ठा) बेअत हुआ हू, अगर मेरे अल्लाह की रजा जान देने में है तो मैं जान देने के लिए तैयार हो कर आया हूं, आप मुझे बस हुकुम करें।

अहमदः हजरत से आप मुरीद हो गए, आप तो पहले पीर बाबा से मुरीद थे, अब दोबारा मुरीद कैसे हो गए?
अब्दुर्रहमान: असल में मैं तीन साल से हजरत से मिलना चाह रहा था हजरत को फोन करता था, पहले मिलता ही न था तो हजरत सफर पर होते, दस रोज पहले मैं ने फोन किया तो फोरन कहा कि मैं आठ साल पहले मुसलमान हुआ हूं, मुझे जिन मौलाना साहब ने हजरत का पता दिया था उन्हों ने कहा था कि अपना नाम बताने से पहले यह बता देना, फिर हजरत कहीं न कहीं मिलने की शकल बता देंगे। मैं ने जब कहा कि मैं तीन साल से आप से राबता करने की कोशिश कर रहा हूं, हजरत ने बहुत माजरत की और फरमाया कि इतवार के रोज ‘शाहीन बाग‘ आप आ जाएं, बहुत लोगों को मैं ने बुला लिया है, मगर फिर भी आप की जियारत हो जाएगी।
अहमदः हजरत का पता आपको किसने दिया था?

अब्दुर्रहमान: मुझे एक मौलाना साहब ने हजरत की किताब ‘‘आपकी अमानत आपकी सेवा में‘‘, ‘‘हमें हिदायत कैसे मिली‘‘ और ‘‘नसीमे हिदायत के झोंके‘‘ खरीद कर लाकर दी थी, मैं ने वो पढी, असल में मैं अपने पीर बाबा की मुसलसल ठगी और जुल्म से परेशान था, और मैं आठ साल तक इस मुरीदी से यह बात समझा कि मजहब के नाम पर शिर्क(अनेकश्वरवाद), धर्म के नाम पर सब से बडा अधर्म धार्मिक पंडितों ने कैसे चलाया, शिर्क के नाम पर लोगो को गुलाम बनाकर उनको ठगने का नाम शिर्क(बहीश्वरवाद) है, मजहब इन्सान की अन्दरूनी प्यास है, उसकी आत्मा यह मांगती है कि वो अपने खुदा को राजी करे उसके लिए उस से जो कुरबानी मांगी जाए इन्सान देता है, तकरीबन बीस हजार रूपए मेरी माहाना फीस के अलावा पीर बाबा ने मुझ पर न जाने क्या क्या जुल्म किए। मेरी लउकी बहुत खूबसूरत थी, इन्टर में पढ रही थी अचानक एक जुमेरात में मैं पीर बाबा के पास गया, हर जुमेरात को कुछ हदिया ले कर जाना पडता था, मैं पहुंचा तो पीर बाबा बहुत खुश थे, बोले अब्दुर्रहमान तेरे लिए मैं जो इबादत कर रहा हूं वो मालिक के यहां बहुत कुबूल हो रही है, पीर और मुरीद का रिश्ता तो आक़ा और गुलाम का होता है, मगर शायद तुझे अपने पीर के बराबर दरजा मिलने वाला है, आज उपर से मुझे इशारा हुआ है, अब्दुर्रहमान पहले ही तुम्हारा गुलाम है, मगर उसकी अकीदत हमें बहुत कुबूल है, अपने बेटे से उसकी बेटी और फिर अपनी बेटी से उसके बेटे की शादी करदो, यह एजाज़ बेटा तुम्हें मुबारक हो, तुम्हारी औलाद ने कैसा नसीब पाया है, पीर के बेटे और बेटी से आसमान से रिश्ता जुडवा लिया है, मैं ने कहा अगर मेरे मालिक का यह हुकुम है तो मैं हाजिर हूं, मैं घर आया अपनी बीवी से बताया, बच्चों से मशवरा किया, घर वाले तैयार नहीं थे, घर में मैं ने उनको मालिक के गुस्से से डराया, वहां से हुकुम हुआ है तो मानना चाहिए, मालिक ने औलाद दी है तो उसके हुकुम को मानना चाहिए।

अहमदः आपको यह बात ढोंग नहीं लग रही थी?
अब्दुर्रहमान: दिल में बात आई थी कि शायद यह भी नाटक और ढोंग है, मगर यह भी डर लगता था कि सचमुच मालिक का हुकुम होगा और न माना तो बर्बाद हो जाएंगे, कभी कभी दिल करता, फिर दिल को समझाता, अगर मेरे मालिक के नाम पर धोका है तो उसकी मुहब्बत में धोका खाना भी अच्छा है, बस इस लिए सब कुछ करते रहे।

अहमदः आगे क्या हुआ आप ने शादियां कर दीं?
अब्दुर्रहमान: मेरी लडकी छोटी थी और पीर बाबा की लडकी छ साल बडी थी, मगर उन्होंने कहा कि उपर से इशारा है कि पहले तुम्हारी लडकी की शादी हो, बीवी को खिदमत करनी पडती है, पहले पीर की लडकी से खिदमत कराना बे अदबी है, पहले अपनी बेटी को खिदमत के लिए पेश करो, शदी से पहले हमसे पीर बाबा ने कहा तुम मुरीद हो और में पीर हूं, अल्लाह की मुहब्बत में यह रिश्ता है, इसमें जो भी आप पीर बाबा को अपनी लडकी के जहेज में दोगे वो जन्नत में मिलेगा, मैं ने कहा अल्लाह की मुहब्बत में हर चीज मेरी जानिब से है, आप हुकुम करो, पीर बाबा ने कहा तुम्हारी बेटी मेवात आया जाया करेगी, उसके अलावा हमारे पास भी सवारी का साधन नहीं है, एक ए सी गाडी दो, मेरा मकान तुम्हारी लउकी के लायक नहीं है, मेवात में मकान दोबार बनवाना पडेगा, इसके अलावा और घर में जरूरत का सामान तुम्हारी बच्ची चाहे, हम तो फकीर आदमी हैं, हमारे पास तो बोरिए के अलावा कुछ भी नहीं, बहरहाल तकरीबन 28-29 लाख रूपए शादी में खर्च किए, एक साल बाद फिर मेरी लडकी की शादी का हुकुम उपर से आने की खबर दी, वो बोले तुम मुरीद हो मैं पीर हूं हम तुम्हें जन्नत और विलायत के दरजात जैसी कीमनी चीज दिलाते हैं, अगर मुरीद अपने पीर से जहेज वगेरा का मुतालबा करे तो मुरीदी टूट जाएगी, उनकी लडकी जो कपडे पहन कर आई सारे मैं ने ही बनाए, एक सूई भी वो जहेज में न लाई
अहमदः आप यह सब कुछ करते रहे आज कल अकल का जमाना है, और आप शहर के रहने वाले पढे लिखे ग्रेजवेट हैं, बच्चे पढे लिखे हैं, आपकी बीवी पढी लिखी हैं?
असल में दिल तो टूटता रहा, मगर बस वही बात कि मालिक के नाम पर धोका खाना भी एक मजा देता है, हम सब यह करते रहे।

अहमदः उन पीर साहब से अब भी ताल्लुक है?
अब्दुर्रहमान: असल में नव मुस्लिमों के इन्टरव्यू की किताब ‘‘नसीम-ए-हिदायत के झोंके‘‘ ने दिल तो हटा दिया था, मगर अब रिश्तों की वजा से जाहिरी तौर पर निभाते रहे। मगर अब जालिम ने मेरी बच्ची को सताना शुरू कर दिया है, पीर बाबा की बीवी ऐसी जालिम औरत है कि बस अल्लाह पनाह में रखे, अब उसके जुल्म से खुद उसका बेटा भी आजिज आ गया है, और उसने खुद से कहा कि इन धोकबाजों के चक्कर में न आएं। असल में अल्लाह ताला को हम पर तरस आया, उसके नाम पर धोका हमने चूंकि उसकी मुहब्बत में खाया था, इस लिए खुद पीर बाबा का बेटा हमारे लिए पीर बाबा के बन्धन से छुडाने का जरिया अना। पीर बाबा का बेटा जो हमारा दामाद है जावेद वो एक साथी के साथ हजरत से मिला, दूकान न चलने की शिकायत की, हजरत ने उसको किसी एक नमाज के बाद एक तस्बीह इस्तगफार और हर महीने में तीन दिन तीन महीने तब्लीगी जमात में लगाने का मशवरा दिया और फरमाया कि उम्मीद है कि इन्शा अल्लाह कारोबर चल जाएगा, वो नमाजें पढता था, उसने इस्तगफार नमाज के बाद पढने के लिए रात की नमाज ईशा पढना शुरू की और जमात में तीन रोज तीन महीन तक लगाए, तीसरे माह अमीर साहब ने चार माह का इरादा कर वा लिया, अल्लाह का शुक्र है वो जमात से जुड गया और वो आज हजरत से बेअत भी हुआ, उसने ज्यादा जोर दिया कि हम सब घर वाले हजरत से बेअत हो जाएं, यह अलग बात है कि अल्लाह ताला ने मुझे और मेरी बीवी को एक हफते पहले ही तौफीद दे दी, मेरी बीवी और बच्चे सब यह कह रहे थे कि डेडी असल में आज ऐसा लगा जैसे हम आजाद हो गए, हमारे घर में नव मुस्लिमों के इन्टरव्यू की किताब ‘‘नसीम-ए-हिदायत के झोंके‘‘ बहुत दिनो से बच्चे पढते हैं, मेरे दोनों बेटे उसके बाद से जुमेरात को मरकज भी जाने लगे हैं, अब मेरा भी जमात में वकत लगाने का इरादा है, हजरत ने भी मशवरा दिया है कि चार महीने लगा दूं।

अहमदः माशा अल्लाह वाकई आपकी बात भी खूब है कि आप को बंदर ने मुसलमान बना दिया है, अच्छा आपके इलम में है कि आपका यह इन्टरव्यू हमारे यहां मेगजीन ‘अरमुगान‘ में छपने के लिए है आप उसके पढने वालों को कोई सन्देश देगें?
पूर्व ब्रह्मण अब नव मुस्लिम अब्दुर्रहमान: मैं सन्देश या पैगाम क्या दे सकता हूं, सच्ची बात यह है कि मैं सिर्फ एक हफ्ते का मुसलमान हूं, मैं अपनी जिन्दगी के तजरबे से दो बातें कहता हूं कि बहेसियत मुसलमान हमारी जिम्मेदारी है कि हम शिर्क(अनेकश्वरवाद) के वास्ते से मजहबी गुलामी में जकडी इन्सानियत को एक अल्लाह के सामने खडा करके और उस सच्चे मालिक से जोड कर आजाद कराने की कोशिश करें। अगर हम ऐसा नहीं करेंगे तो अल्लाह ताला मजलूम और सिसकती इन्सानियत के गले से शिर्क (अनेकश्वरवाद) के फंदे और बेडियां काटने के लिए बंदरों को भेज कर यह काम करा लेंगे,
दूसरी बात यह भी दिल में आई है कि अल्लाह की मुहब्बत में उसको राजी करने की नियत से इतना धोका खाने और कुरबानी देने के बदले में अल्लाह ताला ने हम पर तरस खाया और खुद पीर बाबा के बेटे को उस चंगुल से निकाला और हमें निकलवाया। तो अगर उसके नाम पर इस्लामी और शरई क़ायदों को जान कर कुरबानी दी जाएगी तो वो अल्लाह कितना नवाजेंगे, इसका अन्दाजा मुश्किल है।

अहमदः आपने अपने खानदान पर काम का कुछ इरादा किया, आपने हजरत से इस सिलसिले में कुछ नहीं कहा?
अब्दुर्रहमान: ऐसा नहीं होसकता, पहली मुलाकात में सबसे पहले हजरत ने यह कहा कि यह ईमान आपका जब ईमान है, जब यह यकीन हो कि ईमान के बगैर निजात मुक्ति नहीं, और जब यह यकीन है तो आप कैसे इन्सान हैं कि आपके सामने आपके भाई बहन रिश्ते दार बेकार नष्ट हो जाएं। और यह ईमान और बढेगा, जब आप सारी इन्सानियत की फिकर करेंगे और खास तौर पर रिश्तेदारों और खानदान वालों का और भी ज्यादा हक है। अलहम्दु लिल्लाह मैं ने इरादा ही नहीं क्या बल्कि बात करना शुरू कर दी है, आपसे दुआ की दरखास्त है कि अल्लाह ताला की हिदायत से हमारे सब रिश्ते दार इस्लाम में आ जाएं।

अहमदः आमीन, बहुत बहुत शुक्रिया, अस्सलामु अलैकुम
अब्दुर्रहमान: वालैकुम सलाम
........
साभार उर्दू मासिक पत्रीका ‘अरमुगान‘ जुलाई 2012

Urdu men idhar padhen
جناب عبد الرحمن سے ایک گفتگو
newmuslimsindia.blogspot.in/2012/06/new-muslim.html

नोटः लगभग 20 साल के ऐसे मासिक इन्टरव्यु ‘‘नसीमे हिदायत के झोंके‘‘ नाम से उर्दू के साथ साथ हिन्दी और इंग्लिश में भी छप चुके हैं।


 کتاب ’’نسیم ہدایت کے جھونکے‘‘ ان نو مسلم بھائیوں بہنوں کے انٹرویوز کا مجموعہ ہے  جو خداوند عالم کی توفیق و عنایت اور داعیِ اسلام حضرت مولانا محمد کلیم صاحب صدیقی اور ان کے  رفقاء کی کوششوں سے نعمت اسلام اور ہدایت کے نور سے سرفراز ہوئے ان نو مسلم بھائیوں کے قبول اسلام کےانٹرویوزماہ نامہ ’’ارمغان‘‘ میں مسلسل شائع ہوتے رہے ہیں اور الحمد للہ یہ سلسلہ اب بھی جاری ہے۔


Nasim e hidayat ke Jhonke Vol. 1 to 6 [ urdu ] نسیم ہدایت کے جھونکے  

This book Set is collection of interviews with newly converts to Islam who got guidance and Allah's blessing due to efforts of made preaches of Islam Hazrat Maulana Muhammad Kaleem Siddiqui and his associates. These interviews were published in Urdu Monthly "ARMUGHAN" and the series still continuing. This magazine is edited by Maulana Wasi Sulaiman Nadvi under the patronage of Hazrat Maulana Muhammad Kaleem Siddiqui
---------------------------------------------------------------------------------
"नसीमे हिदायत के झोंके" उन नो मुस्लिमों के इंटरव्यू का संग्रह है जो अल्लाह के आशीर्वाद से मौलाना कलीम सिद्दीकी और उनके साथियों की कोशिशों  से इस्लाम धर्म  में आये, ये साक्षात्कार फुलत, उत्तर प्रदेश की  उर्दू मासिक पत्रिका अरमुगान में छप चुके हैं।



Nasim e hidayat ke Jhonke Vol. 1 to 6 [ hindi ] नसीमे हिदायत के झोंके