Thursday, August 1, 2019

Quran enemy now Friends - armughan aug 2019 'अरमुगान' Aug 2019

उर्दू मासिक पत्रीका 'अरमुगान'  Aug 2019 ईं में मौलाना मुहम्‍मद कलीम साहब के सुपुत्र अहमद अव्‍वाह को दिया गया interview साक्षात्कार

अहमद अव्वाह: अस्स्लामु अलैकुम,
मुहम्मद इमरान: वालैकुम सलाम

अहमद अव्वाह: आप खैरियत से हैं, इस वक़्त कहां से आना हुआ?
मुहम्मद इमरान: अल्हम्दु लिल्लाह मालिक का करम है, बहुत अच्छा हूं, इस वक्त मैं निज़ामुददीन से आया हूं, असल में, मैं चालिस दिन की जमात में गया था, कल वापस हुआ था, फोन किया तो मालूम हुआ कि हज़रत देहली में हैं, तो खयाल हुआ यह तो लाटरी निकल गयी, कुछ ज़रूरी मशवरे भी करने थे, इस लिए यहां आ गया।
जमात
दिल्ली निजामुद्दीन में बंगले वाली मस्जिद से पूरी दुनिया में ये मुस्लिम धार्मिक सुधार आंदोलन फैला था, इस में दुनिया भर से अपनी मस्जिदों में जमा होकर फिर अपनी हैसियत के हिसाब से यानि अपने खर्च से धार्मिक यात्रा पर कहीं के लिए भी निकलते हैं, अधिकतर निजामुद्दीन से ज़रुरत के मुताबिक उन्हें किस इलाक़े में जाना है मश्वरा दिया जाता रहता है, जिस इलाक़े में जाते हैं मुस्लिम्स को धर्म की तरफ खास तौर से नमाज़  के लिए बुलाते हैं, धर्म की तरफ लौटने को कहते हैं, इस यात्रा में जो साथ चलते हैं उनकी तरबियत भी होती रहती है. इस्लाम का इसे चलता फिरता स्कूल भी कहा जाता है, अधिकतर ३ दिन को जाते हैं जो चालीस दिन की यात्रा को चिल्ला कहते हैं.  


अहमद अव्वाह: हो गयी अबी (कलीम साहब) से पूरी मुलाकात, या अभी कुछ और होनी है?
मुहम्मद इमरान: जी हां अल्हम्दु लिल्लाह खूब इतमिनान से मुलाकात हो गयी, हज़रत जी मुझे अपने साथ हरियाण के एक सफर पर ले गये थे, गाडी में खूब इतमिनान से मुलाकात हो गयी, जो बातें याद भी नहीं थीं, वो भी याद आती रहीं।


अहमद अव्वाह: जी हां! अबी से इतमिनान से मुलाकात का यही तरीका है कि उनके साथ गाडी में बैठा जाये और रास्ते में बातें कर ली जायें, सच्ची बात यह है कि हम घर वालों की मुलाकात भी इतमिनान से गाडी में ही हो पाती है, उस वक्त जब किसी को देहली से फुलत और फुलत से देहली जाना होता है।
आप का जमात में वक्त किस इलाके में लगा और आप के साथ जो जमात थी वो कहां की थी?
मुहम्मद इमरान: मेरा जमात में वक़्त भोपाल में लगा, यह मुतफर्रिक जमात थी, अमीर साहब आज़मगढ़ के थे, शिबली कालिज के एक उस्ताद, बहुत ही प्यारे आदमी थे, अल्हम्दु लिल्लाह चालीस रोज में बहुत ही फायदा हुआ, औरब हुत कुछ सीखने को मिला, दो तीन साथी बडे गर्म मिजाज के थे, बात बे बात बस आग का गोला बन जाते थे, उन में दो तो और भी ज्यादा ज्वालामुखी की तरह थे, मगर वाह रे अमीर साहब! वो ऐसी हिम्मद और सबर के इन्सान थे, जैसे समुंद्र का कलेजा था उन का।
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अहमद अव्वाह: बडी बात है, सुलझे हुए अमीर का मिल जाना, आपने अपने इस्लाम कुबूल करने का एलान कर दिया है क्या?
मुहम्मद इमरान: कुछ कुछ अपनी बीवी और बच्चे और छोटे भाई जो मेरे साथ गाज़ियाबाद में रहते हैं उनको तो बता दिया है, बल्कि मेरी अहलिया Wife ने तो अलम्दु लिल्लाह बच्चों के साथ कलमा भी पढ लिया है, भाई भी करीब हैं, जमात में गया था तो हजरत से फोन पर बात हुयी थी, हजरत ने बहुत जोर दे कर यह बात कही थी कि आप अल्लाह के रास्ते में जा रहे हैं, एक तो उसूल के मुताबिक वक्त गुजारना, उस में बरकत होती है, और सबसे बडा उसूल यह है कि अमीर की इताअत किजिये, अमीर की मन्शा के खिलाफ जर्रा बराबर कुदम ना उठायें, और इससे ज्यादा जरूरी बात यह है कि आप अल्लाह के रास्ते में जा रहे हैं, इस लिये अपने घर वालों की हिदायत अपने अल्लाह से मनवाकर लाईये, और उनका इस्लाम हैड आफिस से मन्जूर करा के लाइये, अल्हम्दु लिल्लाह मैं ने दोनों बातें का बहुत खयाल रखा, 

अमीर साहब आज रूख्सत हुए तो मुझे गले लगा कर बहुत रोये, और बोले इमरान बेटा मेरा यह बत्तिसवां चिल्ला था, इतने लोगों ने मेरे साथ वक्त लगाया, मगर जितना मान कर तुमने वक्ल लगाया मैं ने किसी साथी को ऐसा नहीं देखा, दूसरे मैं ने जब मौका हुआ, सब से ज्यादा अपने खान्दान वालों के लिए हिदायत की दुआ मांगी, और इस बार तो अुआ करते ऐसा लगा जैसे कोई कह राह है कि हिदायत मन्जूर हो गयी, एक रात मेरी आंख बिल्कुल अखीर में खुली, बस दो रकात ही तहज्जुद पढ सका, मेरा दिलबहुत दुखा और बहुत रोना आया कि शायद मेरे अल्लाह मुझ से नाराज़ हैं, अगले रोज डर की वजा से बार-बार आंख खुलती रही, दो बजे उठ कर मैं ने तहज्जुद पढी, और एक घंटा से ज्यादा दुआ मागी, दुआ मांगते मांगते ऐसा लगा कि कोई कह रहा हो, हिदायत मन्जूर हो गयी, अगले रोज एक जरूरी काम के लिए गाजियाबाद भाई को फोन किया, तो उन्हों ने मालूम किया कि आप इतने दिन के लिए कहां गये हैं, मैं ने उसको बताया कि मैं दीन इस्लाम सीखने के लिये भोपाल जमात में आया हूं, और चालीस रोज में वापस हूंगा, तो भाई बोला, भैया आप अकेले अकेले स्वर्ग में जायेंगे क्या? यहां तो आपने मुझे माता पिता के साथ भी नहीं रहने दिया और गाज़ियाबाद ले कर आ गये, मगर जमात में मुझे ले कर नहीं गये, मैं ने कहा कि अब मैं जमात में आ गया हूं, जब मैं वापस आ जाउंगा, तब तुम को जमात में भेज दूंगा।

अहमद अव्वाह: छोटे भाई जो आप के sath रहते हैं आप उनकी बात कर रहे हैं या किसी दूसरे भाई की?
मुहम्मद इमरान: जी मेरे बस एक ही भाई हैं छोटे, जो मेरे sathरहते हैं।

अहमद अव्वाह: उन्हों ने कलिमा पढ लिया है क्या?

मुहम्मद इमरान: नहीं बस मुझे उम्मीद है कि मेरे अल्लाह ने उन की हिदायत की दरखास्त मन्जूर कर ली है, इन्शा अल्लाह आज जाकर उनको कलिमा पढाउंगा।
Kalima baare men "aapki amanat aapki sewa" Book men Maulana Kaleem  kehte henमेरे प्रिय पाठको! मौत का समय न जाने कब आ जाए। जो सांस अन्दर है, उसके बाहर आने का भरोसा नहीं और जो सांस बाहर है उसके अन्दर आने का भरोसा नहीं। मौत से पहले समय है। इस समय में अपनी सबसे पहली और सबसे बड़ी ज़िम्मेदारी का आभास कर लें। ईमान के बिना न यह जीवन सफ़ल है और न मरने के बाद आने वाला जीवन।
कल सबको अपने स्वामी के पास जाना है। वहाँ सबसे पहले ईमान की पूछताछ होगी। हाँ, इसमें मेरा व्यक्तिगत स्वार्थ भी हैं कि कल हिसाब के दिन आप यह न कह दें कि हम तक पालनहार की बात पहँचाई ही नहीं गयी थी।
मुझे आशा है कि ये सच्ची बातें आपके दिल में घर कर गयी होंगी। तो आइए श्रीमान! सच्चे दिल और सच्ची आत्मा वाले मेरे प्रिय मित्रा उस मालिक को गवाह बनाकर और ऐसे सच्चे दिल से जिसे दिलों का हाल जानने वाला मान ले, इक़रार करें और प्रण करें: ‘‘अशहदु अल्लाइलाह इल्लल्लाहु व अशहदु अन्न मुहम्मदन अब्दुहू व रसूलुहू’ ‘‘मैं गवाही देता हूँ इस बात की कि अल्लाह के सिवा कोई उपासना योग्य नहीं (वह अकेला है उसका कोई साझी नहीं) और मैं गवाही देता हूँ कि मुहम्मद अल्लाह के बन्दे और उसके रसूल (दूत) हैं’’।
‘‘मैं तौबा करता हूँ कुफ़्र से, शिर्क (किसी भी तरह अल्लाह का साझी बनाने) से और हर प्रकार के गुनाहों से, और इस बात का प्रण करता हूँ कि अपने पैदा करने वाले सच्चे मालिक के सब आदेशों को मानूंगा और उसके सच्चे नबी मुहम्मद (सल्ल.) का सच्चा आज्ञा पालन करूंगा।
दयावान और करीम मालिक मुझे और आपको इस रास्ते पर मरते दम तक जमाए रखे। आमीन!


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अहमद अव्वाह: माशा अल्लाह, वाकई दुआ का हक तो यही है कि बस मैं मांगू तो मेरे अल्लाह जरूर अता करें गे, अल्लाह ने आपको खूब नवाजा है?
मुहम्मद इमरान: जी अल्हम्दु लिल्लाह मेरे अल्लाह का मुझ पर बहुत बडा करम है।

अहमद अव्वाह: आप अने खानदान का तआरूफ कराईये?
मुहम्मद इमरान: मैं बुलंद शहर जिला के एक गांव का रहने वाला हूं, मेरा खानदानी ताल्लुक एक हिंदू राजपूत गोत से है, पिता जी गांव के पुराने किसान हैं, काफी पढ लिखे, वो 1960 के बी. ए. हैं, राजनिती का शौक जवानी से था, वी पी सिंह से जाती ताल्लुकात थे, एक बार जनता पार्टी से इलेक्शन भी एम एल ए का लडे थे, दो हजार वोटों से हार गये थे।
मैं ने कुरआन मजीद दो महीने तक एक एक लफज़ पढा, अंग्रेजी और हिंदी दोनों में इस का टरांसलेशन, मगर मुझे कुरआन मजीद में वो आतंकवादी की बातें नहीं मिलीं जो मैं सुना करता था, मैं ने दुखा कि कुरआन मजीद के उपर एक स्टीकर लगा है जिस पर एक फोन नंबर लिखा है, वहां लिखा था, इस्लाम की मालूमात या पुस्तकें हासिल करने के लिए इस फोन नंबर पर राबिता करें, जब मैं ने उस नंबर पर फोन किया तो एक मौलाना से बात हुयी, मैं ने उनसे कहा कि मेरठ सिटी पब्लिकेश से मैं ने कुरआन लिया है, और दो हफते में शब्द शब्द पढ लिया है, मगर हिंदुओं को कतल करने और आतंकवाद कीबात मुझे नहीं मिल पायी, वो बोले कि आप मेरठ आते हैं, मैं ने कहा कि मेरठ तो मेरे बहुत क्लाईंट हैं, वो बोले आप हमारे यहां आईये, फिर मैं खोल कर दिखाउंगा कि कुरआन मजीद में आतंकवाद की बातें कहां कहां हैं, मुझे दूसरे रोज ही मेरठ एक आफिस में काम था, आफिस का काम करके में तीन बजे मौलान के पास गया, मौलाना ने अच्छा नाश्ता कराया, और बोले आप को मालूम है कि कुरआन मजीद का ओथर और राईटर कौन है? 

मैं ने कहा मेरे लिये यह भी सरपराईज है, मैं समझता हूं कि कुरआन मजीद किसी इन्सान की लिखी हुई पुस्तक है, मगर कुरआन में बार बार यह आता है कि हम ही अकेले तुम्हारे मालिक और रब हैं, मौलाना साहब बोले हज़रत मुहम्मद साहब तो पढे लिखा थे ही नहीं, और उपर वाले मालिक ने उन्हें इस लिये पढा लिखा नहीं बनाया था कि, एक तो वा सारे संसार के गुरू थे, अगर उनको कोई पढाता तो वो उनका गुरू होता, और गुरू का मर्तबा शागिर्द से बढा हुआ होता, दूसरे लोग यह कहते कि कुरआन मजीद मुहम्मद साहब ने खुद लिख लया है, कुरआन मजीद ऐसे मालिक का कलाम और उसकी लिखी हुई किताब है जो सारे संसार को पालने वाला और सारी माओं को मामता देने वाला है, भला ऐसा दयालू और कृपालू मालिक अपने बंदों को ऐसी शिक्षा कैसे दे सकता है कि वो किसी को कतल करें, और अत्याचार और जुल्म करें, शैतान जो इन्सान का दुश्मन है और सच्चे मार्ग से बंदों को हटाना चाहता है, उसी ने लोगों में यह बात फैला दी है कि कुरआन आतंकवाद की किताब है, मैं ने कहा कि आप मुझे पच्चिस कुरआन मजीद दे दें, मैं अपने सारे साथियों को कुरआन पढवाना चाहता हूं, हमारे सारे साथियों में हमेशा यह बात होती रहती है कि कुरआन तो आतंकवाद की किताब है, और में उसमें हिंदुओं का कतल करने को कहा गया है, मौलाना ने एक पेटी जिस में पच्चिस कुरआन मजीद थे, वो अपने एक साथी के जरिये मेरी गाडी में रखवा दी, मैं ने उनसे पैसे लेने के लिए कहा, मौलाना ने कहा कि यह तो फ्री डिस्टिरीब्यूशन के लिए हैं, मैं ने कहा दोबारा भी तो प्रिंट कराने होंगे, मौलाना मना करते रहे और मैं ने पांच हज़ार रूपए जबरदस्ती उनकी जेब में डाल दिए।
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अहमद अव्वाह: उसके बाद आने सब साथियों को वो कुरआन मजीद पढवाए?
मुहम्मद इमरान: जी मैं बहुत जोर दे कर साथियों को वो कुरआन मजीद बांटे और जोर दे कर पढवाये, और खुद भी एक बार और कुरआन मजीद पढा, कुरआन ने मेरी आंखें खोल दी, उस के बाद मैं ने नेट पर इस्लाम को और जानने की कोशिश की, और जैसे जैसे में इस्लाम को पढता गया और हजरत मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम के जीवन के बारे में जानता रहा मेरा हर दिन नयी खोज और तलाा का दिन लगता था, बाद में हजरत को यूटयूब पर सुनना शुरू किया, मौलाना तारिक जमील साहब को भी सुना, गाजियाबाद एक मौलाना साहब ने मुझे हजरत का फोन नंबर दिया, और एक दिन हजरत मुम्बई थे, फोन पर ही हजरत ने मुझे कलिमा पढाया।
विजय नगर के एक मौलाना साहब के साथ दिल्ली ओखला, शाहीन बाग में हजरत से मुलाकात हुई, हजरत ने घर वालों को दावत देने पर जोर दिया और बताया कि उस यकीन और विश्वास के साथ आपने कलिमा पढा है कि ईमान के बगेर निजात, मोक्ष और मुक्ति नहीं है, बल्कि इस कलिमे के बगेर हमेशा की नर्क है, तो यह ईमान आपका कुबूल है, और जब यह बात बिल्कुल सच्ची है कि ईमान के बगेर हमेशा की नर्क में जलना पडेगा, और सांस का कुछ पता नहीं कि कौन सा सांस आखरी सांस है, तो वो मां जिसने पेट में रखा, किस किस तरह दूध पिलाया, कितनी तकलीफें झेल कर परवरिश की, वो नर्क में जाये और हम स्वर्ग में, तो हम मुसलमान तो किया, इन्सान कहलाने के लायक भी नहीं हैं, वो बाप जिन्हों ने कितनी कुरबानी दे करके साथ हमें पाला और पढाया, वो भाई बहन जिन्हों ने कितनी मुहब्बतें दीं, वो बीवी जो सब कुछ छोड कर आपके लिये आयी, वो नन्हे नन्हे बच्चे जो घर की रौनक हैं अगर नर्क में जायें और हम जन्नत में मजे करें तो हम कैसे मुसलमान हैं, इस लिये अब दिल से, अल्लाह से घर वालों के लिये हिदायत की दुआ किजिये, और खूब उनकी खिदमत और मुहब्बत करके दिल में जगह बना कर उन्हें दावत दिजिये।

अहमद अव्वाह: आपने उन सब लोगों को दावत दी?
मुहम्मद इमरान: जी मालिक का शुकर है पूरी कोशिश की, मेरे बीवी बच्चे तो एक महीने के बाद ही मेरे साथ मुसलमान हो गये थे, भाई जरा समझने की कोशिश कर रहा है, और कुछ वक्त सोचने के लिए कहता है, इन्शा अल्लाह आज मेरा दिल कह रहा है कि वो जरूर कलिमा पढ लेगा।

अहमद अव्वाह: अबी कह रहे थे कि आपके दो साथी भी मुसलमान हो गये हैं?
मुहम्मद इमरान: जी अल्हम्दु लिल्लाह! मेरे दो साथी, एक नोएडा में और एक दिल्ली में कलिमा पढ चुके हैं, मेरे आफिस के भी तीन लडके कलिमा पढ चुके हैं, कुछ और लोग भी दीन को पढ रहे हैं।

अहमद अव्वाह: अपने माता पिता से भी आपने कोई बात की?
मुहम्मद इमरान: अभी हम ने उनको नहीं बताया कि हम मुसलमान हो गये हैं, छोटा भाई कलिमा पढ लेगा तो हमारे लिए काम आसान हो जायेगा, मेरी माता जी अगले महीने हमारे यहां एक महीने रूकने के लिए आने वाली हैं, मेरी अहलिया के बच्चा हाने वाला है, इन्शा अल्लाह वो आयेंगी तो जरूर वो भी ईमान ले आयेंगी, मुझे उम्मीद है मेरी दुआयें मेरे अल्लाह ने जरूर कुबूल की हैं, मैं ने एक हजार हिंदी और हजार अंग्रेजी कुरआन मजीद के टरांसलेशन छपवाये हैं, इन्शा अल्लाह मेरा इरादा है कि मैं ज्यादा से ज्यादा लोगों तक कुरआन पहुंचा दूंगा, ताकि मेरी तरह कुरआन मजीद को आतंकवाद की किताब समझने वालों की आंखों से परदे हटें।

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aapki amanat 
अहमद अव्वाह: माशा अल्लाह, आपके इल्म में है कि मैं यह बातें आप से हमारे यहां निकलने वाली उर्दू मंथली मैगजीन अरमुगान के लिए कर रहा हूं, इसके पाठकों के लिए आप कोई खास पैगाम संदेश देना चाहेंगे?
मुहम्मद इमरान: मैं दो दिन का मुसलमान इन पढे लिखे मुसलमानों के लिए क्या संदेश दे सकता हूं, बस हाथ जोड कर बिनती निवेदन ही कर सकता हूं, मुझे एक बार खुश किस्मती से हजरत की बात, पास वाली मस्जिद जो सेंटर के पास है, सुनने का मौका मिला, हजरत ने मेरे दिल के अंदर की बात कह दी, कि यह जमाना इल्म और अकल का जमाना है, अब इन्सान हर बात को इल्म और अकल की तराजू पर परखता है, और इल्म और अकल वाले इन्सान को सिर्फ इस्लाम ही सेटिसफाई कर सता है, पूरी दुनिया को शांति और चैन की तलाश है, और आत्मा की शांती सिर्फ इस्लाम में है, हमें जो इस्लाम के खिलाफ माहौल लग रहा है यह असल में हक और सच की कमी है, और किसी चीज की कमी को उसके खिलाफ माहोल नहीं समझना चाहिए, यह खिलाफ कहना ऐसा है जैसे कोई कहे कि सख्त गर्मी हो रही है, गर्म हवायें चल रही है, हर इन्सान प्यासा है, जबां पर पियास की वजह से कांटे पडे हुए हैं, और होंटों पर खुश्की की वजा से पपडियां जम रही हैं, ऐसे में ठंडे पानी और शर्बत की बात कर रहे हैं, कितनी मुखालिफ बात कर रहे हैं, ऐसे वक्त में आप ठंडे पानी का गिलास प्यासी इन्सानियत के होंटो पर एक बार लगा दिजिये, फिर आप पिलाना ना भी चाहेंगें, तो लागे खुद छीन कर पीने को तैयार होंगे, इस्लाम और हक की प्यासी इन्सानियत को किसी तरह चाहे इस्लाम के खिलाफ परोपगेंडे की वजह से ही, किसी को पढने का मौका मिल जाता है, तो लोग प्यासे की तरह छीन कर पीने को तैयार हैं, मैं और मेरे दो साथी बिल्कुल इस्लाम के ऐसी ही प्यासे थे जिन्हें इस्लाम की मुखालिफत के जमाने में इस्लाम का, रूह को ठंडा करने वाला जाम हमारे होंटो को लगा, और हम ने छीन कर खुद ही पी लिया, ऐसे में हम अगर अपनी दावती जिम्मेदारी अदा ना करें, तो यह तो इन्सानियत पर बहुत बडा जुल्म है, अल्लाह के यहां जुल्म किसी तरह भी कालिब माफी नहीं है, इस लिए तमाम मुसलमानों को अपनी जिम्मेदारी समझनी चाहिए।

अहमद अव्वाह: जी बेशक, वाकई आने बिल्कुल सच फरमाया, बहुत बहुत शुक्रिया, अस्सलामु अलैकुम।
मुहम्मद इमरान: शुक्रिया तो आपका है आप ने मुझे इस मुबारक काम में शरीक कर लिया। वालैकुम सलाम।

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Monday, July 22, 2019

भाई हसन अब्दाल » जय वर्धन « से एक मुलाक़ात-armughaln-Oct-2008

उर्दू मासिक पत्रीका 'अरमुगान' Oct-2008 ईं में प्रकाशित मौलाना मुहम्‍मद कलीम साहब के सुपुत्र अहमद अव्‍वाह को दिया गया इन्‍टरव्‍यू interview साक्षात्कार

अहमद अवाह      : अस्सलामु अलैकुम 
हसन अब्दाल   :  वाअलैकुम अस्सलाम 

सवाल   :    हसन भाई ! आप जमात से कब लौटे और आपका वक़्त कहाँ लगा
जवाब   :  अहमद भाई में आज ही जमात मेंसे वापिस आया हूँ और हमारी जमात मथुरा में वक़्त लगाकर लूटी है

सवाल   :    जमात में कुछ परेशानी तो नहीं हुई?आपके साथ जमात कहाँ की थी
जवाब   :  अल्हम्दु  लिल्लाह जमात में वक़्त बहुत अच्छा लगा और साथीयों ने बहुत ही बहुत हमारी ख़िदमत की और हमारी जमात मुतफ़र्रिक़ थी, कुछ लोग सहारनपुर के थे तीन लोग मेवात के थे, दो-चार बिजनौर के, अल्लाह का शुक्र है और अमीर हमारे सहारनपुर  ज़िला के एक गांव के आलिम थे और बार-बार वक़्त लगा चुके थे, अल्हम्दु लिल्लाह  मुझे पूरी नमाज़  दुआए क़नूत के साथ याद हो गई
Sunein Sunayen
aapki amanat  aapki sewa men in voicehttps://youtu.be/ZOp2xxs-kMo



Book Links: "Aapki amanat aapki swea men" in EnglishHindiMalyalam text, آپ کی امانت Urdu, MarathiTamilTelguBengali, oriyaKannada & Punjabi , Gujrati and Sindhi , Roman-Urdu,,, Roman-Hindi,,,,,Languages --- 12 Languages PDF Link here-


सवाल   :    हुस्न भाई हमारे यहां फुलत से  एक उर्दू मैगज़ीन हर महीना निकलती है, इस में उन  लोगों के इंटरव्यू शाय किए जाते हैं जिनको अल्लाह ताला आज के ज़माने में अपने फ़ज़ल से राह-ए-हिदायत अता फ़रमाते हैं, अबी का हुक्म है कि आपसे उस के लिए कुछ बातें करूँ ताकि दूसरे लोगों के लिए रहनुमाई हो, खासतौर पर पुराने ख़ानदानी मुस्लमानों को इबरत हो,
  जवाब   : हाँ मौलवी अहमद साहिब मैंने मथुरा में बहुत से लोगों से अरमुग़ान का नाम सुना, हम लोग एक मस्जिद में गए तो वहां के इमाम साहिब ने मुंबई के नदीम साहिब का  इन्‍टरव्‍यू  पढ़ कर सुनाया तो मुझे बहुत अच्छा लगा और मेरे दिल में आया था कि मैं मौलाना साहिब से कहूँगा कि मेरा भी इन्‍टरव्‍यू  छपवा दें, मुझे उस का अंदाज़ा नहीं था कि मेरे कहने से पहले ही ख़ुद ही हज़रत के दिल में मेरा अल्लाह  ये बात डाल देगा, अल्लाह  की ज़ात कैसी करम वाली है कि मुझ दो महीना बीस दिन के छोटे से मुस्लमान के दिल में जो भी बात आई है मेरे अल्लाह  उसे पूरा कर देते हैं, अमीर साहिब ने एक रोज़ तालीम में अल्लाह  के नबी मूसा  का क़िस्सा सुनाया था कि वो आग लेने के लिए पहाड़ पर गए थे और उनको पैग़ंबर बना दिया गया ( रोते हुए ) मेरे मालिक ने ( मेरी जान उस के नाम पर क़ुर्बान कि मुझ गंदे को,, शिर्क और बुत  परस्ती के रास्ते पर बल्कि मंज़िल पर हिदायत दी और मेरे साथ कैसा करम है कि मेरे दिल चाह रहा था कि मैं अरमूग़ान में इंटरव्यू के लिए कहूँगा मगर अंदर से शर्म भी आ रही थी कि एक दो महीने के मुस्लमान का हाल इस काबिल कहाँ कि इस को अरमूग़ान में छपवाया जाये

सवाल:  अबी (कलीम साहब) ने रात में मुझे हुक्म कर दिया था हसन का इंटरव्यू ज़रूर लेना है, आप अपना ख़ानदानी परिचय  तआरुफ़ ) कर आईए
  जवाब   :  मैं ग़ाज़ियाबाद ज़िला के एक गांव के ब्रहमन घराने  1975 में 9 सितंबर को पैदा हुआ, पिताजी ( वालिद साहिब ) ने मेरा नाम जयवर्धन रखा, आठवीं क्लास तक गांव में एक स्कूल में पढ़ा, उस के बाद ग़ाज़ियाबाद के एक कॉलेज से एंटर क्या, उस के बाद एक दूसरे कॉलेज से बी काम किया, बी काम करने के बाद एक साल IAS कंपटीशन की तैयारी की,  पहला इमतिहान दो बार पास किया, मगर मैं इमतिहान में पास के क़रीब क़रीब रह गया जिससे दिल बहुत टूट गया, मेरे पिता जी ( वालिद साहिब )एक स्कूल में प्रिंसिपल थे, उनकी ख़ाहिश थी कि में एक-बार और कोशिश करूँ मगर दिल दुनिया से बिलकुल उचाट हो गया था, मुझे दूसरी बार बहुत उम्मीद थी कि मैं ये इमतिहान ज़रूर पास करलूंगा, मगर बिलकुल क़रीब हो कर महरूम हो जाने से मेरे दिल-ओ-दिमाग़ को बहुत सदमा हुआ और मैं घर से भाग कर हरिद्वार चला गया कि सन्यास ले लूँगा, में हरिद्वार , ऋषि कैश, उतर काशी बनारस बहुत आश्रमों में चार साल भटकता रहा, कहीं शांति नहीं मिली,दो चार महीने के बाद हर आश्रम में कोई ऐसी बात नज़र आ जाती जिससे दिल खट्टा हो जाता, हरिद्वार से एक रोज़ में अपने दो साथीयों के साथ क्लियर गया, वहां पहुंच कर मुझे शांति तो मिली


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मगर वहां का हाल भी मुझे बाज़ारी आश्रमों की तरह लगा, वहां से हम फूल चढ़ा कर वापिस आए तो एक मस्त ने मुझे पकड़ लिया और बार-बार मुझसे कहता दस रूपए मुझे दे दे अल्लाह ने तुझे अब्दाल बनाया है, मैंने कहा, में तो साधू हूँ, हरिद्वार  से आया हूँ, वो मस्त पागल मुझे छोड़ ने को तैयार ना हुआ में ने लोगों से पूछा कि ये पागल यहां कहाँ रहता है, लोगों ने कहा कि यहां का मलंग है, ये किसी से कुछ नहीं मांगता, कोई दे देता है तो खाना खाता है, वर्ना जंगलों में चला जाता है मैंने जान छुड़ाने के लिए इस को दस रूपए दीए, मैंने लोगों से मालूम किया कि ये अब्दाल क्या कह रहा था, एक साहिब वहां थे उन्होंने बताया कि अब्दाल बड़े पहुंचे हुए फ़क़ीर को कहते हैं,
 इस को मैंने दस रूपए किया दिए, मांगने वाले मेरे कपड़े फाड़ने को तैयार हो गए, हर एक मुझसे ज़िद करता कि हमें भी कुछ दो, मेरे माथे पर तिलक लगा हुआ था, मगर उस के बावजूद वहां के मांगने वालों से जान बचाना मुश्किल हो गई, वहां के ज़ाहिरी हाल से में बहुत बदज़न हुआ, मगर वहां अंद जाकर मुझे कुछ अजीब सी शांति-ओ-सुकून मिला, खासतौर पर वहां एक मस्जिद है इस में अंद र  जा कर बैठा, 
तो में दो घंटे बैठा रहा, वहां से आने को दिल नहीं चाहता था, मस्जिद में कुछ लोग सो रहे थे, कुछ लोग नमाज़ पढ़ रहे थे, वहां से वापिस हरिद्वार  आया, यहां चैन ना मिला फिर एक-बार घर चला गया घर वालों ने मुझ पर-ज़ोर दिया कि मैं आगे पढ़ाई करूँ, सी,ए कर लूं,या कम अज़ कम एमबी कर लूं, मेरा दिल कुछ इस तरह का काम करने को नहीं चाहता था तीन महीने घर रहने के बाद घर से दबाओ बढ़ा तो फिर में घर से हरिद्वार चला आया और बस ना जाने कैसी बेचैनी में दर-ब-दर मारा मारा फिरता रहा, ये मेरी पहले जन्म की कहानी है

सवाल   :    पहले जन्म का क्या मतलब
जवाब   : बस में अपनी नई ज़िंदगी को ९२ जुलाई २००८ -ए-से मानता हूँ और इस को में अपना नया जन्म समझता हूँ, इस लिए कि ज़िंदगी शिर्क में गुज़रे वो ज़िंदगी क्या ज़िंदगी है

Shandar itihas ek raat men islami desh bana




सवाल   :    अपने इस्लाम क़बूल करने का हाल बयान करईए
 जवाब   :  मैंने अभी बताया कि मेरा हाल तो ये हुआ कि मेरे अल्लाह ने शिर्क के रास्ता पर अपना दस्त-ए-रहमत मेरे ऊपर रुख के मुझे हिदायत नसीब फ़रमाई, दर बदर मारा मारा फिरता, फिर भी ऐसा लगता था कि जैसे मुझे किसी चीज़ की तलाश है, धर्म की बात जिस पर क़ुर्बानी देकर मुझे लगता के मेरा मालिक राज़ी हो जायेगा, में इस को करने की कोशिश करता, उस के लिए मैंने कावड़ ले जाने की नज़र मानी,आप जानते हैं कि महा शिव रात्रि पर सख़्त गर्मी और बरसात के ज़माना में हर की पौड़ी हरिद्वार से गंगा जल कावड़ में लेकर पैदल जहां की कावड़ से पानी चढाने की नज़र मानी जाती है वहां लेकर जाना होता है, 
सबसे ज़्यादा  पर्वा महादेव शेख़पूरा के एक मंदिर पर दसियों लाख लोग पानी चढाने जाते हैं ,ये सफ़र मौलाना अहमद साहिब बहुत मुश्किल तपस्सया ( मुजाहिदा )है में भी तीन साल से कावड़ ले जाता और किसी तरह पानी चढ़ा कर सख़्त बीमार हो जाता पिछले साल तो मैं इतना बीमार हो गया कि सोचता था कि शायद इस बार बच नहीं सकूँगा मगर मेरे मालिक ने ज़िंदगी दे दी, पांव पर इतना वर्म आ जाता है कि पांव की खाल फट कर ख़ून रिसने लगता, 
छाले ज़ख़म बन जाते में बार-बार आसमान की तरफ़ मुँह कर के मालिक से शिकायत करता और फ़र्याद भी करता कि मालिक आपने धर्म को इतना मुश्किल बना दिया है, कभी कहता क्या मेरे जल चढ़ाए बग़ैर तू  ख़ुश नहीं हो सकता ?
इस साल में कावड़ लेकर चला तो अजीब शश-ओ-पंज में था, कभी दिल में आता ये सब ढोंग है मगर अंदर से कोई कहता है कि तू सच्चा है तो तुझे इस रास्ते से ही मालिक तक पहुंचना नसीब हो जाएगा,मुज़फ़्फ़र नगर शहर में निकला तो एक कावड़ केम्प में आराम किया, मैंने सपना( ख़ाब ) देखा कि में एक मस्जिद में हूँ और जमात खड़ी है एक साहिब आए और उन्होंने मुझे दरवाज़े के अंदर जूतीयों में खड़ा देखा तो बोले बेटा ! नमाज़ हो रही है तुम नमाज़ क्यों नहीं पढ़ते ?मैंने कहा कि लोग मुझे पढ़ने नहीं देंगे में हिंदू हूँ 
वो बोले आ मैं तुझे ले चलूं मेरा हाथ पकड़ा और जमात में खड़ा कर दिया, मैंने देखा देखी नमाज़ पढ़ी, आँख खुली तो अहमद साहिब में बयान नहीं कर सकता कि कितना अच्छा लगा

Allach ka challenge

Maulana Kaleem Siddiqui Urdu / Hindi


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  थोड़ी देर आराम कर के हम चल दिए मेरे साथ हरिद्रुवार के तीन साथी और थे,रास्ते में एक मस्जिद सड़क पर थी दो बजे दोपहर का वक़्त थामें ने देखा लोग मस्जिद में नमाज़ पढ़ रहे हैं बस में बेचैन हो गया, मैंने अपने साथीयों से कहा ये मस्जिद भी तो उसी मालिक का घर है जिसके लिए हम जा रहे हैं मैं थोड़ा सा चढ़ावा वहां चढ़ा आऊँ 

तेल के लिए मुझे मस्जिद में पैसे देने हैं , कावड़ साथी को देकर में मस्जिद गया मगर डर भी लग रहा था कि नामालूम मुस्लमान क्या समझेंगे, मगर मैं अंदर से मजबूर था,मेरा दिल चाहा कि मैं जमात में खड़ा हो जाऊंगा मगर हिम्मत ना हुई,एक बड़े मियां बोले, भोले बेटा क्या देख रहा है तुझे क्या चाहीए ?
मैंने कहा अब्बा जी ! एक-बार नमाज़ पढ़ना चाहता हूँ,उन्होंने मेरा हाथ पकड़ा और कहा कि तो फिर सोच क्या रहा है और ये कह कर मेरा हाथ पकड़ कर जमात में खड़ा कर दिया, मैंने नमाज़ पढ़ी सर जब ज़मीन पर रखकर सज्दे में गया तो मुझे ऐसा लगा जैसे आज मैं मालिक के पास आया हूँ,नमाज़ पढ़ कर वापिस आया, मैंने साथीयों से अपने ख़ाब का ज़िक्र किया और नमाज़ में जो मज़ा आया उस का भी, 
साथीयों में  दो ने तो बहुत बुरा-भला कहा, मेरा एक साथी दिनेश बोला तो मुझे क्यों नहीं ले गया ?
मुझे भी दिखाता कि नमाज़ में कैसा मज़ा आता है हमारा सफ़र चलता रहा हम लोग उनत्तीस तारीख़ की दोपहर को  नहर की पटरी वाली सड़क से भोले की झाल पर पहुंचे तो ज़ुहर दोपहर की अज़ान-ए-मस्जिद में हुई में मौक़ा लगा कर कावड़ एक कैंप में रखकर दिनेश को लेकर अंदर गांव में मस्जिद में गया, चार पाँच लोगों की जमात हो रही थी, मैं जमात में शरीक हो गया मैंने दिनेश से कहा के शेष( सर ) जब ज़मीन पर रखेगा तो देखना ऐसा लगेगा जैसे मालिक के चरणों ( क़दमों ) मैं माथा रखा है, फिर देखना कैसा आनंद आएगा, नमाज़ पढ़ कर फिर हम कैंप आ गए, दिनेश ने कहा कि वाक़ई तुम सच्च कहते हो, अस्र के बाद हम लोग पूरा महादेव पहुंचे, हम लोग ख़ुशी ख़ुशी मंज़िलतक पहुंचने की ख़ुशी में बैठे हुए थे,रात बारह बजे के बाद जल   चढ़ाना था भीड़ बहुत थी दोरज़रा भीड़ से दूर, नदी के किनारे एक पेड़ के नीचे हम सो गए आ द   है घंटे में आँख खुली तो कुछ नव जो इन पास बैठे हुए थे उनके हाथ में कुछ किताबें थीं वो हमारे पास आए और हमारा पर यचे ( तआरुफ़ ) पूछा, फिर बोले हम सब एक माँ बाप की संतान हैं हम आपके हक़ीक़ी ख़ूनी रिश्ते के भाई हैं, आप लोग मालिक को राज़ी करने के लिए कैसी कठिन तपस्सया ( मजा हुदा )कर के यहां पहुंचे हैं, हमारे एक धरम गिर-ओ-हैं, उन्हों ने इंसा नों से हमारा क्या रिश्ता है और इस रिश्ता का सबसे बड़ा हक़ किया है, ये समझाने और इस हक़ को कैसे पहुंचाना जाये उस की ट्रेनिंग के लिए एक कैंप बड़ वित्त में लगा या था मस्जिद में इस के आख़िरी प्रोग्राम में हम सभी को अपनी तक़रीर में बहुत फटकार सुनाई कि ये हमारे ख़ूनी रिश्ता के भाई जो कावड़ लाते हैं कैसी मुसीबत भर कर सफ़र करते हैं और उनका, सच्चाई का रास्ता मालूम ना होने की वजह से, हर क़दम नरक की तरफ़ शिर्क की तरफ़ जा रहा है,और हम अपनी खाल में मस्त खाने और कमाने में हैं , ये कैसा बड़ा ज़ुलम है हम सारे ग़ैर मुस्लिमों को अपना दुश्मन और मुख़ालिफ़ समझते हैं , ये लाखों लोग सिर्फ मालिक को राज़ी करने के लिए इस क़दर मुश्किल सफ़र करते हैं  

मैंने कई कावड़ कैम्पों में देखा कि पांव पर वर्म छाले और ज़ख़म हो रहे हैं ,लोग उनकी मरहम पट्टी कर रहे   हैं  हम कैसे रहमत भरे नबी को मानने वाले हैं कि हम इन भाईयों को हक़ नहीं पहुंचाते, ज़रा कोशिश तो करनी चाहीए अपना समझ कर हमारे ज़िम्मा उनको सच्चाई पहुंचाना है, कम अज़ कम हमें पहुंचाना त्वचा हुए,छः सात रोज़ के कैंप में एक साथी भी कावड़ भाईयों से नहीं मिला, कल मैदान मह्शर में ये हमारा गला दबाईंगे और हम छुड़ा ना सकेंगे उनकी दर्द-भरी बातों से हमारा दिल भर आया और हमने इरादा किया कि हम कुछ भाईयों तक बात ज़रूर पहुंचाएंगे, आज हम सुबह से पच्चीस भाईयों से डरते डरते मिले हैं आपको सोते देखा तो ख़्याल हुआ कि आप अलग जगह पर हैं , आपसे इतमीनान से बात हो सकती है, अगर आपको बुरा ना लगे तो हम आपके और अपने मालिक के बारे में कुछ बातें करें,मेरे साथी दिनेश ने कहा ज़रूर बताइए,वो हमें एक मालिक और इस की पूजा के बारे में बताने लगे और इस के इलावा किसी की पूजा को पाप बता कर नरक की आग से डराने लगे और क़ुरआन की आयतें पढ़ कर सुनाएँ, वो जब अरबी में क़ुरआन पढ़ते तो हम सभी साथीयों को बहुत अच्छा लगता, आधे घंटे तक बारी बारी वो लोग बात करते रहे और जब हमने उनकी सब बातों से सहमति( इत्तिफ़ाक़ ) ज़ाहिर किया तो उन्होने हमें कलिमा पढ़ने को कहा हम चारों ने कलिमा पढ़ा, उन्होंने हमें एक एक किताब ’’ आपकी अमानत, आपकी सेवा में ‘‘ दी और बता याक़ाजिन धरम गुरु ने बड़ वित्त में कैंप लगा कर हमें झंझोड़ा था और जिनकी वजह से हम आपके पास आए हैं ये उन्हीं की किताब है,हम आपको भेंट कर रहे   हैं   इस को ग़ौर से तीन तीन बार पढ़िए, तो आपको हक़ किया है और इस्लाम लाना और कलिमा पढ़ना क्यों ज़रूरी है, मालूम हो जाएगा और फिर इस किताब में जो करने को कहा है ज़रूर करईए में ये किताब लेकर फ़ौरन पढ़ने लगा


Do Goli maarne wale ko maaf kardiya

New Muslim Interview ✔️( Maulana kaleem siddiqui ) with google / micro Voice





  मेरे दूसरे साथी भी पढ़ने लगे,हम लोग इस प्रेम भाव ( मुहब्बत )से लिखी इस किताब में बिलकुल ग़म से हो गए ये किताब पढ़ कर मुझे ऐसा लगा, जैसे ये किताब सिर्फ मेरे लिए लिखी गई हो और मैं जिस सच्चाई की तलाश में दर-ब-दर मारा फिरता रहा और तपस्सयाएं करता रहा, वो मुझे मिल गई, दिन छिपने को था,वो लोग ये कह कर जाने लगे अच्छा हम चलते हैं मैंने कहा आप तो जाते हम क्या करें,उन्होंने कहा कि आप जल चढ़ईए फिर घर जा कर सोचिए और फ़ैसला कीजिए, मैंने कहा के आप कैसी बात करते हैं ?इस किताब में शिर्क को सबसे बड़ा पाप कहा गया है और यहां जल चढ़ाना सबसे बड़ा पाप है,उन्होंने कहा कि ये कावड़ यहां आप छोड़ेंगे तो कुछ और ना हो जाये,मैंने कहा हो जाएगी तो किया है,और मैंने वो कावड़ नदी में फेंक दी और कहा कि अब किसी नमाज़ का वक़्त है कि नहीं ?उन्होंने कहा कि थोड़ी देर बाद नमाज़ का वक़्त हो जाये गा, मैंने कहा मुझे नमाज़ पढ़ने ले चलो,मेरे साथी दिनेश ने भी कावड़ डाल दी,और हम इन दोनों के साथ होलए और बड़ वित्त पहुंचे, मेरे दो साथी कावड़ले कर पानी चिढ़ाने के लिए चले गए, मगर बाद में उन्होंने भी पानी चिढ़ाने का इरादा मुल्तवी कर दिया

  सवाल   :  इस के बाद किया हुआ
  जवाब   : बड़ोत पहुंच कर उन्होंने मेरे और आपके वालिद मौलाना कलीम साहिब से फ़ोन पर बात की, उन्होंने फ़ोन पर मुझे बहुत बहुत मुबारकबाद दी और कहा कि आप सच्चे तालिब थे इस लिए मालिक ने आपको राह दिखाई,मैंने इस्लाम को समझने खासतौर पर नमाज़ सीखने का तक़ाज़ा किया, तो उन्होंने मुझे जमात में जाने का मश्वरा दिया और बताया कि पहले कचहरी जाकर किसी वकील से मिलकर क़ानूनी कार्रवाई करके और फिर दिल्ली आजाऐं में आपको किसी अच्छी जमात में भेज दूंगा, अगले रोज़ मैंने सहार नुपूर जा कर अपना बयान हलफ़ी और सर्टीफ़िकेट वग़ैरा बनवाया और फिर इकत्तीस की शाम को में और दिनेश दिल्ली पहुंचे हज़रत से मुलाक़ात की और पूरी दास्तान सुनाई,उन्होंने मेरा नाम हसन और दिनेश का नाम हुसैन रखा मैंने अर्ज़ किया कि एक मस्त ने मुझे क्लियर में बताया था कि तुझे अबदाल बनाया,इस लिए मेरा नाम अब्दाल रख दें ताकि मैं नाम का अबदाल बन जाऊं, क्या मुश्किल है कि मेरा अल्लाह मुझे पहुंचा हुआ अबदाल बनादे,मौलाना ने कहा कि अल्लाह के एक बहुत प्यारे बंदे और बुज़ुर्ग हसन अबदाल हुए हैं मैं आपका नाम हसन अबदाल रखता हूँ ताकि आप अबदाल भी अच्छे वाले बन जाये, जिस अल्लाह ने आपको परवा महादेव में शिर्क की मंज़िल पर हिदायत अता फ़रमाई और अपनी आग़ोश रहमत में आपको उठा लिया इस अल्लाह के लिए अबदाल बनाना बहुत आसान है, मौलाना साहिब ने कहा मुझे उम्मीद है आप अबदाल ज़रूर बनेंगे, इंशा अल्लाह और बल्कि अबदाल से भी आगे अल्लाह आपको कुछ बनाएँ गे, मैंने मौलाना साहिब से जब अपनी चार साला तपस्सया की बात बताई कि मैंने बरत पर बरत रखा है, तीन चिल्ले  एक टांग पर खड़ा हो कर यज्ञ किया है, छः महीने बहुत ना के बराबर सोया हूँ , कितने आश्रमों में जैसे कोई बताता रहा मेहनत करता रहा हूँ 
मौलाना साहिब रोने लगे और बोले असल में तुम्हारी इन तकलीफों के हम मुजरिम हैं कि हमने आपको बताया नहीं फिर भी अल्लाह का शुक्र है कि अल्लाह तो आपके पालनहार हैं ख़ुद ही अल्लाह ने आपके लिए राह निकाल दी, मौलाना ने मुझे एक मौलाना साहिब के साहिब के साथ मर्कज़ निज़ाम उद्दीन भेज दिया पहली अगस्त को हम जमाअत में मथुरा चले गए, जमात तीन चले की थी, आगरा मथुरा के चले के बाद मेरा दिल नहीं भरा, मेरा क़ायदा मुकम्मल हुआ, उर्दू भी मैंने पढ़ना शुरू कर दी तो अमीर साहिब ने हमें दूसरे चिल्ले में जाने का मश्वरा दिया, जमात में मेरे साथ अजीब अजीब हालात आए, एक दो दफ़ा ना जाने साथीयों से किस तरह बिछड़ गया, कुछ अजीब अजीब लोगों से मेरी मुलाक़ातें हुईं  


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उन्होंने मुझे कैसी कैसी अजीब चीज़ें दिखायीं और जब मैं ज़रा ख़्याल करता कि मेरी जमात ! तो अचानक जैसे ज़मीं मेरे पैरों के नीचे भाग रही हो, जिस तरह रेल में या गाड़ी में बैठ कर लगती है ऐसा लगता और में अपनी जमात के साथ होता ऐसा मेरे साथ ८,९ बार हुआ, मुझे ख़ाब दिखाई देता जैसे मैं परों वाला परिंदा हूँ, यहां उड़ा, वहां उड़ा, यहां पहुंचा, वहां पहुंचा सोते में मैं उड़ने लगता, एक रोज़ तालीम में फ़ज़ाइल आमाल में अब्दालों का ज़िक्र आया मैंने अमीर साहिब से मालूम किया कि अबदाल क्या होते हैं ?
उन्होंने तफ़सीलात बताएं कि अल्लाह के ख़ास बंदे होते हैं, जिनके पैरों में ज़मीन सिकुड़ जाती है, जिस तरह फ़ील्ड अफ़िसरों को गाड़ी दी जाती है इसी तरह अब्दालों  को तरह तरह के कमालात और करामात दी जाती हैं, मुझे धुन सी लग गई, 
मेरे अल्लाह मुझे तो अबदाल बनादे, पूरी जमात ये दुआ करता रहा उस के बाद मेरे साथ जमात से बिछड़ने वग़ैरा के मुआमले हुए

सवाल   : आपने अबी(कलीम साहब) से ये हालात बताए
जवाब   :दो घंटे तक हज़रत ने कार-गुज़ारी सुनी, असल में हज़रत ने मुझे सख़्ती से मना कर दिया था कि जमात में किसी को मत बताना कि मैं कावड़ ले जा रहा था और वहीं मुस्लमान हुआ हूँ, बस मैंने एक रोज़ अमीर साहिब से आख़िर में ज़िक्र किया,आज मैंने मौलाना साहिब से कहा आप दुआ  कीजिए अल्लाह मुझे अबदाल बनादे, मौलाना ने कहा कि दाल बनने से किया होगा, गोश्त बनीए अबदाल तो तुम हो ही इन्सान गोश्त का बना रहे उस के लिए ये ही बेहतर है, जब मैंने ज़िद की तो मौलाना साहिब ने कहा कि बस अल्लाह ईमान पर ख़ातमा फरमावें और अपने नबी के तरीक़े पर चला दें और सबसे ज़्यादा ये कि इन्सान बना दें, उस की दुआ करना चाहीए अबदाल होना, कशफ़ करामत की तमन्ना करना ये भी एक तरह ग़ैर ही हैं, जिस तरह देव देवता की तमन्ना करना शिर्क है इसी तरह ये भी एक तरह ख़ास लोगों के लिए शिर्क की तरह है, बस अल्लाह को राज़ी करने की फ़िक्र करना चाहीए उसके लिए दावत के काम को मक़सद बनईए, जहां तक अबदाल और ग़ौस बनने की बात है आदमी अपने अल्लाह की रज़ा में सच्चा हो तो अबदाल और ग़ौस तो यूँही अल्लाह बना देते हैं आपके हालात बता रहे हैं कि अल्लाह आपको ज़रूर अबदाल ही नहीं इस से आगे बनाएंगे

सवाल   :  अब आपका क्या इरादा है
जवाब   :  मुझे हज़रत ने चंद रोज़ के लिए एक अल्लाह वाले के यहां जाकर रहने का मश्वरा दिया है


सवाल   :    आपके दो साथी जो कावड़ में साथ थे उनका किया हुआ
जवाब   : वो घर आकर ५१ रोज़ के बाद मौलाना से आकर मिले थे, बाद में वो भी जमात में चला लगा कर आए और घर वालों पर काम कर रहे हैं

  सवाल   :  आपके साथी दिनेश कुमार का वक़्त कैसा गुज़रा
  जवाब   : अल्हम्दुलिल्लाह उस का वक़्त भी बहुत अच्छा गुज़रा वो बहुत सीधा साधा और भला आदमी है, इस के नेचर में बुराई पहले ही से नहीं है बस कलिमा पढ़ कर बहुत अच्छा मोमिन इन्सान वो बन गया, हमारी पूरी जमात में सबसे अच्छा वक़्त दिनेश का लगा, सारे साथी उस की ख़िदमत में बहुत ख़ुश थे

सवाल   : आपने साथीयों की ख़िदमत नहीं की  
जवाब   :मेरे साथ एक दो अजीब बातें हो गई थीं, इस लिए साथी मुझे ना जाने क्या समझने लगे और सब मेरी ख़िदमत करते थे मुझे ना जाने क्या-क्या कहते थे दुआ को कहते थे, मुझे डर भी लगता था कि मेरे अंदर की ख़राबी उनको मालूम हो जाएगी तो सारा भरम खुल जाएगा, में अल्लाह से दुआ भी करता था

सवाल   :  अबी (कलीम साहब) ने आपको दावत का काम करने के लिए नहीं कहा
जवाब   :  आज बैठ कर ख़ाका बनाया है, हज़रत ने मुझे कहा है कि पहले अपने को बनाने की फ़िक्र कीजिए, ये हमारा देश मुहब्बत वालों और रूहानियत वालों का देश है, अगर अन्दर को साफ़ करके और बिना के रूहानियत की तरक़्क़ी हो जाये, तो उनमें ख़ुसूसन मज़हबी लोगों में काम ज़्यादा आसान होगा, इस लिए मुझे कुछ रोज़ के लिए एक जगह भेज रहे हैं वहां ज़िक्र वग़ैरा बताए हैं दुआ कीजिए अल्लाह ताला मेरे अंदर का खोट निकाल दे और हज़रत का मेरे बारे में जो इरादा है वो पूरा हो जाये

सवाल   : इंशाअल्लाह, अल्लाह ताला ज़रूर पूरा करेंगे, बहुत बहुत शुक्रिया, हसन भाई किसी वक़्त हुसैन भाई से भी मिलवाइए, ताकि उनसे भी बातें की जा सकें
जवाब   : जब आप कहेंगे में उनको इंशाअल्लाह बुला दूंगा   

  सवाल   :अस्सलामु अलैकुम،बहुत बहुत शुक्रिया  
  जवाब   :अहमद भाई अल्लाह का लाख लाख शुक्र है कि अल्लाह ने मेरे दिल की चाहत पूरी करा दी अरमूग़ान में मेरी कार-गुज़ारी आएगी और आपका भी शुक्रिया, धन्यवाद 
        
with thanks
माहनामा अरमूग़ान, अक्तूबर  2008